ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
२१० [ तीसरी पञ्चिका
इस प्रकार अग्निष्टोम के पहले और बाद को जितने कृत्य
हैं वे सब अग्निष्टोम में शामिल हैं ॥
अग्निष्टोम के सब स्तोत्र १९० होते हैं । ९० बराबर हैं दश
त्रिवृत के (९x१०) १० में ९ से एक अधिक है । शेष ९ यानी
त्रिवृत हैं । २१ बार ९ लेकर १८९ हुये । एक हुआ सूर्य्य जो
तपता है । यह विषुवत् है ।
दश त्रिवृत्त स्तोम इसके पहले हैं और दश पीछे । एक बीच
में है जो इन के ऊपर घूमता और तपता है अर्थात् सूर्य्य । एक
स्तोत्रिय जो अधिक है । इसके ऊपर ढकने के समान है । यह
यजमान है । यह दिव्य छत्र है । जो किसी आक्रमण का निवारण
कर सकता है ।
जो इस रहस्य को समझता है उसे दिव्य छत्र की प्राप्ति
होती है । वह किसी आक्रमण का सहन कर सकता है । और
उसको सायुज्य, सारूप्य और सालोक्य प्राप्त हो जाता है । (३)
४२—एक बार देवते असुरों से हार गये और ऊपर की ओर
स्वर्ग लोक चले । अग्नि ने नीचे भूमि से स्वर्ग के ऊपर के हिस्से
को छुआ और वहाँ पहुँचकर स्वर्ग लोक का द्वार बन्द कर दिया ।
अग्नि स्वर्ग लोग का अधिपति है । पहले वसु लोग उसके पास
गये और कहा, “अपनी लपटों में होकर हमको आकाश अर्थात्
स्थान दे कि हम ऊपर चले जा सकें”। उसने कहा, “बिना स्तुति
किये मैं तुमको जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो”। वह मान
गये और नौ ऋचाओं (त्रिवृत स्तोम) से उसकी स्तुति की । जब
उन्होंने ऐसा किया तो उसने उनको स्वर्ग में जाने दिया ।
अब रुद्र लोग आये और कहा कि अपनी लपटों में होकर
हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जासकें । उसने कहा कि बिना
स्तुति के मैं जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो । वे मान गये
चौथा अध्याय ] २११
और १५ ऋचाओं से स्तुति की । उसने उनको जाने दिया और
वह यथेष्ट लोक को पहुँच गये ।
अब आदित्य लोग पहुँचे और कहा कि अपनी लपटों में
होकर हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जा सकें। उसने कहा कि
बिना स्तुति कराये मैं जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो ।
उन्होंने मान लिया और १७ ऋचाओं से स्तुति की । तब उसने
उनको जाने दिया और वे यथेष्ट लोक में पहुँच गये ।
अब विश्वेदेव आये और कहा कि अपनी लपटों में होकर
हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जा सकें । उसने कहा कि मैं
बिना स्तुति कराये तुमको जाने न दूंगा; तुम मेरी स्तुति करो ।
उन्होंने स्वीकार कर लिया और २१ स्तोमों से स्तुति की। और
स्तुति करने के पश्चात् वह यथेष्ट लोक में पहुँच गये । इस
प्रकार एक एक करके देवते गये और एक एक स्तोम से स्तुति कर
करके यथेष्ट लोक को प्राप्त हो गये ।
जो यजमान चार स्तोमों से स्तुति करता है और जो
ऋत्विज ( अग्निष्टोम को ) जानता है वह अग्नि को पार करके
चला जाता है ।
जो इस रहस्य को समझता है अग्नि उसको जगह दे देता
है और वह स्वर्ग लोक को प्राप्त हो सकता है । (४)
४३—अग्निष्टोम अग्नि ही है । देवों ने अग्नि की स्तोम से
स्तुति की इसलिये अग्निष्टोम नाम पड़ा । अग्नि + स्तोम का परोक्ष
रूप अग्निष्टोम हो गया । क्योंकि देव परोक्ष-प्रिय होते हैं ।
चार प्रकार के देवों ने चार स्तोमों से स्तुति की । इसलिये
इसको "चतुःष्टोम' कहते हैं । यह परोक्ष रूप हैं। देव परोक्ष-
प्रिय होते हैं ।
अग्नि की उस समय स्तुति की गई जब वह ऊपर को
ज्योति के रूप में जा रहा था । इसलिये इसको "ज्योतिःस्तोम”
२१२ [ तीसरी पञ्चिका
या ज्योतिष्टोम कहते हैं। यह परोक्ष रूप है। देव परोक्षप्रिय
होते हैं।
यह जो अग्निष्टोम है इसका न पूर्व है न पर ( न आदि
है, न अन्त )। यह जो अग्निष्टोम है वह रथ के अनन्त चक्र
के समान है। प्रायणीय और उदयनीय उसके दो पहियों के
समान हैं।
इसके विषय में एक गाथा है कि:-अग्निष्टोम का जो
आदि है वह अन्त है और जो अन्त है वह आदि है। जैसे
शाकल नामी सर्प वृत्ताकार में चलता है। यह नहीं मालूम होता
कि आदि कहाँ है और अन्त कहाँ है। क्योंकि इसका प्रायणीय
अर्थात् आरंभ ही अन्त है।
इस पर कुछ शंका करते हैं कि प्रायण यानी आरंभ त्रिवृत
अर्थात् ९ मंत्रों से होता है और अन्त २१ स्तोमों से। फिर एक
से कैसे हुये ? इसका उत्तर यह है कि इनमें यह समानता है
कि २१ स्तोम भी त्रिवृत हैं क्योंकि इनमें तीन तीन ऋचायें होती
हैं और तृचों के लक्षण पाये जाते हैं। (५)
४४-अग्निष्टोम तपने वाला अर्थात् सूर्य है। सूर्य भी दिन
में तपता है और अग्निष्टोम भी दिन में ही समाप्त हो जाना
चाहिये।
अग्निष्टोम साह्न ( एक दिन में समाप्त हो जाने वाला या
एकाह्निक ) है इसलिये इसे जल्दी से नहीं करना चाहिये, न
पहले सवन में, न मध्य सवन में और न तीसरे सवन में। नहीं
तो यजमान शीघ्र मर जायगा।
अगर प्रातः और दोपहर के सवनों को जल्दी से नहीं करते
तो पूर्व की ओर ग्राम फूलते फलते हैं और अगर सायंकाल का
सवन जल्दी से कर देते हैं तो पश्चिम का गाँव जंगल हो जाता
है और यजमान मर जाता है इसलिये प्रातः, दोपहर और
चौथा अध्याय ] २१३
सायंकाल के सवनों को करने में जल्दी नहीं करनी चाहिये।
तो यजमान शीघ्र न मरेगा।
शस्त्रों के पढ़ने में सूर्य की चाल का अनुकरण करे। प्रातः-
काल के समय यह शनैः-शनैः तपता है। इसलिये प्रातःकाल के
समय शस्त्रों को धीरे धीरे पढ़े। दोपहर को तेज़ होता है इस-
लिये दोपहर के सवन में तेज़ पढ़ना चाहिये। दोपहर के बाद
मुँह के सामने बहुत तेज़ तपता है। इसलिये सायंकाल के सवन
में बहुत तेज़ी से पढ़ना चाहिये। उस समय ऐसी तरह पढ़ना
चाहिये मानो वाणी पर पूरा प्रभुत्व है। क्योंकि वाणी ही
शस्त्र है। तृतीय सवन में जिस तेज़ी से आरंभ किया था
अगर उसी तेज़ी से बराबर पढ़ता जाय तो बहुत ही अच्छा
होता है।
सूर्य न कभी अस्त होता है, न उदय होता है। जो इसको
अस्त होता हुआ जानता है वह केवल दिन का अन्त करके फिर
अपने को लौटा देता है। रात्रि इधर कर देता है और दिन
उधर। और जो यह प्रातःकाल को उदय होता हुआ मानते हैं
यह रात का अन्त करके अपने को लौटा देता है। दिन इधर
करता है और रात उधर। सूर्य कभी अस्त नहीं होता।
जो इस रहस्य को समझता है उस को सूर्य से सायुज्यता,
सारूप्यता और सालोक्यता प्राप्त होती है। उसका कभी अस्त
नहीं होता। (६)
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।
पाँचवाँ अध्याय
४५—एक बार यज्ञ देवों को छोड़कर अन्नादि में चला
गया। देवों ने कहा "यज्ञ हमको छोड़कर अन्नादि में चला गया
है। हम चाहते हैं कि यज्ञ को भी ले आवें और अन्नादि को भी।
उन्होंने विचारा कि कैसे लावें। तो उन्होंने कहा, "ब्राह्मण और
छन्दों के द्वारा।" उन्होंने एक ब्राह्मण को छन्दों से दीक्षित
किया। उसमें दीक्षणीय इष्टि से लेकर "पत्नी: समयाज" तक
पूरा पूरा कृत्य किया। चूंकि देवों ने दीक्षणीय इष्टि से लेकर पत्नी-
समयाज तक सब कृत्य किया इसीलिये मनुष्य भी उन्हीं का
अनुकरण करते हैं। उन्होंने प्रायणीय इष्टि के द्वारा यज्ञ का
सामीप्य प्राप्त किया। उन्होंने इष्टि को जल्दी जल्दी किया।
और उसको शंयुवाक् से समाप्त किया। इसलिये प्रायणीय इष्टि
शंयुवाक् से समाप्त हुआ करती है। क्योंकि मनुष्यों ने इस बात
में देवों का अनुकरण किया।
देवों ने आतिथ्य-इष्टि के द्वारा यज्ञ का सामीप्य प्राप्त किया।
उन्होंने जल्दी जल्दी इष्टि को इला से समाप्त कर दिया। इसलिये
आतिथ्य इष्टि भी इला से समाप्त होती है क्योंकि मनुष्यों ने
इस में भी अनुकरण किया।
( २१४ )
पांचवाँ अध्याय ] २१५
देवों ने उपसदों के कृत्य द्वारा यज्ञ की समीपता प्राप्त की ।
उन्होंने इसको जल्दी जल्दी किया और केवल तीन सामिधेनियों
और देवतों के याज्य पढ़कर उसको समाप्त कर दिया । इसीलिये
उपसदों में केवल तीन सामिधेनियां और तीन देवतों के याज्य
पढ़े जाते हैं । क्योंकि मनुष्यों ने भी देवों का अनुकरण किया ।
देवों ने उपवसथ किया । उपवसथ के दिन ही उन्होंने
यज्ञ को प्राप्त किया । यज्ञ को करने के बाद उन्होंने सभी कृत्यों
को पत्नी समयाज सहित किया । इसीलिये सोम याग के एक
दिन पहले मनुष्य भी उपवसथ करते हैं और पत्नी समयाज
सहित सभी कृत्य करते हैं ।
इसलिये उपवसथ पूर्व के सभी कृत्यों में मंत्रों को बहुत धीरे
धीरे पढ़ना चाहिये । क्योंकि देवों ने यज्ञ को पा लेने के पहले
सब कृत्यों का इस प्रकार किया मानों वह उसे ढूंढ रहे हैं ।
इसलिये उपवसथ के दिन मंत्रों को जैसे चाहे पढ़े क्योंकि
उस दिन तो यज्ञ मिल चुका था ।
यज्ञ को प्राप्त करके देवों ने उससे कहा, “ठहर हमारे भोजन
के लिये ।” उसने कहा, “नहीं । मैं तुम्हारे लिये क्यों ठहरूं ?”
उसने उनकी ओर देखा । उन्होंने कहा, “ब्राह्मण और छन्दों से
संयुक्त होकर तू भोजन के लिये ठहर ।” वह मान गया !
इसलिये यज्ञ ब्राह्मण और छन्दों से युक्त होकर हवि को
देवों तक ले जाता है । (१)
४६—यज्ञ में तीन दोष हो जाया करते हैं । पहला 'जग्ध'
(उगला हुआ खा लेना) । दूसरा गीर्ण (निगल जाना) । तीसरा
वातं (कै या वमन करना) ।
अगर कोई ऋत्विज् यह सोचकर अपने को स्वयं ही अर्पण
करे कि यजमान मुझे कुछ देगा या यजमान मुझसे यह कृत्य
करायेगा । तो ऐसे पुरुष को नियुक्त करना उगले हुये को खाने
२१६ [ तीसरी पञ्चिका
के तुल्य है। क्योंकि ऐसी नियुक्ति से यजमान का भला नहीं
होता।
अगर कोई ऋत्विज् को डर के मारे नियुक्त करता है कि
(अगर मैं इसे न नियुक्त करूंगा तो) यह मुझे मार डालेगा या
मेरे यज्ञ में विघ्न डालेगा तो यह यज्ञ को निगल जाने के समान
है। क्योंकि इससे यजमान को लाभ नहीं होता।
वमन वह कि किसी ऐसे को ऋत्विज् वर लिया जिसकी
कीर्ति ठीक नहीं है। जैसे वमन से लोग घृणा करते हैं ऐसे
ही ऐसे मनुष्य से देव घृणा करते हैं। यह ऐसा ही घृणित कार्य
है जैसा वमन। क्योंकि ऐसे के काम से यजमान का भला नहीं
होता।
इसलिये यजमान को चाहिये कि इन तीनों में से किसी
को ऋत्विज् न बनावे। यदि भूल से इस प्रकार हो जाय तो
इस का प्रायश्चित्त वामदेव्य गान है। क्योंकि यह वामदेव्य
यजमान लोक, अमृतलोक और स्वर्गलोक है।
इस साम में तीन अक्षर कम हैं। इसको पढ़ने के समय
'पुरुष' शब्द के जो आत्मा का पर्याय है, तीन टुकड़े करदे और
हर एक को मंत्र के हर पाद के पीछे लगा दे। इस प्रकार वह
अपने को यजमान लोक, अमृत लोक, और स्वर्गलोक में स्थापित
कर लेता है। इस प्रकार यज्ञ के करने में जो भूल चूक हो जाती
है उसकी निवृत्ति हो जाती है।
ऋषि (ऐतरेय) का कहना है कि यदि ऋत्विज् समृद्ध (ठीक
ठीक) भी हो तो भी वामदेव्य गान☸ करना चाहिये। (२)
☸वामदेव्य गान के तीन मन्त्र हैं:—
( १ ) कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया
वृता ॥
पाँचवाँ अध्याय ] २१७
४७—देवों के लिये हव्य ढोते ढोते छन्द थक गये और
यज्ञ के पिछले भाग में ठहर गये जैसे घोड़ा या खच्चर बोझ
लेजाने के बाद थक कर ठहर जाता है ।
( इनको ताज़ा करने के लिये ) मित्र और वरुण के पशु के
लिये पुरोडाश देने के पश्चात् देविका हवियों को दे ।
धाता के लिये १२ कपालों का पुरोडाश । धाता वषट्कार
है । अनुमति के लिये चरु । क्योंकि अनुमति गायत्री है । राका
के लिये चरु । क्योंकि राका त्रिष्टुभ् है । सिनीवाली के लिये
चरु । क्योंकि सिनीवाली जगती है । कुहू के लिये चरु क्योंकि
कुहू अनुष्टुभ् है । यह सब छन्द हैं । क्योंकि अन्य छन्द भी
गायत्री, त्रिष्टुभ्, जगती और अनुष्टुभ् के ही अनुयायी हैं । यह
इस यज्ञ में श्रेष्ठ समझे जाते हैं । जो कोई इस रहस्य को समझ
कर इन छन्दों से आहुति देता है मानों वह सभी छन्दों से
आहुति देता है ।
कहावत है कि कि घोड़े यदि ठीक तौर पर रक्खे जांय तो
सवार को आराम मिलता है । यही हाल छन्दों का है । छन्दों
को ठीक तौर पर रक्खा जाय तो यजमान को लाभ पहुचाते
हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह उस लोक को प्राप्त होता
है जिसका उसने कभी ध्यान भी नहीं किया ।
( २ ) कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः । दृढा चिदारुजे
वसु ॥
( ३ ) अभीषुणः सखीनामविता जरितॄणाम् । शतमभवास्त्यूतये ॥
( साम० १।३।१-२,-३ )
यह गायत्री छन्द में हैं । इनमें से तीसरे मंत्र में २१ ही अक्षर
हैं । तीन कम हैं । इसलिये पहले पद के अन्त में 'पु', दूसरे के 'रु'
और तीसरे के 'ष' लगाकर छन्द पूरा कर दिया जाता है ।
२१८ [ तीसरी पञ्चिका
इन (देविका) आहुतियों के विषय में कुछ लोग कहते हैं
कि इन सब देविकों की आहुतियों के पहले पहले एक एक ही
की आहुति धाता को देवे। ऐसा करने से वह हर देविका का
धाता से मैथुन करा देगा। इस पर कहते हैं कि ऐसा करना
आलस्य (अनुचित) है कि एक ही दिन में ऋचाओं के एक ही
जोड़े (पुरानुवाक्य और याज्य) पढ़े जायँ। कई स्त्रियाँ भी
तो एक ही पति से मैथुन करती हैं। जब (चारो) देविकाओं से
पहले होता धाता के लिये याज्य मंत्र पढ़ता है तो मानों धाता
सभी देविकाओं के साथ मैथुन कर लेता है।
देविकाओं की आहुति के विषय में इतना कथन हुआ। (३)
४८-अब देवियों की आहुतियों के विषय में।
'सूर्य' के लिये एक कपाल का पुरोडाश रक्खे। जो सूर्य है
वह धाता है। और वही वषट्कार है।
'द्यौ' के लिये चरु। द्यौ अनुमति है। वह गायत्री है।
'उषा' के लिये चरु। उषा राका है। वह त्रिष्टुभ् है।
'गौ' के लिये चरु। गौ सिनीवाली है। गौ जगती है।
'पृथिवी' के लिये चरु। पृथिवी कुहू है। पृथिवी अनुष्टुभ् है।
यज्ञ में जो अन्य छन्द प्रयोग किये जाते हैं वह सब गायत्री,
त्रिष्टुभ्, जगती और अनुष्टुभ् का अनुसरण करते हैं।
जो इस रहस्य को समझकर इन छन्दों के लिये आहुतियाँ
देता है वह सभी छन्दों को आहुतियाँ देता है।
कहावत है कि अच्छा घोड़ा सवार को सुख देता है। यही
छन्दों का हाल है। क्योंकि वे यजमान को सुख देते हैं जो इस
रहस्य को समझता है वह उस लोक को प्राप्त होता है जिसको
ओर उसका ध्यान भी न रहा हो। इन (देवियों) की आहुतियों
के विषय में कुछ लोगों का कहना है कि हर देवी को आहुति
पाँचवाँ अध्याय ] २१९
देने से पहले सूर्य को घी की आहुति देवे क्योंकि इससे वह
सूर्य का अन्य देवियों के साथ मैथुन कराता है ।
इस पर कहते हैं कि एक दिन में ऋचाओं के एक ही जोड़े
को बार बार कहना अनुचित है। कई पत्नियाँ भी एक पति से
मैथुन करती हैं । इन चारों देवियों के लिये आहुतियाँ देने से
पूर्व जो सूर्य के लिये एक आहुति दी जाती है उससे मानों सूर्य
हर देवी के साथ मैथुन कर लेता है ।
जो यह हैं वह वह हैं । जो वह हैं वह ये हैं (अर्थात् धाता
और अनुमति वही हैं जो सूर्य और द्यौ इसलिये जो कामनायें
सिद्ध हो सकती हैं वे एक से भी सिद्ध हो जाती हैं) ।
जिसको सन्तान की इच्छा हो उसके लिये दोनों प्रकार की
देवी और देविकाओं के लिये पुरोडाश का एक एक भाग काटकर
रक्खे जिससे दोनों प्रकार के देवतों की संतुष्टि हो जाय । परन्तु
जो धन की कामना करे उसके लिये ऐसा न करे । यदि वह धन
की कामना करने वाले के लिये दोनों प्रकार की देवी देविकों के
लिये पुरोडाश देगा तो देव लोग यजमान के धन का दाह करके
उससे अप्रसन्न हो जायंगे । ऐसे पुरुष को तो यही समझ लेना
चाहिये कि इतना पर्याप्त है ।
एक बार शुचिवृक्ष गोपालायन ने वृद्धद्युम्न प्रतारिण के यज्ञ
में देविका और देवियों दोनों के लिये पुरोडाश दे दिया । उसने
राजा के एक पुत्र को जल में तैरते देखकर कहा "यह इसीलिये
हैं कि मैंने देवी और देविका दोनों को राजा के यज्ञ में प्रसन्न
कर दिया था । इसीलिये राजकुमार जल में तैरता है । इसके
सिवाय राजा के चौंसठ पुत्र और पौत्र थे जो हर वक्त कवच
पहने रहते थे । (४)
४९—अग्निष्टोम में देवों ने और उक्थ्यों में असुरों ने आश्रय
लिया । दोनों बराबर शक्ति वाले थे इसलिये देव असुरों को न
२२० [ तीसरी पञ्चिका
निकाल सके। ऋषियों में से भरद्वाज ने उनको देखा और कहा
यह असुर उक्थ्यों में छिपे हैं। इसलिये कोई और उनको देख
नहीं सकता।" उसने इस मंत्र से अग्नि को बुलाया :—
एह्य॒ षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्येतरागिरः। एभिर्व॑र्धास इन्दुभिः।
(ऋ० ६।१६।१६)
"इतरा गिरः" (अर्थात् दूसरी वाणियाँ) असुरों की हैं।
इस पर अग्नि उठा और कहने लगा "यह कृश (दुबला),
दीर्घ (लम्बा), पलित (पीला) पुरुष क्या कहता है? क्योंकि
भरद्वाज दुबला, लम्बा और पीला था। उसने कहा "यह असुर
उक्थ्यों में प्रविष्ट हो गये। इन को कोई नहीं देख सकता।"
अग्नि घोड़ा बनकर उनके पीछे दौड़ा, और उसने उनको पकड़
लिया। इससे साकमश्वंसाम" बन गया। तभी से यह "साकम-
श्वंसाम" कहलाता है।
इस पर लोग कहते हैं कि 'साकमश्वंसाम' से उक्थ्यों को
शुरू करे। और जो उक्थ्य साकमश्वं से नहीं शुरू होते हैं
उनको शुरू होते न समझना चाहिये।
इस पर कुछ लोगों का कहना है कि प्रमंहिष्टीय से उक्थ्यों
को शुरू करना चाहिये क्योंकि इन्हीं के द्वारा देवों ने असुरों को
उक्थ्यों से निकाला था।
ऋषि का कथन है कि चाहे प्रमंहिष्टीय से शुरू करे या
साकमश्वंसाम से। जैसा जी चाहे। (५)
५०—असुर मित्रावरुण के उक्थ्य में घुस गये। इन्द्र ने
कहा, "कौन मेरा साथ देगा कि हम दोनों इन असुरों को वहाँ
से निकाल दें।" वरुण ने कहा, "मैं"। इसलिये तृतीय सवन में
इन्द्र-वरुण के लिये मित्रावरुण का उक्थ्य पढ़ा जाता है।
असुर यहाँ से निकल कर ब्राह्मणाच्छंसी में घुस गया।
इन्द्र ने कहा, "मैं"। इसलिये तीसरे सवन में इन्द्र-बृहस्पति के
पाँचवाँ अध्याय ] २२१
लिये ब्राह्मणाच्छंसी उक्थ्य पढ़ा जाता है। इन्द्र और बृहस्पति
ने असुरों को उसमें से निकाल दिया।
असुर यहाँ से निकल कर अच्छावाक् में घुस गये। इन्द्र
ने कहा, "कौन मेरा साथ देगा कि हम दोनों असुरों को यहाँ से
निकाल दें।" विष्णु ने कहा, "मैं"। इसलिये तीसरे सवन में
इन्द्र और विष्णु के लिये अच्छावाक् उक्थ्य पढ़ा जाता है।
इन्द्र और विष्णु ने उनको वहाँ से निकाला।
इन्द्र के साथ जिन देवों की स्तुति की जाती है वे द्वन्द्व
अर्थात् जोड़े हैं। जोड़े में नर और नारी होते हैं। इसी जोड़े से
जोड़ा उत्पन्न होता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा
और पशुओं से युक्त होता है।
पोत्रीय और नेष्ट्रीय ऋतुयाज चार होते हैं। वे छः ऋचायें
होती हैं। यह विराट् है जिसमें दस भाग हैं। इस प्रकार यह
यज्ञ को दस भाग वाले विराट् से समाप्त करते हैं। (६)
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका समाप्त हुई।
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
चौथी पञ्चिका
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CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पहला अध्याय
१-देवों ने पहले दिन ( की सोम-इष्टि ) द्वारा इन्द्र के लिये
वज्र तैयार किया । दूसरे दिन के द्वारा ठंडा किया । तीसरे दिन
के द्वारा इन्द्र को अर्पण किया और चौथे दिन के द्वारा उसने
उससे शत्रुओं पर प्रहार किया ।
इसलिये होता चौथे दिन षोडशी शस्त्र को पढ़ता है । यह
जो षोडशी है वह वज्र है । यह जो चौथे दिन षोडशी का पाठ
करता है मानो वज्र का प्रहार करता है अपने शत्रु और अहित-
चिन्तक पर और उस पर जिस का मारना ठीक हो ।
षोड़शी वज्र हैं । उक्थ्य पशु हैं । उस ( षोडशी ) को शस्त्रों
के ढकने के तौर पर पढ़ता है । ऐसा करने से मानो षोडशी के
शस्त्र से पशुओं को घेर लेता है । इसलिये षोडशी रूपी वज्र से
जब पशु घेरे जाते हैं तो वे यजमान के पास लौट आते हैं ।
इसलिये घोड़ा हो या पुरुष हो या गौ हो या हाथी हो यदि
ये जाते हों तो स्वयं ही लौट आते हैं यदि इनको पुकारा जाय ।
षोडशी रूपी वज्र को देखकर इस षोडशी वज्र से ही वश
में आते हैं। क्योंकि वाणी वज्र है। षोडशी वज्र है।
( २२५ )
१५
२२६ [ चौथी पञ्चिका
प्रश्न होता है कि यह षोडशी नाम क्यों पड़ा । स्तोत्र १६
होते हैं । शस्त्र भी सोलह होते हैं । सोलह अक्षर ( अनुष्टु॒भ् )
के बाद ठहरता है और सोलह अक्षर के बाद 'ओ३म्' कहता है ।
इसमें १६ पदों का निविद् रक्खा जाता है । इसीलिये षोडशी
नाम पड़ा ।
अब दो अक्षर बढ़े ( मंत्र के पिछले भाग में १६ के बजाय
अठारह अक्षर होते हैं । ) क्योंकि षोडशी के अनुष्टुभ् में अठा-
रह अक्षर हैं । यह वाणी के दो स्तन रूप हैं जो इस रहस्य को
समझता है उसकी सत्य रक्षा करता है और झूठ उसको हानि
नहीं पहुँचाने पाता । (१)
२--तेज और ब्रह्मवर्चस् का इच्छुक षोडशी में गौरिवीत
साम का पाठ करे । ( गौरिवीत साम-इन्द्र जुषस्व प्रवहाय···
साम वेद, उत्तरार्चिक ३।२२; आश्वलायन श्रौत सूत्र ६।२ ) । यह
गौरिवीत साम तेज भी है और ब्रह्मवर्चस् भी । जो इस रहस्य
को समझ कर गौरिवीत साम पढ़ता है वह तेजस्वी और ब्रह्म-
वर्चस्वी होता है ।
कुछ लोग कहते हैं कि षोडशी में नानद साम पढ़ना चाहिये,
( नानद साम—प्रत्यस्मै पिपीषते इत्यादि, सामवेद ४।२।७।१-४ )
इन्द्र ने वृत्र के लियें वज्र उठाया, और उसे मारा, और उसे
घायल किया । घायल होकर वह शोर करने लगा ( व्यनदत् ) ।
इसलिये नानद साम हो गया । इसीलिये इसको नानद साम
कहते हैं । नानद साम को शत्रु का भय नहीं क्योंकि यह शत्रु
का मारने वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर षोडशी में
नानद साम का पाठ करता है उसका शत्रु मर जाता है और
वह शत्रुओं से अभय हो जाता है ।
यदि नानद साम पढ़ा जाय तो अविहृत पढ़ना चाहिये
(अर्थात् एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से नहीं मिलाने
पहला अध्याय ] २२७
चाहिये) क्योंकि इसको अविहृत ही पढ़ा जाता है। यदि षोडशी
शस्त्र में 'गौरिवीत' का पाठ करे तो विहृत पढ़े (अर्थात् एक
मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से मिला देना चाहिये) क्योंकि
उसको इसी प्रकार पढ़ा करते हैं।
३—यदि गौरिवीत पढ़ा जाय तो होता छन्द कं पदों को
मिला जुला देता है (व्यतिषजति)। गायत्री और पंक्ति को
मिला देता है "आत्वा वहन्तु" (ऋ० १।१६।१-३) और उप-
सुश्रूणिहि (१।८२।१,३,४)। (पहला गायत्री है और दूसरा
पंक्ति)। पुरुष गायत्री होता है और पशु पंक्ति। इस प्रकार
वह पुरुष को पशुओं से मिलाता है और उनको पशुओं में
स्थापित करता है।
गायत्री और पंक्ति मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस
प्रकार यजमान अनुष्टुभ् रूप वाणी से या वज्र से अलग नहीं
होता।
उष्णिग् और बृहती को मिला देता है जैसे "यदिन्द्र
पृतनाज्ये" "अयन्तेते अस्तु हर्य्यत।" (ऋ० ४।२४।२५-२७ और
३।४४।१-३)। पुरुष उष्णिग् है और पशु बृहती। इस प्रकार वह
पुरुष को पशुओं से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना
कर देता है।
उष्णिग् और बृहती मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस
प्रकार वह अनुष्टुभ् रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं
होता।
वह द्विपद को त्रिष्टुभ् से मिला देता है। जैसे "धूर्ध्वस्मै"
और "ब्रह्मन् वीर" (ऋ० ७।३४।४ तथा ७।२९।२) पुरुष द्विपद्
है और वीर्य त्रिष्टुभ्। इस प्रकार पुरुष को वीर्य से मिला देता
है; और वीर्यवान् कर देता है। यही कारण है कि मनुष्य वीर्य-
वान् होकर सब पशुओं से अधिक बल वाला हो जाता है।
२२८ [ चौथी पञ्चिका
बीस अक्षरों का द्विपद् और ४४ का त्रिष्टुभ् मिल कर ६४
अक्षर के दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार यजमान व अनुष्टुभ्
रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं होता।
वह द्विपद् और जगती को मिला देता है जैसे एष ब्रह्मा
(आश्व० श्रौतसूत्र ६।२) और प्रतेमहे (ऋ० १०।९६।१-३)। पुरुष
द्विपद् हैं और पशु जगती हैं, इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं
से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना कर देता है।
इसलिये पुरुष पशुओं में प्रतिष्ठित होकर उनसे दुग्धादि भोजन
प्राप्त करता है। और उन पर शासन करता है क्योंकि यह उसके
वश में होते हैं। सोलह अक्षरों के द्विपद् और अड़तालीस
अक्षरों की जगती मिलकर चौंसठ अक्षरों के दो अनुष्टुभ् हो
जाते हैं। इस प्रकार यजमान वाणी रूपी अनुष्टुभ् और वज्र
से अलग नहीं होता।
वह अब नीचे के मंत्र बोलता है जिनमें उन नियत छन्दों से
अधिक अक्षर हैं :—( अति छन्द )
( १ ) त्रिकद्रुकेषु महिषोयवाशिरं ( ऋ० २।२२।१-३ )
( २ ) प्रोष्वस्मै पुरोरथम् । ( ऋ० १०।१३३।१-३ )
छन्दों में से जो रस बहा वह अतिच्छन्दों में चला गया।
इसीलिये इनको "अतिच्छन्द" कहते हैं।
षोडशी शस्त्र सब छन्दों से बना है, इसलिये अतिच्छन्दों
का पाठ किया जाता है।
इस प्रकार होता यजमान को सब छन्दों से युक्त कर
देता है।
जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों के षोडशी
द्वारा फूलता फलता है। (३)
पहला अध्याय ] २२९
· ४—महानाम्नी मंत्रों से कुछ टुकड़े लेकर उपसर्ग※ अर्थात्
आधिक्य करता है :—
पहली महानाम्नी यह ( भूलोक ) है, दूसरी अंतरिक्ष लोक,
तीसरी वह ( स्वर्ग लोक )। इस प्रकार षोडशी में सब लोक
आ गये ।
महानाम्नियों में से षोडशी में उपसर्ग करने का तात्पर्य यह है
कि होता यजमान को सब लोकों में भाग देता है। जो इस
रहस्य को समझता है वह षोडशी के सब लोकों से निर्मित होने
के कारण फूलता फलता है।
अब वह नीचे के प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ करता है :—
(१) प्र. प्रवनिष्टुभम्। (ऋ० ८।६६।१)
(२) अर्चत प्रार्चत। (ऋ० ८।६६।८-१०)
(३) यो न्यत्तौँफरांणायद् । (ऋ० ८।६६।१३-१५)
प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ ऐसा है जैसे कोई मार्ग से बहक
गया हो और लौट-फेर कर ठीक मार्ग पर आ जाय ।
जो जो अपने को श्री वाला और संपन्न समझे उसको चाहिये
कि होता से अविहृत पाठ कराये जिससे छन्दों को विहृत करने
में जो उनकी क्षति होती है उस क्षति का उस पर भी प्रभाव न
पड़ सके ।
अगर पाप नाश करने का प्रयोजन हो तो विहृत पाठ होना
चाहिये।
※यह उपसर्ग पाँच हैं ( १ ) प्रेचन ( २ ) प्रचेतय ( ३ ) आया-
हिपिबमत्स्व ( ४ ) क्रतुश्छन्द ऋते वृहत् ( ५ ) सुम्न आवेहि नो
वसो। यह महानाम्नी मंत्रों से लिये गये हैं। यदि इनको अविहृत
बोलना हो तो लगातार बोलते हैं। इन का एक अनुष्टुभ् हो जाता है ।.
यदि विहृत बोलना हो तो अतिच्छन्दों में जोड़ देते हैं ।