सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 239

पहला अध्याय
१-देवों ने पहले दिन ( की सोम-इष्टि ) द्वारा इन्द्र के लिये
वज्र तैयार किया । दूसरे दिन के द्वारा ठंडा किया । तीसरे दिन
के द्वारा इन्द्र को अर्पण किया और चौथे दिन के द्वारा उसने
उससे शत्रुओं पर प्रहार किया ।
इसलिये होता चौथे दिन षोडशी शस्त्र को पढ़ता है । यह
जो षोडशी है वह वज्र है । यह जो चौथे दिन षोडशी का पाठ
करता है मानो वज्र का प्रहार करता है अपने शत्रु और अहित-
चिन्तक पर और उस पर जिस का मारना ठीक हो ।
षोड़शी वज्र हैं । उक्थ्य पशु हैं । उस ( षोडशी ) को शस्त्रों
के ढकने के तौर पर पढ़ता है । ऐसा करने से मानो षोडशी के
शस्त्र से पशुओं को घेर लेता है । इसलिये षोडशी रूपी वज्र से
जब पशु घेरे जाते हैं तो वे यजमान के पास लौट आते हैं ।
इसलिये घोड़ा हो या पुरुष हो या गौ हो या हाथी हो यदि
ये जाते हों तो स्वयं ही लौट आते हैं यदि इनको पुकारा जाय ।
षोडशी रूपी वज्र को देखकर इस षोडशी वज्र से ही वश
में आते हैं। क्योंकि वाणी वज्र है। षोडशी वज्र है।
( २२५ )
१५