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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

॥ भूमिका ॥
पॉल ब्रण्टन ने ‘ गुप्त भारत की खोज¹ , का वर्णन करते हुए आधुनिक
भारत में जो उसे अनभिव्यक्त प्रतीत हुए, और जिन्हें वह संसार के सम्मुख उपस्थित
करना चाहता था उन्हें अपने मनोनुकूल ढंग से लिपि-बद्ध किया है । परन्तु अभी
तक प्राचीन भारत की खोज करके उस काल की स्थिति एवंमानव-जीवन का
विश्लेषणात्मक वर्णन किसी ने नहीं किया है । यह कार्य है भी अत्यन्त दुष्कर ।
माना जाता है कि इसके लिए साधन या तो हड़प्पा व मोहें-जो-दड़ो आदि की
खुदाई है, या प्राचीन शिलालेख व खण्डहर आदि हैं, या प्राचीन काल से
आती हुई किंवदन्तियाँ व लोक - कथाएँ व गीत हैं, या वेद, पुराण, महाभारत,
रामायण, तोल्काप्पियम, संघम-साहित्य आदि । प्राप्त वस्तु से ही अप्राप्त की
कल्पना व गणना होती आयी है । यही वैज्ञानिक माने जाने पर भी वस्तुतः यह
प्रणाली यथेष्ट नहीं है । यह कहना उपयुक्त ही है कि प्रकाश के कारण ही हमें
अन्धकार का अनुभव होता है ; यह कहना ठीक ही है कि अज्ञान के कारण ही
ज्ञान का भान होता है ; यह कहना उचित ही कि सद्गुण के कारण ही
दुर्गुण से हम दूर जाने की इच्छा करते हैं ; यह कहना माननीय ही है कि
सुख का अनुभव करने के पश्चात् ही कोई दुख से मुँह मोड़ता है ; यह कहना
युक्तियुक्त ही है कि मृत्यु को देखकर ही मानव जीवन की ओर अधिकाधिक
आकर्षित होता है, परन्तु यह भी सम्भव है कि कोई प्रकाश में इतना तन्मय
हो जाय कि उसे अन्धकार का विचार ही न उत्पन्न हो, अज्ञान में इतना ग्रस्त हो
जाय कि ज्ञान का उसे भान ही न हो, सद्गुणसम्पन्न इतना हो कि दुर्गुण उसे
कहीं न दिखायी पड़े, सुख में इतना डूबा हो कि उसे दुख का पता ही न चले,
और मृत्यु को देखकर इतना विचलित हो जाय कि उसे जीवन ही मिथ्या प्रतीत

  1. ‘ Search in Secret India ’—Paul Brunton

2 भूमिका
होने लगे । तात्पर्य यह कि व्यक्त के आधार पर किया गया अव्यक्त का अन्वेष
आंशिक होता है, अपूर्ण होता है और कभी-कभी अनुचित व अप्राकृतिक भी ।
यह विश्लेषण प्राचीन भारत के सम्बन्ध में प्राप्त साधनों पर पूर्णतः घटता है ।
अभी तक प्राचीन भारत का या तो आंशिक ज्ञान प्राप्त हुआ है या अनुचित रूप
देकर उसे अभिव्यक्त कर दिया गया है । कारण यही प्रतीत होता है कि प्राप्त
विषयों में मानव का मन इतना बँध गया कि वह उसके पीछे की बात
देखने का परिस्थितिवश साहस ही नहीं कर पाता । प्राप्त विषय को प्रस्तुत रूप में
किसने, क्यों और कैसे रक्खा, इसका विचार स्पष्टतः कोई कर नहीं पाता ।
कोई कहता है कि अपने स्वार्थ के लिए रक्खा, कोई कहता है कलाकार अदृष्ट
रूप से आ मिले, कोई कहता है प्राकृतिक शक्तियों ने तोड़-फोड़कर वह रूप दे
दिया, तो कोई कहता है ईश्वर ने लोक-हितार्थ वैसा कर दिया । परन्तु
बात यह है कि मानव ने जान-बूझकर प्रस्तुत रूप प्रदान किया है, मनोनुकूल
ढंग से सब का निश्चय किया है, परिस्थितिवश प्राप्त वस्तुओं को भिन्न-भिन्न रूपों में
देखने का प्रयत्न किया है, विभिन्न वर्णों के चश्मों को पहनकर विभिन्न वस्तुओं को
विभिन्न दृष्टिकोणों से देखकर अपने-अपने निष्कर्षों को अभिव्यक्त किया है।
अन्यथा एक ही विषय पर विभिन्न विद्वानों के विभिन्न मत कैसे होते, एक ही
विषय को लेकर विभिन्न विचारों पर पहुँचकर वाक्-युद्ध क्यों करते ?
मानव-जीवन की यथार्थता को सूचित करते हुए विभिन्न भाषाओं में
विभिन्न रूपों में विचारकों ने अपने-अपने भाव अभिव्यक्त किये हैं । ये साधारणतः
तात्कालिक परिस्थितियों के फलस्वरूप उद्भवित जन-कल्याण के लिए निर्मित
भाव-विशेष हैं जो जनता के विकास में यथेष्ट रूप से साधक सिद्ध हुए हैं ;
परन्तु वे ही भाव-विशेष विभिन्न युद्धों के लिए तथा वैमनस्य उत्पन्नकरने में भी
साधक सिद्ध हुए हैं जिनके कारण जन-कल्याण व लोक-विकास में यथेष्ट बाधा
उपस्थित हो चुकी है । संसार के साहित्य में ऐसे ग्रन्थ विरले ही हैं जिनके

भूमिका ३
रचयिताओं ने प्राप्त से अप्राप्त की ओर जाने के अतिरिक्त अपने विचार-क्षेत्र को
इतना विशाल बनाया हो कि देश-काल के बन्धनों से हटकर सभी देशों तथा
कालों के लिए समानतः उचित व युक्तियुक्त सिद्ध हुआ हो । भारत में
ऐसे कतिपय विचारक हो चुके हैं जिन्होंने इस ढंग से अपने विचारों को व्यक्त
किया है । वे मानवमात्र के लिए सदा माननीय महत्तम आदर्श स्थापित
कर गये हैं । इन्हीं विरले व्यक्तियों में से एक थे तिरुवळ्ळुवर जिन्होंने वस्तुतः
वास्तविक भारत को अभिव्यक्त किया है । प्राचीन भारत की खोज करने पर यही
विचार-विशेष गुप्त रूप से सर्वत्र व्याप्त प्रतीत होगा । वस्तुतः इसे मानवमात्र की
सभ्यता की शाश्वत ग्रन्थिका कह सकते हैं । यदि कहा जाय कि संसार की
मानव-संस्कृति का मूल-सूत्र तिरुवळ्ळुवर के 'तिरुक्कुरळ्' में निहित है तो
युक्तियुक्त ही होगा ।


'तिरुक्कुरळ्' तमिळ साहित्य का गौरव है और भारतीय साहित्य का
भव्य भूषण है । विश्व साहित्य में इसका एक विशेष स्थान है । संस्कृत
साहित्य में जो स्थान वेद व भगवद्गीता को प्राप्त है वही स्थान तमिळ साहित्य में
तिरुक्कुरळ् को प्राप्त है ।¹ इसे 'तमिळ वेद'² भी कहते हैं । यह एक
अत्यन्त समादृत ग्रन्थ है । इसमें उल्लिखित तत्त्वों को हृदयंगम करने के पश्चात्
कोई भी व्यक्ति इसकी महानता पर विश्वास किये बिना नहीं रह सकता ।

  1. "The Tirukkural of Tiruvalluvar is the pride of South
    India. What the Bhagvatgita is to the Sanskritist, the
    Tirukkural is to the Lover of Tamil". Sri V. R. Rama-
    chandra Dikshitar’s ‘Tirukkural’ with English Translation
    (p. IX) Preface.
  2. 'தமிழ் மறை'—மறை के शाब्दिक अर्थ हैं—रहस्य, वेद, उपनिषद्,
    आगम्, आश्रय आदि । Tamil Lexicon, p. 3124, 3125).

4 भूमिका
तिरुक्कुरळ् के शब्द सौन्दर्य एवं अर्थ गाम्भीर्य का सुन्दर सामंजस्य सहृदय
पाठक को स्वभावतः भावमय एवं रसमय कर देता है ।
तिरुक्कुरळ् के अनेक नाम प्रचलित हैं जिनमें से एक 'तिरुवळ्ळुवर'
भी है जो इसके लेखक का भी नाम है । वस्तुतः यह उचित ही है क्योंकि
दोनों में इतना अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है, इतनी अभिन्नता है कि वे एक दूसरे से
पृथक् नहीं किये जा सकते । तिरुक्कुरळ् तिरुवळ्ळुवर की एकमात्र कृति है ।
तिरुवळ्ळुवर के जीवन में तिरुक्कुरळ् पूर्णतः ठीक उतरता है । तिरुवळ्ळुवर को
ही तिरुक्कुरळ् के लिए आदर्श रूप में ले सकते हैं । तिरुवळ्ळुवर का
जीवन ही 'तिरुक्कुरळ्' था । तिरुवळ्ळुवर ही तिरुक्कुरळ् थे और वे आज हमारे
सम्मुख एक ग्रन्थ के रूप में उपस्थित हैं और सदा रहेंगे । तिरुक्कुरळ् ही
तिरुवळ्ळुवर है ।
तिरुवळ्ळुवर का वास्तविक नाम अज्ञात है । कबीर, सूर, तुलसी आदि के
समान अपने काव्य में इन्होंने अपने नाम को 'जड़ा' नहीं है । 'तिरु'
एक आदरसूचक उपसर्ग मात्र है, और 'वळ्ळुवर'¹ उनकी जन्मगत एक अत्यन्त
निम्न-कोटि की जाति का नाम है । विद्वानों का विचार है कि इन दो शब्दों के
संयोग से ही कवि का प्रस्तुत नाम प्रचलित हुआ । सन्त कवि कबीर के समान
ही इनके जन्म के सम्बन्ध में भी अनेक प्रकार की किंवदन्तियां प्रचलित हैं ।²

  1. வள்ளுவன் (वळ्ळुवन) 1. A paraiya caste, the members of
    which are royal drummers, and priests for paraiyas.
  2. One who foretells events by Omens. 3. An officer
    who proclaims the king’s commands. 4 The author of
    ‘Kural’ (Tamil Lexicon, P 3552).
  3. “A wild and utterly incredible tradition assigns him a
    Brahmin father and a low caste mother..” G. U. Pope,
    ‘The Sacred Kural’, P. ii. Introduction.

भूमिका 5
तिरुक्कुरळ् के प्रारम्भिक छन्द के आधार पर इनके माता - पिता का नाम
'आदि-भगवन्' माना जाता है। छन्द यह है :-
“ अकर मुदल वॆष़ुत्तेल्ला मादि
भगवन् मुदट्त्रे युलहु । ”
वस्तुतः निश्चित् रूप से कुछ कहा नही जा सकता । इतना अवश्य ज्ञात है कि
वे कबीर के ही समान जुलाहे का कार्य करते थे और उन्होंने मद्रास नगर के
पर्यन्तभाग मयिलापुर (मयिल=मोर, पुर=नगर) की एक कुटि में सपत्नीक सानन्द
जीवन व्यतीत किया । यह स्थान समुद्र तट के अति निकट होने के कारण इनका
अनेक विदेशियों से मिलना-जुलना रहता था । साथ-साथ दक्षिण भारत का यह एक
प्रधान स्थान होने के कारण सभी प्रकार के लोगों का यहाँ आना - जाना सदैव
रहा जिससे इनका सम्पर्क तात्कालिक सभी विचार-धाराओं के विभिन्न व्यक्तियों
से बना रहा । हिन्दू, जैन, बौद्ध आदि मत के विभिन्न सिद्धान्त इनको ज्ञात थे
और उनके दैनिक-जीवन से ये पूर्ण परिचित थे । इसी कारण से इनकी
विचार-धारा अत्यन्त व्यापक हो सकी ।
इस प्रकार जीवन व्यतीत करते हुए तिरुवळ्ळुवर ने अपने एक मात्र ग्रन्थ
'तिरुक्कुरळ्' की रचना की, कदाचित् पड़ोसियों की प्रार्थना पर, जैसाकि कुछ
लोग मानते हैं । 'कुरळ्'¹ का मूल अर्थ है 'छोटा' । यह एक छोटे छन्द का
भी नाम है जिसमें दो चरण होते हैं । प्रथम में चार Cīr ' पद ' व ' गण '
होते हैं तथा द्वितीय में केवल तीन । इसकी रचना का नियम अत्यन्त क्लिष्ट है ।
एक कुरळ् में एक भाव-विशेष पूर्णतः निहित रहता है । 'तिरु' एक आदर-सूचक

  1. குறள் ' Kural '—1. Shortness, dwarfishness; 2. Dwarf,
    about 2 ft. high; 3. Imp, goblin; 4. Smallness, 5. A
    line consisting of two ' Cīr '; 6. Distich of a 'Venba'
    metre, the first line consisting of four and the second of
    three feet; 7. Tirukkural--(Tamil Lexicon PP. 1046-47)

6 भूमिका
प्रत्यय, एवं 'कुरळ्' एक छन्द का नाम होने के कारण इस ग्रंथ का नाम
तिरुक्कुरळ् पड़ा । ग्रन्थ का क्या नाम रक्खा कवि ने, यह अज्ञात है। यह
एक नीति ग्रन्थ है जिसमें कुल १३३० कुरळ् हैं । आश्चर्य की बात यह है कि
एक का भी पाठ-भेद प्रचलित नहीं है और ग्रन्थ जिस रूप में आज उपस्थित
है वही उसका मूल रूप था, यद्यपि ग्रन्थकर्ता एवं ग्रन्थ के मूल नाम अप्राप्य
हैं । ग्रन्थ के तीन खण्ड हैं — धर्म, अर्थ, एवं काम (अरम्, पोरुळ्, इन्बम्) ;
और इनमें क्रमशः ३८, ७० एवं २५ अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में
१० कुरळ् हैं । 'धर्म' में प्रस्तावना के रूप में सर्वेश-स्तुति से प्रारम्भ करके
'मोक्ष' (वीडु) की भी अप्रत्यक्ष रूप से सूचना देते हुए गार्हस्थ्य-धर्म एवं
सन्यास-धर्म के स्पष्टीकरण के पश्चात् एक अध्याय में कर्म सिद्धान्त को भी व्यक्त
कर दिया गया है। 'अर्थ' में सम्राट् व शासन, अमात्य व राजनीति के विभिन्न
अंग तथा शासक व शासित के शेष कार्यों का विशद् वर्णन किया गया है।
'काम' में प्रेमी-प्रेमिका के पूर्वराग व गुप्त प्रेम तथा सतीत्व का, अर्थात् सम्भोग
तथा वियोग शृंगार का पुंखानुपुंख रूप से चित्रण किया गया है । इस प्रकार
कवि ने अपनी कृति में मानव के व्यक्तिगत, गार्हस्थ्य एवं सामूहिक जीवन के
आदर्श को प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया है । इससे स्वतः सिद्ध हो जाता
है कि तिरुवळ्ळुवर एक आदर्शवादी दार्शनिक, राजनीति-विदग्ध तथा उत्तम कोटि
के रसिक भी थे ।
तिरुवळ्ळुवर ने अपने जीवन में इस कृति में कथित सब आदर्शों को
कार्य रूप में परिणत कर दिखाया है। इनके गार्हस्थ्य-जीवन के सम्बन्ध में
अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं । वासुकी इनकी पत्नी का नाम था । विवाह के पूर्व
वासुकी के पिता ने तिरुवळ्ळुवर के आदर्श-जीवन से प्रभावित होकर अपनी पुत्री
को तिरुवळ्ळुवर से अर्धांगिनी के रूप में ग्रहण कर लेने की अभ्यर्थना की।
तिरुवळ्ळुवर ने एक बालू के पुलिन्दे की ओर सूचित करते हुए अपनी स्वीकृति
इस शर्त पर दी कि यदि वह इसे पकाकर उसे भात बना दे तो मैं पाणिग्रहण

भूमिका 7
के लिए प्रस्तुत हूँ। वासुकी ने आत्म-विश्वास के बल पर वैसा ही करके मानो
यह सिद्ध कर दिया कि तिरुक्कुरळ् में जो कहा गया है—
'ईश न, नित उठ पूजै पति को,
बरसो कह दे तो बरसे।'¹ (१-६-५)
सत्य है।
विवाह के उपरान्त एक दिन कोई एकव्यक्ति जिसे यह सन्देह था कि एक
साधारण जुलाहा इतना श्रेष्ठ कैसे हो सकता है, इनके पास आया और उसने प्रश्न
किया—“गार्हस्थ्य-जीवन श्रेष्ठ है या सन्यास?” इसका शब्दों में उसे कोई उत्तर
प्राप्त नहीं हुआ। तिरुवळ्ळुवर के गार्हस्थ्य-जीवन के निरीक्षण से ही उत्तर प्राप्त
करने के लिए उसे छोड़ दिया। कुछ समय पश्चात् जब वासुकी कुएँ से पानी
खींच रही थी, इन्होंने उसे बुलाया। वासुकी जल से पूर्ण पात्र को कुएँ में ही
आधी खिंची छोड़कर तुरन्त अपने पति के सम्मुख आ उपस्थित हुई। वह पात्र
उसी अवस्था में वासुकी के लौटने पर मिला! और एक बार जब प्रातःकाल के
समय ठण्डा भात² खाते-खाते इन्होंने कहा कि भात बहुत गरम होने के कारण मुँह
तक जलने लगा, वासुकी बिना किसी हिचकिचाहट के तुरन्त पंखा झलने लगी।
दिन प्रकाशपूर्ण मध्याह्न के समय कपड़ा बुनने का काम करते हुए अपनी ढरकी को
गिराकर उसे खोजने के लिए इन्होंने दीपक मांगा तो वासुकी ने बिना कुछ
पूछे-ताछे दीपक ला दिया। इस प्रकार की अनेक अन्य घटनाओं को देखकर प्रश्न
का उत्तर आपसे आप प्रश्नकर्ता को प्राप्त हो गया कि ऐसी पत्नी हो तो गार्हस्थ्य
श्रेष्ठ है, अन्यथा सन्यास³।

  1. தெய்வந் தொழாஅள் கொழுநற் றொழுதெழுவாள்
    பெய்யெனப் பெய்யு மழை.”-(குறள 1-6-5).
  2. देखिये—पृ० ४४१—'विश्ववाणी', दिसम्बर १९४६.
  3. சற்றேனும்--ஏறுமாறாக விருப்பாளே யாமாயின்
    கூறாமற் சன்னியாசங் கொள்.” ( தனிப்பா. 1-95-14)
    तनिक भी—हो विषम पत्नी तो बिन कह ग्रहण कर सन्यास।

8 भूमिका
कविवर की अर्द्धांगिनी के अवसान के समय की एक अद्भुत घटना अति
प्रसिद्ध है । मृत्यु-शय्या पर लेटी हुई वासुकी को अपनी ओर असाधारण रूप से
चिन्तामग्न नेत्रों के साथ अवलोकन करते हुए देखकर तिरुवल्लुवर ने उसका
कारण पूछा । वासुकी ने सविनय उत्तर देते हुए अत्यन्त मृदुल स्वर में कहा—
' विवाह के उपरान्त प्रथम भोज के समय ही आपने मुझे एक आज्ञा दी थी कि
भोजन के समय एक सूई और एक छोटे पात्र में स्वच्छ जल रख दिया करो—
और मैं वैसा करती आयी । पर मैं उसका मर्म अभी तक न समझ सकी
क्योंकि आपने कभी उनका प्रयोग नहीं किया ।' तिरुवल्लुवर ने उत्तर दिया—
" वे इसलिए कि यदि कोई चावल का कण पृथ्वी पर गिर पड़े तो सूई से
उठाकर स्वच्छ जल में शुद्ध कर लिया करूँ ।" उत्तर से सन्तुष्ट हो वासुकी
स्वर्ग सिधारी । इनसे इतना अवश्य सिद्ध होता है कि तिरुवल्लुवर के आदर्श
महान् थे और प्राचीन तमिऴ संस्कृति का स्तर अत्यन्त श्रेष्ठ था ।²
विद्वानों का विचार है कि तिरुवल्लुवर ईसा की द्वितीय शताब्दी में
[L

भूमिका 9
साधारण मानव-जीवन के ही सिद्धान्त हैं—यत्रतत्र देखकर उनके आधार पर
कल्पना करते हैं कि इसके रचयिता का काल आठ और दस सौ ईस्वी के बीच
कहीं रहा होगा$^1$ और अपने अभिप्राय को सिद्ध करने के लिए कोई विशिष्ट
कारण देना उन्होंने अनिवार्य नहीं समझा । श्री वी. आर. रामचन्द्र दीक्षितर का
दृढ़ विचार है कि ग्रन्थ-रचना व ग्रन्थकार का काल ईसा पूर्व द्वितीय अथवा
प्रथम शताब्दी ही है ।$^2$ तिरुवळ्ळुवर का काल कुछ भी क्यों न हो, वे कवि
शिरोमणि ‘तिरुक्कुरळ्’ जैसे ग्रन्थ की रचना करके काल की परिधि को लाँघकर
अमर हो गये हैं ।
साधारणतः संसार में मानव के अस्थायी भौतिक शरीर के अवसान के
पश्चात् ही स्थाई यश-शरीर दृष्टिगोचर होता है । भवभूति ने जो उत्तर-राम-
चरित को देखते हुए महाकवि कालिदास से भी श्रेष्ठ ठहराये जाते हैं$^3$, इसी
कारण कहा था—
‘‘ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां,
जानन्तु ते किमपि, तान् प्रति नैष यत्नः ।
उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा
कालोह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥’’
मालती माधव १—६

  1. "I think between A. D. 800 and 1000 is its probable
    date "-P. iv Introduction to 'The Sacred Kural' by
    G. U. Pope.
  2. "It is now nearly twenty years since I published my
    'Studies in Tamil Literature and History', where I have
    assigned the first or Second Century B. C. as the date of
    its (Tirukkural's) composition. I find no reason to change
    that view." P. ix, Preface to 'Tirukkural with English
    Translation' by Sri V. R. Ramachandra Dikshitar, M. A.,
    Professor of Indian History and Archaeology, University
    of Madras.
  3. ‘‘उत्तरे राम चरिते भवभूतिर्विशिष्यते ।”
    2

10 भूमिका
परन्तु तिरुवल्लुवर के यश-शरीर का प्रकाश उनके जीवन-काल में ही
प्रज्ज्वलित हो उठा था। उनके समकालीन नक्कीरर, चात्तनार, कपिलर, परणर
आदि अनेक तमिऴ महाकवियों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। भगवान
शिव की कविता के दोष को, उनके ज्वलन्त तृतीय नेत्र को प्रत्यक्ष करने पर भी
निडर होकर, "तृतीय नेत्र को दिखाने पर भी दोष दोष ही है"¹ ऐसा शिव के
ही सम्मुख कहने का सामर्थ्य जिस कवि-शिरोमणि नक्कीरर में था, उन्होंने भी
तिरुवल्लुवर की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। इनके अतिरिक्त केरळ-सम्राट्
चॆङ्गुट्टुवन के अनुज तथा चिलप्पदिकारम् महाकाव्य के रचयिता श्री इळंगोवडिहळ्
तथा अन्यान्य अनेक श्रेष्ठ कवियों ने हृदय से इनकी प्रशंसा के गीत
गाये हैं। तमिऴ के प्रसिद्ध आलोचक एवं लेखक श्री चेल्वकेशवराय मुदलियार
ने तिरुवल्लुवर को तमिऴ की 'गति-द्वै'² में से एक माना है। ' अनेक भारतीय
एवं पाश्चात्य भाषाओं व साहित्यों के अध्ययन के पश्चात् आधुनिक तमिऴ
साहित्य के कवि-सम्राट् स्वर्गीय श्री सुब्रह्मण्य भारती ने कहा है कि तिरुवल्लुवर
जैसे श्रेष्ठ कवि को और कहीं नहीं देखा।³ तिरुवल्लुवर का स्थाई यश इसीसे

  1. “ நெற்றிக கண்ணைக காட்டினும் குற்றம் குற்றமே ”—நக்கீரர்.
  2. “ தமிழககுக கதியாவா இருவா எனச சில புலவர் புகழ்
    வதுண்டு. கதி எனபதில் கஃகாணைக கம்பநாட்டாழ்வாருக்கும்,
    திஃகாணேத திருவள்ளுவருககும ஞாபக சூத்திரமாகக கொள்ளல்
    வேண்டும்.”-P. 7. 'Tiruvalluvar' by Sri Chelvakesavaroya
    Mudaliar M. A.
  3. “ யாமறிந்த புலவரிலே கம்பனைப்போல்
    வள்ளுவர்போல் இளங்கோவைப் போல்,
    பூமிதனில யாங்கணுமே பிறந்ததிலை,
    உண்மை வெறும் புகழ்ச்சி இல்லை. ”
    जो ज्ञात हैं कविगण मुझे, उनमे न कम्बर के समान,
    तिरुवल्लुवर के सम न, अथवा कवि इळङ्गो के समान ।
    जन्मे न इस भू पर कहीं भी आज तक इनके समान,
    नहि डींग कोरी, सत्य है यह सन्तवाणी के समान ॥

भूमिका 11
सिद्ध हो जाता है कि उनके समय में तथा तदनन्तर प्रकट सभी श्रेष्ठ रचनाओं
में तिरुक्कुरळ् की सुगन्धि व सौष्ठव स्पष्टतः सम्पृक्त हुआ है। कहने का तात्पर्य
यह है कि तमिऴ के तुलसी कविवर कम्बर जैसे श्रेष्ठ प्राचीन महाकवियों से
लेकर आधुनिक काल के 'भूषण' श्री सुब्रह्मण्य भारती तक सभी ने तिरुक्कुरळ्
के छन्दों को उसी रूप में एक पुष्प के समान, अथवा उसके एक खण्ड को
पंखड़ी के समान स्वरचित काव्य कृति रूपी सुन्दर सरस-माला में पिरोया है
जिससे वह कृति तिरुक्कुरळ् के उत्तम सौरभ से सुरभित हो उठी है।
कवियों द्वारा तिरुक्कुरळ् के प्रथम-स्वीकरण (अरंगेट्रम्) के सम्बन्ध में
एक अपूर्व कथा प्रचलित है। तिरुवळ्ळुवर के समय में पाण्ड्य प्रदेश की
राजधानी मदुरा में तमिऴ के कवियों का एक 'संगम्'¹ था जो प्रागैतिहासिक काल
से कार्य करता आ रहा था। इसमें यह प्रथा थी कि कवि के काव्य-सौष्ठव को
मापने के लिए अलौकिक शक्ति से युक्त, पानी पर तैरते हुए एक शिव-प्रदत्त तख्ते
(संगप्पलहै)² पर उसकी कृति को रखकर उसका मूल्यांकन किया जाता था। ऐसा

  1. तमिऴ का प्रथम संगम् प्रागैतिहासिक काल में ४४४० वर्ष तक रहा जिसमे
    कुल ५४९ कविगण सम्मिलित थे। ८९ सम्राटों का आश्रय इस संगम् को
    प्राप्त हुआ था। द्वितीय संगम् ने ३७०० वर्षों तक कार्य किया। इसमे
    कुल ३७०० कवियों ने भाग लिया, और ५९ सम्राटों का आश्रय इसे प्राप्त
    हुआ। प्रस्तुत सङ्घम् तृतीय था जिसमे कुल ४९ सदस्य थे। ४४९
    कवियो ने अपनी रचनाएँ स्वीकरणार्थ समर्पित कीं। इस संगम् के अन्त
    का कारण कुछ लोग तिरुवळ्ळुवर-कृत तिरुक्कुरल की अवहेलना ही मानते
    हैं, जब कि प्रथम दो संगम् की समाप्ति का कारण जल-प्रलय माना
    जाता है।
  2. சங்கப்பலகை (संगप्पलहै)—Miraculous seat capable of
    accommodating only deserving scholars, believed to
    have been granted by Siva at Madura, to the Sangam
    Poets.

12 भूमिका
कहा जाता है कि जब तिरुक्कुरळ् अन्य ग्रन्थों के साथ उस "संगप्पलहै" पर
रखा गया तो अन्य सभी ग्रन्थ जल में निमज्जित हो गये, और केवल तिरुक्कुरळ्
ही जल के ऊपर तैरता रहा। इस कथा में सत्य का अंश चाहे कितना ही क्यों
न हो, पर यह अवश्य माननीय है कि इसकी तुलना में तात्कालिक अन्य कोई
कृति नहीं ठहरती। यह अपने ढंग की एक ही कृति है। कविवर परणर ने
तिरुक्कुरळ् की तुलना वामनावतार से की है। भगवान ने वामनावतार लेकर दो
ही पग में सम्पूर्ण विश्व को नाप डाला था। इसी प्रकार 'पौने दो चरणों' का
प्रत्येक कुरळ् एक भाव-लोक को अपने में अन्तर्लीन किये हुए है। दूसरे एक
सत्कवि ने तिरुक्कुरळ् में विभिन्न विषयों की विशदता को अलौकिक काव्यगत
सौन्दर्य से पूर्ण¹ व्यक्त किया हुआ पाकर कहा है :—
सभी अर्थ इस में समाप्त,
जो इस में है न, नहीं अन्यत्र ॥²
यहाँ "अर्थ" से वही भाव है जो "वागर्थाविव सम्पृक्तौ, वागर्थ
प्रतिपत्तये" के "अर्थ" से है।
तिरुक्कुरळ् पर "क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति । तदेव रूपं रमणीयतायाः ॥"
वाला सिद्धान्त पूर्णतः घटित होता है। जितना ही इसमें पैठकर अर्थ गाम्भीर्य का
अन्वेषण करते हैं उतना ही नवीन अर्थ का प्रकाश निस्सृत होता हुआ प्रकट होता
है। यह प्रकाश पाठक में उसके ज्ञान, अनुभव एवं व्यक्तिगत विचार-धारा की

  1. "Musaco Contingens Cuncta lopre" i. e., "touching all
    things with poetic Grace"—G. U. Pope.
  2. " எல்லாப் பொருளும் இதன்பாலுள ; இதன்பால்
    இல்லாத எப்பொருளும் இல்லையால்."
    (மதுரைத் தமிழ்நாயனார்.)

भूमिका 13
गम्भीरता के अनुपात में होता है। इसकी एक विशेषता यह है कि इसके भाव
गम्भीर व नितनूतन होते हुए भी अत्यन्त सरल एवं स्पष्ट हैं।
तिरुक्कुरळ् एक मुक्तक काव्य है। इसका प्रत्येक पद पृथक् - पृथक्
मोती के सदृश विशिष्ट व्यक्तित्व से युक्त है। प्रत्येक पद स्वतन्त्र रूप से पूर्ण
अर्थ का द्योतक है। ऐसा होते हुए भी इसकी रचना में आद्योपान्त एक सम्बन्ध
सूत्र व धारावाहिकता भी है, जो यह सिद्ध करती है कि यह एक संग्रह ग्रन्थ
नहीं, अपितु एक पूर्ण क्रमबद्ध रचना है। इसका प्रत्येक अध्याय पूर्वोक्त अध्याय
से, एवं प्रत्येक पद पूर्वोक्त पद से विकसित ज्ञात होता है। दूसरे शब्दों में इस
प्रकार हम कह सकते हैं कि यह मोक्ष प्राप्ति के लिए एक प्रशस्त सोपान है
जिसके तीन खण्ड हैं—धर्म, अर्थ एवं काम। इसका एक-एक पद उस प्रशस्त
सोपान का एक - एक पद है। जिस प्रकार सोपान का प्रत्येक पद अपने में पूर्ण
होता हुआ भी निम्न पद के पश्चात् एवं आगामी पद के पूर्व होता है और इस
प्रकार एक क्रम-बद्धता रहती है, उसी प्रकार तिरुक्कुरळ् के पदों में भी एक
'क्रम-बद्धता, एक नियम व भावों का क्रमिक विकास हम देख सकते हैं।
तिरुक्कुरळ् एक 'सामान्य नीति-ग्रन्थ'¹ है। यह किसी मत - विशेष,
काल-विशेष अथवा स्थान-विशेष का ग्रन्थ नहीं है। यह ग्रन्थ हिन्दू, जैन, बौद्ध,
ईसाई, इस्लाम आदि सभी, से समाहृत हुआ है। जिस प्रकार यह ईसा की
प्रारम्भिक शताब्दियों में समाहृत हुआ था, उसी प्रकार आज भी हो रहा है,
और सदा होता रहेगा। सभी मनुष्य समान रूप से इसका अध्ययन व सम्मान
करते हैं। भारत में ही नहीं प्रत्युत पाश्चात्य एवं प्राच्य देशों में भी इसका नाम
सादर लिया जाता है। इसी हेतु यह रचना 'सम-धर्म-ग्रन्थ'² की संज्ञा से, और

  1. பொது நீதி நூல்—Common Ethical Code
  2. 'समयப் பொது நூல்'

14 भूमिका
इसके रचयिता 'दैविक कवि', 'भगवान', व 'पिता'¹ आदि नामों से स्मरण
किये जाते हैं। इसमें जो तत्त्व व्यक्त किये गये हैं वे सभी मनुष्यों, देशों व
कालों के लिए सत्य ठहरते हैं। अतः इसे "सत्य वचन"² की संज्ञा से भी
सम्मानित किया जाता है।
यद्यपि तमिऴ भाषा में आचरण एवं नीति के ग्रन्थ अनेकानेक हैं, तथापि
उनमें तिरुक्कुरळ् का स्थान कुछ विलक्षण ही है। निकटतः दो सहस्राब्दियों के
पूर्व रचित ऐसा अपूर्व काव्य-ग्रन्थ कदाचित् अन्य किसी भाषा-साहित्य में
अप्राप्य है। इन सबका यही कारण है कि यह ऐसा विशिष्ट नीति-ग्रन्थ है जो
भाव, भाषा एवं साहित्यिक सौंदर्य से पूर्ण है, और जिसके साधु-लेखक ने मनुष्य
के सामान्य आचरण एवं व्यवहार भूमि पर अवस्थित होकर अपनी सर्वतोमुखी
प्रतिभा एवं सुविशाल विचार-धारा से प्रेरित सर्वग्राह्य मानव-धर्म के तत्वों को सुन्दर
समास शैली में स्पष्टतः व्यक्त किया है। अनेकानेक गम्भीर भाव-चित्रों को अपने
मानस-पटल पर अंकित करके उन्हें उसी रूप में न्यूनातिन्यून शब्दों में चित्रित
करने में तिरुवळ्ळुवर विश्व साहित्य में अद्वितीय हैं³। कोई भी सहृदय पाठक
तिरुक्कुरळ् को आद्योपान्त पढ़कर उनके तत्त्वों को हृदयंगम करने के पश्चात् उक्त
कथन की सत्यता को माप सकता है। कवि इडैक्काडर ने ठीक ही कहा है :—
'सरसों को छिद, सत सागर भर,
काटे मध्य कुरळ्।'⁴

  1. 'தெய்வப் புலவா', 'நாயனா'
  2. 'பொய்யா மொழி.' "செய்யா மொழிக்கும் திருவள்ளுவர் மொழிந்த
    பொய்யா மொழிக்கும் பொருள் ஒன்றே." (வெள்ளி வீதியார்)
  3. "It is truly an apple of gold in a net-work of silver."
    (P. vi—Introduction to 'The Sacred Kural' by G. U. Pope)
  4. "கடுகைத துளைத்தேழ் கடலைப் புகட்டிக
    குறுகத தரித்த குறள்." (இடைக்காடா)

भूमिका 15
इस समालोचना-सूक्ति को शिथिल मानकर सरस्वती का साक्षात् अवतार
मानी जानेवाली तमिऴ कवयित्री अव्वयार ने कुरळ् की अपार शक्ति का अवलोकन
करके कहा—
' अणु को ही छिद, सत सागर भर,
काटै मध्य कुरळ् ।'¹
हिन्दी साहित्य के प्रेमी कविवर बिहारीलाल के दोहों में उपस्थित
“ गागर में सागर ” के गुण से परिचित ही हैं। बिहारी के दोहों के सम्बन्ध में
कहा गया है—
“ सतसैया के दोहरे, अरु नावक के तीर ।
देखत के छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर ॥ ”
यही गुण हम तिरुवळ्ळुवर में अत्यधिक मात्रा में पाते हैं ।
विचार स्वातन्त्र्य की भावना इस नीति-ग्रन्थ की अपनी एक अनुपम
विशिष्टता है । ध्यान देने का विषय है कि यह कोई परम्परागत अथवा एक-
पक्षीय धर्म-ग्रन्थ तो है ही नहीं । सम्पूर्ण ग्रन्थ में रचयिता ने अपने विभिन्न
विचारों को स्पष्टतः व्यक्त करके अन्तिम निर्णय का अधिकार पाठक को ही दे
दिया है । कवि ने स्वयं ही कहा है—
जो भी सुनें किसी भी जन से,
उसमें सत्य निरखना ज्ञान ।²

  1. “ அணுவைத் துளைத்தேழ் கடலைப் புகட்டிக்
    குறுகத் தரித்த குறள். ” (ஔவையார்)
    2, “ எப்பொருள் யார்யார்வாய்க் கேட்பினு மப்பொருள்
    மெய்ப்பொருள் காண்ப தறிவு. ”
    (2-43-3)

16 भूमिका
तिरुवळ्ळुवर कहते हैं कि कोई व्यक्ति कितना ही महान् क्यों न हो,
मानव को चाहिए कि उसके विचारों को ध्यान से सुनकर उन पर स्वयं चिन्तन एवं
मनन करे, और सत्य मात्र को स्वीकार करे । तात्पर्य यह है कि कथित विषय का
विवेचन स्वयं भी अपनी बुद्धि से करके वास्तविकता की छान-बीन करे, और
युक्तियुक्त हो तो उस पर विश्वास लावे, अन्यथा नहीं । यही ज्ञान कहलाता है ।
अन्धानुकरण अज्ञान का चिह्न है । कबीर ने भी कहा है—
“ लेना होय सो लेय ले,
कही-सुनी मत मान । ”
एक दूसरे स्थान में तिरुवळ्ळुवर ने यहाँ तक कह दिया है—
किसी वस्तु का गुण कुछ भी हो,
उसमें सत्य निरखना ज्ञान । ¹
सारांश यह है कि तिरुवळ्ळुवर ने व्यक्तिगत विचारों को मानव के सम्मुख
उपस्थित करके, अपनी बुद्धि के आधार पर उन पर मनसा-वाचा-कर्मणा आचरण
करने की सम्मति दी है । सम्पूर्ण ग्रन्थ में कहीं भी धार्मिक अथवा अन्य
किसी प्रकार के प्रमाण की छाप² नहीं लगायी है । यह वर्तमान काल के
प्रजातन्त्र-वाद के दृष्टिकोण से भी युक्तियुक्त सिद्ध होता है ।
तिरुक्कुरळ् एक नीति-ग्रन्थ है जिसमें पुरुषार्थों का विशद विवेचन एवं
स्पष्टीकरण हुआ है । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों में से कवि ने
केवल प्रथम तीन का ही प्रत्यक्ष रूप से वर्णन किया है । चौथे पुरुषार्थ—
मोक्ष—का शब्दों में विशद वर्णन दो कारणों से नहीं किया है । प्रथम यह कि यदि

  1. “ எப்பொரு ளெத்தன்மைத தாயினு மப்பொருண்
    மெய்ப்பொருள் காண்ப தறிவு ”. (2-36-5.)
    2 “ Stamp of Religion or any other type of Sanction. ”

भूमिका 17
कोई व्यक्ति धर्म, अर्थ एवं काम का अपने जीवन में तिरुक्कुरळ् में कहे अनुसार
व्यवहार करेगा तो चौथा पुरुषार्थ उसे आप से आप प्राप्त हो जाएगा । तत्पश्चात्
वह स्वयं उसका अनुभव भी कर लेगा, और साथ-साथ यह भी कि वह अव्यक्त
अवस्था अवर्णनीय है ।¹ दूसरा कारण यह है कि जिसे यह पुरुषार्थ प्राप्त हो
जाय, वह इसका अपने मुख से वर्णन नहीं करेगा; और जो इसका वर्णन करे,
उसे वास्तव में इसका अनुभव नहीं हुआ समझना चाहिए ।² कबीर ने कहा
ही है—
“जो देखे सो कहे नहीं, कहे सो देखे नाहिं ।
सुने सो समझावे नहीं, नैन - जीभ - कन काहिं ॥”
अतः तिरुवळ्ळुवर ने मोक्ष पर किसी अध्याय की रचना नहीं की है।
पर हाँ, प्रस्तावना के चार अध्यायों, में इस चतुर्थ पुरुषार्थ के सम्बन्ध में अप्रत्यक्ष
रूप से सूचना मात्र दे दी है³ और तद्हेतु जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को लेकर
एक सामान्य मानव-धर्म-पथ का उल्लेख कर दिया है ।

  1. “अविगत गति कछु कहत न आवै ।
    ज्यों गूंगेहि मीठे फल को रस अन्तरगत ही भावै ॥
    परम स्वाद सब ही जु निरन्तर अमित तोष उपजावै ।
    मन बानी को अगम अगोचर सो जानै जो पावै ।”
    —सूरदास
  2. “He who has seen will not say,
    He who says, has not seen.”
  3. “வீடொன்று பாயிர நான்கு” (சிறு மேதாவியார்)
    अर्थात् ‘मोक्ष इक प्रस्तावना चार ।’ तात्पर्य यह कि प्रथम चार
    अध्यायों को एक पृथक खण्ड ‘मोक्ष’ पर मानने से तिरुक्कुरळ् मे चार
    खण्ड—क्रमशः मोक्ष, धर्म, अर्थ एवं काम पर चारों पुरुषार्थों के हो जाते
    हैं । इस प्रकार तिरुक्कुरळ् ‘चतुर्पुरुषार्थ-निरूपण ग्रन्थ’ है ।
    3

18 भूमिका
तिरुक्कुरळ् में धर्म के जिज्ञासुओं के लिए, अर्थ (राजनीति) विभाग के
छोटे-बड़े सभी कार्य-कर्त्ताओं के लिए व ज्ञान के अन्वेषकों के लिए ही नहीं,
अपितु काव्य व काम-रस के इच्छुकों के लिए भी मनोवांछित सामग्री यथेष्ट
मात्रा में प्राप्त हो सकती है। यह उत्तम जीवन का उत्तम पथ-प्रदर्शक है। अतः
हम कह सकते हैं कि तिरुक्कुरळ्—
धर्म के जिज्ञासुओं को धर्म-ग्रन्थ महान है,
राजनीति विदग्ध को यह राज्य-ग्रन्थ महान है।
ज्ञान का जो भान चाहें, ज्ञान-ग्रन्थ महान है,
काव्य-रस के रसिक जन को काव्य-ग्रन्थ महान है॥
प्रेम-रस के पाठकों को प्रेम-ग्रन्थ महान है,
ब्रह्म-सुख-खोजी को ब्रह्मानन्द-ग्रन्थ महान है॥
जीवनोत्तम पथ-प्रदर्शन हेतु ग्रन्थ महान है,
दिव्य-विद्या-ज्ञानार्जन हेतु ग्रन्थ महान है॥
दो०—तिरुक्कुरळ् पथ के पथिक, होंगे यहाँ सानन्द।
उन्हें प्राप्त होगा वहाँ, निज पद ब्रह्मानन्द॥
तिरुक्कुरळ् एवं उसके लेखक तिरुवळ्ळुवर के अनेक नाम हैं जिनमें नौ
प्रधान हैं। वे हैं—
ग्रन्थ के नाम लेखक के नाम
(१) तिरुक्कुरळ् तिरुवळ्ळुवर
(२) मुप्पानूल् नायनार
(३) उत्तरवेदम देवर
(४) देय्वनूल् मुदर्पावलर
(५) तिरुवळ्ळुवर देय्वप्पुलवर

भूमिका 19
(६) पोय्यामोष़ि नान्मुखनार
(७) वायुरै वाष़्त्तु मातनुवंगी
(८) तमिष़ मरै चेन्नाप्पोदार
(९) पोदु मरै पेरुनावलर


वस्तुतः तिरुक्कुरळ् का कोई अनुवाद उसके सम्पूर्ण काव्य-सौष्ठव को
व्यक्त नहीं कर सकता ।¹ वैसे इस ग्रन्थ का अनुवाद अनेक भाषाओं में
हो चुका है । भारतीय व अंग्रेज़ी के अतिरिक्त अन्य अनेक पाश्चात्य भाषा
साहित्यागार इस ग्रन्थ-रत्न के भाषान्तर से समृद्ध किये जा चुके हैं। केवल
अंग्रेज़ी में इसके बारह अनुवाद हो चुके हैं जिनमें पादरी श्री जी. यू. पोप,
वा० वे० सु० अय्यर, वी. आर. रामचन्द्र दीक्षितर आदि के प्रमुख हैं।
श्री एम. एरियल ने फ्रेंच में इसका अति सुन्दर अनुवाद किया है। डॉ०
ग्रॉल ने जर्मन तथा लैटिन भाषाओं में सन् १८५६ में अनुवाद करके क्रमशः
लैप्सिग तथा लन्दन से प्रकाशित किया है। इटालियन फ़ादर बेस्की जिन्होंने
अपना नाम 'वीरमामुनिवर', 'धैर्यनाथ स्वामी' व 'इसाती सन्यासी' रखकर
भारतीय वेश-भूषा में तिरुच्चिराप्पळ्ळी के निकटवर्ती एक नगर में चालीस वर्ष
रह कर तमिष़ भाषा के विशद अध्ययन के पश्चात् तिरुक्कुरळ् का लैटिन भाषा में
अनुवाद तथा तमिष़ भाषा तथा साहित्य पर अन्य अनेक ग्रन्थों की भी रचना की,
विशेष प्रशंसा के पात्र हैं। इन अनुवादकों ने तमिष़ को ही नहीं, अपितु
अपनी भाषा को भी प्रशोभित किया, और उसी के साथ-साथ तिरुक्कुरळ् के
दिव्य सन्देश को संसार के विभिन्न देशों तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की।

  1. "No Translation can express its charming effect." — P. vi.
    Introduction to the Sacred Kural — by G. U. Pope

20 भूमिका
इस ग्रन्थ के भाष्य तमिऴ में ही बारह से अधिक लिखे जा चुके हैं।
प्रत्येक में एक विशिष्ट विचार-धारा को प्रतिबिम्बित होते हुए हम स्पष्टतः देख
सकते हैं। इसके अनुवाद अन्य तीनों द्राविडीय भाषाओं में हो चुके हैं।
तेल्लुगु में श्री वेंकटराम विद्यानन्द ने ‘ त्रिवर्ग दीपिका ’ के नाम से आकस्मिक
स्वर्गवास के कारण केवल प्रथम दो खण्डों का पद्यानुवाद प्रस्तुत किया है।
कन्नड में श्री नरसिंहाचार्य ‘ नीति मंजरी ’ के नाम से सम्पूर्ण ग्रन्थ का सुन्दर
भाषान्तर तीन शताब्दियों के पूर्व ही कर गये हैं, और अभी श्री एल. गुण्डप्पा
का भी संपूर्ण भाषानुवाद प्रकाशित हो चुका है। मलयाळम् में श्री परमेश्वरन्
पिळ्ळै ने ‘ रत्न उद्धारकम् ’ के नाम से प्रथम दो खण्डों का भाषानुवाद किया है।
इतर भारतीय भाषाओं में से बंगाली में डा० नलिनी मोहन सानियाल
ने स्वर्गीय श्री वा० वे० सु० अय्यर के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर
प्रसिद्ध भाषा-शास्त्रज्ञ डा० सुनीति कुमार चटर्जी के प्राकथन के साथ सुन्दर
अनुवाद प्रस्तुत किया है। हिन्दी में श्री क्षेमानन्द राहत द्वारा चुने हुए
८९ अध्यायों का तथा प्रो० बी. डी. जैन द्वारा तीनों खण्डों का अंग्रेज़ी से
भाषानुवाद हो चुका है।
प्रस्तुत अनुवाद में मैंने तिरुक्कुरळ् के तमिऴ भाष्यों पर, विशेष रूप से
परिमेलऴग़र के भाष्य पर तथा अन्य टीकाओं व भाषानुवादों पर ध्यान रखते
हुए तिरुक्कुरळ के विशेषज्ञों से स्थान-स्थान पर परामर्श प्राप्त करके मूल
तिरुक्कुरळ का अनुसरण करने का प्रयत्न किया है।
अपने आदरणीय वाइस चान्सलर सर ए० लक्ष्मणस्वामी मुदलियार जी
को इस ग्रंथ का प्राक्कथन प्रदान करने के लिये मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता
सादर समर्पित करता हूँ।
मद्रास विश्वविद्यालय,
मद्रास ❭ सु. शंकर राजू नायडू
१ - ६ - १९५८ /