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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 592 में से

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पृष्ठ 233

पाँचवाँ अध्याय ] २१९
देने से पहले सूर्य को घी की आहुति देवे क्योंकि इससे वह
सूर्य का अन्य देवियों के साथ मैथुन कराता है ।
इस पर कहते हैं कि एक दिन में ऋचाओं के एक ही जोड़े
को बार बार कहना अनुचित है। कई पत्नियाँ भी एक पति से
मैथुन करती हैं । इन चारों देवियों के लिये आहुतियाँ देने से
पूर्व जो सूर्य के लिये एक आहुति दी जाती है उससे मानों सूर्य
हर देवी के साथ मैथुन कर लेता है ।
जो यह हैं वह वह हैं । जो वह हैं वह ये हैं (अर्थात् धाता
और अनुमति वही हैं जो सूर्य और द्यौ इसलिये जो कामनायें
सिद्ध हो सकती हैं वे एक से भी सिद्ध हो जाती हैं) ।
जिसको सन्तान की इच्छा हो उसके लिये दोनों प्रकार की
देवी और देविकाओं के लिये पुरोडाश का एक एक भाग काटकर
रक्खे जिससे दोनों प्रकार के देवतों की संतुष्टि हो जाय । परन्तु
जो धन की कामना करे उसके लिये ऐसा न करे । यदि वह धन
की कामना करने वाले के लिये दोनों प्रकार की देवी देविकों के
लिये पुरोडाश देगा तो देव लोग यजमान के धन का दाह करके
उससे अप्रसन्न हो जायंगे । ऐसे पुरुष को तो यही समझ लेना
चाहिये कि इतना पर्याप्त है ।
एक बार शुचिवृक्ष गोपालायन ने वृद्धद्युम्न प्रतारिण के यज्ञ
में देविका और देवियों दोनों के लिये पुरोडाश दे दिया । उसने
राजा के एक पुत्र को जल में तैरते देखकर कहा "यह इसीलिये
हैं कि मैंने देवी और देविका दोनों को राजा के यज्ञ में प्रसन्न
कर दिया था । इसीलिये राजकुमार जल में तैरता है । इसके
सिवाय राजा के चौंसठ पुत्र और पौत्र थे जो हर वक्त कवच
पहने रहते थे । (४)
४९—अग्निष्टोम में देवों ने और उक्थ्यों में असुरों ने आश्रय
लिया । दोनों बराबर शक्ति वाले थे इसलिये देव असुरों को न