ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ
पृष्ठ 243, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 243पहला अध्याय ] २२९
पहला अध्याय ] २२९
· ४—महानाम्नी मंत्रों से कुछ टुकड़े लेकर उपसर्ग※ अर्थात्
आधिक्य करता है :—
पहली महानाम्नी यह ( भूलोक ) है, दूसरी अंतरिक्ष लोक,
तीसरी वह ( स्वर्ग लोक )। इस प्रकार षोडशी में सब लोक
आ गये ।
महानाम्नियों में से षोडशी में उपसर्ग करने का तात्पर्य यह है
कि होता यजमान को सब लोकों में भाग देता है। जो इस
रहस्य को समझता है वह षोडशी के सब लोकों से निर्मित होने
के कारण फूलता फलता है।
अब वह नीचे के प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ करता है :—
(१) प्र. प्रवनिष्टुभम्। (ऋ० ८।६६।१)
(२) अर्चत प्रार्चत। (ऋ० ८।६६।८-१०)
(३) यो न्यत्तौँफरांणायद् । (ऋ० ८।६६।१३-१५)
प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ ऐसा है जैसे कोई मार्ग से बहक
गया हो और लौट-फेर कर ठीक मार्ग पर आ जाय ।
जो जो अपने को श्री वाला और संपन्न समझे उसको चाहिये
कि होता से अविहृत पाठ कराये जिससे छन्दों को विहृत करने
में जो उनकी क्षति होती है उस क्षति का उस पर भी प्रभाव न
पड़ सके ।
अगर पाप नाश करने का प्रयोजन हो तो विहृत पाठ होना
चाहिये।
※यह उपसर्ग पाँच हैं ( १ ) प्रेचन ( २ ) प्रचेतय ( ३ ) आया-
हिपिबमत्स्व ( ४ ) क्रतुश्छन्द ऋते वृहत् ( ५ ) सुम्न आवेहि नो
वसो। यह महानाम्नी मंत्रों से लिये गये हैं। यदि इनको अविहृत
बोलना हो तो लगातार बोलते हैं। इन का एक अनुष्टुभ् हो जाता है ।.
यदि विहृत बोलना हो तो अतिच्छन्दों में जोड़ देते हैं ।