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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

तीसरा अध्याय ] ३१९
पशु मिथुन हैं । पशु छन्दोम हैं, यह पशुओं की बढ़ती के लिये
किया जाता है ।
सातवें दिन के बृहत् पृष्ठ यह हैं :—
त्वामिद्धि हवामहे... ( ऋ० ६।४६।१ )
त्वं ह्येहिचेरवे... ( ऋ० ८।६१।७ )
पृष्ठ वही हैं जो छठे दिन के ।
वैरूप रथन्तर है और वैराज बृहत् । शक्वर रथंतर है और
रैवत बृहत् । इसलिये सातवें दिन बृहत् पृष्ठ होता है । क्योंकि
वे छठे दिन के बृहत् सातवें दिन के बृहत् से बाँध देते हैं स्तोमों
को जारी रखने के लिये । क्योंकि यदि ( बृहत् का विरोधी )
रथंतर पढ़ा जांय तो जोड़ा ( मिथुन ) टूट जाये । इस लिये
बृहत् का प्रयोग होता है ।
धाय्या वही है अर्थात् यद् वावान... “अभित्वा शूर नोनुमः”
के पाठ से होता सबको योनि तक लौटा लाता है । यह क्रम के
अनुसार रथंतर है ।
साम प्रगाथ यह है—
“पिबा सुतस्य रसिनः”... ( दा३।१-२ )
इसमें 'पिब' शब्द है । यह सातवें दिन का रूप है । ताक्ष्यँ
वही है “त्यमूषु वाजिनं देवजूतम्” । ( १ )
१७—इन्द्रस्य नुवीर्याणि... ( ऋ० १।३२ )
इस सूक्त में 'प्र' है । यह सातवें दिन का रूप है । यह
त्रिष्टुभ् छन्द में है । इन पदों के द्वारा जो ठहरे हुये हैं होता
सवन को कायम रखता है और पतित नहीं होने देता ।
“अभि त्यं मेषं पुरुहूतमुक्थ्यम्' सूक्त ( १।५१ ) में 'प्र' के
स्थान में 'अभि' है । यह सातवे' दिन का रूप है । यह जगती
छन्द में है । मध्य सवन के वाहक जगती छन्द हैं । जो छन्द