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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

तीसरा अध्याय ] ३१९
पशु मिथुन हैं । पशु छन्दोम हैं, यह पशुओं की बढ़ती के लिये
किया जाता है ।
सातवें दिन के बृहत् पृष्ठ यह हैं :—
त्वामिद्धि हवामहे... ( ऋ० ६।४६।१ )
त्वं ह्येहिचेरवे... ( ऋ० ८।६१।७ )
पृष्ठ वही हैं जो छठे दिन के ।
वैरूप रथन्तर है और वैराज बृहत् । शक्वर रथंतर है और
रैवत बृहत् । इसलिये सातवें दिन बृहत् पृष्ठ होता है । क्योंकि
वे छठे दिन के बृहत् सातवें दिन के बृहत् से बाँध देते हैं स्तोमों
को जारी रखने के लिये । क्योंकि यदि ( बृहत् का विरोधी )
रथंतर पढ़ा जांय तो जोड़ा ( मिथुन ) टूट जाये । इस लिये
बृहत् का प्रयोग होता है ।
धाय्या वही है अर्थात् यद् वावान... “अभित्वा शूर नोनुमः”
के पाठ से होता सबको योनि तक लौटा लाता है । यह क्रम के
अनुसार रथंतर है ।
साम प्रगाथ यह है—
“पिबा सुतस्य रसिनः”... ( दा३।१-२ )
इसमें 'पिब' शब्द है । यह सातवें दिन का रूप है । ताक्ष्यँ
वही है “त्यमूषु वाजिनं देवजूतम्” । ( १ )
१७—इन्द्रस्य नुवीर्याणि... ( ऋ० १।३२ )
इस सूक्त में 'प्र' है । यह सातवें दिन का रूप है । यह
त्रिष्टुभ् छन्द में है । इन पदों के द्वारा जो ठहरे हुये हैं होता
सवन को कायम रखता है और पतित नहीं होने देता ।
“अभि त्यं मेषं पुरुहूतमुक्थ्यम्' सूक्त ( १।५१ ) में 'प्र' के
स्थान में 'अभि' है । यह सातवे' दिन का रूप है । यह जगती
छन्द में है । मध्य सवन के वाहक जगती छन्द हैं । जो छन्द

३२४] [पाँचवीं पञ्चिका
वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये इसमें
निविद् रक्खा गया है।
अब मिथुन सम्बन्धी सूक्त पढ़े जाते हैं। यह त्रिष्टुभ् और
जगती में हैं, पशु मिथुन हैं। और छन्दोम पशु हैं। यह पशुओं
की बढ़ती के लिये किया जाता है।
वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद् और अनुचर यह हैं:—
तत् सवितुर्वृणीमहे (ऋ० ५।८२।१-३)
अद्या नो देव सवितः (ऋ० ५।८२।४-५)
यह रथन्तर है। यह सातवें दिन के रूप हैं।
अभि त्वा देव सवितः (ऋ० १।२४।३)
यह सविता का निविद् सूक्त है। इसमें 'अभि' 'अ' का
स्थानीय है। यह सातवें दिन का रूप है।
द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है:—
प्रेतां यज्ञस्य (ऋ० २।४१।१६)
इसमें 'प्र' है यह सातवें दिन का रूप है।
ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है:—
अयं देवाय जन्मने (ऋ० १।२०)
इसमें 'जन्म' आया है। यह सातवें दिन का रूप है।
आ याहि वनसा सह गावः सचन्त वर्तनिं यदूधभिः ॥१॥
आ याहि वस्व्या धिया मंहिष्ठो जारयन् मखः सुदानुभिः ॥२॥
(ऋ० १०।१७२)
इत्यादि दो पदों वाले मंत्रों का पाठ करता है। पुरुष दो-
पाया है। पशु चौपाये हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की बढ़ती
के लिए यह किया जाता है।
एभिरग्ने दुवोगिरः (ऋ० १।१४)
विश्वेदेवों का निविद् सूक्त है। इसमें 'आ' है यह सातवें
दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में है। इस त्र्यह के तृतीय

तीसरा अध्याय ] ३२१
सवन का छन्द गायत्री है। इसलिये यह गायत्री छन्द में है।
अग्निमारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :—
“वैश्वानरो अजीजनत्”
इसमें 'जात' शब्द है, यह सातवें दिन का रूप है।
मरुतों का निविद् सूक्त यह है :—
प्र यद्धरिख्ष्टुभमिषम्... । ( ऋ० ८।७ )
इसमें 'प्र' है। यह सातवें दिन का रूप है।
जातवेदस मंत्र वही है :—
जातवेदसे सुनवाम ( ऋ० १।६६।१ )
जातवेदों का निविद् यह है :—
दूतं वो विश्ववेदसम् । ( ऋ० ४।८ )
इसमें 'जातवेद' का स्पष्ट वर्णन नहीं है। यह सातवें दिन
का रूप है। यह छन्द गायत्री में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन
का वाहक गायत्री छन्द है। (२)
१८—आठवें दिन का रूप यह है कि न 'अ' हो, न 'प्र'
और 'स्थित' हो। आठवाँ वही है जो दूसरा। इसके रूप यह
हैं :—ऊर्ध्व, प्रति, अन्तः, वृषण्, वृधन, बीच के पाद में देवता
का निर्वचन, अन्तरिक्ष का उल्लेख, दो बार अग्नि शब्द, महद्,
विहूत, पुनः, और वर्तमान कालिक क्रिया।
अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा......( ऋ० ७।३ )
यह आठवें दिन का आज्य है। इसमें दो बार अग्नि आया
है। यह आठवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इस
त्र्यह के प्रातः सवन का वाहक त्रिष्टुभ् छन्द है।
इसके प्र-उग शस्त्र के मन्त्र यह हैं :--
कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन्।
ते वायवे मनवे बाधितायाऽवासयन्नुषसं सूर्येण ॥ ( ऋ० ७।६१।१ )
२१

३२२ [पाँचवीं पञ्चिका]
पीवो अन्नान् रयिवृधः सुमेधाः श्वेतः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः।
ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेनरः स्वपत्यानि चक्रुः॥
(ऋ० ७।९१।३)
उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा उरु ज्योतिर्विबिदुदीध्यानाः। गव्यं
चिदूर्वमुशिजो वि वव्रु स्तोषामनु प्रदिवः सस्रुरापः॥ (ऋ० ७।९०।४)
उशन्ता दूता न दभाय गोपा मासश्च पाथः शरदश्च पूर्वीः।
इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमीट्टे सुवितं च नव्यम्॥
(ऋ० ७।९१।२)
यावत् तरस्तन्वोर्यावदोजो यावन्नरश्चक्षसा दीध्यानाः। शुचिं
सोमं शुचिपा पातमस्मे इन्द्रवायू सदतं बर्हिरेदम्॥
नियुवाना नियुतः स्पार्हवीरा इन्द्रवायू सरथं यातमर्वाक्। इदं
हि वां प्रभृतं मध्वो अग्रमध प्रीणाना वि मुमुक्तमस्मे॥
(ऋ० ७।९१।४-६)
प्रति वां सूर उदिते सूक्तैर्मित्रं हुवे वरुणं पूतदक्षम्।
ययोरसुर्यमक्षितं ज्येष्ठं विश्वस्य यामन्नाचिता जिगत्नू॥
ता हि देवानामसुरो तावर्या ता नः क्षितीः करतमूर्जयन्तीः।
अश्याम मित्रावरुणा वयं वां द्यावा च यत्र पीपयन्नहा च॥
ता भूरिपाशावनृतस्य सेतू दुरत्येतू रिपवे मर्त्याय।
ऋतस्य मित्रावरुणा पथा वामपो न नावा दुरिता तरेम॥
(ऋ० ७।६५।१-३)
धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहानाऽन्तः पुत्रश्चरति दक्षिणायाः। आ द्योतनिं
वहति शुभ्रयामोषसः स्तोमो अश्विनावजीगः॥
सुयुग् वहन्ति प्रति वामृतेनोर्ध्वा भवन्ति पितरेव मेधाः। जरेथा
मस्मद् वि परोर्मनीषां युवोरवश्चकृमा पातमर्वाक्॥
सुयुग्भिरश्वैः सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः। किमङ्ग
वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाऽऽहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः॥
(ऋ० ३।५८।१-३)

तीसरा अध्याय ] ३२३
ब्रह्माण इन्द्रोप याहि विद्वानर्वाञ्चस्ते हरयः सन्तु युक्ताः । विश्वे
चिद्धि त्वा विह्वन्त मर्ता अस्माकमिच्छृणुहि विश्वमिन्व ॥
हवं त इन्द्र महिमा व्यानड् ब्रह्म यत् पासि शवसिन्नृषीणाम् । आ
यद्वज्रं दधिषे हस्त उग्र घोरः सन् क्रत्वा जनिष्ठा अषाळ्हः ॥
तव प्रणीतीन्द्र जोहुवानान्त्सं यन्नॄन् रोदसी निनेथ । महे
क्षत्राय शवसे हि जज्ञेऽनूतुजिं चित् तूतूजिराशेशनत् ॥
( ऋ० ७।२८।१-३ )
ऊर्ध्वो अग्निः सुमतिं वस्वो अश्रेत् प्रतीची जूर्णिर्देवतातिमेति ।
भेजाते अद्री रथ्येव पन्थामृतं होता न इषितो यजाति ॥
प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विश्पतीव वीरिट् इयाते ।
विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान् ॥
जम्या अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षेमर्ज्यन्त शुभ्राः ।
अर्वाक् पथ उरुप्रयः कृणुध्वं श्रोता दूतस्य जग्मुषो नो अस्य ॥
( ऋ० ७।३६।१-३ )
उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत् सुभगा यज्ञे अस्मिन् ।
मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः ॥
इमा जुहाना युष्मदा नमोभिः प्रतिस्तोमं सरस्वति जुषस्व । तव
शर्मन् प्रियतमे दधाना उपस्थेयाम शरणं न वृक्षम् ॥
अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः । वर्ध शुभ्रे
स्तुवते रासि वाजान् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
( ऋ० ७।६५।४-६ )
इन मन्त्रों में प्रति, अन्तः, विहूत, ऊर्ध्व आये हैं । यह
त्रिष्टुभ् छन्द में हैं । इस त्र्यह के प्रातः सवन का वाहक त्रिष्टुभ्
छन्द है ।
मरुत्वतीय शस्त्र के आतान जो दूसरे दिन के हैं, वही
आठवें के और यही आठवें दिन का रूप है :-

३२४ [ पाँचवीं पञ्चिका
विश्वानरस्य वस्पतिं ( ऋ० ८।६८।४ )
इन्द्र इत् सोमपा एकः ( ऋ० ८।२।४ )
इन्द्र नेदीय एदि हि ( ऋ० ८।५३।५-६ )
उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते ( ऋ० १।४०।१-२ )
अग्निर्नैता त्वं सोम ऋतुभिः......
अब 'महद्वत्' सूक्त पढ़े जाते हैं अर्थात् वह जिनमें 'महद्'
शब्द आया है :-
शंसा महाम्...( ऋ० ३।४६ )
महश्चित् त्वम्... ऋ० १।१६६ )
पिबा सोममभि यं...( ऋ० ६।१७ )
यहाँ इन्द्रो नृवत् ( ऋ० ६।१६ )
इन सब में 'महान्' शब्द आया है और यह आठवें दिन
का रूप है।
यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इससे होता सवन को कायम
रखता है और गिरने नहीं देता।
"तमस्य द्यावा पृथिवी" ( ऋ० १०।११३ ) भी महद्वत् सूक्त
है। क्योंकि पहले मन्त्र के दूसरे पाद में महिसानो शब्द आया
है। इसका छन्द जगती हैं। इस त्र्यह् के मध्य सवन के वाहक
छन्द जगती हैं। निविद् उसी छन्द में रक्खा जाता है जो
वाहक होता है। इसलिये निविद् जगती छन्द में रक्खा
गया है।
अब मिथुन के सूक्त पढ़े जाते हैं त्रिष्टुभ् और जगती छन्दों
में। पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये
महद्वत् सूक्त पढ़े जाते हैं।
अन्तरिक्ष महद् है। अन्तरिक्ष की प्राप्ति के लिये पाँच सूक्त
पढ़े जाते हैं।

प्रथमो निषीदसि सोमकामं हि ते मनः ॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ )

तीसरा अध्याय ] ३२५
पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ पंक्ति वाला है। पशु भी
पंक्ति वाले हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये।
आठवें दिन के रथन्तर पृष्ठ यह हैं :—
अभित्वा शूर नो नुमो......
अभित्वा पूर्वपीतये......
धाय्या वही है......यद् वावान्......
‘त्वामिद्धि हवामहे' इससे सबको मानि की ओर लौटाता
है। क्रमानुसार यह बृहत् दिवस है।
साम प्रगाथ यह है :—
उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवा सोम
पीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥
तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां
प्रथमो निषीदसि सोमकामं हि ते मनः ॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ )
इनमें वह भी है जो आज है और वह भी जो कल था।
यह बृहत् दिवस अर्थात् आठवें दिन का रूप है।
तार्क्ष्य वही है अर्थात् त्यमूषु वाजिनम्......(३)
१९—पाँच महद्वत् सूक्त यह हैं :—
अपूर्व्या पुरुतमान्यस्मै...( ऋ० ६।३२ )
इसमें 'महेवीराय तवसे तुराय' में 'महद्' शब्द आया है।
यह आठवें दिन का रूप है।
तां सु ते कीर्तिं मघवन् महित्वा...( ऋ० १०।५४ )
इसमें भी 'महद्' है। यह भी आठवें दिन का रूप है।
त्वं महां इंद्र यो ह शुष्मैः...( ऋ० १।६३ )
इसमें 'महद्' है यह भी आठवें दिन का रूप है।
त्वं महां इंद्र तुभ्यं ह क्षा......( ऋ० ४।१७)

३२६ [ पाँचवीं पञ्चिका
इसमें भी 'महद्' है। यह भी आठवें दिन का रूप है।
यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इसके द्वारा प्रतिष्ठित करके वह सवन
को थामे रहता है गिरने नहीं देता ।
दिवश्चिद्दस्य वरिमा वि पप्रथ......( ऋ० १।५५ )
इस सूक्त में "इन्द्र' न महा" में महद् शब्द है यह आठवें
दिन का रूप है।
यह जगती छन्द में है। इस त्र्यह का मध्य सवन का
वाहक गायत्री छन्द है। जो छन्द सवन का वाहक होता है
उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये निविद् जगती छन्द
में है।
अब मिथुन सूक्त पढ़ते हैं। त्रिष्टुभ् भी और जगती भी ।
पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये
'महद्वत्' सूक्त पढ़े जाते हैं। महद् अन्तरिक्ष है। अन्तरिक्ष
की प्राप्ति के लिये यह सूक्त पढ़े जाते हैं।
पाँच पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं, पाँच पदों की पंक्ति होती है।
यज्ञ पाँच भाग वाला है। पशु भी पाँच भाग वाले होते हैं।
पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये ।
पाँच पाँच कर दस होते हैं। यह दसवाली विराट् है।
अन्न विराट् है। पशु अन्न हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की
वृद्धि के लिये ।
विश्वो देवस्य नेतुः ( ऋ० ५।५०।१ )
तत्संवितुर्वरेण्यम्
आविश्चदेव सत्पतिम् । (ऋ० ५।८२।७ )
यह वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद् और अनुचर हैं। यह बृहत
छन्द में हैं और आठवें दिन के रूप हैं।
सविता के निविद् यह हैं—
हिरण्यपाणिमूतये (ऋ० १।२२।५-७ )

तीसरा अध्याय ] ३२७
इसमें 'ऊर्ध्व' आया है। यह आठवें दिन का रूप है।
द्यावापृथिवी के निविद् यह हैं :—
मही द्यौः पृथिवी चन ( ऋ० १।२२।१३-१५ )
इसमें 'महद्' है। यह आठवें दिन का रूप है।
ऋभुओं का निविद् यह है :—
युवाना पितरा पुनः ( ऋ० १।२०।४-८ )
इसमें 'पुनः' है। यह आठवें दिन का रूप है। 'इमा नु कं
भुवना सीषधाम' में ( १०।१५७ ) दो पद वाले मंत्र हैं। अब
यह पढ़े जाते हैं। मनुष्य दो पाया है। पशु चौपाया। पशु
छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। इस सूक्त का पाठ करके
होता यजमान को चौपाये पशुओं में स्थापित करता है।
विश्वेदेवों का निविद् सूक्त यह हैं :—
देवानामिदवो महद्......( ऋ० ८।८३।१ )
इसमें महद् शब्द है। यह आठवें दिन का रूप है।
यह गायत्री छन्द में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन का
वाहक गायत्री छन्द है।
अग्नि मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :—
ऋतावान वैश्वानरं ( आश्व० श्रौत सूत्र ८।१० )
इसमें 'वैश्वानरं महान्' में महद् शब्द आया है। यह
आठवें दिन का रूप है।
मरुतों का निविद् सूक्त यह है :—
क्रीडं वः शर्धो मारुतम्। ( ऋ० १।३७ )
इसमें 'वावृध' शब्द आया है। 'वृधन' आठवें दिन का
रूप है।
जातवेद मंत्र वही है :—जातवेदसे सुनवाम...
जातवेद का निविद् सूक्त यह है :—

६२८ [ पाँचवीं पञ्चिका
“अग्ने मृडमहाँ असि” ( ऋ० ४६ )
इसमें 'महद्' आया है । यह आठवें दिन का रूप है ।
यह सब गायत्री छन्द में हैं, इस त्र्यह के तीसरे सवन का
वाहक छन्द गायत्री है । ( ४ )
ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।

चौथा अध्याय
२०—यह जो समानोदर्क है वह नवें दिन का रूप हैं यह
वही है जो तीसरे दिन का। इसकी विशेषतायें यह हैं :-
अश्व, अन्त, पुनरावृत्ति, पुनर्निवृत्ति, रमण करना, पर्यास,
तीन की संख्या, अन्त का रूप, अन्त के पद में देवता का
निर्वचन, स्वर्ग लोक का उल्लेख, शुचि, सत्य, क्षेति अर्थात्
रहना, गत (गुज़र जाना), ओक (घर) और भूतकालिक
क्रिया। यह तीसरे दिन के रूप हैं। यही नवें दिन के भी।
नवें दिन का आज्य सूक्त यह हैं :—
अगन्म महा नमसा यविष्ठम् (ऋ० ७।१।२)
इसमें 'गत' शब्द है। यह नवें दिन का रूप हैं। छन्द त्रिष्टुभ्
है। इस त्र्यह के प्रातः सवन का छन्द त्रिष्टुभ् है।
प्र उग शस्त्र के मंत्र यह हैं:—
प्र-वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वयु भिर्मधुमन्तः सुतासः। वह वायो।
नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसोमदाय ॥ ( ऋ० ७।६०।१ )
( ३२९ )

३३० [ पाँचवीं पञ्चिका
ते सत्येन मनसा दीध्यानाः स्वेन युक्तासः
ऋतुना वहन्ति । इन्द्रवायू वीरवाहं रथं
वामीशानयोरभि पृक्षः सचन्ते ॥ ( ऋ० ७।६०।५ )
दिवि क्षयन्ता रजसः पृथिव्यां प्र वां घृतस्य निर्णिजो ददीरन् । हव्यं
-नो मित्रो अर्यमा सुजातो राजा सुक्षत्रो वरुणो जुषन्त । (ऋ० ७।६४। १)
आ विश्ववाराश्विना गतं नः प्र तत् स्थानमवाचि वां पृथिव्याम् ।
अश्वो न वाजी शुनपृष्ठो अस्थादा यत्सेदुश्चुर्वसे न योनिम् ॥
सिषक्ति सा वां सुमतिश्चनिष्ठोऽतापि घर्मो मनुषो दुरोणे ।
यो वां समुद्रान्सरितः पिपर्त्येत्तग्वा चिन्न सुयुजा युजानः ॥
यानि स्थान्यश्विना दधाथे दिवो यह्वीष्वोषधीषु विक्षु ।
नि पर्वतस्य मूर्धनि सदन्तेषं जनाय दाशुषे वहन्ता ॥
( ऋ० ७।७०।१-३)
अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्व आ तु प्र याहि हरिवस्तदोकः ।
पिबत्वस्य सुषुतस्य चारोर्ददो मघानि मघवन्नियानः ॥
ब्रह्मन् वीर ब्रह्मकृतिं जुषाणोऽर्वाचीनो हरिभिर्याहि तूयम् । अस्मिन्न्
षु सवने मादयस्वोप ब्रह्माणि शृणव इमा नः ॥
का ते अस्त्यरंकृतिः सूक्तैः कदा नूनं ते मघवन् दाशेम विश्वा मतीरा
ततने त्वायाऽधाम इन्द्र शृणवो हवेमा । ( ऋ० ७।२६।१-३ )
प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त प्र क्रन्दनुर्नभन्यस्य वेतु । प्र धेनव
उदप्रुतो नवन्त युज्यतामद्री अध्वरस्य पेशः ॥
सुगस्तै अग्ने सनवित्तो अध्वा युक्ष्वा सुते हरितो रोहितश्च । ये
वा सधस्रषा वीरवाहो हुवे देवानां जनिमानि सक्तः ॥
समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके ।
यजस्व सु पुरुणीक देवानां यज्ञियामरमतिं ववृत्याः ॥
( ऋ० ७।४२।१-३ )
सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने । सरस्वतीं
सुकृतो अह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वार्यं दात् ॥

चौथा अध्याय ] ३३१
सरस्वति या सरथं ययाथ स्वधामिद्वि पितृभिर्मदन्ती । आसद्यास्मिन्
बर्हिषि मादयस्वऽनमीवा इष आ वेह्यस्मे ॥
सरस्वतीं यां पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः । सहस्रा-
र्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानेषु धेहि ॥ ( ऋ० १०।१७।७ ६ )
आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तुयज्ञम् । हवं देवी
जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥
आ वेशसं नीलपृष्ठं बृहन्तं बृहस्पतिं सदनं सादयध्वम् । सादद्योनि
दम आ दीदिवांसं हिरण्यवर्णमरुषं सपेम ॥
आ धर्षत्सिन्वँ इन्दिनोराणो विश्वेभिर्गन्त्वोममिहुवानः । ग्ना वसान
ओषधीरमृतृन्त्रिधातुशृङ्गो वृषभो वयोधाः ॥ (ऋ० ५।४३।११-१३)
सरस्वत्यभि नो नेषि वस्यो माप स्फरीः पयसा मा न आ धक् ।
जुषस्व नः सख्या वेश्या च मा त्वत् क्षेत्राण्यरणानि गन्म ॥
( ऋ० ६।६१।१४ )
इन मंत्रों में शुचि, सत्य, चेति, गत, ओक आये हैं । यह
नवें दिन का रूप है । छन्द त्रिष्टुभ् है । इस त्र्यह के प्रातः
सवन का छन्द त्रिष्टुभ् ही है ।
जो तीसरे दिन के आतान हैं वही नवें के । वही नवें दिन
का रूप हैं :—
अर्थात्
तं तमिद्राधसे मह...... ( ऋ० ८.६८।७ )
इन्द्रस्य सोमा......
इन्द्र नेदीय एदहि...... ( ऋ० ८।५३।५ )
प्रनूनं ब्रह्मणस्पतिः...... ( ऋ० १।४०।५ )
अग्निर्नैतात्वं सोमक्रतुभिः......
पिन्वन्त्यपो...... ( ऋ० १।६४।६ )
न किः सुदासो रथम्...... ( ऋ० ७।३२।१० )
इन्द्रः स्वाहा पिबतु यस्य सोमः ( ऋ० ३।५० )

३३२ [ पाँचवीं पञ्चिका .
इस सूक्त में स्वाहाकार अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन
का रूप है।
गायन्त्साम नभन्यं यथावेः ( ऋ० १।१७३ )
इस सूक्त में "अर्चाम तद्वावृधानं स्वर्वत्" इसमें "स्वः"
अन्त वाला है। अन्त नवें दिन का रूप है।
"तिष्ठा हरी रथ आ युज्यमाना" ( ऋ० ३।३५ )
इसमें 'स्था' अन्त वाला है। और 'अन्त' नवें दिन का
रूप है।
"इमा उ त्वा पुरुतमस्य कारोः" ( ऋ० ६।२१ )
इसमें "धियोरथेष्ठा" में 'स्था' अन्त वाला है। अन्त नवें
दिन का रूप है।
यह त्रिष्टुभ् छन्द में हैं। इस प्रतिष्ठित पद से सवन को
क़ायम रखता है और गिरने नहीं देता।
प्रमन्दिने पितुमदर्चंतावच......( ऋ० १।१०१ )
यह सूक्त समानोदर्कं है। यह नवें दिन का रूप है। यह
जगती छन्द में है। इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक छन्द
जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा
जाता है। इस लिये निविद् जगती छन्द में रक्खा गया है।
यह मिथुन सूक्त पढ़े गये, त्रिष्टुभ् भी और जगती भी।
पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये यह
पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ पाँच
पद वाला होता है। पशु पाँच पद वाले होते हैं। पशु
छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये ऐसा किया जाता है।
नवें दिन के बृहत् पृष्ठ यह हैं :—
त्वामिद्धि हवामहे...... ( ऋ० ६।४६।१ )
त्वं ह्यहि चेरवे...... ( ऋ० ८।६१।७ )

चौथा अध्याय ] ३३३
धाय्या वही है—
यद् वावान्...... (ऋ० १०।ऽ४।६)
अभित्वा शूर नोनुम...... (ऋ० ७।३२।२२)
इससे सबको योनि की ओर लौटाते हैं क्योंकि यह क्रम
के अनुसार रथंतर है।
सामप्रगाथ यह है :-
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत् । छर्दिर्य॑च्छ मघवद्भ्यश्च
मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः ॥
ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया । अद्य स्मा नो
मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव ॥ (ऋ० ६।४६।६—१०)
इसमें 'त्रि' है यह नवें दिन का रूप है।
तार्क्ष्या वही है :—
त्यमूर्षु वाजिनं देवजूतम् ॥ (ऋ० १०।१७८।१)
सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वी......(ऋ० ६।३४)
२१—इसमें 'गत' शब्द है। यह नवें दिन का रूप है।
"कदा सुवन् रथन्त्याणि ब्रह्म"......(ऋ० ६।३५)
इसमें 'द्येति' है। 'द्येति' अन्त वाला है। यह नवें दिन का
रूप है।
आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी...(ऋ० ४।१६)
इसमें 'सत्य' है। यह नवें दिन का रूप हैं।
तत्त इंद्रियं परमं पराचैः (ऋ० १।१०३), इसमें 'परमं'
अन्त वाला है। यह नवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द
में हैं। इस प्रतिष्ठित पद के द्वारा सवन को धारण करता है
और गिरने नहीं देता।
अहं भुव वसुनः पूर्व्य॑स्पतिः (ऋ० १०।४८।१)
इसमें "अहं धनानि संजयामि शश्वतः" में 'जितं' अन्त
वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है।

३३४ [ पाँचवीं पञ्चिका
यह जगती छन्द में है। इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक
छन्द जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद
रक्खा जाता है। इसीलिये निविद जगती छन्द में रक्खा
गया है।
मिथुन सूक्त पढ़े जाते हैं, त्रिष्टुभ् भी और जगती भी।
पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये।
पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ में
पाँच पद होते हैं। पशु पाँच पद वाले हैं। पशु छन्दोम हैं।
पशुओं की वृद्धि के लिये।
दो बार पाँच पाँच दस हो जाते हैं। विराट् दश वाली है।
अन्न विराट् है। पशु अन्न हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की
वृद्धि के लिये।
वैश्वदेव के प्रति पद् और अनुचर क्रमशः यह हैं :—
तत्सवितुर्वृणीमहे...... (ऋ० ५।८२।१)
अद्या नो देव सवितः...... (ऋ० ५।८२।४)
यह रथन्तर हैं। यह नवें दिन का रूप है।
सविता का निविद् सूक्त यह हैं :—
दोषो आगात्......( ? )
इसमें “सावित्रमंतो वैगतम्” अन्त वाला है। 'अन्त' नवें
दिन का रूप है।
द्यावा पृथिवी का निविद यह है।
प्र वां महि चवी अभिः...( ऋ० ४।५६।५-७ )
इसमें 'शुची उप प्रशस्त' में 'शुचि' शब्द आया है। यह
नवें दिन का रूप है।
ऋभुओं का निविद यह हैं।
इन्द्र इषे ददातु नः। (ऋ० ८।६३।३४)
ते नो रत्नानि धत्तन (ऋ० १।२०।७-८)

चौथा अध्याय ] ३३५
इसमें 'त्रि' शब्द आया है। यह नवें दिन का रूप है।
बभ्रुरेको विषुणः सूनरो युव......( ऋ० ८।२६ )
दो पद वाले मंत्र हैं। मनुष्य दो पाया है। पशु चौपाये
हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। दो पद वाले
वाले मंत्र इस लिये पढ़े जाते हैं कि यजमान की पशुओं में
प्रतिष्ठा हो।
वैश्व देवों का निविद् सूक्त यह है :-
ये त्रिंशति त्रयस्परः......( ऋ० ८।१२ )
इसमें 'त्रि' शब्द आया है। यह नवें दिन का रूप है।
यह गायत्री छन्द में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन का छन्द
गायत्री है।
अग्नि मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :-
वैश्वानरो न ऊतये......( आश्व० ८।११ )
इसमें 'अ प्रयातु परावत' में 'परावत' अन्त वाला है।
'अन्त' नवें दिन का रूप है।
मरुतों का निविद् यह है : -
मरुतो यस्य हि क्षये......( ऋ० १।८६ )
इसमें 'क्षेति' अन्त वाला है। 'अन्त' नवें दिन का रूप है।
मानों कोई किसी स्थान पर जाकर पहुँचता है।
जातवेद का मन्त्र वही है :-
जातवेदसे सुनवाम सोमम्......( ऋ० १।६६ )
जातवेद का निविद् सूक्त यह है :-
प्राग्नये वाचमीरय ( ऋ० १०।१८७ )
यह समानोदर्क है। यह नवें दिन का रूप है। "सनः
पर्षदति द्विषः" इस पद का दो बार पाठ करता है। इस नवरात्र
में बहुत से कृत्य हैं और चूक होना सम्भव है। इसलिए "सनः
पर्षदति द्विषः" ( यह अग्नि हमारे शत्रुओं पर विजयी हो और

३३६ [ पाँचवीं पञ्चिका
हमारे यज्ञ को अन्त तक पहुँचावे ) । इस पद का बार-बार
पाठ करता है, जिससे शान्ति हो जाय । ऐसा करने से वह
उन सब को पाप से छुड़ा देता है । यह गायत्री छन्द में हैं । इस
त्र्यह के तीसरे सवन का छन्द गायत्री है । (२)
२२—पृष्ठ्य षडह ( द्वादशाह के पहले छः दिन ) मुख्य
हैं । और ( सातवाँ, आठवाँ, नवाँ दिन ) अर्थात् छन्दोमा मुख
के भाग हैं । जैसे जिह्वा, तालु, दाँत । दशवाँ दिन ऐसा है
जिससे वाणी की विवेचना होती है या स्वादु और बेस्वादु
जाना जाता है । या पृष्ठ्य षडह नाक के नथुनों के समान हैं ।
और छन्दोमा उसके जो नथनों के बीच में हो । और दशवाँ
दिन ऐसा है जिसके द्वारा गंधों की पहचान की जाती है । या
पृष्ठ्य षडह आँखों के समान है । छन्दोमा आँख के काले
भाग के समान है और दसवाँ दिन पुतली के समान, जिससे
देखते हैं ।
या पृष्ठ्य षडह कान के समान है । छन्दोमा कान के
भीतर का आकाश है । और दसवाँ दिन वह है जिससे
सुनते हैं ।
दसवाँ दिन श्री है । जो दसवें दिन में प्रवेश करते हैं वे
श्रीमान् होते हैं । दसवें दिन मौन रहते हैं । श्री से कोई नहीं
बोलता । श्री बोलने की चीज नहीं है ।
अब ऋत्विज् लोग चलते हैं, स्नान करते है और पत्नीशाला
में जाते हैं । उनमें से जो इस आहुति को जाने वह कहे, “सम-
न्वारभध्वम् ।”
“इह रमेहरमध्वमिह धृतिरिहस्वधृतिरग्ने वाट् स्वाहा वाट्”
अब इस मन्त्र को पढ़ कर आहुति दे :—
“इत रम” ( यहां रमण कर ) से उन सब यजमानों को

चौथा अध्याय ] ३६७
जो इस लोक में हैं खुश करता है। "इह रमध्व" से इन लोकों
में सन्तान को खुश करता है।
“इह धृतिः, इहस्वधृतिः” से यजमानों को प्रजा और वाणी
धारण कराता है। 'अग्ने वाट् ' रथन्तर है। और 'स्वाहावाट्'
बृहत् साम है। रथन्तर और बृहत् देवों के मिथुन हैं। मिथुन से
मिथुन होता है और सन्तान होती है। उत्पत्ति के लिये ऐसा
किया जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और
पशुओं से सम्पन्न होता है।
अब वे सब चलते हैं और स्नान कर के अग्नीध्र के स्थान
को जाते हैं। उनमें से जो इस आहुति को जानता हो वह कहे
"समन्वारभध्वम्" और यह पढ़ कर आहुति दे :-
"उपसृजं धरुणं मातरं धरुणोधयन्। रायस्पोषमिषमूर्ज मस्मा
सुदीधरत् स्वाहा"।
जो इस रहस्य को समझ कर आहुति देता है वह अपने लिये
और यजमानों के लिये धन, शक्ति, स्वास्थ्य और तेज प्राप्त कर
लेता है। (३)
२३-वे वहाँ से चलते हैं। और सदस् में पहुँचते हैं।
( उत्तर वेदी के दक्षिण पूर्वी कोने में एक स्थान होता है उसे
सदस् कहते हैं )। जिधर को जो चाहें उधर को ही ( अर्थात्
यह नियम नहीं है कि इसी दिशा में चलें )। अन्य ऋत्विज्
भिन्न-भिन्न दिशाओं में चलते हैं। लेकिन उद्गाता लोग साथ
चलते हैं। वे सर्पराज्ञी वाली ऋचायें पढ़ते हैं। यह ( पृथिवी )
सर्पराज्ञी है क्योंकि जितने चलने वाले हैं उन सब की रानी
है। यह पृथिवी पहले अलोमिका ( रोम रहित या वृक्ष आदि
रहित ) थी। उसने तब यह मंत्र देखा :--
अयं गौः पृश्निरक्रमीत् ( ऋ० १०।१८९६ )
२२

३३८ [ पाँचवीं पञ्चिका
तब उसमें पृश्निवर्णा ( चित्र विचित्र रंगों ) ने प्रवेश किया।
नाना रूपों में से जिस किसी की कामना की, ओषधि, वनस्पति
इत्यादि सभी रूप इसमें आ गये। जो इस रहस्य को समझता
है। वह नाना रूपों को अपनी कामना के अनुसार प्राप्त कर
सकता है।
प्रस्तोता मौन होकर ( मन से ) पढ़ता है। उद्गाता मौन
होकर पढ़ता है। प्रतिहर्ता मौन होकर पढ़ता है। होता वाणी
से ( जोर जोर से ) पढ़ता है। वाक् और मन देवों के मिथुन
हैं। देवों के इस मिथुन से मिथुन की उन्नति होती है। देवों
के मिथुन से मिथुन पैदा होता है। जो इस रहस्य को समझता
है वह सन्तान और पशुओं से युक्त होता है।
अब होता चतुर्होत्री मन्त्रों को पढ़ता है। उद्गाता के
स्तोत्र के साथ साथ पढ़ता है।
चतुर्होत्री में देवों का जो यज्ञ का नाम था वह छिपा हुआ
था। होता उसको प्रकट करता है। देवों का जो यज्ञ का नाम
है उसे प्रकाशित करता है। उस प्रकाशित को प्रकाशित करता
है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रकाशित हो जाता है।
जिस वेदपाठी ब्राह्मण को यश न प्राप्त हो, वह वन में जावे,
दर्भ घास के सिरों को बाँध ले और एक दूसरे ब्राह्मण के
दक्षिण की ओर बैठ कर चतुर्होत्री के मंत्रों को ज़ोर ज़ोर से
पढ़े। चतुर्होत्री में देवों का यज्ञ का नाम छिपा हुआ रहता है।
चतुर्होत्री पढ़ने से वह नाम प्रकाशित हो जाता है। जो इस
रहस्य को समझता है वह प्रकाशित हो जाता है। (३)
२४-अब उदम्बर वृक्ष की शाखा को ( जो यज्ञशाला में
उद्गाता के आसन के पीछे रक्खी रहती है ) छूते हैं। यह
सोचकर कि हम 'अन्न और रस' को छू रहे हैं। क्योंकि
उदुम्बर वृक्ष 'अन्न और रस' है। जब देवों ने 'अन्न और रस'