सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 411

पाँचवाँ अध्याय ] ३९७
जगती और अतिजंगती है । यह जो कुछ संसार में हैं वह या
तो जगत् ( जंगम ) है या अति जगत् ( या स्थावर ) । यह
सूक्त मरुत का है । मरुत जल हैं । जल अन्न हैं जो भरे जाने
चाहियें । इस प्रकार वह यजमान को अन्न से युक्त करता है ।
यह जो नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि और एवयामरुत
सूक्त हैं यह सहचर कहलाते हैं । उनको दूसरों के साथ साथ
पढ़े । अगर दूसरों के साथ न पढ़ना चाहे तो न पढ़े । इनको
अलग पढ़ना ऐसा ही है जैसे किसी पुरुष को उसके वीर्य से
अलग करना । इस लिये या तो इनको दूसरे सूक्तों के साथ
पढ़े या न पढ़े ।
अश्व के पुत्र अश्वतर के पुत्र बुलिल ने विश्वजित यज्ञ में
होता बनते हुये इन शिल्पों के विषय में ऐसा विचार किया
था :- “संवत्सर के विश्वजित् यज्ञ में मध्यसवन में दो शस्त्र
( मैत्रावरुण और ब्राह्मणाच्छंसी ) बढ़ाने के बाद मैं 'एवया-
मरुत' सूक्त पढूँगा ।” उसने ऐसा ही किया । जब वह पढ़
रहा था तो गौशल आया । और कहने लगा “होता, यह
तेरा शस्त्र बिना पहियों के जैसा क्यों घसिट रहा है ? यह दशा
कैसे हो गई ? एवयामरुत तो उत्तर की ओर पढ़ा जाता है” ।
फिर उसने कहा, 'मध्य सवन इंद्र का है । तू इन्द्र को इसमें
से क्यों निकालना चाहता है ?” उसने उत्तर दिया, “मैं इंद्र
को इससे निकालना नहीं चाहता” । उसने कहा, “तुम चाहते
हो । क्योंकि यह जगती और अतिजगती छन्द मध्यसवन का
नहीं हैं। यह सूक्त मरुतों का है । इसलिये यहाँ इसका पाठ
नहीं होना चाहिये ।” उसने कहा, “अच्छावाक, ठहर
जाओ । मैं इनके अनुशासन को पूरा करूँ गा” । गौशल ने कहा,
“इंद्र का सूक्त पढ़ो जिसमें विष्णु की छाप पड़ी हो” । इसलिये
हे होता, अपने शस्त्र में से 'एवयामरुत' छोड़ दो जो रुद्र