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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 3, कुल 421 में से

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पृष्ठ 3

प्राक्कथन
सामान्यतया द्वितीय वेद के रूप में प्रसिद्ध यजुर्वेद की रचना ऋग्वेदीय
ऋचाओं के मिश्रण से हुई मानी जाती है, क्योंकि ऋग्वेद के ६६३ मंत्र यथावत
यजुर्वेद में भी प्राप्त होते हैं. फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि दोनों एक ही
ग्रंथ हैं. ऋग्वेद के मंत्र पद्यात्मक हैं, जबकि यजुर्वेद के गद्यात्मक—'गद्यात्मको यजुः
'. साथ ही अनेक मंत्र ऋग्वेद से भिन्न भी हैं.
वस्तुतः यजुर्वेद एक पद्धति ग्रंथ है, जो पौरोहित्य प्रणाली में यज्ञ आदि कर्म
संपन्न कराने के लिए संकलित हुआ था. इसीलिए आज भी विभिन्न संस्कारों एवं
यज्ञीय कर्मों के अधिकांश मंत्र यजुर्वेद के ही होते हैं. यज्ञ आदि कर्मों से संबंधित
होने के कारण यजुर्वेद अपेक्षाकृत अधिक जनप्रिय रहा है.
यूं तो यजुर्वेद की १०१ शाखाएं बताई जाती हैं, किंतु मुख्यतयाः दो शाखाएं
ही अधिक प्रसिद्ध हैं—कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद. इन्हें क्रमशः तैत्तिरीय एवं
वाजसनेयी संहिताएं भी कहा जाता है. इन में से तैत्तिरीय संहिता अपेक्षाकृत अधिक
पुरानी मानी जाती है, वैसे दोनों में प्रायः एक ही सामग्री है. हां, उन के क्रम में कुछ
अंतर है. शुक्ल यजुर्वेद अपेक्षाकृत अधिक क्रमबद्ध है. इस में कुछ ऐसे भी मंत्र हैं,
जो कृष्ण यजुर्वेद में नहीं हैं.
यजुर्वेद दो संहिताओं में कब और कैसे विभाजित हो गया—यह तो प्रामाणिक
रूप में उपलब्ध नहीं है, हां, इस संदर्भ में एक रोचक कथा अवश्य प्रचलित है—
कहा जाता है कि वेदव्यास के शिष्य वैशंपायन के २७ शिष्य थे. उन में से
सर्वाधिक मेधावी थे याज्ञवल्क्य. एक बार वैशंपायन ने किसी यज्ञ के लिए
अपने सभी शिष्यों को आमंत्रित किया. उन में से कुछ शिष्य यज्ञ कर्म में
पूर्णतया कुशल नहीं थे.
अतः याज्ञवल्क्य ने उन अकुशल शिष्यों का साथ देने से मना कर दिया. इस
से शिष्यों में आपसी विवाद उठ खड़ा हुआ. तब वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य से
अपनी सिखाई हुई विद्या वापस मांगी. याज्ञवल्क्य ने भी आवेश में तुरंत यजुर्वेद
का वमन कर दिया. विद्या के कण कृष्ण वर्ण के रक्त से सने हुए थे.