ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ] २२१
लिये ब्राह्मणाच्छंसी उक्थ्य पढ़ा जाता है। इन्द्र और बृहस्पति
ने असुरों को उसमें से निकाल दिया।
असुर यहाँ से निकल कर अच्छावाक् में घुस गये। इन्द्र
ने कहा, "कौन मेरा साथ देगा कि हम दोनों असुरों को यहाँ से
निकाल दें।" विष्णु ने कहा, "मैं"। इसलिये तीसरे सवन में
इन्द्र और विष्णु के लिये अच्छावाक् उक्थ्य पढ़ा जाता है।
इन्द्र और विष्णु ने उनको वहाँ से निकाला।
इन्द्र के साथ जिन देवों की स्तुति की जाती है वे द्वन्द्व
अर्थात् जोड़े हैं। जोड़े में नर और नारी होते हैं। इसी जोड़े से
जोड़ा उत्पन्न होता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा
और पशुओं से युक्त होता है।
पोत्रीय और नेष्ट्रीय ऋतुयाज चार होते हैं। वे छः ऋचायें
होती हैं। यह विराट् है जिसमें दस भाग हैं। इस प्रकार यह
यज्ञ को दस भाग वाले विराट् से समाप्त करते हैं। (६)
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका समाप्त हुई।