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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

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यह देख कर दूसरे शिष्यों ने तीतर बन कर उन कणों को चुग लिया. इन शिष्यों
द्वारा विकसित होने वाली यजुर्वेद की शाखा तैत्तिरीय संहिता कहलाई.
इस घटना के बाद याज्ञवल्क्य ने सूर्य की उपासना की और उन से पुनः यजुर्वेद
प्राप्त किया. सूर्य ने वाज ( अश्व ) बन कर याज्ञवल्क्य को यजुर्वेद की शिक्षा
दीक्षा दी थी, इसलिए यह शाखा वाजसनेयी कहलाई.
यह कहानी कितनी सच है और कितनी झूठ, यह बता पाना असंभव है. कुछ
विद्वान् इसे कपोलकल्पित कहते हैं और कुछ मिथ. कुछ भी हो, इतना निश्चित है
कि यजुर्वेद ज्ञान ( वेद ) की वह शाखा ( भाग ) है, जिस में यज्ञीय कर्मों का वर्चस्व
है, जिस के बल पर धर्म के धंधेबाजों ने सदियों से जनसामान्य को बेवकूफ बना
कर स्वार्थ साधे और आज भी यही हो रहा है.
आज जब देश में संस्कृत के ज्ञाताओं की संख्या नगण्य रह गई है, उन में भी
वैदिक संस्कृत जानने वाले तो और भी कम हैं, तब यह आवश्यक हो गया है कि
अन्य वेदों ( वैदिक ग्रंथों ) के साथसाथ यजुर्वेद का भी सरल हिंदी में अनुवाद
प्रस्तुत किया जाए, ताकि साधारण पाठक भी समझ सकें कि यज्ञ, सामाजिक
संस्कार आदि कर्मों की कथित महत्ता प्रतिपादित करने वाले इस वेद के मंत्रों का
वास्तविक अर्थ और अभिप्राय क्या है ?
चूंकि आरंभ से ही यजुर्वेद को यज्ञीय कर्मों से संबद्ध माना गया है, इसलिए
प्रायः सभी प्राचीन आचार्यों ने इस के मंत्रों के अर्थ यज्ञीय कर्मों के संदर्भ में ही
किए हैं. इन आचार्यों में उवट ( १०४० ई. ) और महीधर ( १५८८ ई. ) के भाष्य
प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने शुक्ल यजुर्वेद पर भाष्य लिखे थे. वे भाष्य
आज भी उपलब्ध और विभिन्न विद्वानों द्वारा स्वीकृत हैं. यहां तक कि आचार्य उवट
का भाष्य देख कर ही आचार्य सायण ने भी यजुर्वेद के भाष्य पर अपनी कलम
नहीं चलाई है.
अतः यजुर्वेद के प्रस्तुत अनुवाद में आचार्य उवट के अनुवाद को ही आधार
बनाया गया है. इस में प्रायः उन्हीं अर्थों को अपनाया गया है, जो उवट को अभीष्ट
थे. अनुवाद की भाषा सरल एवं सुबोध रखने का प्रयास किया गया है, ताकि
साधारण पाठक भी विषय को आसानी से समझ सकें.
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