तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका 9
साधारण मानव-जीवन के ही सिद्धान्त हैं—यत्रतत्र देखकर उनके आधार पर
कल्पना करते हैं कि इसके रचयिता का काल आठ और दस सौ ईस्वी के बीच
कहीं रहा होगा$^1$ और अपने अभिप्राय को सिद्ध करने के लिए कोई विशिष्ट
कारण देना उन्होंने अनिवार्य नहीं समझा । श्री वी. आर. रामचन्द्र दीक्षितर का
दृढ़ विचार है कि ग्रन्थ-रचना व ग्रन्थकार का काल ईसा पूर्व द्वितीय अथवा
प्रथम शताब्दी ही है ।$^2$ तिरुवळ्ळुवर का काल कुछ भी क्यों न हो, वे कवि
शिरोमणि ‘तिरुक्कुरळ्’ जैसे ग्रन्थ की रचना करके काल की परिधि को लाँघकर
अमर हो गये हैं ।
साधारणतः संसार में मानव के अस्थायी भौतिक शरीर के अवसान के
पश्चात् ही स्थाई यश-शरीर दृष्टिगोचर होता है । भवभूति ने जो उत्तर-राम-
चरित को देखते हुए महाकवि कालिदास से भी श्रेष्ठ ठहराये जाते हैं$^3$, इसी
कारण कहा था—
‘‘ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां,
जानन्तु ते किमपि, तान् प्रति नैष यत्नः ।
उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा
कालोह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ॥’’
मालती माधव १—६
- "I think between A. D. 800 and 1000 is its probable
date "-P. iv Introduction to 'The Sacred Kural' by
G. U. Pope. - "It is now nearly twenty years since I published my
'Studies in Tamil Literature and History', where I have
assigned the first or Second Century B. C. as the date of
its (Tirukkural's) composition. I find no reason to change
that view." P. ix, Preface to 'Tirukkural with English
Translation' by Sri V. R. Ramachandra Dikshitar, M. A.,
Professor of Indian History and Archaeology, University
of Madras. - ‘‘उत्तरे राम चरिते भवभूतिर्विशिष्यते ।”
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