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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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भूमिका 11
सिद्ध हो जाता है कि उनके समय में तथा तदनन्तर प्रकट सभी श्रेष्ठ रचनाओं
में तिरुक्कुरळ् की सुगन्धि व सौष्ठव स्पष्टतः सम्पृक्त हुआ है। कहने का तात्पर्य
यह है कि तमिऴ के तुलसी कविवर कम्बर जैसे श्रेष्ठ प्राचीन महाकवियों से
लेकर आधुनिक काल के 'भूषण' श्री सुब्रह्मण्य भारती तक सभी ने तिरुक्कुरळ्
के छन्दों को उसी रूप में एक पुष्प के समान, अथवा उसके एक खण्ड को
पंखड़ी के समान स्वरचित काव्य कृति रूपी सुन्दर सरस-माला में पिरोया है
जिससे वह कृति तिरुक्कुरळ् के उत्तम सौरभ से सुरभित हो उठी है।
कवियों द्वारा तिरुक्कुरळ् के प्रथम-स्वीकरण (अरंगेट्रम्) के सम्बन्ध में
एक अपूर्व कथा प्रचलित है। तिरुवळ्ळुवर के समय में पाण्ड्य प्रदेश की
राजधानी मदुरा में तमिऴ के कवियों का एक 'संगम्'¹ था जो प्रागैतिहासिक काल
से कार्य करता आ रहा था। इसमें यह प्रथा थी कि कवि के काव्य-सौष्ठव को
मापने के लिए अलौकिक शक्ति से युक्त, पानी पर तैरते हुए एक शिव-प्रदत्त तख्ते
(संगप्पलहै)² पर उसकी कृति को रखकर उसका मूल्यांकन किया जाता था। ऐसा

  1. तमिऴ का प्रथम संगम् प्रागैतिहासिक काल में ४४४० वर्ष तक रहा जिसमे
    कुल ५४९ कविगण सम्मिलित थे। ८९ सम्राटों का आश्रय इस संगम् को
    प्राप्त हुआ था। द्वितीय संगम् ने ३७०० वर्षों तक कार्य किया। इसमे
    कुल ३७०० कवियों ने भाग लिया, और ५९ सम्राटों का आश्रय इसे प्राप्त
    हुआ। प्रस्तुत सङ्घम् तृतीय था जिसमे कुल ४९ सदस्य थे। ४४९
    कवियो ने अपनी रचनाएँ स्वीकरणार्थ समर्पित कीं। इस संगम् के अन्त
    का कारण कुछ लोग तिरुवळ्ळुवर-कृत तिरुक्कुरल की अवहेलना ही मानते
    हैं, जब कि प्रथम दो संगम् की समाप्ति का कारण जल-प्रलय माना
    जाता है।
  2. சங்கப்பலகை (संगप्पलहै)—Miraculous seat capable of
    accommodating only deserving scholars, believed to
    have been granted by Siva at Madura, to the Sangam
    Poets.