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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

About this granth

This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.

Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.

Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.

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प्रथमः निष्यन्दः २२९
'विषयेष्वेव संलीनामधोऽधः पातयन्त्यणून् ।
रुद्राणून् याः समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥'
'स्वस्थितेः' = चिद्रूप आत्मा का ।। स्वरूप (आत्मा) की वास्तविक स्थिति का ।।
ते = वे गुण (गुणादि·स्पन्द) ॥
'अप्रबुद्ध' = अज्ञानी ।। अप्रत्यभिज्ञात पारमेश्वरी शक्त्यात्मकनिजस्पन्द तत्त्व वाला
देहात्माभिमानी, प्राणात्माभिमानी लौकिक पुरुष ।
धी = बुद्धि ।। शक्ति-चित, निवृत्ति-इच्छा, ज्ञान, क्रिया ।
माया = कला, विद्या, राग, काल, नियति ।।
एते = ये ।। पूर्वोक्त गुणादिस्पन्द निष्यन्द ।
स्वस्थितिस्थगनोद्यताः = अपनी पारमात्मिकी स्थिति पर आवरण डालकर अपने
को बन्धन ग्रस्त करने हेतु प्रयत्नशील ।।
स्थगन = अपनी स्पन्दतत्त्वात्मा स्थिति को रोकना ।।
दुरुत्तार = 'दैशिकैः जन्तुचक्रं लंघयितुं अशक्ये' अलंघ्य ।।
संसारवर्त्मनि = संसरणमार्ग में । संसार के पथ में ।
दुरुत्तार = कठिनाई से पार होने योग्य ।। पातयन्ति = (ये स्पन्द-निष्यन्द दुरुत्तार
घोर संसार मार्ग में) गिराते हैं । श्री 'मालिनीविजय' में कहा भी गया है—
'विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् ।
रुद्राणून् याः समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥'
स्पन्द तत्त्वात्मा पराशक्ति जगत् तो अन्दर एवं बाहर वमन करने और वामाचार के
कारण 'वामेश्वरी शक्ति' कहलाती है । यही शक्ति खेचरी-गोचरी-दिक्केरी-भूचरी चार
रूपों वाले देवताचक्र को जन्म देकर सुप्रबुद्धों को उनके द्वारा परम भूमि में पहुँचाती है
किन्तु अप्रबुद्ध लोगों को इन्हीं शक्तियों के द्वारा अधोलोक एवं अधपतन के मार्ग में
गिराती है । जिस प्रकार 'खेचरी' (खे = गगन में । चरी = संचरण करने वाली) ज्ञानियों
को सर्व-कर्तृत्व—सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व-व्यापकत्व प्रथा कर्त्री है उसी प्रकार वही अप्रबुद्धों
को—किंचि-त्कर्तृत्व-किंचिज्ज्ञता आदि प्रदान करती है ।
१) 'गोचरी'—गोर्वाक तदुपलक्षितासु सङ्कल्पमयीषु बुद्धयहंकारमनोभूमिषु चरन्त्यो
गोचर्यः सुप्रबुद्धस्य स्वात्माभेदमयं अध्यवसायाभिमानसंकल्पान् जनयन्ति मूढ़ानां तु
भेदैकसारान् ॥
२) 'दिक्केरी' = दिक्षु दशसु बाह्येन्द्रियभूमिषु चरन्त्यो दिक्पर्यः सुप्रबुद्धस्य
अद्वयप्रथासाराः अन्येषां द्वयप्रथाहेतवः ।१
३) 'भूचरी' = भूः रूपादि पंचकात्मकं मेयपदं तत्र चरन्त्यो भूचर्यः तदाभोगमय्या
आश्यानीभावतया तन्मत्वं आपन्नाः भूचर्यः सुप्रबुद्धस्य चित्प्रकाशशरीरतया आत्मानं
दर्श- यन्त्य इतरेषां सर्वतो अपि अवच्छिन्नतां प्रथयन्त्यः स्थिताः ॥२
१. स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दनिर्णय ।

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२३० स्पन्दकारिका
'खेचरी', 'गोचरी', 'दिक्धरी' एवं 'भूचरी'—शक्ति चक्र अन्तःकरण एवं
बहिष्करण प्रमेय रूप से गुणादिस्पंद युक्त अप्रबुद्ध लोगों को बिन्दुनादादि प्रथामात्र से
संतुष्ट योगियों को संसार में अधःपतित करती रहती हैं ।१
मूढ़ पुरुष के लिए ये ही स्पन्द-निष्यन्द चित् स्वरूप के आच्छादक बन जाते हैं
क्योंकि वह मूढ़ बुद्धि पुरुष अपने को गुणात्मक दी देखता है शुद्ध बुद्ध नहीं ।२ कहा भी
गया है—'जैसे बालक स्वच्छ दर्पण को अपने ही श्वासों से मलिन कर देता है वैसे ही
अज्ञानी अपने विकल्पों से विज्ञान को मलिन कर देता है ।३ इसका परिणाम यह होता है
कि वे जन्म-मरण के संसार-प्रवाह में भेद दिये जाते हैं । उस प्रवाह में अत्यन्त क्लेश है
और दुस्तर भी है—
'यथादर्श शिशुः स्वच्छं निःश्वासैर्मलीम सम् ।
करोति तद्वद्विज्ञानं स्वविकल्पैर्जडाशयः ॥'४
'ज्ञानसंबोध' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही
आत्म शक्ति से संचालित होते हैं तथापि एक स्वतन्त्र है और द्वितीय परतन्त्र है ।
शुद्धबोध पुरुष विषम स्थल में भी साक्षी की भाँति स्वतन्त्र रहता है । मन्दबोध पुरुष
अंधे के समान समस्थल में भी परतन्त्र होता है—५
यद्यपि स्वात्मशक्त्यैव गतिः साक्ष्यनयोर्द्वयोः ।
तथाप्येकः स्वयं याति द्वितीयोऽन्येन नीयते ॥
साक्षिवत् स्फीतबोधानां स्वातन्त्र्यं विषमेष्वपि ।
अंधवन्मन्दबुद्धीनां पारतन्त्र्यं समेष्वपि ॥६
'अप्रबुद्ध' = पारमेश्वर परानुग्रह से शून्य । अज्ञानात्मक बुद्धि वाले हैं । ये
गुणदिस्पन्द निष्यन्द ऐसे अप्रबुद्ध लोगों को घोर (विभीषिकाशतसंकुल एवं दारुण) एवं
दुरुत्तार (दुस्तीर्ण = दुर्लंघ्य) संसारवर्त्म (जन्ममरणादि प्रबन्ध मार्ग) में अनवरत रूप से
भटकाते रहते हैं—अधःपतित करते रहते हैं ।
ये कैसे हैं? 'स्वस्थितिस्यगनोद्यताः ।।'
स्व (परमात्मा) में सामान्यस्पन्द मात्र कर्म में स्थिति अर्थात् निर्विकल्प प्रतिपत्ति से
उत्पन्न सुस्थिर प्रतिष्ठा वाले । 'उद्यताः' = प्रतिपक्षभूत प्रबोध के उदित न होने के कारण
विशेषस्पन्द में प्रसरणशील ॥
अप्रबुद्ध लोगों में सर्वकर्तृत्वादि लक्षण वाले सामान्यस्पन्द रूप महिमा रहते हुए
भी समस्त कार्यों में परतन्त्र, अनात्मक देहादि को अपनी आत्मा समझने वाले, लब्ध-
प्रसर, — 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, – आदि गुणप्रधान प्रत्यय प्रवाह वाले ये लोग संस-
रणमार्गोपेत नश्वर संसार प्राप्त करते हैं । इस उपदेश के विषय केवल प्रबुद्ध है अप्रबुद्ध
नहीं । ये कभी भीतर विश्राम नहीं कर पाते । कहा भी गया है—७
१. स्पन्दनिर्णय । २-६. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
७. स्पन्दकारिकाविवृति : रामकण्ठाचार्य ।

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प्रथमः निष्यन्दः २३१
ज्ञेयत्वमप्युपगता हृदये न रोढुं, शक्ताः प्रमूढ़ मन मनसामुपदेश वाचः ।
आर्द्रत्वमादधति किं नलिनीदलानां, श्लिष्टाः निरन्तरतयापि नभोऽम्बुधाराः ॥
विशेष स्पन्द और उसकी भूमिका—
'विशेष स्पन्द' सामान्य स्पन्द के विपरीत व्यष्टिगत होते हैं और विशिष्ट धर्म
विशिष्ट लक्षण एवं विशिष्ट वैलक्षण्यों से युक्त होते हैं। इनका एक विशेष स्वभाव यह है
कि ये प्रत्येक क्षण पशुओं की चिन्मात्र आत्मसत्ता के ऊपर आवरण डालने में व्यापृत
रहते हैं।
भट्टकल्लट ने 'स्पन्दसर्वस्व' में इसके स्वरूप पर प्रकाश डालते हुआ कहा
है—'स्वल्पप्रबोधांस्तु स्वस्थितेः चिद्रूपायाः स्थगनं कृत्वा, ते गुणाः पातयन्ति दुरुत्तारे
अस्मिन् विषमे संसारवर्त्मनि, यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति, न तु शुद्धबुद्ध-
स्वरूपतया ॥'१
सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण आदि गुणों में प्रवहमान विशेष स्पन्द प्रति काल खण्ड
चिन्मात्र आत्मस्वरूप पर आवरण डालने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं। परिणाम
यह होता है कि दुस्तर संसार के मार्ग पर पशुओं को चलाकर ये 'विशेष स्पन्द' उनका
अधःपतन करते रहते हैं 'विषयेष्वेव संलीनानधोधः पातयन्त्यणून् । रुद्राणून् याः
समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥ (मा०वि०)
अप्रबुद्ध = स्वप्न प्रबुद्ध ॥ स्वस्थितेः = चिद्रूप आत्मा का स्थगनोद्यता =
स्थगन करने के लिए प्रयत्नशील । ते (गुणाः) पातयन्ति = वे गुण अधःपतित कर देते
हैं । दुरुत्तार = दुस्तर । घोर = भयानक । भट्ट कल्लट—'क्योंकि पशुगण सारी
सत्ताओं एवं भावों को गुणान्वित ही देखते हैं। आत्मा को भी तदात्मक देखते हैं न कि
उसे शुद्ध बुद्ध स्वरूप की दृष्टि से ॥'
(१) 'शक्ति' बहिर्मुखी प्रसार करने की स्थिति में सदैव चिदात्मा पर आवरण
डाल-कर उसके स्वरूप को छिपाना एवं अंधकारावृत रखना चाहती है।
(२) बाह्योन्मुख स्पन्द-प्रवाह पंच कंचुक, देह, पंचभूत, विषय, आदि के
आवरणों के रूप में प्रकट होकर चिदात्मा के चतुर्दिक ऐसा आवरण डाल देता है कि
पशु आत्मस्वरूप को विस्मृत करके अनात्मा में आत्माभिमान करने लगता है। यही
बाह्योन्मुखी शक्ति सुख, दुःख, शोक, मोह, क्रोध, ममत्व आदि के रूप में रूपान्तरित
होकर इन सारी वृत्तियों से पशुओं की आत्मा को क्षुब्ध करती रहती है। पशुओं की यही
अधोगति 'शक्ति दारिद्र्य' कहलाती है। इस स्तर पर ज्ञान-क्रिया-विभुता-इच्छा-तुष्टि
आदि सभी की असीमता ससीमता (या संकोच) में परिवर्तित हो जाती है। पशु सर्वज्ञ से
अल्पज्ञ, सर्वकर्ता से अल्पकर्ता, सर्व व्यापक से किंचिद् व्याप्त एवं स्वतन्त्र से परतन्त्र
बन जाता है। परम शुद्ध चिदात्मा शिव पराधीनता के पथ का पथिक बन जाता है।
'अवरोहण' की यह अधोगामिनी क्रीड़ा पशुपति को पशु बना देती है।
१. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व'।

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२३२ स्पन्दकारिका
अवरोहण की पतनोन्मुख प्रक्रिया—
स्पन्दनात्मिका चित् शक्ति का अशुद्धाध्व (माया से पृथ्वी तत्त्व) के मार्ग पर चल
कर 'माया' का रूप धारण करना चिन्मात्र (शिवांश) आत्मा की चिन्मात्रता को ढककर
उसे शिवभाव से पृथक् कर देना—चित, आनन्द-इच्छा-ज्ञान-क्रिया को कला, विद्या,
राग, काल, नियति (पञ्चकञ्चुक) के मार्ग पर यात्रा कराना—सर्वकर्तृत्व को अल्पकर्तृत्व,
सर्वज्ञत्व को अल्पज्ञत्व, संतृप्ति से अतृप्ति, नित्यत्व को अनित्यत्व, व्यापकता को
अव्यापकता में रूपान्तरित करना एवं आणव मल, मायीय मल एवं कार्ममल को
आविर्भूत करके स्वतन्त्र शिव को पराधीन पशु बना देना—आदि के द्वारा अवरोहण
प्रक्रिया निष्पादित होती है। 'लोलिका' (निष्कर्म अभिलाषा, अस्पष्ट आकांक्षा) क्षोभ
उत्पन्न करके स्थूल अभिलाषा को जन्म देकर (राग तत्त्व के) उत्पाद के रूप में देता है।
यही राग सारे बन्धनों का कारण है।
जाग्रत् अवस्था में भी स्पन्दतत्त्वाभिव्यक्ति के उपयोगी उपाय—
अतः सततमुद्युक्तः स्पन्द तत्त्व विविक्तये ।
जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥ २१ ॥
इसलिए (पूर्वोक्त कारणों से) स्पन्दतत्त्व स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए निरन्तर
प्रयत्नरत (योगी) जाग्रत अवस्था में ही अपने भाव (स्पन्द तत्त्व) को शीघ्रता पूर्वक प्राप्त
कर लेता है ॥ २१ ॥

  • सरोजिनी *
    जो साधक स्पन्दात्मक पर संवित् को अधिगत करने की आकांक्षा रखते हों उन्हें
    चाहिए कि वे स्पन्द तत्त्व की स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। 'शिव-
    सूत्र' (२.२) में—'प्रयत्नः साधकः' कहकर भी इसी तथ्य को प्रतिपादित किया गया है।
    प्रतिक्षण सङ्कल्पविकल्पात्मक चित्त को आन्तर अनुसंधित्सा (गवेषणा) अर्थात्
    सद्विमर्श—की शक्ति के द्वारा सामान्य स्पन्दस्वरूप, विकल्प शून्य परसंवित् पर तत्त्व में
    विलीन करने का अकृतिक (अकृत्रिम) प्रयास ही 'प्रयत्न' है आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्र-
    विमर्शिनी' (२।२) में कहते हैं—
    (१) मन्त्रस्य अनुसंधित्सा प्रथमोन्मेषावष्टम्भप्रयतनात्मा अकृतिको यः प्रयत्नः स एव
    साधकों (मन्त्रयितुर्मंत्रदेवता तादात्म्यप्रदः)।
    (२) अकृतिकनिजोद्योग बलेन योगीन्द्रो मनः कर्मबिन्दुं विकर्षयेत् परप्रकाशात्मतां
    प्रापयेत्। 'प्रयत्नोऽन्तः स्वरंभः स एव खलु साधकः। यतो मन्त्रयितुर्मन्त्रदेवतैक्यप्रदः
    स्मृतः ॥ (वार्तिक)—शिवसूत्रवार्तिक ।
    इस श्लोक में अज्ञानी के संसार से पार होने की युक्ति को इस प्रकार समझाया
    गया है—
    'अतः जबकि जाग्रत् अवस्था में भी कोई साधक जो कि स्पंद तत्त्व के सुस्पष्ट
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प्रथमः निष्यन्दः २३३
साक्षात्कार के लिए सदा प्रस्तुत रहता है । (तब) वह बहुत शीघ्र ही अपने यथार्थस्वरूप
का साक्षात्कार कर लेता है ।'१
अतः = इसलिए ।
सततमुद्युक्तः = लगातार प्रयत्नरत ॥
विविक्तये = विमर्शन के लिए । स्वरूपाभिव्यक्ति हेतु ।
जाग्रदेव = जागृत् अवस्था में ही ।
निजंभावं = आत्मीयशङ्करात्मकस्वस्वभाव को ।
अधिगच्छति = प्राप्त कर लेता है ।२
जो योगी अबाधित रूप में अहर्निश सदैव अंतर्मुखस्वरूप एवं निभालनप्रवण
रहता है—'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते' (१२।२)—ऐसा योगी अपने
आत्मीय शङ्करात्मक स्वस्वभाव को बहुत शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है । तथा उसकी
शङ्करात्मा आन्तर स्वभाव स्वयं उन्मज्जित होता है जिससे कि नित्योदित समावेश को
प्राप्त करने से सुप्रबुद्ध या 'जीवन्मुक्त' हो जाता है ।३
स्पन्द के निष्यन्द अज्ञानी को सर्वदा पतित बनाने हेतु उद्यत रहते हैं । अतः अपने
विकस्वर स्वभाव से स्पन्दतत्त्व का विवेक करने हेतु सदैव उद्योग करते रहना चाहिए ।
इसीसे स्वरूप की अभिव्यक्ति होती है । वस्तुतः अपना स्वरूप उद्योक्ता है, विकस्वर
है—शिव है । शिवसूत्रों में 'उद्योग' को शिव कहा गया है—'उद्योगः शिवः' । अतः
जाग्रतावस्था अर्थात्—व्युत्थानावस्था में शीघ्र से शीघ्र उसे अपने स्वरूप का अधिगम हो
जाता है । जो लगा रहता है; वह जागता रहता है । इसका विवेचन इस प्रकार है ४—'मैं
हूँ शुद्धबोधैकस्वरूपा यह जगत् मेरा विस्तार है, विलास है, जुंभा है, मुस्कान है । यह
सब मेरा वैभव है ।'—ऐसा ज्ञान हो जाने पर वह विश्वात्मा हो जाता है और विकल्पों के
विस्तार में भी वह महेश्वर ही रहता है ।'—
'सर्वो ममायं विभव इत्येवं परिजानतः ।
विश्वात्मनो विकल्पानां प्रसरेऽपि महेशता ॥'५
'पञ्चरात्र' में भी कहा गया है—जब आत्मा में समस्त भूतों को देखता है और
अपने को उनमें देखता है तथा अपने को तब उनसे पृथक् देखता है तब जनम-मरण से
मुक्त हो जाता है—
'यदात्मनि सर्वभूतानि पश्यत्यात्मानं च तेषु पृथक्च तेभ्यस्तदा मृत्योर्मुच्यते
जन्मनश्च' ।
अन्यत्र भी कहा गया है—तुम निर्मल, अनन्त एवं एकमात्र बोधस्वरूप हो ।
भव्यबुद्धि सावधान पुरुष तुम्हें ज्ञाता और ज्ञेय दोनों में ही देख लेता है ॥'—६
'निर्मलानन्त्य बोधैकरूपत्वं भव्यबुद्धिभिः ।
वेद्याद्वा वेदकाद्वापि लभ्यसेऽवहितात्मभिः ॥'
१-३. स्पन्दनिर्णय । ४-६. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

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२३४ स्पन्दकारिका
'तत्वार्थचिन्तामणि' में भी कहा गया है कि—विवेक के द्वारा विशाल मोहान्धकार
का विदलन हो जाने पर योगी के स्वरूप का उदय हो जाता है । अनात्मभाव का
तिरस्कार हो जाने के कारण वह प्रत्येक दशा में अपने परमानन्दस्वरूप में मग्न रहता है ।
वह द्रष्टा-दृश्य के विवेक का रहस्य समझ गया । संसार का ऐसा कोई क्ष्मा करण या
कोण नहीं है जहाँ वह नहीं है भवरोग मिट गया । उसके व्युत्थान में भी समाधि है ।
सच्ची मोक्षलक्ष्मी तो उसकी आत्मजा है—१
इत्थं तत्तदनल्पमोहदलनप्राप्तस्वरूपोदयो,
योगी नित्यमनात्मभावविरहात् स्वात्मस्थितो निर्वृतः ।
दृश्य द्रष्टृ विवेकविद्धवपदव्यापी विमुक्तामयो,
व्युत्थानेऽपि समाधिभागभवति सन्मोक्षश्रियः कारणम् ॥
अब ग्रन्थकार, 'ज्ञान ज्ञेय .... चिन्मयः' कारिका में प्रबुद्ध योगी के लिए उपक्रान्त
उपदेश्यत्व की पुष्टि करके अगली तीन कारिकाओं में अप्रबुद्धों के प्रतिषेध के विषय में
कह रहा है ।'
'अतः ...... अधिगच्छति ॥'—
अतः = इसलिए । प्रस्तुत व्याख्यान में श्लोकत्रय में निर्दिष्ट होने के कारण
जाग्रदेव = जागते हुए ही । अर्थात् प्रबुद्ध ही ।
निजं भावं = आत्मीय पारमार्थिकी सत्ता ॥ अचिरेण = शीघ्र ही । अल्पीयस
काल में । अधिगच्छति = सम्यक् रूप में उपलब्धि के द्वारा स्वीकृत करता है । (एव-
कारेणाप्रबुद्धं व्यवच्छिनत्ति) ॥ कैसा होकर स्वीकार करता है—'स्पन्दतत्त्वविविक्तये
सततमुद्युक्तः ॥'
स्पन्दस्य = स्पन्द का ॥ पर शाक्ततत्त्व का, उपचरित सामान्य विशेषात्मक रूप
से दो प्रकार से व्याख्यास्यमान तत्त्व का । वह तत्त्व परमार्थ है और उपादेय एवं हेय के
रूप में उसका रूप निश्चित है । विविक्तये = विवेक अर्थात् पृथक्करण के लिए ।२
परमकारणभूत, आत्मस्वरूप सत्य का—'यह मैं हूँ' ('अयमहमस्मि') अतः यहीं
सब कुछ उत्पन्न होता है एवं यहीं सब कुछ विलीन हो जाता है—इस प्रकार का प्रत्यव-
मर्शात्मक निज धर्म सामान्यस्पन्द है—'अयमहमस्मि, अतः सर्वं प्रभवति, अत्रैव च
प्रलीयते—इति प्रत्यवमर्शात्मिको निजो धर्मः सामान्यस्पन्दः' । विशेष स्पन्द क्या हैं?
विशेषस्पन्द के लक्षण (१) ये अत्यन्त हेय हैं (२) ये अनात्मभूत देहादिक पदार्थों में
आत्माभिमान की उद्भावना करते हैं । (३) ये आपस में भिन्न-भिन्न मायीय प्रमाताओं के
भिन्न-भिन्न विषय हैं—यथा—मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ । (४) ये गुणमय प्रत्यय-प्रवाह
संसरण के मूल कारण हैं । 'अत्यन्त हेया विशेषस्पन्दा अनात्मभूतेषु देहादिषु आत्मा-
भिमानमुद्भावयन्तः परस्परभिन्न मायीय प्रमातृविषयाः—सुखितोऽहं, दुखितोऽहं—इत्यादयो
गुणमयाः प्रत्यय प्रवाहाः संसारहेतवः ॥'
१. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' । २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।

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प्रथमः निष्यन्दः २३५
'सततं' = लगातार। सभी अवस्थाओं में बिना किसी भी व्यवधान के। 'उद्युक्तः'
= 'वक्ष्यमाणोपपत्तिलब्ध्युपाय प्रतिपत्यभिव्यज्यमान स्वबलबृंहणत्वात् अव्याहोत्साहमध्य
वसितः'। अत्यन्त उत्साहपूर्वक अध्यवसायानिरत॥ इससे यह सिद्ध होता है कि प्रबुद्ध
ही उपायों का परिशीलन करने में एकतान बनकर शीघ्र ही अपने स्वस्वरूप की उपलब्धि
कर लेते हैं अन्य नहीं।१
आत्मोद्धार हेतु स्पन्द शक्ति के साक्षात्कार हेतु नियमित अध्यवसाय—
भट्टकल्लट 'स्पन्द सर्वस्व' में कहते हैं—'अतः सततं सर्वकालं यः करोत्युद्योगं स्पन्द-
तत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थं स जाग्रदवस्थायामेव निजमात्मीयं, तुर्यभोगाख्यं स्वभावं
अचिरेणैव कालेन प्राप्नोति ॥२
जो प्रबुद्धभूमिकारूढ़ योगी स्पन्दतत्त्व को अपने में अभिव्यक्त करने हेतु निरन्तर
अक्लान्त अध्यवसाय करता रहता है उसको जाग्रत् अवस्था में ही अपने चिन्मात्रभाव की
सम्प्राप्ति स्वल्पावधि में ही हो जाती है। ऐसा साधक अपने स्वगत भाव (तुर्य-
चमत्कारमय स्पन्द तत्त्व) का अनुभव शीघ्र प्राप्त कर लेता है।
उद्योग एवं प्रयत्न—'अतः सततमुद्युक्तः' यहाँ 'उद्योग' का क्या अर्थ है?
'शिवसूत्र' में 'प्रयत्नः साधकः' (२.२) कहकर जिस 'प्रयत्न' शब्द का जो अर्थ लिया
गया है वही पारिभाषिक अर्थ यहाँ 'उद्योग' का भी है।
स्पन्द का बहिर्मुखी (विश्वोन्मुख) एवं गुणादि रूपों में जो विराट् प्रवाह है—जो
विश्वोन्मुखी प्रसरण है वही 'चित्त' कहलाता है। इसे चित्त इसलिए कहते हैं क्योंकि यह
मनन धर्मा है—'चेत्यते विमृश्यते अनेन परं तत्त्वं इति चित्तं, पूर्णस्फुरत्ता सतत्त्वप्रासाद-
प्रणवादिविमर् parse: प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्, तदेव मंत्र्यते गुप्तम् अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम्
अनेन, इति मन्त्रः ॥ अतएव च परस्फुरतात्मकमननधर्मात्मता, भेदमयसंसारप्रशमनात्मक
त्राणधर्मता च अस्य निरुच्यते ॥' (शि०सू०वि० २।१)
'चित्तं मन्त्रः' (२।१) के बाद दूसरा सूत्र 'प्रयत्नः साधकः' (२।२)—शाक्तोपाय-
विवेचन के संदर्भ में लिखा गया है। दोनों शब्दों की विवेचना प्रासंगिक है।
'चित्त' के द्वारा ही परम तत्त्व का चिन्तन किया जाता है। मननधर्मा होने के
कारण ही मन्त्र का 'मन्त्र' नाम पड़ा है। मन्त्र का मनन चित्त द्वारा किया जाता है।
चित्त में प्रतिक्षण संकल्प-विकल्प की तरंगें उठती एवं बैठती रहती हैं। चित्त एक
सरोवर है और संकल्प-विकल्प उसकी तरंगें है। चित्त-सरोवर में समुत्थित इन्हीं अ-
निवार्य तरंगों को या संकल्पविकल्पस्वरूप 'चित्त' को (अन्तरोन्मुखी होकर) सद्धिमर्श की
शक्ति के माध्यम से सामान्य स्पन्द स्वरूप (विकल्पशून्य) पर संवित् में संलीन करने का
प्रयत्न या उद्योग किया जाता है। शाक्त स्वरूप की अभिव्यक्ति आत्मस्वरूप की प्रत्य-
भिज्ञा—मन्त्रवीर्य की अनुभव-प्राप्ति—पूर्णाहन्तास्वरूप 'वीर्य' का संवेदन—इसी 'प्रयत्न'
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
२. भट्टकल्लट : स्पन्दसन्दोह (स्पन्दकारिकावृत्ति) २१।

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२३६ स्पन्दकारिका
या 'उद्योग' के मार्ग से सम्भव हो पाता है। कारिकाकार 'उद्योग' की अखण्ड निरन्तरता
का उपदेश दे रहे हैं। सारांश यह कि—त्रिगुणात्मक चित्त में विस्फुरित सङ्कल्प-विकल्प
की व्यष्टिभूता भाव तरंगों को विकल्प शून्य परसंवित्त्व में स्वाभाविक (सहज =
अकृत्रिम) रूप से लय करने का अभिधान है—'उद्योग' (प्रयत्न) ॥
विकल्प बन्धन के कारण हैं—अभिनवगुप्ताचार्य की दृष्टि—अभिनवगुप्त
कहते हैं कि (१) मन्त्र (२) आत्म (३) द्रव्य (४) भूत (५) दिव्य (६) तत्त्व नामक ६
प्रकार की शङ्कायें विकल्पों को उत्पन्न करती हैं। इनका नाश भी ज्ञान से हो जाता है।
विकल्पों का नाश 'ज्ञान' से होता है। विकल्पों के नाश से ही निर्विकल्पात्म संविद् में
विश्रान्ति प्राप्त होती है। विकल्पों से शङ्काओं का जन्म होता है। विकल्पोत्पन्न शङ्काओं
के अतिरिक्त अन्य कोई बन्धन नहीं है। मन्त्र शङ्का, आत्म शङ्का, द्रव्य शङ्का, भूत
शङ्का, दिव्य कर्म शङ्का—ये ५ शङ्कायें हैं। ये जीवों को बन्धन में डालने वाले हैं।
'तत्त्वशङ्का' या 'पराशङ्का' भी है अतः—
'शङ्का विकल्पमूला हि शाम्येत्स्वप्रत्ययादिति ॥'¹
(१) विकल्पार्णवतारकत्वात्स्वोपलब्धि स्वत उद्भूतं ज्ञानं मुख्यं।
(२) विकल्पमूला मन्त्रादिविषया षोढा शङ्का शाम्येत् विकल्प स्वात्म संविद्विश्रान्तो
भवेत् ॥'
अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं—
(१) प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात् संस्कारमञ्जसा ॥ (तं० ४.३)
(२) विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्वात्मसंस्कृतम् ।
स्वतुल्यं सोऽपि सोऽप्यन्यं सोऽप्यन्यं सदृशात्मकम् ॥ (तं० ३.३)
(३) विकल्पक्षीणचित्तस्तु परमाद्वैतभावितः ।
मुच्यते नात्र सन्देह इति सत्यं ब्रवीमि ते ॥
(४) विकल्पाज्जायते शङ्का सा शङ्का बन्धरूपिणी ।
बन्धोन्यो न हि विद्येत ऋते शङ्कां विकल्पजाम् ॥
(५) त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानमात्मा शास्त्रं गुरोर्मुखम् ।
प्राधान्यात्स्वोपलब्धिः स्वाद्विकल्पार्णवतारिणीम् ॥
अभिनवगुप्तपादाचार्य एवं अन्य शैव आचार्य इन उपर्युक्त कथनों के माध्यम से
यह सिद्धान्त निरूपित करते हैं कि—
१) 'चित्त' विकल्पमूलक है।
२) विकल्प बन्धनप्रद है।
३) विकल्प-शोधन से 'उद्योग' में साकल्य मिलता है।
१. तन्त्रालोक (१३।१९८) 'विवेक' (तन्त्रालोक की टीका : जयरथ) ।

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प्रथमः निष्यन्दः २३७
आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं आत्मिक अभ्युत्थान के लिए विकल्प-संस्कार की
विधि का प्रतिपादन अभिनवगुप्त की निजी दृष्टि है।
अभिनवगुप्त की विकल्प-संस्कार-प्रक्रिया—यदि साधक अपने विकल्पों का
संस्कार करे क्योंकि 'उद्योग' 'प्रयत्न' की मुख्य पद्धति यही है।
विकल्पों का संस्कार किया कैसे जाय?
१) संसारोन्मुख, भोगोन्मुख (कामिनी)-काञ्चन एवं अन्य ऐन्द्रिय उपभोगों के प्रति
सतृष्ण) प्रवाहित विकल्पों के मार्ग को परिवर्तित करना और
२) इस विकल्प-प्रवाह को स्वरूप-चिन्तन की दिशा में संलग्न करना—इन दोनों
प्रयासों से विकल्पों का संस्कार होता है और 'प्रयत्न' एवं 'उद्योग' का मुख्य कार्य है।
गुणादि स्पन्दों के निष्यन्द प्रत्येक क्षण आत्मा के यथार्थ स्वरूप पर आवरण
डालते रहते हैं—
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपंथिनः ॥'
'विकल्प' प्रत्येक कालखण्ड में मायिक उपलब्धियों एवं ऐन्द्रिय उपभोगों एवं
स्वार्थों के पूर्त्यर्थ प्रवृत्त रहता है। परिणाम—
कुत्सित विकल्प—कुत्सित संस्कार । सांसारिक विषयों की मूर्ति की तृष्णा—
चित्त को कभी भी स्थैर्य प्राप्त न होना । अहर्निश विकल्पसंस्कार, सत्परामर्श द्वारा
बाह्योन्मुखी प्रसार से विरति—चिद्रूप संवित् में एकनिष्ठ एकाग्रता प्राप्त करने का 'उद्योग'
(प्रयत्न)—चित्त में परिमार्जित (संस्कार युक्त) विकल्पोद्भव—असत् विकल्पों का ह्रास ।
संस्कृत विकल्प भी अन्ततः हैं तो विकल्प ही अतः उनका भी त्याग आवश्यक है।
विकल्प संस्कारों की अनेक भूमिकायें हैं यथा—
'चतुःष्वेव विकल्पेषु यः संस्कारः क्रमादसौ ।
अस्फुटः स्फुटताभावी प्रस्फुटन् स्फुटितात्मकः ॥'
विकल्प संस्कार की भूमियाँ
┌──────────┬──────────┬──────────┐
१ २ ३ ४
अस्फुट स्फुटतोन्मुख स्फुटता की पूर्ण प्रस्फुटित
और विकसित
अपनी चरमावस्था में पहुँचा विकल्पसंस्कार का यह स्तर असत् संस्कारों का ध्वंस
कर देता है।
ततः स्फुटतमोदार ताद्रूप्य परिबृंहिता ।
संविदभ्येति विमलाभे विकल्पस्वरूपताम् ॥ (तन्त्रालोक)

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२३८ स्पन्दकारिका
विकल्प अपनी संस्कारावस्था में चरम भूमि पर पहुंचने पर संविद्रूप बन जाते हैं या
स्वयं संवित् पारमार्थिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत हो जाता है । संस्कृत विकल्पों के
संस्कार—अन्य संस्कृत विकल्प । (इनका रूप शुद्धविद्या का ही अंश होता है—
‘शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः) = सद् ज्ञान या सतर्क के विकल्प ।। योग में ‘सतर्क’ को
योग का उच्चतर अंग स्वीकार किया गया है । ‘सतर्क’—तामसिक, राजसिक विकृतियों
का नाश ।—असत् तर्क का ध्वंस । विकल्पों को कितना भी संस्कृत क्यों न किया जाय
किन्तु उनका पारमार्थिक संस्कृत स्वरूप भी शिवत्व-प्राप्ति नहीं करा सकता ।
विकल्पसंस्कार और उद्योग—किसी भी विकल्प या विकल्पांश के रहते
चिदानन्द शिवत्व (चिन्मात्र शिवभाव) प्राप्त होना संभव नहीं है ।
पारमार्थिक एवं संस्कृततम विकल्पों से भी मुक्ति प्राप्त करना आवश्यक है । इन
सुसंस्कृत विकल्पों का भी तब तक पुनः परिमार्जन (परिष्कार, संस्कार) करना आवश्यक
है जब तक कि विशेष स्पन्द रूपान्तरित होकर सामान्य स्पन्द की अद्वैतात्मक भूमिका पर
आरूढ़ होकर निर्विकल्प आत्मसंवित् में विश्रान्ति न प्राप्त कर लें ।
‘चित्तं मन्त्रः’ की स्थिति ऐसी ही विकल्पशून्यावस्था का विकास भूमि है जहाँ चित्त
के साथ मन्त्रों की विमर्शात्मक तद्रूपता आने पर ‘चित्त’ ‘मन्त्र’ एवं ‘देवता’ तीनों में
तादात्म्य, एकरूपता या एकाकारता आ जाती है । विकल्प-संस्कार ही अपनी चरम भूमि
पर यात्रा कराते कराते साधक को ऐसे उच्चतम सिद्धि-शृंग पर पहुँचा देते हैं जहाँ योगी
का परिष्कृत चित्त ही ‘मन्त्र’ बन जाता है । मन्त्र में शक्ति का उदय होने के पूर्व तक या
स्पन्दात्मक शाक्त बल के उदय के पूर्व या मन्त्र एवं मननकर्ता के अहं की एकाकारता के
पूर्व तक ‘मन्त्र’ मन्त्र नहीं वर्ण मात्र रहते हैं और उनका जप केवल शब्दोच्चारण मात्र
रहता है—‘जप’ नहीं बन पाता ।
विविक्तये = स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए । निजं भावं = तुर्यभोगाख्यं स्वभावम् ।
जाग्रदेव = जाग्रत अवस्था में ही ।। सततं = सर्व काल = सदैव ।। भावं = अपना
चिदानन्द, चिन्मय, नित्यात्मक आत्मस्वरूप ।।
स्पन्दात्मक परसंवित् में प्रवेश करने हेतु ‘सततोद्योग’ एक प्रमुख साधक है ।
शिव सूत्र (१।५) ‘उद्यमो भैरवः’ में ‘उद्यम’ की जो व्याख्या की गई है—
‘योऽयं प्रसररूपाया विमर्शमय्याः संविदो झगिति उच्छलनात्मक पर प्रतिभोन्मज्जनरूप
उद्यमः स एव सर्वशक्तिसामरस्येन अशेषविश्वभरितत्वात् सकलकल्पनाकुलालं कवलनम-
त्वाच्च भैरवो भैरवात्मक स्वस्वरूपाभिव्यक्ति हेतुत्वात् भक्तिभाजाम् अन्तर्मुखैतत्तत्वाधान-
धनानां जायते । ... भावनं हि अन्तर्मुखोद्यन्तापद विमर्शनमेव ।।’ ‘परप्रतिभोन्मेषा-
वष्टम्भोपायिकां भैरवसमापत्तिम् अज्ञानबन्धप्रशमैक हेतुं ... प्रशान्तभेदावभासंभवति ।।’
(शि०वि० १।५)
‘भैरव’ का पर्याय ही है ‘उद्यम’ ।।—संवित् तत्त्व का उच्छलनात्मक पर प्रतिभो-
न्मज्जनरूप उद्यम । भैरव का अर्थ है—भैरवात्मकस्वस्वरूपाभिव्यक्ति ।

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प्रथमः निष्यन्दः २३९
'आत्मनो भैरवं रूपं भावयेद्यस्तु पूरुषः ।
तस्य मन्त्राः प्रसिध्यन्ति नित्ययुक्तस्य सुन्दरि ॥'
यही है बन्धन के प्रशमोपाय, उपेय विश्रान्ति—इसे ही कहा गया है—'उद्यमो
भैरवः ॥' (१।५)
स्पन्द का स्वरूप-लक्षण—
अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
अत्यन्त क्रोधाविष्ट होने पर, आनन्द के चरम सोपान पर आरूढ़ होने पर, 'मैं
क्या करूँ?' इस प्रकार की (किंकर्तव्यविमूढ़ता) अवस्था में पड़ने पर, (दौड़ने के लिए
विवश होने पर अकस्मात्) दौड़ पड़ने पर—(कोई भी व्यक्ति) जिस अवस्था में प्रवेश
करता है वही 'स्पन्द' तत्त्व उदित हो जाता है ॥ २२ ॥

  • सरोजिनी *
    'स्पन्द' के दो रूप हैं—(१) सामान्य स्पन्द (२) विशेष स्पंद ।
    'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' (१९)
    गुणादिस्पन्द—ये 'विशेष स्पन्द' कहलाते हैं और 'सामान्य स्पन्द' के आश्रित हैं।
    स्पन्दतत्त्व तो जाग्रत आदि भेदात्मक अवस्थाओं में भी व्याप्त रहता है—
    'जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति ॥' (३)
    'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्व विविक्तये ।
    जाग्रदेव निजं भावं न चिरेणाधिगच्छति ॥ (२१)
    अकस्मात् क्रोधावेश की चरमसीमा पर पहुंचने, विवशतावश अकस्मात् दौड़
    पड़ने, किंकर्तव्यविमूढ़ होने पर, व्यक्ति के भीतर शक्ति प्रत्यस्तमित दशा का प्राकट्य
    होता है और इन अवसरों पर स्पन्दतत्त्व जाग्रत् अवस्था में भी उदित हो उठता है—
    'तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे, प्रहृष्टे, धावमाने च 'किं करोमि' इत्येवं चिन्ताविष्टे यदा
    शक्ति प्रत्यस्तमयः तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥'
    (भट्टकल्लटः वृत्ति) ।
    जहाँ जब एवं जिस अवस्था में समस्त शक्तियों का लय हो जाता है और मन
    केवल अनन्य रूप से एक चित्त वृत्ति परायण हो जाता है उस अवस्था में आत्मस्वस्वरूप
    'स्पंद' स्पष्टतया स्थित रहता है यथा क्रोधावेश में, भयावेश में, प्रेमावेश में, हर्षावेश
    में । इसी भाव को सुस्पष्ट करता हुआ ग्रन्थकार कहता है—
    अत्यधिक क्रुद्ध या उत्तेजित है या अत्यधिक आह्लादित है या वह जो—'मैं क्या
    करूँ?'—इस प्रकार सोच रहा हो, या (इधर-उधर) दौड़ रहा हो—वह जिस पद
    (अवस्था) में जाता है (जिस भावभूमि पर आरूढ़ होता है) वहाँ 'स्पंदतत्त्व' प्रतिष्ठित
    रहता है ॥ २२ ॥
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२४० स्पन्दकारिका
अनन्य विषयक भावभूमि या एक चिन्ताप्रसक्त चिन्तन-भूमि ही 'स्पंद' है। योगी
लोग उपायमार्ग में अन्य सभी चित्तवृत्तियों का प्रशमन करके एकाग्र हुआ करते हैं और
अति क्रोध, अति हर्ष आदि कोई योगी तत्त्व विमर्शन हेतु तत्काल अंतर्मुखी हो जाता है
तो वह शीघ्र ही अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है किन्तु जो योगी नहीं है वे इस स्तर
पर भी मूढ ही रहते हैं।
कोई व्यक्ति दारुण उपघात या शत्रु-साक्षात्कार के कारण या मर्मस्पर्शी वचनबाण
से विद्ध होने के कारण उत्पन्न संजिहीर्षा या अत्यधिक उत्पन्न क्रोध या प्राणेशी के
मुखारविन्द को देखने के कारण अत्यन्त प्रसन्नता या किसी अत्याचारी से अपनी रक्षा
करने हेतु 'मैं क्या करूँ?' - इस प्रकार उत्पन्न चिन्ता, या किसी शिकार के पीछे धनुष
बाण लेकर दौड़ते समय अपने शरीर को भूल कर शिकार के ऊपर लगी दृष्टि के कारण
दौड़ते रहने या सिंह या अजगर आदि को देखकर उत्पन्न असीम भय के समय अन्य
समस्त वृत्तियों के नष्ट हो जाने पर उत्पन्न अत्यन्त भय की अवस्था में जिस मनोभूमि पर
आरूढ होता है वह स्पंद की ही भूमि है। इस अन्यवृत्तिक्षयात्मक पद पर जो आरूढ
होता है उस योगी की इस वृत्तिक्षयात्मक अवस्था विशेष में स्पन्दतत्त्व अवश्यमेव
प्रतिष्ठित रहता है— 'वृत्तिक्षयात्मके पदे अवस्था विशेषे स्पंदः प्रतिष्ठितः स्पंदतत्त्व
अभिमुखी-भूतमेव तिष्ठति ॥'१
अतः इस वृत्तिक्षयपक्ष को समझकर शीघ्र कूर्मांग सङ्कोच (जिस प्रकार कछुआ
अपने अंगों को अपने भीतर समेट लेता है) की भाँति क्रोधसंशय आदि वृत्तियों का
शमन करके महाविकास-व्याप्ति की युक्ति द्वारा अपनी स्पन्द शक्ति का विमर्शन करना
चाहिए। 'विज्ञानभैरव' में कहा भी गया है- २
कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे ।
बुद्धिं निस्तिभितां कृत्वा तत्त्वमावशिष्यते ॥ १०१ ॥
आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बाँधवेचिरात् ।
आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तल्लयस्तन्मना भवेत् ॥ ७१ ॥
क्षुताद्यन्ते भये शोके गह्वरे वारणद्रुते ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगः ॥ ११८ ॥३
द्वेष से अमश्र के उद्दीप्त होने पर अत्यन्त क्रुद्ध मनुष्य पहले जिस अवस्था पर
पहुँचता है उसकी चित्तवृत्ति जिस स्फार या उन्मुखता का स्पर्श करने लगती है, समागत
प्रिय व्यक्ति को देखने आदि से उत्पन्न हर्ष प्राप्त करके जिस परमानन्द की अनुभूति करता
है, अनेक कर्तव्यों के कल्लोल में फँसकर- 'यह करूँ या यह करूँ' - इस प्रकार का
परामर्श करके जब निश्चयकारिणी दशा पर पहुंचता है, अपनी प्रेयसी के आमंत्रित करने
या संभ्रमवश दौड़कर जिस अवस्था पर आरूढ़ होता है उसमें आत्मस्वभाव 'स्पन्द'
स्पष्टतया उपलब्ध होता है। ४
१-३. स्पन्दनिर्णय । ४. स्पन्दप्रदीपिका ।

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प्रथमः निष्यन्दः २४१
जब, जहाँ, जिस अवस्था में समस्त शक्तियों का लय हो जाता है वहाँ स्पन्दतत्त्व
का उदय दृष्टिगत होता है । इसका कारण यह है कि क्रोध से भरी सारी दुःखभूमियाँ
प्रकट हो जाती है और हर्षातिरेक से समस्त सुखभूमियाँ प्रकट हो जाती हैं ।१
'क्या करूँ' 'क्या न करूँ'—इन प्रश्नों के उपस्थित होने पर मोहजन्य समस्त
इन्द्रियवृत्तियाँ दौड़ने लगती हैं । इसीसे 'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि—'क्रोधादि के
अन्त में, भय में, शोक में, शून्य में, अरण्य में, किसी काम की प्रवृत्ति को एकाएक
रोक देने पर, घनघोर संग्राम में, कुतूहल में, क्षुधा-पिपासा का अन्त होने पर ब्रह्मसत्ता
सर्वथा निकट रहती है—किन्तु पहचानी नहीं जा पाती ।२
'रहस्यस्तोत्र' में कहा गया है—क्रोध एवं हर्ष की विवशता की पराकाष्ठा में,
कर्तव्याकर्तव्य के विमर्श में, एक भाव का स्पर्श होने से पूर्व जो दशा रहती है—वहाँ
'स्पन्द' अपने अन्दर बल का सञ्चार करता रहता है:—'क्रोधहर्षविवशः परां दशामाश्रि-
तोऽथ विमृशंश्च यः क्रियाम् । यत्स्पृशत्यनियतक्रियास्पदं स्पन्दमात्मबलदं वदन्ति ते ।
एषोऽन्यत्र त्रुटेः पातः प्रोक्तः सर्वज्ञतादिभाक्' ।
इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्रुटिमात्र काल में सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता का स्पर्श होने
लगता है । सुई से कमल की एक पंखुड़ी को छेदने में जितना समय लगता है—उसको
'त्रुटि' कहते हैं ।३
एक त्रुटि के लिए मनुष्य में 'सर्वज्ञता' सर्वकर्तृत्व एवं सर्वेश्वरत्व का उदय हो
जाता है ।
जहाँ-जहाँ, जब एवं जिसके द्वारा समस्त शक्तियों का लय हो जाता है वहाँ
स्पन्दतत्त्व का उदय स्पष्टतः दृष्टिगत होता है—४
यत्र यत्र यदा येन सर्वशक्तिलयो भवेत् ।
स्फुटः स्यात् स्पन्दतत्त्वस्य तत्र तत्र तदोदयः ॥
क्रोध से समस्तु दुःखभूमियों एवं हर्ष से समस्त सुखोत्पन्न भाव उत्पन्न होते हैं ।
क्या करूँ एवं क्या न करूँ—इससे मोहजन्य समस्त इन्द्रियों की समस्त वृत्तियाँ दौड़ने
लगती हैं—५
क्रोधाद् दुःखभुवः सर्वा हर्षात् सुखभुवः स्मृताः ।
किं करोमीति मोहोत्था धावन्तीन्द्रिय वृत्तयः ॥
'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि—क्रोधादि के अन्त में, भय में, शोक में,
एकान्त अरण्य में, कुतूहल आदि में ब्रह्मसत्ता सर्वथा निकट ही रहती है—
'क्रोधाद्यन्ते भये शोके, गह्वरे, वारणे रणे ।
कुतूहले, क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगा ॥'६
'स्पन्दतत्त्व' के दो भेद हैं—(१) 'सामान्य स्पन्द' (२) 'विशेष स्पन्द' ।

१-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४-६. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
स्पं० १६

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२४२ स्पन्दकारिका
(१) 'प्रतिष्ठित स्पन्द' (२) 'अप्रतिष्ठित स्पन्द'¹ जो उपादेय स्पन्द है वही
स्पन्द 'प्रतिष्ठित स्पन्द' है । 'उपादेयः प्रतिष्ठितः स्पन्दः ।।'
'अवस्था युगलं चात्र कार्य-कर्तृत्व शब्दितम् ।
कार्यताक्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ।।' (१४)
कारिका में स्पन्दतत्त्व की निम्न अवस्थायें बताई गई थी—
१. कार्य २. कर्ता; १. भोग्य २. भोक्ता; १. वेद्य २. वेदक ।
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' (का० १९)
द्वारा (१) 'सामान्य स्पन्द' एवं (२) 'विशेष स्पन्द' की ओर संकेतित किया
गया । 'सामान्य स्पन्द'—सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण, महत्, अहङ्कार आदि स्पन्द ।।
सामान्य स्पन्द के निष्यन्द (प्रवाह) सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगे । स्पन्दनिष्यन्द—
चित स्वरूप का आच्छादन ।। स्पन्द-निष्यन्द (अज्ञानियों को)—अधःपतिते करते हैं—
'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये ।।' (२१)
स्पन्दतत्त्व का 'विवेक'—स्वरूपाभिव्यक्ति । विवेक = 'मैं शुद्धबुद्ध मुक्त,
शुद्धबुद्धैकस्वरूप हूँ तथा मेरा ही विलास जगत् है, जगत् मेरी स्मृति है—जगत् मेरा
जृंभण है । मैं विश्वात्मा हूँ ।'
यत्पदं गच्छेत् = जिस पद को प्राप्त करता है । (गच्छेत् = उपलभ्यते ।) तत्र =
वहाँ ।। निर्दिश्यमान पद में उपलक्षणीय । तत्र = उसमें ('तस्मिन्') 'तस्मिन्' । कस्मिन्?
'यत् पदम् अति क्रुद्धो गच्छेत्' 'यत्पदं' = (यां भूमिकां) = जिस भूमिका को ।
गच्छेत् = मन से प्राप्त करता है (मनसा आसादयेत् ?) 'अतिप्रहृष्टो यत्पदं
गच्छेत्' 'किं करोमि इति यत्पदं गच्छेत्' 'अतिक्रुद्धो यत्पदं गच्छेत्' 'धावन्वा यत्पदं
गच्छेत्' संशयाविष्टो यत्पदं गच्छेत्, उत्सहमनो यत्पदं गच्छेत्, 'क्रुद्धः' = क्रोधित ।
क्रोध शब्द से उपलक्षित भाव—क्रोध, शोक, भय, जुगुप्सा भेद से चतुर्विधि ।
प्रहृष्ट—आनन्दित । प्रहृष्ट शब्द से उपलक्षित भाव—हर्ष, उत्साह विस्मय एवं
हास ।।२
सामान्य स्पंद तत्त्व—जो स्पन्द 'प्रतिष्ठित' (उपादेय) है वह अचलत्व का सूचक
है (अचल व्यपदेश हेतुः) । विशेष स्पन्द = सुखित्वादि अनित्य विशेष स्पन्द ।
प्रतिष्ठित स्पन्द = सुखित्वादि अनित्य विशेष स्पन्द के विषय नहीं हैं क्योंकि वे
अप्रकम्प (अविचल) हैं, स्वभावमात्राधार हैं । और मुख्य स्पन्द हैं—'सुखित्वाद्यनित्य-
विशेषस्पन्दाविषयत्वादप्रकम्पस्थितिः स्वभावमात्राधारः सामान्यरूपो मुख्यस्पन्दः ।।'
'मुख्य', 'उपादेय' एवं 'प्रतिष्ठित' स्पन्द = 'सामान्य स्पन्द'ः लक्षण—
(१) यह उपादेय है, मुख्य है एवं प्रतिष्ठित है ।
(२) सुखित्वादि अनित्य विशेषस्पन्दों का विषय नहीं है ।

१-२. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।

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प्रथमः निष्यन्दः २४३
(३) स्वभावमात्राधार है ।
(४) अचल है ।
(५) अविशिष्ट है—'सामान्य' है ।
(६) 'प्रत्यस्तमितसमस्तविशेषशक्तिचक्रपरमात्मधर्मः'—लक्षण वाला है । 'स्पन्द'
क्या है?
‘यत्पदं अतिक्रुद्धो गच्छेत्’ : ‘क्रोध’ = क्रोध, शोक, भय, जुगुप्सा । क्रोध
करते समय, शोक करते समय, भयभीत होते समय, घृणा करते समय मन की जो
विकारा-वस्था हुआ करती है—वह मानसिक अवस्था ही ‘स्पन्द’ है ।
प्रत्यग्रक्षत, दारुण उपद्रव, द्वेषी के अवलोकन आदि के समय मन की जो विशिष्ट
एकाग्रावस्था होती है और उससे तीव्रतर कोपाविष्ट व्यक्ति उससे आविर्भूत मानसिक
विकारावस्था के पूर्व शीघ्र ही क्रोधाविष्ट होकर मन की जिस अत्यन्त आवेगपूर्ण
भूमिका में प्रवेश कर जाता है; तथा मृत्यु के बाद भी जी उठने वाली प्राणप्रिय
प्रियतमा को जीवित देखने से उत्पन्न परमानन्द से आनन्दनिर्भर होकर (हर्षित, उत्साहित,
विस्मयाविष्ट एवं हास्यलीन होकर) व्यक्ति मन की जिस अत्यन्त आवेगपूर्ण एवं एकाग्र
भूमिका में प्रवेश कर जाता है, कोई व्यक्ति—
क्रोधित राजा शत्रु या किसी बलवान् व्यक्ति का प्रतीकार करने हेतु उद्यत होने पर
भी अनिश्चयात्मिका बुद्धि के कारण जो यह सोचने लगता है कि ‘अब मैं क्या करूँ
और क्या न करूँ?’ अर्थात् मैं इस समय किस उपाय का अवलम्बन ग्रहण करूँ?—
इस प्रकार प्रतिपत्तिमूढ़ एवं शङ्कावृत व्यक्ति उस समय जिस निरालम्ब चित्तवृत्ति या
एकनिष्ठ मनोभूमिका में प्रवेश करता जाता है—वहाँ पर ‘प्रतिष्ठितस्पन्द’ प्राप्त होता
है—‘तत्र प्रतिष्ठित स्पन्दोपलब्धिरित्यर्थः’ ।
इस प्रकार के प्रकार त्रय द्वारा दुःख, सुख एवं मोह को अपने विषय के रूप में
ग्रहण करके उससे उद्वेलित अन्तःकरण वाला होकर और तज्जन्म व्यापारों को स्वीकार
करके जाग्रत अवस्था में अनुभूत विषयों में एकनिष्ठचित्त होकर व्यक्ति जिस एकाग्र
मनोभूमि में प्रवेश करता है वही है—‘स्पन्द तत्त्व’ ॥
अत्यन्त क्रुद्ध होकर या अपने इष्टजन की अप्रत्याशित मृत्यु का समाचार सुनकर
अत्यन्त शोकाविष्ट होकर, या किसी अतिक्रुद्ध काले सर्प या क्रोधित व्याघ्र को देख
कर अत्यन्त भयभीत होकर, अत्यन्त जुगुप्सास्पद पदार्थ आदि को देखने के कारण
अत्यन्त घृणाक्रान्त होकर—व्यक्ति जिस विशिष्ट मनोभूमि में—(क्रोधातिशय, शोका-
तिशय, भुयातिशय, एवं जुगुप्सातिशय के कारण) प्रवेश करता है वहाँ भी प्रतिष्ठित
स्पन्द प्राप्त होता है ।
यहाँ जो क्रोध, शोक, भय एवं जुगुप्सा की अवस्थाओं का उल्लेख किया गया
उसका कारण यह है कि ‘क्रोध’ शब्द से यहाँ—क्रोध, शोक, भय एवं जगुप्सा चारों
मनोविकार उपलक्षित हैं ।१
१. ‘स्पन्दकारिकाविवृति’ (रामकण्ठाचार्य) ।

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२४४ स्पन्दकारिका
किसी अत्यन्त प्रसन्न उस व्यक्ति के समान जो कि अपनी शक्ति, अपने पराक्रम
एवं सम्पत्ति की संभावना को देखकर सुदुष्कर कार्यों को भी निष्पादित करने हेतु, अन्य
विकल्पों से शून्य होकर, अत्यन्त उत्साह से संवलित होकर जिस एकाग्र एवं एकनिष्ठ
मनोभूमि में पदार्पण करता है; या कोई व्यक्ति किसी अदृष्टपूर्व एवं परमरमणीय तथा
अत्याकर्षक पदार्थ को देखने आदि के कारण जिस एकाग्र एवं एकनिष्ठ मनोभूमि में
प्रविष्ट होता है, या चूहा या अन्य हास्यास्पद वस्तु को देखकर कोई व्यक्ति हास्यातिशय
की जिस एकनिष्ठ एवं एकाग्र मनोभूमि में पहुँचकर अन्य सब कुछ, भूल जाता है उस
मनोभूमि में भी 'प्रतिष्ठित स्पन्द' विद्यमान रहता है या उपलब्ध होता है।
इस व्याख्यान में जो—हर्ष, उत्साह, विस्मय एवं हास्य की मनोभूमियों का
उदाहरण दिया गया है उसका कारण यह है कि यहाँ 'हर्ष' शब्द से हर्ष, उत्साह, विस्मय
एवं हास्य ये चारों मनोभाव उपलक्षित हैं।
इसी प्रकार किसी वस्तु के दूर, अस्पष्ट, अग्राह्य, अश्राव्य आदि होने के कारण
कोई व्यक्ति उस पदार्थ के विषय में निश्चित अवधारणा न बना सकने के कारण
किंकर्तव्यविमूढ़ व्यक्ति के समान संशय से घिरकर जिस संशयाविष्टावस्था में उपनीत
होता है और वहाँ एकाग्र हो जाता है—वहाँ भी प्रतिष्ठित स्पन्द की विद्यमानता रहती है।
'धावन्वा यत्पदं गच्छेत्'—'तत्र' = (उस पद में भी 'प्रतिष्ठित स्पन्द, विद्यमान
रहता है) 'तत्र' = वहाँ भी = उस पद में भी ।।
(जीवन बचाने के लिए) दौड़ता हुआ व्यक्ति संसार की सारी वस्तुओं एवं सारी
आकांक्षाओं एवं एषणाओं से मुक्त होकर केवल सुदूर या रक्षित स्थान की ओर ही सारा
ध्यान केन्द्रित रखकर भागता है, (या दौड़—प्रतियोगिता में एक धावक अपनी समस्त
चेतना दौड़ने की क्रिया में ही लय कर देता है)—इस क्रिया में दौड़ने वाले की जो
लक्ष्यैककेन्द्रित मनोभूमि होती है—वहाँ भी 'प्रतिष्ठित स्पन्द' विद्यमान रहता है। इस
मनोभूमि में भी—इच्छा-प्रयत्न-ज्ञान-क्रिया आदि वृत्तियों का पृथक्-पृथक् (विभाग द्वारा)
ग्रहण नहीं होता प्रत्युत् अद्वय ईश्वर रूप की ही अभिव्यक्ति होती है।
जब व्यक्ति दौड़ता है तो पैर उठाने, पैर रखने एवं पुनः पैर उठाने-रखने में जो
भिन्न-भिन्न क्रियाओं का भेद (अन्तर) है उसका दौड़ने वाले को ज्ञान नहीं होता वाणी
आदि कर्मेन्द्रियों के व्यवहार में भी यही स्थिति है।
अत्यन्त कुशलतापूर्वक वर्ण एवं स्वरोच्चारण में व्यग्र वाग्वृत्ति वाला एकाग्र व्यक्ति
भी जिस पद को प्राप्त करता है, वीणा-वेणु वादन आदि में त्वरिततर व्यापारार्यमाण
करांगुलि-कलाप जिस पद में प्रविष्ट होता है—वहाँ भी प्रतिष्ठित स्पन्द प्राप्त होता है।
'धावन' शब्द समस्त कर्मेन्द्रिय व्यापारों का उपलक्षक है। अतिक्रुद्ध, अतिभीत,
अतिविस्मयाविष्ट, अतिसंशय ग्रस्त, अतिवादैकनिष्ठ व्यक्तियों की एकाग्र मनोभूमियों को
कारिकाकार ने 'उपाय' के रूप में गृहीत किया है। ये मनोभूमियाँ प्रबुद्धों के लिए
प्रत्यवमृश्यमाण तो हैं और प्रतिष्ठित स्पन्द पाने के उपाय भी हैं फिर भी ये प्रबुद्धों के

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प्रथमः निष्यन्दः २४५
लिए अनुभूयमान नहीं है क्योंकि ये दुःखादिमूलक हैं अतः प्रबुद्ध व्यक्ति इससे मुक्त
होकर उपदेश की शक्ति के कारण आत्मस्वरूप के विवेचन में सक्षम प्रज्ञातिशय द्वारा
स्पन्द तत्त्व का अनुभव करते हैं ।१
मायाशक्ति द्वारा उद्भावित भेदावभास की शक्ति से उल्लसित (भेद भरी)
अनेकताओं द्वारा अनन्त ज्ञान एवं क्रियाओं द्वारा व्यवधीयमान के समान यह 'प्रतिष्ठित
स्पन्द' प्रबुद्ध साधकों को भी उपलब्धि गोचर नहीं । यद्यपि यह भी सत्य है कि समस्त
प्राणी समस्त अवस्थाओं में, नित्योदित प्रतिष्ठित स्पन्द प्रकाश से परिस्फुरित समापत्ति
का, उन्मेष करने में समर्थ है किन्तु माया शक्ति से उद्भावित भेदावभासजन्य नानात्व के
उल्लास से व्यवधीयमान प्रतिष्ठित स्पन्द उपलब्ध नहीं हो पाता ।२
जागृति अवस्था में स्पन्दतत्त्व की अनुभूति—
अत्यधिक क्रुद्ध या अत्यधिक हर्षित होने पर या अकस्मात् दौड़ पड़ने पर और
किंकर्तव्यविमूढ़ होने (मैं क्या करूँ?' की स्थिति में अवस्थित होने) पर जब व्यक्ति के
अन्तःकरण में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उन्मेष होता है तब उस क्षणिक एकाग्रता की
अवस्था में स्पन्द तत्त्व का स्पष्टतः उदय होता है और इसकी अनुभूति गुरूपदेश से प्राप्त
होता है ।
भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—
‘तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि, इत्येवं चिन्ताविष्टे
यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः, तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥’३
सहसा क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ या हर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ
या किसी तर्कशून्य कारणों से—‘मैं क्या करूँ?’—इस प्रकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता की
अवस्था में पड़ा हुआ या अकस्मात दौड़ पड़ने के लिए विवश व्यक्ति जिस विशिष्टा-
वस्था में प्रविष्ट हो जाता है उसी में प्रतिष्ठित स्पन्द तत्त्व की उपलब्धि हो जाती है ।
शक्तिप्रत्यस्तमित दशा—दैनिक जीवन में कभी कभी ऐसे विशिष्ट क्षण आते हैं
जब कि मनोभावों के रूप में प्रवाहित विशिष्ट स्पन्द-प्रवाह किसी विशिष्ट स्थिति के आ
जाने से अकस्मात् तत्काल रुक जाते हैं । बाह्य प्रसृत स्पन्द-प्रवाहों का यह गति-निरोध या
यह गतिनिरोधात्मक अवस्था को ही 'वृत्तिक्षयावस्था' 'निस्तिमितबुद्धिदशा' या 'शक्तिप्रत्य-
स्तमित दशा' कहते हैं । ‘शक्तिप्रत्यस्तमितदशा' के क्षणों में शक्ति की प्रवह्मानता अवरुद्ध
नहीं होती प्रत्युत् बाह्योन्मुख प्रवाह अकस्मात् अपने मार्ग की दिशा परिवर्तित करके
क्षणभर के लिए अन्तर्मुखी हो जाता है और विद्युत के समान तीव्र गति से गतिमान होकर
सामान्य स्पन्द से एकाकार होकर फिर विशेष स्पन्द रूप से प्रवाहित हो जाता है ।
जागृतावस्था में सामान्य स्पन्दतत्त्व की अनुभूति 'शक्तिप्रत्यस्तमित' क्षणों में ही
१-२. रामकण्ठाचार्य : ‘स्पन्दकारिकाविवृति' ।
३. भट्टकल्लट : ‘स्पन्दसर्वस्व' ।

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२४६ स्पन्दकारिका
संभव है। क्योंकि इन विशिष्ट क्षणों में विशेष स्पन्दों का क्षोभ पूर्णतः शान्त हो जाता है।
जब किसी व्यक्ति के मन में क्रोध, हर्ष, भय या अन्य कोई विशिष्ट मनःस्थिति
उत्पन्न होती है तब वह मन की अन्य वृत्तियों को तिरोहित करती है। वर्तमान मनोभाव
जितनी ही तीव्रता के साथ उभरते हैं उतनी ही तीव्रता से पुराने मनोभावों को तिरोहित कर
देते हैं। किसी (भय, क्रोध, काम, लोभ, आदि) मनोभाव पर तत्काल उत्पन्न तीव्रतम मनो-
भाव जितनी तीव्रता से आक्रमण करता है उतनी ही तीव्रता से पूर्ववर्ती मनोभाव तत्काल
नष्ट होता है और नया तत्काल (पूर्वमनोभाव विस्मृत करके) उत्पन्न होता है। जितनी
तीव्रता से उभर आने वाला भाव उभर आता है उतनी ही तीव्रगति से उकसा पूर्ववर्ती
मनोभाव डूब जाता है। इन दोनों भावों के अप्रत्याशित अन्त एवं आरंभ के मध्य में जो
(मध्य में) एक बहिर्मुखी विशेष वृत्ति उदित है—यह अकस्मात् उत्पन्न होने वाली क्षणिक
मनोवृत्ति निर्विकल्प, स्तब्ध एवं भयानक मनोवेग के रूप में उदित होती है।
'विज्ञानभैरव' (११९) में कहा गया है—
क्षुधाद्यन्ते भये शोके गह्वरे वारणद्रुते ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥
यह क्षण एक निर्विकल्प क्षण है और इसमें विद्युत की तीव्रतम कौंध की भाँति
एक मनोभाव उदित होकर नष्ट हो जाता है यथा सिंह को देखकर उत्पन्न भय ॥
इस क्षण के उदित होने पर सुख, दुःख, मूढ़ता आदि अन्तःकरणावृत्तियाँ नष्ट हो
जाती हैं और इस नवोत्पन्न विशिष्ट क्षण में मात्र सामान्य स्पन्द तत्त्व अस्तित्व में रहता
है। मनोभावों को उन्मज्जन एवं निमज्जन की यह क्रिया अविराम गति से चलती रहती
है किन्तु जब यह उदित होती है तो उसका व्यक्ति को मान भी नहीं रह जाता। क्योंकि
अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण बुद्धि इसे पकड़ नहीं पाती।
यही क्षण शक्तिपात के समय भी उदित होता है। गुरु अपनी शक्तिपात-सामर्थ्य
द्वारा इन मध्यवर्ती संधिक्षणों एवं तन्निहित स्पन्द तत्त्व की अनुभूति अपने शिष्यों को
करवा देते हैं। शक्तिपात की दृढ़ता से बहिर्मुखी स्पन्द प्रवाह को योगी कूर्मांगसंकोचवत्
अपने भीतर समेटकर (अन्तर्मुखी होकर) इस विशिष्ट एवं एकाग्रतानिष्ठ क्षण पर स्थिर
रहने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
प्रस्तुत कारिका में—क्रोध, हर्ष एवं मूढ़ता से—सुख, दुःख एवं मोह युक्त
अन्तःकरण की वृत्तियों को ग्रहण करके ज्ञानेन्द्रियों की जागृतावस्था एवं दौड़ने की क्रिया
द्वारा समस्त बाह्यवर्ती कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण किया गया है और यह संकेतित किया
गया है कि—जागृतावस्था में भी स्पन्द तत्त्व समान रूप से उपलब्ध होता है।
जागृति की अवस्था में भी स्पन्द तत्त्व का साक्षात्कार—
प्रबुद्ध साधकों को गुरु अपने विशेषानुग्रह के द्वारा जाग्रत अवस्था में भी स्पन्द
शक्ति की अनुभूति करा देते हैं। बार-बार अभ्यास करने पर वे उसे स्थिरता (एकाग्रता में
स्थिरता) प्राप्त कर लेते हैं।

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प्रथमः निष्यन्दः २४७
मूढ़ एवं प्रबुद्ध साधकों की अवस्था की तुलना (योगमार्गीय साधना का अवलम्बन)—
यामवस्थां समालम्ब्य यदऽयं मम वक्ष्यति ।
तदवश्यं करिष्येऽहमिति सङ्कल्प्य तिष्ठति ॥ २३ ॥
तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ।
सौषुम्णेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम् ॥ २४ ॥
तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ।
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥ २५ ॥
कोई सेवक या शिष्य—'यह (मेरा स्वामी या शास्ता) मुझसे (जो कोई भी कार्य
करने हेतु) कहेगा उसे मैं अवश्य करूँगा'—इस प्रकार सङ्कल्पबद्ध होकर, जिस अवस्था
(वृत्ति प्रत्यस्तमित अवस्था) का अवलम्बन ग्रहण करके स्थित रहता है ॥ २३ ॥
(उस साधक की) उसी अवस्था का अवलम्बन ग्रहण करके उसके चन्द्रमा एवं
सूर्य शरीर-मार्ग (ब्रह्माण्डगोचर) का त्याग करके ऊर्ध्व मार्ग द्वारा सुषुम्णा-मार्ग में (प्रवेश
करके) उसी में लयीभूत हो जाते हैं ॥ २४ ॥
तब उस 'महाव्योम (चिदाकाश) में चन्द्रमा एवं सूर्य के लीन हो जाने पर प्रबुद्ध
योगी तो अनावृतस्वरूप वाला होकर अवस्थित होता है किन्तु मूढ़ (मुह्यमान) (उस
अवस्था में भी) सुषुप्ति पद जैसी प्रगाढ़ तमावस्था में पड़ा रहता है ॥ २५ ॥

  • सरोजिनी *
    सूर्य और चन्द्रमा, ऊर्ध्वपथ के द्वारा इस सांसारिक पदार्थ को पीछे छोड़ते हुए,
    सुषुम्ना के मार्ग में स्थित हो जाते हैं किन्तु यह तभी संभव हो पाता है जबकि योगी उस
    अवस्था में दृढ़ अवस्थान करते हुए निम्न दृढ़ सङ्कल्प लेता है—१
    मैं निश्चित रूप से एवं आवश्यक रूप से वह सभी कहूँगा जो कि यह यथार्थसत्ता
    मुझसे कहेगी । तब उस महाव्योम जहाँ चन्द्र एवं सोम लुप्त हो चुके हैं वह योगी जो कि
    सुषुप्ति की भाँति कार्य करता है, निश्चय ही जड़ है तथा वह उसमें आच्छादित तत्त्व
    अवश्यमेव प्रकाशित हो उठता है ।
    योगी सङ्कल्प करता है एवं दृढ़निश्चय करता है कि मुझे समस्त बहिर्भाव का त्याग
    कर देना चाहिए तथा वह आवश्यक रूप से ऐसा कर भी देता है या उसे उसके प्रति
    अपने को पूर्णतया समर्पित कर देना चाहिए जो कि उसका शङ्कर से अभिन्न स्वभाव
    कहता है ।२
    यह मेरा जो शङ्करात्मा स्वभाव है वह जो मुझसे कहेगा और जो चिदानन्दघन,
    अनुभूतपूर्व स्वरूप मुझसे कहेगा विमर्शन करेगा उसे मैं अवश्य करूँगा और बहिर्मुखता
    का त्याग करके तत्प्रवण ही हो जाऊँगा—ऐसा सङ्कल्प करके जिन क्रोधादि अवस्थाओं
    १-२. स्पन्दनिर्णय ।
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२४८ स्पन्दकारिका
में अनुभूतचरी, चिदानन्दघन स्पन्दात्मिका अवस्था का अवलम्बन ग्रहण करके स्थित
होता है और विकल्पों का शमन करके अविकल्प अवस्था का अवचिल रूप में आश्रय
लेता है और ऐसा करके जो योगी प्राणापान दोनों को हृदयभूमि में एकसाथ मिलाकर
सौषुम्न मार्ग में स्थित ब्रह्मनाड़ी में ऊर्ध्वमार्ग वाले उदान पथ से शमित करके एवं
ब्रह्माधिष्ठित लोक का त्याग करके और ऊर्ध्व कपाटान्त देह व्याप्ति का त्याग करके और
तब सूर्य और चन्द्रमा को लय करने वाले महा व्योम में (निःशेषवेद्योपशम रूप
परमाकाश में) स्थित होने पर भी गुणनिष्यन्द से व्यामोहित होकर सौषुप्तवत् हो जाता
है—शून्यादिभूमि में अवस्थित हो जाता है—वह योगी पूर्णतया अनभिव्यक्तस्वभाव वाला
होकर मूढ़ कहलाता है क्योंकि जिसका स्वस्वभाव सम्यक् रूप से अभिव्यक्त नहीं होता
वह स्वप्न आदि के द्वारा मुह्यमान होकर अप्रबुद्ध ही रहता है।१ किन्तु जो वहाँ पर भी
अपने प्रयत्न-कौशल से उद्यन्तूताशक्ति द्वारा क्षण मात्र भी शिथिल नहीं होता वह तमोगुण
से अनभिभूत होने के कारण चिदा-काशमय होने के द्वारा ही अवस्थित होकर ‘प्रबुद्ध’
कहलाता है। अतः अनवरत प्रयास से योगी ही होना चाहिए ॥२ ‘सौषुम्ण अध्व’ का
महत्व क्या है? ‘सुषुम्णा’ वाहिनि प्राणेसिद्धयत्येव मनोन्मनी’ = ‘मनोन्मनी’ का उदय ॥
अब इसी स्पन्दतत्त्व के जीवन में उदय होने के लिए उपाय का निर्देश करते हुए ग्रन्थकार
कहता है—‘यामवस्थां ... ब्रह्माण्डगोचरम् ॥’
‘ये हमारे गुरुदेव हैं’ ‘ज्ञानाग्रगण्य हैं और ये अनिर्वचनीय सद्वस्तु का भी निर्वचन
कर सकते हैं। इनकी आज्ञा का कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। ये जो कुछ भी मुझसे
कहेंगे मैं अवश्य करूँगा—यह दृढ़ संकल्प धारण करके साधक जब उन्मुखतारूप वृत्ति
का आलम्बन लेकर स्थिर हो जाता है तब उसकी उस अवस्था में ऊर्ध्वमार्ग से विषुवत
प्रवाह के द्वारा सोम, सूर्य, अपान प्राण, मन, सुषुम्णा के मार्ग में (जो कि पराशक्ति का
मार्ग है—मध्यम नाड़ी है)—विलीन हो जाते हैं। पता नहीं गुरुदेव क्या आज्ञा देंगे?—
यह कुतूहल वासनाओं को पीस डालता है। उस समय साधक ब्रह्माण्ड स्थित शरीर-
विषय का परित्याग करके ‘देहाहंभाव’ से मुक्त हो जाता है। कहा भी गया है कि—देह में
अहं प्रत्यय का द्वीप भग्न हो गया। अनन्त संवित् रूप निर्मल समुद्र से एकता हो गयी।
इन्द्रियसम्मूह अन्तर्मुख हो गया। बस तुम एक अद्वितीय विश्वात्मा हो ॥’—३
‘जाते देहप्रत्ययद्वीपभंगे प्राप्तैकत्वे निर्मले बोधसिन्धौ।
अध्यावर्त्यैवेन्द्रियग्राममन्तर्विश्वात्मा त्वं नित्यमेकोऽवभासि ॥’
ऐसी अवस्था में ‘महाव्योम’ अर्थात् परचिदाकाश में सूर्य एवं चन्द्रमा, ज्ञान और
क्रिया—दोनों शान्त हो जाते हैं। स्वभाव में अभिव्यक्ति नहीं होती। स्वप्न, जाग्रत आदि
के दृश्यों से मोह नहीं होता। वह प्रबुद्ध और अनिरुद्ध हो जाता है, मानो सुषुप्ति हो।
किन्तु उस समय वह प्रबुद्ध और आवरणरहित ही होता है।४
‘रहस्यस्तोत्र’ में कहा गया है—बड़े-बड़े आकाशगामी सिद्धपुरुष भी, जिन्होंने
१-२. स्पन्दनिर्णय। ३-४. उत्पलदेव—‘स्पन्दप्रदीपिका’।