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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

About this granth

The Yajurveda (यजुर्वेद) is the second of the four Vedas and the Veda of sacrificial ritual. Its formulas are largely in prose, and it was compiled as a manual for priests conducting the sacrifices; most mantras used in household rites and fire rituals today still come from it.

This edition by Dr. Rekha Vyas gives the mantras with a simple Hindi rendering of their sense. It was published by Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi (copyright 1979); the scanned copy is the 2015 edition. In her foreword the author notes that 663 mantras of the Rigveda reappear unchanged in the Yajurveda, yet the two differ, since the Rigveda is in verse and the Yajurveda in prose. She also mentions the tradition of 101 branches of the Yajurveda, of which two are the most widely followed.

The translation runs chapter by chapter after a table of contents, offering readers the plain meaning of the mantras without a dense commentary.

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

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यजुर्वेद
डा. रेखा व्यास
एम. ए., पी-एच. डी.
संस्कृत साहित्य प्रकाशन

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© १९७९
संस्कृत साहित्य प्रकाशन
संस्करण : २०१५
ISBN 81-7987-096-0
VP : 632.5H15
संस्कृत साहित्य प्रकाशन के लिए
विश्व विजय प्रा. लि.
एम-१२, कनाट सरकस, नई दिल्ली-११०००१
द्वारा मुद्रित व वितरित

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प्राक्कथन
सामान्यतया द्वितीय वेद के रूप में प्रसिद्ध यजुर्वेद की रचना ऋग्वेदीय
ऋचाओं के मिश्रण से हुई मानी जाती है, क्योंकि ऋग्वेद के ६६३ मंत्र यथावत
यजुर्वेद में भी प्राप्त होते हैं. फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि दोनों एक ही
ग्रंथ हैं. ऋग्वेद के मंत्र पद्यात्मक हैं, जबकि यजुर्वेद के गद्यात्मक—'गद्यात्मको यजुः
'. साथ ही अनेक मंत्र ऋग्वेद से भिन्न भी हैं.
वस्तुतः यजुर्वेद एक पद्धति ग्रंथ है, जो पौरोहित्य प्रणाली में यज्ञ आदि कर्म
संपन्न कराने के लिए संकलित हुआ था. इसीलिए आज भी विभिन्न संस्कारों एवं
यज्ञीय कर्मों के अधिकांश मंत्र यजुर्वेद के ही होते हैं. यज्ञ आदि कर्मों से संबंधित
होने के कारण यजुर्वेद अपेक्षाकृत अधिक जनप्रिय रहा है.
यूं तो यजुर्वेद की १०१ शाखाएं बताई जाती हैं, किंतु मुख्यतयाः दो शाखाएं
ही अधिक प्रसिद्ध हैं—कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद. इन्हें क्रमशः तैत्तिरीय एवं
वाजसनेयी संहिताएं भी कहा जाता है. इन में से तैत्तिरीय संहिता अपेक्षाकृत अधिक
पुरानी मानी जाती है, वैसे दोनों में प्रायः एक ही सामग्री है. हां, उन के क्रम में कुछ
अंतर है. शुक्ल यजुर्वेद अपेक्षाकृत अधिक क्रमबद्ध है. इस में कुछ ऐसे भी मंत्र हैं,
जो कृष्ण यजुर्वेद में नहीं हैं.
यजुर्वेद दो संहिताओं में कब और कैसे विभाजित हो गया—यह तो प्रामाणिक
रूप में उपलब्ध नहीं है, हां, इस संदर्भ में एक रोचक कथा अवश्य प्रचलित है—
कहा जाता है कि वेदव्यास के शिष्य वैशंपायन के २७ शिष्य थे. उन में से
सर्वाधिक मेधावी थे याज्ञवल्क्य. एक बार वैशंपायन ने किसी यज्ञ के लिए
अपने सभी शिष्यों को आमंत्रित किया. उन में से कुछ शिष्य यज्ञ कर्म में
पूर्णतया कुशल नहीं थे.
अतः याज्ञवल्क्य ने उन अकुशल शिष्यों का साथ देने से मना कर दिया. इस
से शिष्यों में आपसी विवाद उठ खड़ा हुआ. तब वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य से
अपनी सिखाई हुई विद्या वापस मांगी. याज्ञवल्क्य ने भी आवेश में तुरंत यजुर्वेद
का वमन कर दिया. विद्या के कण कृष्ण वर्ण के रक्त से सने हुए थे.

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यह देख कर दूसरे शिष्यों ने तीतर बन कर उन कणों को चुग लिया. इन शिष्यों
द्वारा विकसित होने वाली यजुर्वेद की शाखा तैत्तिरीय संहिता कहलाई.
इस घटना के बाद याज्ञवल्क्य ने सूर्य की उपासना की और उन से पुनः यजुर्वेद
प्राप्त किया. सूर्य ने वाज ( अश्व ) बन कर याज्ञवल्क्य को यजुर्वेद की शिक्षा
दीक्षा दी थी, इसलिए यह शाखा वाजसनेयी कहलाई.
यह कहानी कितनी सच है और कितनी झूठ, यह बता पाना असंभव है. कुछ
विद्वान् इसे कपोलकल्पित कहते हैं और कुछ मिथ. कुछ भी हो, इतना निश्चित है
कि यजुर्वेद ज्ञान ( वेद ) की वह शाखा ( भाग ) है, जिस में यज्ञीय कर्मों का वर्चस्व
है, जिस के बल पर धर्म के धंधेबाजों ने सदियों से जनसामान्य को बेवकूफ बना
कर स्वार्थ साधे और आज भी यही हो रहा है.
आज जब देश में संस्कृत के ज्ञाताओं की संख्या नगण्य रह गई है, उन में भी
वैदिक संस्कृत जानने वाले तो और भी कम हैं, तब यह आवश्यक हो गया है कि
अन्य वेदों ( वैदिक ग्रंथों ) के साथसाथ यजुर्वेद का भी सरल हिंदी में अनुवाद
प्रस्तुत किया जाए, ताकि साधारण पाठक भी समझ सकें कि यज्ञ, सामाजिक
संस्कार आदि कर्मों की कथित महत्ता प्रतिपादित करने वाले इस वेद के मंत्रों का
वास्तविक अर्थ और अभिप्राय क्या है ?
चूंकि आरंभ से ही यजुर्वेद को यज्ञीय कर्मों से संबद्ध माना गया है, इसलिए
प्रायः सभी प्राचीन आचार्यों ने इस के मंत्रों के अर्थ यज्ञीय कर्मों के संदर्भ में ही
किए हैं. इन आचार्यों में उवट ( १०४० ई. ) और महीधर ( १५८८ ई. ) के भाष्य
प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने शुक्ल यजुर्वेद पर भाष्य लिखे थे. वे भाष्य
आज भी उपलब्ध और विभिन्न विद्वानों द्वारा स्वीकृत हैं. यहां तक कि आचार्य उवट
का भाष्य देख कर ही आचार्य सायण ने भी यजुर्वेद के भाष्य पर अपनी कलम
नहीं चलाई है.
अतः यजुर्वेद के प्रस्तुत अनुवाद में आचार्य उवट के अनुवाद को ही आधार
बनाया गया है. इस में प्रायः उन्हीं अर्थों को अपनाया गया है, जो उवट को अभीष्ट
थे. अनुवाद की भाषा सरल एवं सुबोध रखने का प्रयास किया गया है, ताकि
साधारण पाठक भी विषय को आसानी से समझ सकें.
प्रकाशक

पहला अध्याय ३१-३८

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विषय सूची
पूर्वार्ध
पहला अध्याय ३१-३८
दूसरा अध्याय ३९-४५
तीसरा अध्याय ४६-५५
चौथा अध्याय ५६-६३
पांचवां अध्याय ६४-७३
छठा अध्याय ७४-८२
सातवां अध्याय ८३-९३
आठवां अध्याय ९४-१०६
नौवां अध्याय १०७-११५
दसवां अध्याय ११६-१२४
ग्यारहवां अध्याय १२५-१३९
बारहवां अध्याय १४०-१५९
तेरहवां अध्याय १६०-१७०
चौदहवां अध्याय १७१-१८०
पंद्रहवां अध्याय १८१-१९४
सोलहवां अध्याय १९५-२०६
सत्रहवां अध्याय २०७-२२३
अठारहवां अध्याय २२४-२३८
उन्नीसवां अध्याय २३९-२५४
बीसवां अध्याय २५५-२६९

इक्कीसवां अध्याय २७०-२८३

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उत्तरार्ध
इक्कीसवां अध्याय २७०-२८३
बाईसवां अध्याय २८४-२९१
तेईसवां अध्याय २९२-३०३
चौबीसवां अध्याय ३०४-३११
पच्चीसवां अध्याय ३१२-३२१
छब्बीसवां अध्याय ३२२-३२६
सत्ताईसवां अध्याय ३२७-३३३
अट्ठाईसवां अध्याय ३३४-३४३
उनतीसवां अध्याय ३४४-३५४
तीसवां अध्याय ३५५-३६०
इकतीसवां अध्याय ३६१-३६४
बत्तीसवां अध्याय ३६५-३६७
तैंतीसवां अध्याय ३६८-३८३
चौंतीसवां अध्याय ३८४-३९४
पैंतीसवां अध्याय ३९५-३९८
छत्तीसवां अध्याय ३९९-४०२
सैंतीसवां अध्याय ४०३-४०७
अड़तीसवां अध्याय ४०८-४१३
उनतालीसवां अध्याय ४१४-४१६
चालीसवां अध्याय ४१७-४१९

पहला अध्याय

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पूर्वार्ध
पहला अध्याय
विषय मंत्र पृष्ठ
मनुष्यों के स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना १-२ ३१
सविता देव की कृपा ३-४ ३१-३२
अग्नि से व्रतशील बनाने की प्रार्थना ५ ३२
सामर्थ्यवान परमेश्वर की स्तुति ६-१० ३२-३३
अग्नि की उपासना ११ ३३
जल देव की स्तुति १२-१४ ३३-३४
यज्ञ में काम आने वाले साधन शम्य का वर्णन १५-१७ ३४
अग्नि की स्तुति १८ ३५
यज्ञ का आसन १९ ३५
हवि की प्रशंसा २० ३५
ओषधियों में मधुरता की कामना २१ ३५
पुरोडाश बनाने की विधि २२ ३६
मनुष्यों का उत्साहवर्धन २३ ३६
प्रकाश फैलाने वाले सविता देव की प्रशंसा २४ ३६
पृथ्वी और सविता की स्तुति २५ ३६
शत्रुओं से मुक्ति के लिए प्रार्थना २६ ३६-३७
कल्याणकारी यज्ञवेदिका २७ ३७
परमेश्वर की महिमा का गुणगान २८-२९ ३७
अदिति देव का स्वरूप ३० ३८
सविता देव की स्तुति ३१ ३८
दूसरा अध्याय
समिधा की पवित्रता १ ३९
यज्ञ जल एवं कुश की विशेषता २ ३९

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विश्वावसु की प्रशंसा ३ ३९
अग्नि की प्रमुखता ४ ४०
देवताओं के लिए आसन ५ ४०
जुहू यज्ञस्थान आदि ६ ४०
अन्नदाता अग्नि की स्तुति ७-९ ४०-४१
इंद्र से धन देने का अनुरोध १० ४१
यज्ञ के रक्षक सविता देव की उपासना ११-१२ ४१
सविता और बृहस्पति की स्तुति १३ ४२
अग्नि की बढ़ोतरी के लिए समिधा १४-१६ ४२
अग्नि की परिधि १७ ४२-४३
अग्नि, इंद्र आदि देवगणों की वंदना १८-२८ ४३-४५
पितरों की स्तुति २९-३३ ४५
जलधाराओं से पितरों को तृप्त करने की प्रार्थना ३४ ४५
तीसरा अध्याय
यजमानों से निवेदन १-२ ४६
अग्नि की स्तुति ३-१९ ४६-४९
गायों की स्तुति २०-२२ ४९
अग्नि की स्तुति २३-२६ ४९-५०
इड़ा देवी के पधारने का आग्रह २७ ५०
ब्रह्मणस्पति देव की उपासना २८-३० ५०-५१
मित्र अर्यमन आदि देवों की स्तुति ३१-३३ ५१
इंद्र की स्तुति ३४ ५१
सविता देव से बुद्धि को प्रेरित करने का आग्रह ३५-३६ ५१
बहुरूपा अग्नि की स्तुति ३७-४० ५१-५२
गृह प्रवेश संबंधी मंत्र ४१-४३ ५२
मरुद्गणों की स्तुति ४४ ५२
पापों से मुक्त होने के लिए यज्ञ ४५ ५३
इंद्र की स्तुति ४६-४७ ५३
अवभृथ ( यज्ञ के अंत में ) स्नान संबंधी मंत्र ४८ ५३
दर्वि देवी की उपासना ४९ ५३
इंद्र यजमान संवाद ५० ५३
इंद्र की उपासना ५१-५२ ५४
पितरों से निवेदन ५३-५६ ५४
रुद्र की स्तुति ५७-६१ ५४-५५

चौथा अध्याय

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तीन अवस्थाएं ६२ ५५
शिव से कल्याण कामना ६३ ५५
चौथा अध्याय
जल की महिमा का वर्णन १-३ ५६
सविता देव से पवित्र करने का अनुरोध ४ ५६-५७
इच्छापूर्ति के लिए देवताओं का आह्वान ५ ५७
यज्ञ के संकल्प की प्रेरणा ६-७ ५७
सविता देव की प्रार्थना ८-९ ५७-५८
यज्ञमेखला से ऊर्जा प्रदान करने का निवेदन १० ५८
अग्नि से याचना ११ ५८
अमृत स्वरूप जल १२ ५८
बुरे कामों से रक्षा के लिए अग्नि की उपासना १३-१५ ५९
यज्ञ में आराधनीय देव अग्नि की स्तुति १६-१८ ५९-६०
मंत्र वाणी का स्वरूप १९ ६०
वाग् देवी की स्तुति २०-२३ ६०-६१
सोम के लिए निवेदन २४ ६१
सविता देव की उपासना २५ ६१
सोम का स्वरूप २६-२७ ६१-६२
अग्नि की स्तुति २८-३० ६२
वरुण देव की स्तुति ३१-३२ ६२
सोम, मित्र व वरुण आदि से यज्ञ में आने का निवेदन ३३-३७ ६३
पांचवां अध्याय
अग्नि की स्तुति १ ६४
शकल की स्तुति २ ६४
अग्नि की स्तुति ३-६ ६४-६५
सोम की स्तुति ७ ६५
अग्नि का स्वरूप ८ ६५-६६
पृथ्वी की स्तुति ९ ६६
उत्तरवेदिका का स्वरूप १०-१३ ६६-६७
यजमान और यज्ञ १४ ६७
विष्णु के तीन पैर १५ ६७
पृथ्वी का स्वरूप १६ ६७
देवगण और यज्ञ १७ ६७-६८

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विष्णु की स्तुति १८-२१ ६८
सविता से सहायता के लिए प्रार्थना २२ ६८-६९
अनिष्टकारी प्रयोगों को उखाड़ फेंकना २३ ६९
विशाल गर्त एवं विष्णु की प्रतिष्ठा २४-२५ ६९
सविता देव की स्तुति २६ ६९-७०
गूलर की लकड़ी से सृष्टि विस्तार की कामना २७-२८ ७०
इंद्र की स्तुति २९-३० ७०
अग्नि की स्तुति ३१-३२ ७०-७१
ब्रह्मासन का स्वरूप ३३ ७१
अग्नि की स्तुति ३४-३८ ७१-७२
सविता की प्रशंसा ३९ ७२
अग्नि की स्तुति एवं उन का स्वरूप ४०-४१ ७२-७३
यूपवृक्ष की स्तुति एवं स्वरूप ४२-४३ ७३
छठा अध्याय
यज्ञ साधनों की महत्ता १-२ ७४
विष्णु धाम का निरूपण ३-५ ७४-७५
यज्ञ की सर्वव्यापकता ६ ७५
सर्वगुण संपन्न त्वष्टा ७ ७५
पशुओं की मुक्ति ८ ७५
संतुष्टि के लिए यज्ञ ९ ७५-७६
यज्ञ एवं पशुओं की स्तुति १०-१२ ७६
आचरण शुद्धि का आग्रह १३-१५ ७६-७७
त्यागे हुए तृण की निंदा १६ ७७
याजक और यजमान १७-१९ ७७-७८
अंगअंग में इंद्र की व्यापकता २० ७८
हवि के विस्तार की कामना २१ ७८-७९
वरुण की कृपा की इच्छा २२ ७९
हवि की श्रेष्ठता २३ ७९
अग्नि की महत्ता २४ ७९
यज्ञ की सफलता के लिए प्रार्थना २५ ७९
जल, अग्नि तथा सोम की स्तुतियां २६-३६ ७९-८१
इंद्र की स्तुति ३७ ८२

सातवां अध्याय

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सातवां अध्याय
सोम की स्तुति १-३ ८३
सोम तथा यजमानों की रक्षा के लिए इंद्र से प्रार्थना ४ ८३
इंद्र का विस्तार ५ ८३-८४
सुभव का स्वयं प्रकाश ६ ८४
वायु की स्तुति ७ ८४
इंद्र और वायु से सोमरस पीने का आग्रह ८ ८४
मित्र और वरुण की स्तुति ९-१० ८४-८५
अश्विनी देवों की उपासना ११ ८५
इंद्र के गुणों का वर्णन १२-१३ ८५
सोम की शक्ति १४ ८५-८६
इंद्र के लिए यज्ञ १५ ८६
प्रसन्नतादायक जल वर्षा १६ ८६
सोम से अनुरोध १७ ८६
श्रेष्ठ संतान और धन के लिए देव प्रार्थना १८ ८६
दिव्य देव १९ ८६-८७
यज्ञ के लिए ग्रहों का आमंत्रण २० ८७
सर्वसंतोष कारक सोमरस २१ ८७
दीर्घ जीवन की कामना से सोमपान २२-२३ ८७-८८
अग्नि की प्रशंसा २४ ८८
ध्रुव नाम से प्रसिद्ध सोम २५-२६ ८८
वर्चस्व की कामना २७-२८ ८८-८९
सर्वव्यापी सोम २९ ८९
सोम का ग्रहण ३०-३२ ८९-९०
विश्वे देव का आह्वान ३३-३४ ९०
सोम की रक्षा के लिए इंद्र व मरुद् देव से प्रार्थना ३५ ९०-९१
इंद्र की स्तुति ३६-३७ ९१
जल बरसाने वाले मरुद्गण ३८ ९१
इंद्र की महानता ३९-४० ९१-९२
सूर्य की सर्वज्ञता ४१ ९२
मित्र देव का वर्णन ४२ ९२
अग्नि की स्तुति ४३-४४ ९२-९३
देवकृपा ४५-४६ ९३
कामना का महत्त्व ४७-४८ ९३

आठवां अध्याय

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आठवां अध्याय
सोमरस की रक्षा के लिए विष्णु से प्रार्थना १ ९४
इंद्र की उपासना २ ९४
कल्याणकारक आदित्य देव की स्तुति ३-५ ९४-९५
सुख के लिए सविता से प्रार्थना ६-७ ९५
सोम की स्तुति ८-१२ ९५-९६
पाप से मुक्त करने की याचना १३ ९६
वर्चस्व की कामना १४-१६ ९६-९७
सविता देव की उपासना १७ ९७
देवों के लिए सुगम यज्ञ सदन १८ ९७
अग्नि से हवि ग्रहण करने की प्रार्थना १९-२० ९७
शुद्ध वायु के लिए प्रार्थना २१ ९७
यज्ञ देव की स्तुति २२ ९७-९८
वरुण की उपासना २३ ९८
असुरों से यज्ञ की रक्षा २४ ९८
सोम की स्तुति २५-२७ ९८-९९
गर्भ एवं जरायु की पूर्णता एवं विविधता २८-३० ९९
मरुद्गण की स्तुति ३१-३२ ९९
सोलह कलाओं वाले इंद्र की स्तुति ३३-३७ ९९-१००
वर्चस्ववान अग्नि ३८ १००-१०१
इंद्र और सोम की स्तुति ३९-४१ १०१
महिमाशालिनी देवी की स्तुति ४२ १०२
गोवध निषेध ४३ १०२
इंद्र की स्तुति ४४ १०२
वाचस्पति की स्तुति ४५ १०२
विश्वकर्मा की उपासना ४६ १०२-१०३
सोम का वर्णन ४७-५० १०३
गायों की स्तुति ५१ १०३-१०४
सोम की स्तुति ५२ १०४
इंद्र की स्तुति ५३ १०४
विभिन्न देवों की स्तुति ५४-६१ १०४-१०६
यज्ञ का विस्तार ६२ १०६
पशु व अन्नादि की याचना ६३ १०६
नौवां अध्याय
सविता देव की स्तुति १ १०७

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सोम और सोम पात्र का वर्णन २-४ १०७-१०८
हविष्यान्न से पूर्ण रथ की स्थापना ५ १०८
यज्ञ वृद्धि की कामना ६ १०८
बलवान अग्नि का वर्णन ७-९ १०८-१०९
सत्यमार्ग के प्रेरक सविता देव की स्तुति १० १०९
बृहस्पति की विजय कामना ११-१२ १०९-११०
युद्ध में विजय की कामना १३-१९ ११०-१११
सुख एवं आयु वृद्धि की कामना २०-२१ १११
पृथ्वी की उपासना २२ १११-११२
सोम का राजत्व २३ ११२
परमात्मा की स्तुति २४-२७ ११२
अग्नि देव की स्तुति २८ ११३
इच्छापूर्ति की कामना २९ ११३
विभिन्न विजयों का वर्णन ३०-३४ ११३-११४
देवों और दिशाओं के लिए आहुतियां ३५-३६ ११४-११५
अग्नि से शत्रुओं को हराने का निवेदन ३७ ११५
सुख एवं समृद्धि के लिए प्रार्थना ३८-४० ११५
दसवां अध्याय
राष्ट्रदायी जल की महत्ता १-४ ११६-११७
विभिन्न देवों के लिए आहुति समर्पण ५ ११७-११८
कुशों की पवित्रता ६ ११८
जल की स्थापना ७-८ ११८
यज्ञ स्थल की रक्षा के लिए प्रार्थना ९-१५ ११८-१२०
मित्र और वरुण की स्तुति १६ १२०
यजमान का अभिषेक १७ १२०
शक्ति प्राप्ति के लिए प्रार्थना १८ १२०
जलधाराओं का वर्णन १९ १२०-१२१
प्रजापति से प्रार्थना २० १२१
इंद्र देव से ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रार्थना २१-२२ १२१
आहुति समर्पण २३ १२१
परमात्मा की स्तुति २४-२५ १२२
सुखदायी आसन २६ १२२
व्रतधारी यजमान २७-२८ १२२
अग्नि की महिमा का वर्णन २९ १२२-१२३

ग्यारहवां अध्याय

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प्रेरणादायक देव ३० १२३
हवि की परिपक्वता के लिए प्रार्थना ३१ १२३
प्रजा के कल्याण के लिए सोम ग्रहण ३२ १२३
इंद्र रक्षक अश्विनीकुमार ३३-३४ १२३-१२४
ग्यारहवां अध्याय
सविता देव की प्रशंसा १-११ १२५-१२७
अग्नि की स्तुति १२ १२७
पुरोहित और यजमान के लाभ की कामना १३ १२७
रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान १४ १२७
वाजिन तथा अग्नि की स्तुति एवं महिमा १५-३८ १२७-१३१
पृथ्वी की स्तुति ३९ १३१
अग्नि की महिमा और स्तुति ४०-४९ १३१-१३३
जल देव की स्तुति ५०-५२ १३३
कल्याणकारी अग्नि ५३ १३३-१३४
रुद्रगणों द्वारा पृथ्वी की रचना ५४-५५ १३४
देवमाता सिनीवाली देवी ५६-५७ १३४
उखा देव की स्तुति ५८-६१ १३४-१३६
ऐश्वर्य की कामना ६२ १३६
उखा की स्तुति ६३-६५ १३६
अग्नि के लिए आहुति समर्पण ६६ १३६-१३७
परमेश्वर के लिए आहुति समर्पण ६७ १३७
उखा देव की स्तुति ६८-६९ १३७
पराक्रम में बढ़ोतरी के लिए अग्नि की स्तुति ७०-८३ १३७-१३९
बारहवां अध्याय
सूर्य की महिमा का वर्णन १-३ १४०
सविता देव का विस्तार ४ १४०-१४१
अग्नि की महिमा ५-११ १४१-१४२
बंधन दूर करने के लिए वरुण से प्रार्थना १२ १४२
अग्नि का जन्म एवं विस्तार १३-४४ १४२-१४७
यमदूतों से आग्रह ४५ १४७
उषा देवी से प्रार्थना ४६ १४७

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अग्नि का वर्चस्व ४७-५४ १४८-१४९
स्वर्गिक जल से शोभायमान सोम ५५ १४९
वाणी विस्तार ५६ १४९
इंद्र की स्तुति ५७ १४९
अग्नि की स्तुति ५८-६० १४९-१५०
उखा की मुक्ति कामना ६१ १५०
निर्ऋत देवी की उपासना ६२-६५ १५०-१५१
इंद्र की स्तुति ६६-६७ १५१
हल जोतने के लिए किसानों का आह्वान ६८-७२ १५१-१५२
ईश्वर से कृपा की कामना ७३ १५२
विभिन्न देवों के लिए आहुतियां ७४ १५२
ओषधि वर्णन ७५-१०१ १५२-१५६
प्रथम जन्मा के लिए आहुति १०२ १५६
पृथ्वी की स्तुति १०३ १५६
बहुगुणी अग्नि १०४-१११ १५६-१५८
सोम की स्तुति ११२-११३ १५८
अग्नि की स्तुति ११४-११७ १५८-१५९
तेरहवां अध्याय
अग्नि की महिमा १ १६०
सृष्टि की उत्पत्ति एवं विकास २-५ १६०-१६१
सर्पों को नमन ६-८ १६१
अग्नि की स्तुति ९-१६ १६१-१६२
देवी की उपासना १७-१९ १६२-१६३
दूर्वा की स्तुति २०-२१ १६३
इंद्र, अग्नि और बृहस्पति की स्तुति २२-२३ १६३
प्रजापति की स्तुति २४ १६३-१६४
पारस्परिक सहयोग की कामना २५ १६४
प्रकृति में माधुर्य की कामना २६-२९ १६४
कूर्म की वंदना ३०-३२ १६४-१६५
विष्णु एवं इंद्र की एकता ३३ १६५
उखा का वर्णन ३४-३५ १६५
अग्नि की उपासना ३६-५४ १६५-१६९
विभिन्न उत्पत्तियां ५५-५८ १६९-१७०

चौदहवां अध्याय

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चौदहवां अध्याय
इष्टकाओं की प्रतिष्ठा एवं महिमा १-८ १७१-१७३
प्रजापति द्वारा गायत्री छंद से मूर्धन्य ब्राह्मणों की उत्पत्ति ९ १७३
प्रजापति द्वारा जानवरों की उत्पत्ति १० १७३-१७४
इष्टका स्थापित करने का अनुरोध ११ १७४
इष्टका की स्तुति १२-१४ १७४
मास वर्णन १५ १७५
इष्टका से रक्षा की कामना १६-२७ १७५-१७८
विभिन्न देवलोकों की उत्पत्ति २८-३१ १७८-१८०
पंद्रहवां अध्याय
अग्नि की स्तुति १ १८१
अग्नि से शत्रु के नाश की कामना २-३ १८१
अग्नि की स्थापना ४-५ १८१-१८२
सत्य के लिए रश्मियों का प्रचारप्रसार ६ १८२-१८३
इष्टका की स्तुति ७-१४ १८३-१८५
रक्षा के लिए अग्नि से प्रार्थना १५ १८५
रक्षा के लिए विश्वकर्मा से प्रार्थना १६ १८५
आदित्य देव का वर्णन १७ १८६
अग्नि देव की स्तुति एवं स्वरूप निरूपण १८-६० १८६-१९३
इंद्र की स्तुति ६१ १९३
अग्नि परम इष्ट है ६२-६५ १९३-१९४
सोलहवां अध्याय
रुद्र देव की उपासना तथा वर्णन १-५ १९५
विभिन्न दिशाओं में फैली शक्तियां ६ १९५-१९६
रुद्र देव से रक्षा के लिए प्रार्थना ७-१६ १९६-१९७
रुद्र देव व गणपति आदि के लिए नमन १७-४६ १९७-२०३
रुद्र देव का स्वरूप निरूपण ४७-६४ २०३-२०६
रुद्र देव के लिए नमन ६५-६६ २०६
सत्रहवां अध्याय
अग्नि से कल्याणकारी होने के लिए कामना १-१६ २०७-२०९
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परम शक्ति की उत्पत्ति एवं विकास १७-२१ २०९-२१०
विश्वकर्मा की स्तुति २२-२३ २१०-२११
परम तत्त्व की विवेचना २४-३२ २११-२१२
इंद्र की वीरता ३३-३५ २१२-२१३
बृहस्पति देव की उपासना ३६ २१३
इंद्र व वरुण आदि देवों का पराक्रम ३७-४९ २१३-२१५
अग्नि की स्तुति ५० २१५
इंद्र की स्तुति ५१ २१५
अग्नि से कल्याण कामना ५२-५५ २१५-२१६
यज्ञ की महत्ता ५६-५७ २१६
सूर्य देव की उपासना ५८-६० २१६-२१७
इंद्र की स्तुति ६१-६४ २१७
अग्नि की महिमा एवं उपासना ६५-७३ २१७-२१९
सविता देव की स्तुति ७४ २१९
अग्नि की स्तुति ७५-७७ २१९
यज्ञ में देवों का आह्वान ७८ २२०
अग्नि का स्वरूप ७९-८५ २२०-२२१
मरुद्गण की सेना ८६ २२१
घी की धाराएं ८७-९८ २२१-२२३
अग्नि की स्तुति ९९ २२३
अठारहवां अध्याय
यज्ञ के सर्वविध फलीभूत होने की कामना १-२७ २२४-२३०
विभिन्न महीनों के लिए आहुति समर्पण २८ २३०
देवत्व प्राप्ति की कामना २९ २३०
पृथ्वी तथा प्रकृति की अनुकूलता हेतु प्रार्थना ३०-३४ २३०-२३१
अग्नि एवं सविता देव से कृपा की कामना ३५-३८ २३१-२३२
रक्षा के लिए सूर्य से प्रार्थना ३९-४० २३२
गंधर्वों के लिए आहुति अर्पण ४१-४३ २३२-२३३
प्रजापति के लिए आहुति अर्पण ४४-४५ २३३
तेजस्विता के लिए अग्नि से प्रार्थना ४६-४८ २३३-२३४
वरुण देव की वंदना ४९ २३४
सूर्य के लिए स्वाहा ५० २३४
अग्नि की स्तुति ५१-५७ २३४-२३५

उन्नीसवां अध्याय

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परम शक्ति की वंदना ५८-६० २३५-२३६
बहुरूपा अग्नि ६१-६७ २३६-२३७
शत्रु विनाश के लिए इंद्र का आह्वान ६८-७१ २३७
विश्व कल्याण के लिए अग्नि से प्रार्थना ७२-७७ २३७-२३८
उन्नीसवां अध्याय
औषध देव की स्तुति १ २३९
सोम सिंचन २ २३९
इंद्र सखा वायु की शुद्धता ३ २३९
सोम की स्तुति ४-५ २३९-२४०
किसान और अन्न ६ २४०
सोम से प्रार्थना ७-९ २४०
शक्ति की उपासना १० २४०-२४१
कल्याणकारी मातापिता ११ २४१
यज्ञ का विस्तार १२ २४१
सोम का स्वरूप १३-१६ २४१
यज्ञ व कुशा आदि से प्राप्ति १७-२० २४२
धान व लपसी आदि सोम का रूप हैं २१-२३ २४२-२४३
ऋचाओं के विविध रूप २४-२५ २४३
यज्ञ के विभिन्न अवयवों से प्राप्तियां २६-३१ २४३-२४४
सोम निरूपण ३२-३५ २४४-२४५
पितरों के लिए आहुतियां ३६-३७ २४५
अग्नि का पवित्र स्वरूप ३८-४२ २४५-२४६
सविता व विश्वे देवी आदि से पवित्रता के लिए प्रार्थना ४३-४४ २४६
पितृ एवं देव मार्ग ४५-४७ २४६
बढ़ोतरी के लिए अग्नि से प्रार्थना ४८ २४६-२४७
रक्षा एवं कल्याण के लिए पितृ वंदना ४९-५१ २४७
सोम की स्तुति ५२-५४ २४७-२४८
पितरों का आह्वान ५५-६३ २४८-२४९
अग्नि की उपासना ६४-७० २४९-२५०
इंद्र की स्तुति ७१ २५०
सोम आदि से उपलब्धियां ७२-७९ २५०-२५२
तनमन के विविध अवयवों की उत्पत्ति ८०-९३ २५२-२५४
सरस्वती देवी और अश्विनीकुमार ९४ २५४
शक्तिवर्धक सोमरस ९५ २५४

बीसवां अध्याय

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बीसवां अध्याय
वेदिका स्वरूप निरूपण १-४ २५५
बल व पुरुषार्थ की कामना ५-१० २५५-२५६
रक्षा के लिए देवों से प्रार्थना ११ २५६-२५७
परस्पर संयोजन की कामना १२-१३ २५७
पापों से मुक्ति की कामना १४-१७ २५७-२५८
जल संचरण १८-२२ २५८
बढ़ोतरी के लिए अग्नि से याचना २३-२४ २५९
ज्ञानमय लोक पाने की इच्छा २५-२६ २५९
ओषधियों का रस २७-२८ २५९
इंद्र की स्तुति २९ २५९-२६०
मरुद्गण की स्तुति ३० २६०
अध्वर्यु की स्तुति ३१ २६०
प्राणियों के अधिपति की उपासना ३२ २६०
ओषधि रूप रस ३३-३५ २६०
वृत्रहंता इंद्र ३६-४० २६०-२६१
उषा की वंदना ४१ २६१
इंद्र की स्थापना ४२ २६१-२६२
विघ्न दूर करने के लिए तीन देवियों से प्रार्थना ४३ २६२
त्वष्टा देव की स्तुति ४४ २६२
रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान ४५-५४ २६२-२६४
समिधा से अग्नि प्रज्वलन ५५ २६४
तन रक्षक अश्विनीकुमार ५६ २६४
ओषधि से युक्त सोमरस ५७ २६४
सरस्वती के माध्यम से इंद्र का आह्वान ५८ २६४
सरस्वती द्वारा सोम का हरण ५९ २६४
सरस्वती द्वारा स्वर्ग और पृथ्वीलोकों का दोहन ६० २६४
इंद्र के लिए विशेष बल का समय ६१ २६५
रक्षा के लिए त्रिदेव से प्रार्थना ६२ २६५
ओषधि से युक्त सोम ६३ २६५
मधुर रस का दोहन ६४-६५ २६५
सरस्वती द्वारा नमुचि से हवि प्राप्त करना ६६-६८ २५५-२६६
सरस्वती तथा अश्विनीकुमारों द्वारा इंद्र को हवि अर्पण ६९ २६६
इंद्र द्वारा हविपति की रक्षा ७० २६६

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इंद्र द्वारा नमुचि से रक्षा ७१ २६६
वरुण देव का आह्वान ७२ २६६
अश्विनीकुमारों द्वारा यजमान के पराक्रम की वृद्धि ७३ २६६
देवों से यज्ञ में पधारने का अनुरोध ७४ २६६-२६७
अश्विनीकुमारों की स्तुति ७५-७७ २६७
अग्नि द्वारा सोम को ग्रहण करना ७८-७९ २६७
अश्विनीकुमारों से प्रार्थना ८०-८३ २६८
सरस्वती देवी की उपासना ८४-८६ २६८
यज्ञ में इंद्र देव का आह्वान ८७-९० २६८-२६९
उत्तरार्ध
इक्कीसवां अध्याय
वरुण देव की उपासना १-२ २७०
अग्नि देव की स्तुति ३-४ २७०
अदिति देवी की स्तुति तथा आह्वान ५-६ २७०-२७१
मित्र और वरुण देव की आराधना ७-११ २७१-२७२
रक्षा के लिए अग्नि से प्रार्थना १२-१५ २७२
बल एवं आयु वृद्धि की याचना १६-२८ २७२-२७४
सर्व कल्याण के लिए यज्ञ की कामना २९-५६ २७४-२८२
देवगणों द्वारा पराक्रम धारण ५७-५८ २८२
देवगणों को सोम की भेंट ५९-६० २८२
देवगणों का आह्वान ६१ २८३
बाईसवां अध्याय
तेजोमय देव की उपासना १ २८४
यज्ञ से ज्ञान की वृद्धि २ २८४
अग्नि से देवताओं तक पहुंचने की प्रार्थना ३-४ २८४
प्रजापति की संतुष्टि के लिए अभिषेक ५ २८४-२८५
विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण ६-८ २८५-२८६
सविता देव की स्तुति ९-१४ २८६
अग्नि की महिमा एवं वंदना १५-१९ २८६-२८७
विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण २० २८७-२८८
संसार के नायक २१ २८८