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आदित्यहृदय स्तोत्रम् (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड - महर्षि अगस्त्य-श्रीराम संवाद सविस्तार सटीक)

Aditya Hridaya Stotram with Hindi Meaning

महर्षि वाल्मीकि (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished32 पृष्ठ

॥ श्रीहरिः ॥ 211
आदित्यहृदयस्तोत्रम्
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
211 Adityahriday 1A

आदित्यहृदयस्तोत्रम्
विनियोग
ॐ अस्य आदित्यहृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुप् छन्दः,
आदित्यहृदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया
ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास
ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे नमः,
मुखे। आदित्य-हृदयभूत-ब्रह्मदेवतायै नमः, हृदि। ॐ
बीजाय नमः, गुह्ये। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयोः। ॐ
तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः, नाभौ।

आदित्यहृदयस्तोत्रम् ४
करन्यास
इस स्तोत्रके अंगन्यास और करन्यास तीन प्रकारसे किये
जाते हैं। केवल प्रणवसे, गायत्रीमन्त्रसे अथवा ‘रश्मिमते
नमः’ इत्यादि छः नाम-मन्त्रोंसे। यहाँ नाम-मन्त्रोंसे किये
जानेवाले न्यासका प्रकार बताया जाता है—
ॐ रश्मिमते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवस्वते
अनामिकाभ्यां नमः। ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

आदित्यहृदयस्तोत्रम् ५
हृदयादि अंगन्यास
ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा।
ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्। ॐ विवस्वते कवचाय
हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय
अस्त्राय फट्। इस प्रकार न्यास करके निम्नांकित मन्त्रसे
भगवान् सूर्यका ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिये—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो
देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। तत्पश्चात्
‘आदित्यहृदय’ स्तोत्रका पाठ करना चाहिये।

Āditya-Hṛdaya-Stotram*
ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ १॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा॥ २॥
'उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्धसे थककर चिन्ता करते हुए रणभूमिमें खड़े
थे। इतनेमें रावण भी युद्धके लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह
देख भगवान् अगस्त्य मुनि, जो देवताओंके साथ युद्ध देखनेके लिये आये
थे, श्रीरामके पास जाकर बोले'॥ १-२॥
* Verses in the praise of Sun-god.

आदित्यहृदयस्तोत्रम् ७
'Beholding Śrī Rāma, standing absorbed in thought on the
battlefield, exhausted (as he was) by the fight, and Rāvaṇa facing
him, duly prepared for an encounter, and approaching Śrī Rāma,
the glorious sage Agastya, who had come in the company of gods
to witness the (epoch-making) encounter (of Śrī Rāma with Rāvaṇa)
now spoke as follows'—(1-2)
राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥ ३ ॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥ ४ ॥

आदित्यहृदयस्तोत्रम् ८
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५॥
‘सबके हृदयमें रमण करनेवाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय
स्तोत्र सुनो। वत्स! इसके जपसे तुम युद्धमें अपने समस्त शत्रुओंपर
विजय पा जाओगे। इस गोपनीय स्तोत्रका नाम है ‘आदित्यहृदय’। यह
परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओंका नाश करनेवाला है। इसके जपसे
सदा विजयकी प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय
स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलोंका भी मंगल है। इससे सब पापोंका नाश हो
जाता है। यह चिन्ता और शोकको मिटाने तथा आयुको बढ़ानेवाला
उत्तम साधन है’ ॥ ३—५॥

आदित्यहृदयस्तोत्रम् ९
‘Rāma, O mighty-armed Śrī Rāma, hearken to the following
eternal secret—in the form of a holy, eternal, immortal and
supremely blessed and excellent encomium, entitled the “Āditya-
Hṛdaya” (which is intended to propitiate Brahma, installed in the
heart of the orb of the sun). The blessing of all blessings, by means
of which, my child, you will (be able to) conquer once for all your
adversaries on the battlefield, and which is calculated to bring
victory, root out all sins, allay all anxiety and grief once for all
and prolong life.’ (3—5)
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ ६॥

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १०
सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७ ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ ८ ॥
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ९ ॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥ १० ॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥ ११ ॥

आदित्यहृदय स्तोत्र मूल श्लोक एवं सान्वय हिन्दी अर्थ (श्लोक १-३१)

आदित्यहृदयस्तोत्रम् ११
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहस्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥१२॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः॥१३॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः॥१४॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥१५॥
'भगवान् सूर्य अपनी अनन्त किरणोंसे सुशोभित (रश्मिमान्)

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १२
हैं। ये नित्य उदय होनेवाले (समुद्यन्), देवता और असुरोंसे नमस्कृत,
विवस्वान् नामसे प्रसिद्ध, प्रभाका विस्तार करनेवाले (भास्कर) और
संसारके स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका [रश्मिमते नमः, समुद्यते
नमः, देवासुरनमस्कृताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय
नमः—इन नाम-मन्त्रोंके द्वारा] पूजन करो। ‘सम्पूर्ण देवता इन्हींके
स्वरूप हैं। ये तेजकी राशि तथा अपनी किरणोंसे जगत्को सत्ता एवं
स्फूर्ति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही अपनी रश्मियोंका प्रसार करके
देवता और असुरोंसहित सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं। ये ही
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा,

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १३
वरुण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि,
प्रजा, प्राण, ऋतुओंको प्रकट करनेवाले तथा प्रभाके पुंज हैं। इन्हींके
नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत्को उत्पन्न करनेवाले), सूर्य
(सर्वव्यापक), खग (आकाशमें विचरनेवाले), पूषा (पोषण करनेवाले),
गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुवर्णसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता
(ब्रह्माण्डकी उत्पत्तिके बीज), दिवाकर (रात्रिका अन्धकार दूर करके
दिनका प्रकाश फैलानेवाले), हरिदश्व (दिशाओंमें व्यापक अथवा हरे
रंगके घोड़ेवाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणोंसे सुशोभित), सप्तसप्ति
(सात घोड़ोंवाले), मरीचिमान् (किरणोंसे सुशोभित), तिमिरोन्मथन

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १४
(अन्धकारका नाश करनेवाले), शम्भु (कल्याणके उद्गम स्थान), त्वष्टा
(भक्तोंका दुःख दूर करने अथवा जगत्का संहार करनेवाले),
मार्तण्डक (ब्रह्माण्डको जीवन प्रदान करनेवाले), अंशुमान् (किरण
धारण करनेवाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभावसे ही सुख
देनेवाले), तपन (गर्मी पैदा करनेवाले), अहस्कर (दिनकर), रवि
(सबकी स्तुतिके पात्र), अग्निगर्भ (अग्निको गर्भमें धारण करनेवाले),
अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन
(शीतका नाश करनेवाले), व्योमनाथ (आकाशके स्वामी), तमोभेदी
(अन्धकारको नष्ट करनेवाले), ऋग्, यजुः और सामवेदके पारगामी,

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १५
घनवृष्टि (घनी वृष्टिके कारण), अपां मित्र (जलको उत्पन्न करनेवाले),
विन्ध्यवीथीप्लवंगम (आकाशमें तीव्र वेगसे चलनेवाले), आतपी (घाम
उत्पन्न करनेवाले), मण्डली (किरणसमूहको धारण करनेवाले), मृत्यु
(मौतके कारण), पिंगल (भूरे रंगवाले), सर्वतापन (सबको ताप
देनेवाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त
(लाल रंगवाले), सर्वभवोद्भव (सबकी उत्पत्तिके कारण), नक्षत्र, ग्रह
और तारोंके स्वामी, विश्वभावन (जगत्की रक्षा करनेवाले), तेजस्वियोंमें
भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपोंमें अभिव्यक्त) हैं।
[इन सभी नामोंसे प्रसिद्ध सूर्यदेव!] आपको नमस्कार है'॥ ६—१५॥

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १६
‘Worship (you) the sun-god, the ruler of the worlds, who is
crowned with rays, (nay) who appears at the horizon (every
day without fail), who is greeted by gods and demons (alike)
and brings light (to the world). Indeed, he is the embodiment of
all gods and full of glory and creates and sustains the gods
and the demons as well as their worlds, by his rays. Indeed’ he
is the same as Brahmā (the creator) as well as Viṣṇu (the
Protector of the universe), Lord Śiva (the god of destruction),
Skanda (son of Lord Śiva), Prajāpati (the lord of creation),
the mighty Indra (the ruler of gods), Kubera (the bestower of
riches), Kāla (the Time-spirit), Yama (the god of retribution),

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १७
Soma (the moon-god), Varuṇa (the ruler of the waters), the
Pitṛs (manes), the (eight) Vasus, the (twelve) Sādhyas, the (two)
Aśvīs (the physicians of gods), the (forty-nine) Maruts (wind-
gods), Manu (a Progenitor of the human race), Vāyu (the wind-
god) and the god of fire. He constitutes (all) created beings, he
is the life-breath (of the universe), the source of the seasons,
the store-house of light, an offspring of Aditi, the progenitor
(of all), the sun-god, the courser in the heavens, the nourisher
(of all), the possessor of rays, the golden, the brilliant, the one
whose energy constitutes the seed of the universe and the maker
of day. He has seven green horses (yoked to his chariot), is

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १८
myriad-rayed, full of rays, the destroyer of darkness, the source
of happiness, the mitigator of the suffering of his devotees, the
infuser of life in the lifeless cosmic egg, all-pervading and the
cause of the creation, preservation and destruction of the
universe. He is blissful by nature, the ruler of all, the bringer of
day and the Teacher. As a son of Aditi, he bears the fire of
dissolution in his womb, is bliss personified and all-enveloping
(like space), the destroyer of cold, the lord of the heavens, the
disperser of darkness, a master of the three Vedas (Ṛk, Sāma
and Yajuṣ), the sender of thick showers and the friend (giver)

आदित्यहृदयस्तोत्रम् १९
of water. He courses swiftly along his own orbit, carries in
him the resolve to evolve the universe and is adorned with
a circle of rays. He is death (itself)’ tawny (of hue) and the
destroyer of all. He is omniscient, all-formed, endowed with
extraordinary brilliance, coppery, the source of all evolutes,
the controller of (all) lunar mansions, planets and stars, the
creator of all, the resplendent among the splendid. O god
appearing in twelve forms (in the shape of twelve months of the
year), hail to you !’ (6—15)
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ १६॥

आदित्यहृदयस्तोत्रम् २०
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ १७॥
नमः उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते॥ १८॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ १९॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ २०॥
तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥ २१॥

आदित्यहृदयस्तोत्रम् २१
'पूर्वगिरि—उदयाचल तथा पश्चिमगिरि—अस्ताचलके रूपमें
आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों)-के स्वामी
तथा दिनके अधिपति आपको प्रणाम है। आप जयस्वरूप तथा
विजय और कल्याणके दाता हैं। आपके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते
रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणोंसे सुशोभित
भगवान् सूर्य! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदितिके पुत्र होनेके
कारण आदित्यनामसे प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्कार है। उग्र
(अभक्तोंके लिये भयंकर), वीर (शक्ति-सम्पन्न) और सारंग
(शीघ्रगामी) सूर्यदेवको नमस्कार है। कमलोंको विकसित करनेवाले