स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
About this granth
This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.
Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.
Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.
१६८ स्पन्दकारिका
अन्याङ्गेनोपगमनेन वशीकृतस्य,
कामीश्वरस्थितममी बत संगिरन्ते ॥'१
नवें श्लोक में, देहादिक अनात्म तत्त्वों में अहं प्रत्ययस्वरूप क्षोभ के विगलित हो
जाने पर, निवात-निश्चल-जलधि के समान सुप्रशान्त स्थिति में अवस्थित आत्मतत्त्व को
'परमपद' शब्द द्वारा प्रतिपादित किया गया था। फिर उसके बल के स्पर्श से पुरुष उससे
विलक्षण (भिन्न) क्षोभात्मक धर्म कैसे प्राप्त कर लेता है कि जिसके कारण इन्द्रिय समूह को
उनके व्यापार में संलग्न करते हुए 'मैं करता हूँ' 'मैं जानता हूँ'—इत्यादि अपने ऐन्द्रिय
विषयों को प्राप्त करके क्षुभित हो उठता है?—इन शंकाओं का निराकरण करने हेतु एवं
अनात्मज्ञानियों के मति भ्रम को दूर करने के उद्देश्य से १०वीं कारिका कही गई ॥
तदा = तब ॥ उस यथोक्त क्षोभपरिक्षयोपलक्षित काल में ।
अस्य—इसका इस आत्मा का ।
अकृत्रिम = सहजसिद्ध । सतत अव्यतिरिक्त ।
ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः = ज्ञातृत्व-कर्तृत्व के लक्षण वाला । यतो = जिसके कारण ।
जिस अव्यभिचारी एवं कारणभूत गुण से ।
सर्वम् = अखिल ।
ईप्सितं = ज्ञेय एवं कार्य के रूप में प्राप्त करने हेतु वाञ्छित वस्तु । उस समय ।
सत्यस्वभाव संबन्धलक्षणयोगात्मिका उस दशा में । (न कि देहादिक आलम्बन में अहं
प्रतीति से परिप्लुत सांसारिक पुरुषदशा में) ।
जानाति च करोति च = जानता है और करता है । ऐसा क्यों कहा गया ?
सर्वज्ञातृत्व' उपलब्धृत्व, कर्तृत्व आदि तो आत्मा के अव्यतिरिक्त सहज धर्म हैं । वस्तुतः
एक ही ईश्वर की स्वभावप्रत्यवमर्शरूपा एक ही शक्ति है । वही संवेदन के रूप में 'ज्ञान'
तथा कार्यसंरंभरूप से 'क्रिया' शब्द द्वारा पुकारी जाती है—
'वस्तुतः एकैव ईश्वरस्य स्वभावप्रत्यवमर्शरूपा शक्तिः, सा संवेदनरूपत्वात् ज्ञान
शब्देन उच्यते, लावणमात्रसंरंभरूपत्वात् क्रियाशब्देन च उद्घोष्यते ।' 'इदन्तावसेयस्य
वस्तुतो ज्ञेयतया कार्यतया च द्वैविध्यात् द्वित्वेन उपचर्यते ॥'
वेद्यत्वप्रतीति के उपप्लव से संस्पृष्ट वेदकैकलक्षण स्वभाव में स्थित उस आत्मा
का वह धर्म सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व के रूप में विजृंभित (प्रकट) होता है ।
आत्मा की ज्ञातृ—कर्तृत्वलक्षण अव्यतिरिक्तधर्मता उसका स्वभाव है न कि
उसकी क्षोभावस्था । अपने इस स्वभाव के प्रत्यवमर्श के अभाव से वेद्य देहादिक में
वेदक प्रत्यय का निबन्धनात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व आत्मा का कृत्रिम एवं परिमित विषय है
न कि स्वाभाविक । स्वाभाविक धर्म तो सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व है ।२
ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का विकास
पूर्वकारिका (९वीं) में कहा गया है कि 'क्षोभ' के विलीन हो जाने पर मितप्रमाता
१. स्पन्दप्रदीपिका । २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
प्रथमः निष्यन्दः १६९
शिवभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस अवस्था विशेष में किसी भी प्रकार की स्फुरणा
नहीं होती तथा वह तरंग-हीन समुद्र की भाँति प्रशान्त एवं निस्पन्द है । सूत्रकार का
कथन है कि क्षोभ के विलीन हो जाने पर इसका मितप्रमाता स्वभावसिद्ध ज्ञातृत्व एवं
कर्तृत्व धर्म को निरावृत रूप में प्रकट होता है जिससे कि यह प्रमाता आकांक्षित विषयों
को स्वातन्त्र्यपूर्वक जानता भी है तथा अभीष्ट कार्यों का निष्पादन भी करता है ।
वृत्तिकार भट्टकल्लट कहते हैं—
यदि क्षोभ का ग्रहण अस्त हो जाता है तो ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व, (जो कि आत्मा
का स्वाभाविक धर्म है) के ऊपर से मितज्ञातृत्व एवं मितकर्तृत्व का प्रतिबन्धक अवरोध
हट जाता है और आत्मा अपने सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व की अपनी अमित शक्ति के
साथ प्रोज्ज्वलित हो उठता है । इस अवस्था में मितप्रमाता की संकुचित सीमाओं की
प्राचीर को भंग करके वह सब कुछ जान लेता है और सब कुछ कर सकने की क्षमता
प्राप्त कर लेता है 'यतः तस्मिन् प्रलीनक्षोभात्मके काले अकृत्रिमः सहजो ज्ञत्वकर्तृत्व-
भावरूपो धर्मो यस्मात्, तस्मिन् एवं प्राप्तयोगात्मके काले यत् तद् ज्ञातुम् इच्छति तत्
तत् जानाति च करोति च, नान्यथा संसार्यावस्थायाम् ।।'१
'शान्तब्रह्मवाद' और पञ्चकृत्यकारी शिव का सर्वकर्तृत्ववाद—
१. 'माण्डूक्योपनिषद्'—में परमात्मा को 'शान्त' कहा है और उसके अनेक
लक्षणों की ओर इंगित किया है । यथा—अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण,
अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, प्रपञ्चोपशम, शान्त, शिव एवं अद्वैत-'अदृष्ट-
मव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवम-
द्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥'
आचार्य शङ्कर ने (शाङ्कर भाष्य) में 'शान्त' का अर्थ—यह स्वीकार किया है कि
परमात्मा—जाग्रदादि अवस्थाओं के धर्म से रहित है—'प्रपञ्चोपशममिति जाग्रदादिस्थान-
धर्माभाव उच्यते । अतएव शान्तमविक्रियम्'२
'शान्त'—१) जाग्रदादि अवस्थाओं के धर्मों से रहित ।
२) अविकारी-'अविक्रिय' ।
इस दृष्टि से तो शाङ्कर मत के विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता किन्तु यदि 'शान्त'
का अर्थ—'निष्क्रिय' 'निस्पन्द' माना जाय तब अवश्य इसे 'शान्तब्रह्मवाद' से सम्बद्ध
मानकर इसका शैव दर्शन विरोध करता है ।
'परमार्थचर्चा' के 'विवरण' में हरभट्ट ने 'शान्तब्रह्मवाद' के विरुद्ध अनेक प्रश्न
उठाये हैं—
१) शान्त ब्रह्मवादी परमात्मा को उदासीन (क्रियाशून्य) मानते हैं तो वे यह बताएँ
कि फिर ऐसा उदासीन परमात्मा विश्व को आभासित कैसे करेगा?
१. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व' । २. शांकरभाष्य (माण्डूक्योपनिषद) ।
१७० स्पन्दकारिका
२) ऐसा परमात्मा उसका विश्रान्ति-स्थान कैसे बन सकेगा—
'शान्तब्रह्मवदौदसीन्यमवलम्बमाना कथं विश्वमाभासयेत्?
कथं च तद्विश्रान्तिस्थानं भवितुमहर्हा?१
२. दार्शनिक स्पिनोजा (Spinoza: 1632-1677) का कथन है कि विश्व
परमात्मा से पृथक् नहीं है प्रत्युत्—'विश्वम् ईश्वरः । ईश्वरश्च तद् विश्वम्' = सब ईश्वर है
और ईश्वर ही सब है यही है स्पिनोजा का 'सर्वेश्वरवाद' । शङ्कराचार्य भी 'सर्वब्रह्मवाद' के
समर्थक हैं किन्तु उनकी मान्यता में—१) 'ब्रह्मसत्यम्'—तो ठीक है और 'जीव ब्रह्मैव
नापरः' भी ठीक है किन्तु उनका 'जगन्मिथ्या' कथन ठीक नहीं है। यह Spinoza को
भी मान्य नहीं है, सांख्यदर्शन को भी मान्य नहीं है—रामानुजीय वेदान्त दर्शन को भी
मान्य नहीं है तथा 'प्रत्यभिज्ञा' 'स्पन्द' 'क्रम' आदि अद्वैतवादी शैव दर्शनों को भी मान्य
नहीं है। स्पिनोजा भी परमात्मा को स्थितिशील नहीं गतिशील मानता है। स्पिनोजा का
मूल सत्व निर्गुण है जबकि स्पन्द या प्रत्यभिज्ञा का मूल तत्त्व सगुण, निर्गुण, विश्वमय
एवं विश्वातीत दोनों हैं।
वेदान्ती शान्त ब्रह्मवादी भी हैं। इस ब्रह्म का स्वरूप शान्त एवं निस्पन्द है।
उसमें विमर्श का पूर्णतः अभाव है। वह 'निस्तरंग महोदधि कल्प' है—तरंग शून्य
महासमुद्र है। इसके कारण उसमें—ज्ञान, एवं क्रिया की शक्ति एवं संवेदना भी नहीं है।
ये ब्रह्मवादी ब्रह्म को चेतन तो मानते हैं किन्तु 'निस्तरंग जलनिधि' कहने से वे उसे
उदासीन एवं शक्तिहीन भी मानते हैं। स्पन्द सूत्र ऐसे शक्तिहीन—ज्ञान-क्रिया-हीन, एवं
निष्क्रिय ब्रह्म में विश्वास नहीं रखता। शैव दार्शनिक कहते हैं कि जो निरपेक्षतः पूर्ण
स्वतन्त्र है (जिसकी स्वभावगत शक्ति 'स्वातन्त्र्य शक्ति' हों) ऐसा ब्रह्म एक साथ निस्तरंग
एवं तरंगित दोनों रह सकता है।
'शिवदृष्टि' में सोमान्दपाद कहते हैं कि—शैवदर्शन में निस्तरंगता शिव की
शक्तिहीनता का प्रतीक नहीं है प्रत्युत् इच्छा-ज्ञान-क्रिया शक्तियों का सूक्ष्म सामरस्य या
अभेदात्मकता संकेतित है।
शैवदार्शनिकों के मत में चैतन्य एवं प्रसरणशीलता—स्वरूप प्रथन एक ही सिक्के
के दो पहलू हैं। शिव विश्वरूप में अवभासमान है। चूँकि विश्व शिवमय, शिवस्वरूप है
अतः गर्हित एवं मिथ्या भी नहीं है। निन्दनीय (गर्हित) तो यह है कि विश्व को
शिवस्वरूप माना ही न जाय। आत्म चैतन्य से विश्व की पृथकता ही गर्हित है। ज्ञातृत्व
एवं कर्तृत्व शिव का स्वभाव है और स्वभाव का त्याग संभव नहीं है अतः शिव से इन
शक्तियों की पृथकता भी संभव नहीं है। 'शिवदृष्टि' में सूक्ष्मता का अर्थ शिव का
शक्तिराहित्य नहीं है प्रत्युत् अभेदता है—
सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते।
चिद्रूपाह्लाद परमो निर्विभागः परस्तदा ॥२
उसका रूपप्रसार गर्हित नहीं है—'रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तितमत (शिव-
१. 'परमार्थचर्चाविवरण' (हरभट्ट) । २. शिवदृष्टि (१.४) ।
प्रथमः निष्यन्दः १७१
दृष्टि १४) सोमानन्दपाद ठीक ही कहते हैं कि शक्ति का शक्तिमान से पार्थक्य संभव
नहीं है—'एवं न जातु चित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥'
परमात्मा 'विश्वोत्तीर्ण' है—इसका अर्थ यह है कि वह सुख दुःख, भय, शोक,
अभाव, एवं अनेक द्वन्द्वों ममत्व, अभिमान आदि से उत्तीर्ण है—इन क्षोभों से अतीत
है। शान्तब्रह्मवादियों के संवेदन-शून्य ब्रह्म को शैव दार्शनिक जड़ मानते हैं—'संवित्ति
शून्यं ब्रह्मत्ववादिनां जड़तैव सा ।'१ (सोमानन्दाचार्य) ॥
अभिनवगुप्तपादाचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि 'हृदय' (अहं प्रत्यवमर्शात्मक
बोध) में विमर्श की तरंगें उठती रहती हैं। 'विमर्श' चेतन स्पन्द है। विश्व का 'द्रावण'
(जगत् का इदं रूप में बाह्यावभासन या विश्व-प्रसारण) और उसका प्रसृत भाव जगत् का
आन्तर अहंप्रत्यय में लय करने की क्रियाशीलता विमर्श ही है।
'स्पन्द' के प्रसार की दिशायें दो हैं—१) 'बहिर्मुख प्रसार' २) 'अन्तर्मुख
प्रसार' । 'बहिर्मुख प्रसार' = विश्वात्मक = विश्व विकास । 'अन्तर्मुख प्रसार' ।। स्वात्म-
सङ्कोच । प्रसारित विश्वात्मकता को मूल केन्द्र में समेटना ॥ 'स्पन्द' की यही द्विमुखी
क्रियाशीलता है जिसे कि—१. 'स्वरूपोच्छलन' २. 'किंचिच्चलन' कहा जाता है।
क) हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः ।
भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥
स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे स्वात्मन्युच्छलनात्मकः ॥२
ख) किंचिच्चलनमेतावदन्यस्फुरणं हि यत् ।
ऊर्मि रेषाविबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥३
किंचिच्चलनात्मक स्फुरणा का स्वरूप—'स्पन्द' किंचिच्चलनात्मक है। इसका
स्वरूप निम्नांकित है—और इसके दो रूप हैं—१. 'सामान्य स्वरूप' २. विशिष्ट स्पन्द ।
क) सामान्यस्पन्द—विश्व-प्रसृत धर्म । 'राम' मानव है । मानवता उसका
'सामान्य' एवं 'रामत्व' (सामान्य का) विशिष्ट स्वरूप है। एक जातिगत धर्म है और
दूसरा व्यष्टिगत विशिष्ट धर्म है किंचिच्चलनात्मक स्फुरण विश्व के स्थूल-विकास (जगत्
की सृष्टि = आदि सर्ग) और प्रलय (अन्त में संहार काल) इन दोनों स्थितियों में
सामान्य रूप से प्रसृत होती है अतः उसे 'सामान्य स्पंद' कहते हैं। इसकी गति
अनवरुद्ध रूप में अग्रपद होती रहती है। इस अवस्था में प्रवहमान स्पन्द शक्ति घट,
पट, नील, रक्त, आदि विकल्पों में विभाजित नहीं रहती।
ख) विशिष्टस्पन्द—जगत् की जो स्थिति का काल होता है उसमें ही सामान्य
स्पन्द विकल्पों का विशिष्ट रूप ग्रहण करके (देह, प्राण, नील, सुख आदि बनकर) विश्व
के अनेकात्मक अनन्त रूपों में विश्ववैचित्य का अवभासन करते हुए विशेषरूपता का भी
उच्छलन (किंचिच्चलन) करता है।'
१. सोमानन्दपादः 'शिवदृष्टि' (६.२९) । २. तन्त्रालोक (९.१०२-३) ।
३. तन्त्रालोक (९.१८४) ।
१७२ स्पन्दकारिका
स्वात्मोच्छलनात्मक स्फुरणा ही चैतन्य का शाश्वत स्वस्वभाव है। चाहे पति
प्रमाता हो चाहे पशुप्रमाता दोनों का प्रमातृत्व इसका ऋणी है।
सर्वज्ञ, सर्वकर्ता अनुत्तर तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' की सामर्थ्य से सब कुछ
जानता भी है और सब कुछ करता भी है उदासीन, निरपेक्ष साक्षी मात्र बनकर नहीं रहता।
संवित् का यथार्थ स्वरूप अहंविमर्शात्मक स्फुरणा है। स्वतन्त्र कर्ता संविदात्मक
है। विश्वात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व की अहंविमर्शमयी स्फुरणा ही संवित् का अकृत्रिम
स्वभाव है।
प्रमाताओं की मुख्यतः दो श्रेणियाँ हैं—(१) पतिप्रमाता, (२) पशुप्रमाता ।
कार्यों के कारणसमूह का संयोजन—वियोजन करने में स्वतंत्र कर्ता तो मात्र शिव
ही है क्योंकि विश्वात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व की अहं विमर्शमयी स्फुरणा का वह स्वामी
है किन्तु मितप्रमाता (पशु) भी अपनी पशु भूमिका में संयोजन-वियोजन की क्षमता रखता
है क्योंकि संवित् सक्रिय है और वह संवित् पशुओं में भी है अतः ज्ञाता-कर्ता के व्यापार
की क्रिया में दोनों में कोई भेद नहीं है हाँ अन्तर है तो उसकी मात्रा में यथा—
१) पतिभूमिका—सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व' पूर्ण तृप्ति आदि ॥
२) पशुभूमिका—सर्वकर्तृत्व, किंचिद् ज्ञातृत्व, किंचिद् तृप्ति आदि ॥
पशु अपने संविदात्मक स्वरूप को विस्मृत कर देने के कारण 'पति' से 'पशु' बन
जाता है किन्तु देहादिक में अहंभाव का त्याग करने एवं 'संवित्स्वरूपोऽहं, विश्वविभ-
वोऽहं, सर्वज्ञातृत्व-कर्तृत्व शक्ति संपन्नोऽहं, शिवोऽहं' की प्रत्यभिज्ञा होते ही उसके
समस्त पाशों का उच्छेद हो जाता है और वह 'पशु' से 'पशुपति' बन जाता है। इस
मितप्रमातृत्व के स्थान पर अमितप्रमातृत्व की प्राप्ति ही 'आत्मबल का स्पर्श' कहलाता
है। पशु एवं पति मूलतः अभिन्न हैं—
१) तथा च तेषां हेतूनां संयोजनवियोजने ।
नियते शिव एवैकः स्वतन्त्रः कर्तृतामियात् ॥ (तं०९।३५)
२) तस्मादेकैकनिर्माणे शिवो विश्वैकविग्रह ।
कर्तेति पुंसः कर्तृत्वाभिमानोऽपि विभो कृतिः ॥ (तं० ९।३६)
पशु की मित पदार्थों में ममता, अहंकार, उनके साथ एकात्मता आदि भी विश्व-
शरीरी की ही स्फुरणा है। सर्वज्ञ शिव ही विराजमान है—
'ना सावस्था न यः शिवः ॥'
'विज्ञानभैरव' (धारण ८४) में कहा गया है—
सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः ।
स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ १०७ ॥
प्रथम प्रत्यभिज्ञा—'मै शुद्धबुद्ध स्वरूप हूँ'
द्वितीय प्रत्यभिज्ञा—'निखिल जगत् मेरा ही अपना विस्तार है'
प्रथमः निष्यन्दः १७३
विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन् (वि०भै० १०२)
प्रसार्य भैरवं रूपं भावयन्तस्तन्मयो भवेत् (वि०भै० ८६)
तैमिरं भावयन् रूपं भैरवं रूपमेष्यति (वि०भै० ८५)
लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं भैरवत्वेन भावयेत् ।
तत्सर्वं भैरवाकारं तेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥ ८३ ॥
न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरूरूपा विकासिते ।
निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता ॥ २६ ॥
'तदास्याऽकृत्रिमो धर्मो'—इसकी व्याख्या 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' के सूत्र 'तथापि
तद्वत् पंचकृत्य करोति' (प्र० हृ० १०) के प्रकाश में ही संभव है। क्षेमराज कहते हैं कि
शिव का अकृत्रिम धर्म भी वही है क्योंकि परमात्मा में भी वही धर्म स्वात्मस्वरूप के रूप
में अवस्थित हैं जो जीवों में है—
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तविनाशनम् ॥'
'पंचविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनोभगवतः ॥
'स्वच्छन्द तन्त्र' में भी कहा गया है कि चिदात्मा भगवान् में सदैव पंचविधकारिता
स्थित है । यथा भगवान् अशुद्धाध्वा के विकास क्रम से स्वरूपविकासात्मक सृष्ट्यादि की
रचना करतें हैं उसी प्रकार चित् शक्ति के संकुचित होने पर संसारभूमिका में पंचकृत्य
करते हैं—
'यथा च भगवान् शुद्धेतराध्वस्फारक्रमेण ... तथा संकुचितचिच्छक्तित्वेन संसार-
भूमिकायां पंचकृत्यानि विधत्ते ॥
स्वस्वभाव की सर्वव्यापकता के साक्षात्कार के कारण योगी की संसरण से मुक्ति—
तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ।
स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ॥ ११ ॥
जो (साधक) 'स्वभाव' (स्पन्द स्वरूप आत्मा) को (जगत् के प्रत्येक कण में)
सर्वव्याप्त देखता हुआ विस्मयाविष्ट की भाँति अवस्थित रहता है भला उसके लिए यह
कुत्सित संसरण कहाँ हैं? ॥ ११ ॥
- सरोजिनी *
तुरीयावस्था या शाक्तभूमिका में अवस्थित योगी जब जगत् के कण-कण में सर्वत्र
एक ही चिदात्मा की व्यापकता, अवस्थान एवं उनमें उसकी सर्वव्यापक अनु-स्यूतता का
साक्षात्कार करने लगता है तब उसके कुत्सित आवागमन-चक्र का कोई भय नहीं रह
जाता ।
कारिकाकार ने 'स्पन्द' 'आत्मा' 'चिति' 'शिव' 'विमर्श' 'स्वातन्त्र्य' 'शक्ति'
आदि शब्दों का प्रयोग न करके 'स्वभाव' का प्रयोग क्यों किया? कारिकाकार यह
१७४ स्पन्दकारिका
संदेश देना चाहते हैं सर्वानुस्यूतता, सर्वव्यापकता आदि पारमात्मिक वैभव मात्र परमात्मा
में ही नहीं प्रत्युत् प्रत्येक आत्मा में है और वह वैभव (शक्ति या धर्म) उसका आगन्तुक,
क्षणिक या कृत्रिम धर्म नहीं है प्रत्युत् वह उसका 'स्वभाव' (आत्मधर्म) है।
कुसृतिः—'कुत्सिता जन्ममरणादि प्रबन्धरूपा सृतिः प्रवृत्तिः।'
स्मयमान = विस्मयाविष्ट। ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में, वैचित्य एवं अनन्त,
वैभिन्यों में एक ही अभेदात्मक सत्ता को देखकर एवं भेदात्मक विश्व में मात्र अद्वैत, अभेद
को ही पारमार्थिक सत्य के रूप में साक्षात्कृत करके ऐसा योगी आश्चर्य से भर जाता है।
'तमधिष्ठातृभावेन' = 'सर्वव्यापकत्वेन'—भट्टकल्लट ॥
जो साधक ध्यान एवं ध्यानाभाव में, अपनी स्पंद शक्ति के द्वारा, ऐकात्म्य या
सामञ्जस्य स्थापित कर लेता है उसके लिए यह जीवन एवं मृत्यु का संसार अस्तित्व में
नहीं रहता। व्युत्थान के समय भी योगी, स्पंदतत्व से एकीभूत एवं अभिन्न अपने
स्वभाव को दृढ़ता से देखता है। योगी अपने स्पन्दतत्त्वात्मक स्वभाव को व्युत्थान दशा
में भी अधिष्ठातृभाव पूर्वक देखता है।१
'न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरुद्रूपा विकसिते।
निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपधृक्॥' (वि०भै० २६)
कक्ष्यास्तोत्र में कहा गया है—
'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः,
स्वे स्वे यौगपद्येन विष्वक्।
क्षिप्त्वा मध्ये हाटकास्तंभभूत-,
स्तिष्ठन्विश्वाकार एकोऽवभासि॥'
'विज्ञानभैरव' एवं 'कक्ष्यास्तोत्र' द्वारा कथित इन श्लोकों से निर्दिष्ट इस संप्रदाय-
संमत निमीलन-उन्मीलन समाधि द्वारा एक साथ व्यापक मध्य भूमि के अवष्टंभ से अध्य-
सित, दोनों विसर्ग-अरणि से विगलित विकल्प उपक्रम से इन्द्रिय समूह स्फारित हैं।२
अन्तर्लक्ष्य बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जितः।
इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥
इस साधना का आश्रय लेकर (इसी भैरवी मुद्रा को साधकर), दर्पण में उन्म-
ज्जित, निमज्जित, प्रादुर्भूत एवं तिरोहित होने वाले नाना प्रतिबिम्ब-कदम्बकों की भाँति
चिदाकाश में भी प्रादुर्भूत एवं तिरोहित होने वाले जगत, जगत् के विभिन्न रूप एवं सुख-
दुःख, नील-पीत की अयथार्थता का पारमार्थिक साक्षात्कार करते हुए योगी सहस्रों जन्मों
को एक साथ देखकर एवं अपने स्वस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा करके विस्मयाविष्ट हो उठता
है।३ ऐसी स्थिति में जन्ममरणकारिणी कुत्सिता प्रवृत्ति भला कैसे प्रादुर्भूत हो सकती है?
उस पर तो विष का भी प्रभाव नहीं पड़ता—
१-३. स्पन्दनिर्णय।
प्रथमः निष्यन्दः १७५
तत्त्वे निश्चलचित्तस्तु भुंजानो विषयानपि ।
नैव संस्पृश्यते दोषैः पद्मपत्रमिवांभसा ॥
विषा पहारिमन्त्रादिसन्नद्धो भक्षयन्नपि ।
विषं न मुह्यते तेन तद्वद्योगी महामतिः ॥ (भा०वि०)१
जो शुद्ध आत्म स्वभाव को अर्थात् अधिष्ठातृभाव से अपने को स्वयं प्रकाश
चिद्रूप से सर्वव्यापक रूप से देखता है वह मुस्कराता हुआ, विस्मयाविष्ट सा, खिलते हुए
फूल सा रहता है । अविद्या का विलय हो जाने के कारण उसके लिए यह क्षुब्ध संसार
कहाँ है? यह योगी की एक उच्च भूमिका है । इसकी दृष्टि द्रष्टा रूप से सभी का अनुभव
है ।
इष्टोपदेश नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—‘वत्स! तुम्हारी दृष्टि से यह जो कुछ
दृष्टिगत हो रहा है, उसका आग्रह छोड़ दो । जिससे देखते हो, उसको देखो । उसको
देख लेने पर सब कुछ देख लोगे ।।'
यदिदं दृश्यते दृष्ट्या ग्रहं पुत्राऽत्र सन्त्यज ।
येन पश्यति तं पश्य यं दृष्ट्वा पश्यसेऽखिलम् ॥२
ऐसी स्थिति में विकल्प की कारीगरी के अधीन होकर कुमार्ग में चलना नहीं होता,
सदा अपने स्वरूप में स्थिति हो जाती हे । वही सत्यसंकल्प ईश्वर है । अभ्यास और
भावना से समस्त दुःख मिट जाते हैं । रसायन आस्वादन के बिना केवल ज्ञानमात्र से भी
सिद्धि देता है । कहा भी गया है—
‘यो जगु पश्वि एषु किंनु वीक्षोमाइत्य करो ।
विषयालविलुच्छि एसे पत्तापत्त रावीक्षोअपलइयद अस्त्युबुद्धि ।।'
‘वैसे तो प्रभो! आपको चरवाहे, बच्चे और स्त्रियाँ भी जानती हैं किन्तु साधन या
युक्ति के न होने से आप उन्हें मुक्त नहीं करते । गाय में स्थित दूध भूख प्यास नहीं
मिटाता । पान करने पर ही वह दूध भूख-प्यास मिटाता है ।'
मुनि ने भी कहा है— ‘यदि वाचनिकाज्ज्ञानान्मुक्तिः स्याद् भवनां विना ।
‘शारीरमानसैर्दुःखैर्मुच्येरन् सर्वजन्तवः ॥’
‘रसायनं विनास्वादात् सूचितं ह्यपि सिद्धिदम्'३
भले ही रसायन का आस्वादन न किया जाय और मात्र उसके गुणों को सूचित ही
किया जाय फिर भी सिद्धि प्रदान करता है ।
दूसरे स्थल पर भी कहा गया है कि—
आगोपालबालवनितं भगवंस्त्वमित्थं,
ज्ञातोऽप्युपायविरहान्न तु मोक्षदोऽसि ।
नान्तः स्थितं भवति धनेषु तृड्विहर्तृ,
क्षीरं तदेव पुनरभ्यवहारतः स्यात् ॥४
१-४. उत्पलदेवाचार्यः ‘स्पन्दप्रदीपिका' ।
१७६ स्पन्दकारिका
तम् = स्वस्वभाव आत्मा को ।
अधिष्ठातृभावेन = समस्त शरीरों में समस्त अवस्थाओं में, सर्वदा, सर्वत्र मात्र
अनुभविता के रूप में सभी में व्याप्त होकर, सभी में अवस्थित होकर, 'मैं ही एक
(अद्वैत) एवं स्वतन्त्र परमेश्वर अधिष्ठाता हूँ'—इस प्रकार के परामर्शस्वरूप अधिष्ठातृ
भाव से ॥
अवलोकयन् = देखते हुए । पूर्वोक्त उपपत्ति की दृष्टि से, उपलब्धि की दृष्टि से
देखते हुए ('प्रत्यभिज्ञानन्' अपने को पहचानते हुए) ।
स्मयमान इव = अपने परप्रमाता आत्मतत्त्व की प्रत्यभिज्ञा होने पर और अपने
मायिक प्रमातृत्व की मिथ्या समझते हुए आश्चर्यचकित होकर ॥
य आस्ते = जो अवस्थित है, जो स्थित है । अर्थात् जो निर्विप्लवा स्थिति का
अनुभव करता है ।
तस्य = इस प्रकार के लक्षण वाले उस योगी का ।
इयं = यह इस प्रकार सुप्रख्यात, देहादिक में अहं प्रतीतिमूला ।
कुसृतिः = कुमार्ग । जन्म जरामरणादि के द्वन्द्वयोग से कुत्सिता या गर्हिता सृति
(सरण) । अर्थात् अनेक योनियों में जन्ममरणादि चक्र का मार्ग—आवागमन मार्ग ॥१
प्रस्तुत कारिका का सारांश—(१) अपने आत्मस्वरूप 'स्वभाव' की जगत् के
प्रत्येक कण में व्यापकता को देखकर योगी आश्चर्यचकित हो जाता है । (२) जगत् के
कण-कण में अपना ही साक्षात्कार (स्वभाव का दर्शन) करने लगता है । (३) ऐसे
योगियों के लिए आवागमन का कोई मूल्य नहीं होता और वे इस संसरण-चक्र से मुक्त
हो जाते हैं ।
अभ्यासोपरान्त स्पन्दशक्ति की आन्तरिक अनुभूति
स्पन्द का सार्वभौम अधिष्ठातृत्वभाव—'तमधिष्ठातृत्वभावेन स्वभावमवलोक-
यन्'—सूत्रकार का कथन है कि जो कोई साधक स्वभाव (स्पन्दस्वरूप आत्म तत्त्व) की
जगत् के प्रत्येक कण में विद्यमानता अनुभव करता है और इस आश्चर्यात्मक
सर्वानुस्यूतता का साक्षात्कार करके विस्मय विमुग्ध हो जाता है तब वह साधक इस
तिरस्कार-पूर्ण और विगर्हणीय आवागमन-चक्र से मुक्त हो जाता है ।
भट्ट कल्लट ने 'स्पन्दसर्वस्व' में कहा है—
(१) आत्मस्वभाव (सामान्य स्पन्द तत्त्व) विश्व के प्रत्येक पदार्थ में अन्तः स्थित
और प्रत्येक प्रकार की शक्ति से युक्त है ।
(२) यदि कोई योगी उसी विभु 'स्वभाव' (सामान्य स्पन्द) को अधिष्ठाता के रूप
में (एवं सर्व व्याप्त रूप में) अवस्थित देखता है तो वह आवागमन-चक्र (सृति) से मुक्त
हो जाता है—
१. स्पन्दकारिकाविवृति : रामकण्ठाचार्य ।
प्रथमः निष्यन्दः १७७
'तदेवम्, यतः सर्वानुस्यूतः सर्वसामर्थ्ययुक्तश्च आत्मस्वभावः यस्मात् तम् अधि-
'ष्ठातृभावेन सर्वव्यापकत्वेन स्वभावं पश्यन् विस्मयाविष्ट इव यस्तिष्ठति, तस्य कुत्सिता
सृतिः सरणं न भवति ॥'
अधिष्ठातृभाव एवं स्वभावावलोकन—नित्योदित समाधि—अन्तर्मुख एवं
बहिर्मुख दोनों विरोधी भाव जिस अवस्था में समरस हो जाते हैं—जहाँ समाधि एवं
व्युत्थान दोनों में अभेद का अनुभव होता है—उसी नित्योदित समाधि की अवस्था को
नित्योदित समाधि कहते हैं ।
शैव साधक 'स्वभाव' का साक्षात्कार करके इसी स्मयमानावस्था में पहुँचता है ।
तुरीयावस्था या 'शाक्त भूमिका' में प्रविष्ट योगी समस्त सांसारिक व्यवहारों का निष्पादन
करते हुए भी जगत् के निःसार से निःसार वस्तुओं को भी स्वस्वभावात्मक स्पन्दतत्त्व से
युक्त देखकर, शरीरादिक तुच्छ पदार्थों में आत्माभिमान का त्याग करके, विश्वात्मभाव की
भूमिका पर आरूढ़ होकर, (भैरव भूमिका प्राप्त करके) चतुर्दिक स्वातन्त्र्य शक्ति के प्रसार
का अनुभव करते हुए, प्रत्येक अवस्था एवं प्रत्येक स्थल में अपने चित् तत्त्व की
अधिष्ठातृत्ता का अनुभव करते हुए, सूर्य के ऊपर क्षणिक रूप में दृश्यमान (प्रकाशाच्छा-
दक) घनों के रूप में चिद्रूप आत्मतत्त्व पर माया के क्षणिक घनों के आवरण को देखता
हुआ, तुरीय भूमिका पर स्थायी अवस्थान द्वारा तुरीयावस्था प्राप्त करके शिवभाव प्राप्त
कर लेता है ।
उच्च भूमिका में प्रविष्ट योगी यह अनुभव करता है कि उसके चारों ओर उसकी
'स्वातन्त्र्य शक्ति' ही प्रसृत है और वह तुरीयावस्था स्वरूप स्वच्छन्द भूमिका मेंप्रवेश कर
रहा है— 'योगी स्वच्छन्दयोगेन स्वच्छन्दगतिचारिणा ।
स्वस्वच्छन्दपदे युक्तः स्वच्छन्दसमतां व्रजेत् ॥'१
ऐसे योगी को ऐसा अनुभव होता है कि जैसे जलाशय में उत्थित तरंगें, अग्नि से
ऊर्ध्वोत्थित लपटें एवं सौरमण्डल से निःसृत प्रकाश पुञ्ज क्रमशः जलाशय, अग्नि एवं
सौरमण्डल से अभिन्न ही है उसी प्रकार विश्व की निःशेष भंगियाँ 'स्वस्वरूप' के बहिर्मुखी
विकास से अभिन्न हैं—जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालभंग्यो यथा खेः ।
ममैव भैरवस्यैता विश्वभंग्यो विनिर्गताः ॥२
शाक्तभूमिका का साक्षात्कार योगी को तुरीयावस्था एवं उसके अनन्तर तुरीया-
तीतावस्था में पहुँचा देता है ।
'स्मयमान इवास्ते'—विस्मय-संभरित होकर, अर्थात् आश्चर्याविष्ट होकर अवस्थित
रहता है ।
'स्मय' या 'विस्मय' क्या है? 'विस्मय' शैव दर्शन में योग की एक उच्चावस्था
है—'विस्मयो योगभूमिकाः' (शि०सू० १.१२)३
१. स्वच्छन्दतन्त्र (७-२५७-८) । २. विज्ञानभैरव (११०) ।
३. शिवसूत्र (१.१२) ।
स्पं० १२
१७८ स्पन्दकारिका
‘शिवसूत्रवार्तिक’ (वरदराज) में कहा गया है—
यथा सातिशयानन्दे कस्यचिद्विस्मयो भवेत् ॥ ६३ ॥
तथास्य योगिनो नित्यं तत्तद्ध्येयावलोकने ।
निःसामान्यपरानन्दानुभूतिस्तिमितेन्द्रिये ॥ ६४ ॥
परे स्वात्मन्यतृप्त्यैव यदाश्चर्यं स विस्मयः ।
स एव खलु योगस्य परतत्त्वैक्यरूपिणः ॥ ६५ ॥
भूमिकास्तत्क्रमारोह परविश्रान्तिसूचिकाः ॥१
श्री कुलयुक्ति में कहा गया है—
विस्मय क्या है?—
‘आत्मा चैवात्मना ज्ञातो यदा भवति साधकैः ।
तदा विस्मयमात्मा वै आत्मन्येव पश्यति ॥’२
शिवसूत्रविमर्शिनी में कहा है कि—
‘यथा सातिशयवस्तुदर्शने कस्यचित् विस्मयो भवति तथा अस्य महा योगिनो नित्यं
तत्तद्ध्येयावभासामर्शाभोगेषु निःसामान्यातिशय नव नव चमत्कार चिद्धन स्वात्मा वेशवशात्
स्मेर स्मेर स्तिमित विकसित समस्त करणचक्रस्य यो विस्मयोऽनवच्छिन्नान्दे स्वात्मनि
अपरितृप्तत्वेन मुहुर्मुहुराश्चर्यमाणता, सा एव योगस्य परतत्त्वैक्यस्य संबन्धिन्यो
भूमिका ॥’३
शैव दर्शन में ‘विस्मय’ एक पारिभाषिक शब्द है अतः अपना विशिष्ट अर्थ रखता
है । यह साधना की अनिर्वाच्य एवं स्वसंवेद्य आश्चर्यकारी भूमिका है । यह अणिमादिक
योग भूमियों से (जो कि परसंवेद्य हैं) उच्चतर है और आत्मानुभव की विस्मयोत्पादिका
भूमिका है ।
योगी शाक्त भूमिका की अनुभूतियों के अनन्तर उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर भूमिकाओं पर
आरूढ़ होने के लिए जिस निरतिशय कौतूहल से आविष्ट होकर परिणामतः विचित्र
अन्योन्यानुभूतियों के स्तर पर पहुँचता है वह यौगिक स्तर आश्चर्यों से भरा हुआ है । यह
स्वानुभवगम्य, अन्तर्मुखी, विस्मयकारी योग भूमिका योग की तुरीय भूमिका है ।
आचार्य वरदराज कहते हैं कि—जब व्यक्ति सांसारिक जीवन में किसी सातिशय
वस्तु को देखता है तो उसके मन में एक स्तंभकारिणी, साश्चर्य मनोवृत्ति का आविर्भाव
होता है । वह उन प्रत्यक्षीकृत विशिष्ट वस्तुओं के विशिष्ट आकार-प्रकार को विस्मयपूर्वक
देखता हुआ उनका स्वानुभव तो करता है किन्तु उसके आश्चर्यकारी सौन्दर्य की
अभिव्यक्ति न कर पाने पर भी वह उसके अकथ्य सौन्दर्यातिशय की अनुभूति में विलीन
हो जाता है—यही अवस्था ‘विस्मय’ है ।४ आध्यात्मिक धरातल पर जब कोई आत्मनिष्ठ
योगी वेद्य पञ्चक (पंच महाविषय) को सामान्यस्पन्दान्विता अहन्ता में लीन करके
१. शिवसूत्रवार्तिक (वरदराज) । २. कुलयुक्ति ।
३. शिवसूत्रविमर्शिनी (क्षेमराज) । ४. शिवसूत्रवार्तिक (वरदराज) ।
प्रथमः निष्यन्दः १७९
अनिर्वचनीय चैतन्य रस के अनिर्वाच्य आनन्दातिशय के साक्षात्कार से मण्डित स्वरूप-
समावेश का अनुभव करता है और उसके द्वारा आनन्द के विस्मय सागर में डूब जाता
है। स्वरूपसमावेश की यह आश्चर्यकारी स्पन्दरूपता ही विकल्प शून्य तुर्यातीतावस्था
रूप 'विस्मय भूमिका' है। भेदशून्य विश्वात्मभाव, अपने को सर्वत्र चिन्मात्ररूप में प्रति-
ष्ठित के रूप में अनुभव या पराहंता की अनुभूति ही इस 'विस्मय' का अपर पक्ष है।
क्रममुद्रा—तुर्यावस्थाजन्य निरतिशय आनन्दानुभव को प्राप्त करने हेतु योगी की
बार-बार अन्तर्मुखोन्मुखता ही 'क्रममुद्रा' है। 'क्रममुद्रा' के अन्य पर्याय हैं—'शांभव
समावेश' 'स्वरूप समावेश' 'भैरव मुद्रा' एवं 'नित्योदित समाधि' है। 'क्रम मुद्रा' में दो
शब्द है—(१) 'क्रम', (२) 'मुद्रा'। 'क्रम'—सृष्टि, स्थिति, संहार का क्रम ।। 'मुद्रा' =
मुद्रित करना = स्वरूप में विश्रान्ति 'क्रममुद्रा' = तुरीयावस्था। प्रत्येक क्रम को कवलित
करके स्वरूप में विश्रान्ति, । 'नित्योदित समाधि' ।। बाह्यावभासो को तुरीय सत्ता में
मुद्रित करना।
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है कि—नित्योदित—बाह्याभ्यन्तरसमावेश—(१)
'मुद्' अर्थात् हर्ष के वितरण करने से परमानन्दस्वरूप होने । (२) पाशों को नष्ट करने
का । (३) विश्व को अन्तः—तुरीय सत्ता में मुद्रित करने के कारण मुद्रात्मा और सृष्ट्यादि
क्रम का आभासक होने के कारण तथा क्रमाभासस्वरूप होने से 'क्रम' कहा जाता है
'विश्वस्य अन्तः तुरीयसत्तायां मुद्रणात् च मुद्रात्मा, क्रमः अपि सृष्ट्यादिक्रमाभासकत्वात्
तत्क्रमाभासरूपत्वात् च 'क्रम' इति अभिधीयते इति ।।' १
यह अवस्था (क्रममुद्रा, शांभव समावेश) अन्तर्मुखावस्था के अतिरिक्त बहिर्मुखा-
वस्था में भी चिद्रूपात्मक रहती है—
'तत्रादौ बाह्याद् अन्तः प्रवेशः, अभ्यन्तराद् बाह्यस्वरूपे प्रवेश आवेशवशाद् जायत
इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः ।।' २
'क्रममुद्रया अन्तः स्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः ।।' ३
'क्रममुद्रा' समाधि की स्थिति है। इसमें योगी स्वरूप समावेश की शक्ति द्वारा
बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता में और अन्तर्मुखता से बहिर्मुखता में त्वरित प्रवेश करता है।
'सबाह्याभ्यन्तरसमावेश' का नामान्तर ही 'क्रममुद्रा' है।
इस अवस्था में अवस्थित योगी सांसारिक कार्य कलापों का निष्पादन करता हुआ
भी समाधिकालगत संस्कारों के द्वारा प्रत्येक वेद्य वस्तुओं में चिन्मात्रता के दर्शन करता
हुआ स्वस्वरूप में अवस्थित रहता है—
आसादित समावेशो योगिवरो व्युत्थानेऽपि समाधिरससंस्कारेण क्षीब इव सानन्दं
घूर्णमानो । भावराशि शरदभ्रलवम् इव चिद्गगन एवं लीयमानं पश्यन् । भूयो भूयः अन्त-
र्मुखताम् एवं समवलम्बमानो, निमीलितसमाधिक्रमे रम चिदैक्यमेव विमृशन्, व्युत्थानाभि-
मतावसरे अपि समाध्येकरस एव भवति—'
१. क्षेमराज प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । २-३. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।
३. तृतीय निःष्यन्द: विभूति-स्पन्द (सिद्धि-समुदय, योग-समाधि एवं स्वप्न-सुषुप्ति विमर्श)
१८० स्पन्दकारिका
'क्रमसूत्र' में कहा गया है—'क्रममुद्रया अन्तः स्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो
भवति साधकः । तत्रादौ बाह्यान् अन्तः प्रवेशः आभ्यन्तरात् बाह्यस्वरूपे प्रवेशः आवेश-
वशात् जायते, इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः ॥'¹
'स्मयमान' इसी योग-भूमिका को संकेतित करता है । समाधि क्रम—(१)
'निमीलन समाधि' = इसमें शाक्तभूमिक योगी इदन्ता रूप भाववर्ग को सामान्य स्पन्द में
विश्रान्त करके पराचित् भूमिका में प्रवेश करता है ।
(२) इसके अनन्तर वह योगी 'उन्मीलन समाधि' के माध्यम से अहन्ता में
विश्रान्त भाववर्ग को बहिर्मुखी वमन करता हुआ इदन्ता के क्षेत्र में प्रवेश करता है ।
अभावब्रह्मवाद शून्यात्मवाद तथा सर्वशून्यवाद की अयथार्थता—
नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढ़ता ।
मतोऽभियोगसंस्पर्शात् तदासीदिति निश्चयः ॥ १२ ॥
अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा ।
न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्वं प्रतिपद्यते ॥ १३ ॥
अभाव (कभी भी) भावनीय नहीं बन सकता और वहाँ (अभाव समाधि में) जड़ता
का अभाव भी नहीं है । क्योंकि (अभाव समाधि से उठने पर व्युत्थानावस्था में) भाषण
से संसृष्ट होने पर—'वह मेरी शून्य अवस्था थी'—ऐसा निश्चय (निर्णयात्मक विमर्श)
हो जाया करता है ॥ १२ ॥
इसलिए उस (अभावात्मक जड़ समाधि) को सदैव (पशु समूह की) सुषुप्ति के
समान अस्वाभाविक ही समझना चाहिए । वह तत्त्व (स्पन्द तत्त्व आत्मचैतन्य) इस प्रकार
(जड़ समाधि की भाँति) स्मर्यमाणता का विषय नहीं बनता ॥ १३ ॥
- सरोजिनी *
भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—यदि अभाव-
भावना (मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ की अनवरत भावना) का अभ्यास करने से योगी को किसी
भाव सदृश भूमिका का साक्षात्कार हो भी जाय तथापि वह अवस्था अनित्य होती हे ।
उसकी अनुभूति सामान्य जीवों की मूढ़ात्मक सुषुप्ति की अनुभूति के समतुल्य है । कारण
यह कि आत्मा का सत्स्वरूप चिद्रूप है और उसकी विद्यमानता अखण्ड, नित्य एवं
त्रिकालबाधित होती है । शास्ता के उपदेश पर दृढ़ रहकर उसी आत्म तत्त्व का निरन्तर
अनुशीलन करते रहना चाहिए ।
अब ग्रन्थकार वेदान्तियों, नैयायिकों, माध्यमिकों, के उस दृष्टि का खण्डन करता
है जो ये मानते हैं कि 'क्षोभ' का नाश होने पर केवल शून्य (Naught) मात्र अवशिष्ट
रहता है । वे स्पंदतत्त्व की असाधारणता का भी विशद विवेचन करते हैं । 'प्रातिपक्ष्येण
लोकोत्तरतां ... स्पंदतत्त्वस्य निरूपयति ॥'
१. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।
प्रथमः निष्यन्दः १८१
अभाव (Non-existence) की सत्ता की कल्पना ही नहीं की जा सकती यहाँ
तक कि मूढ़ता (जड़ता) का भी वहाँ अस्तित्व नहीं है क्योंकि अभियोग के कारण 'वह
था' का निश्चय होता है । अतः वह अकृत्रिम (सहज) है । ज्ञान एक गंभीर सुषुप्ति के
समान है । वह सत्य स्मर्यमाण होने की दशा कभी प्राप्त नहीं कर पाता ॥१
'असदेवमदमग्र आसीत्' (छा०३।१९।१) भी कहा गया है किन्तु यहाँ उसका अर्थ
दूसरा है । वेदान्तियों ने जिस अभाव (Non-existence) की बात का उल्लेख किया है
उसकी कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि—'असदेवदमग्र आसीत्' (सृष्टि के प्रारंभ में
सब कुछ असत् था) सत् की धारणा तो विद्यमान वस्तुओं के कारण है और अभाव तो
यथार्थतः कुछ है ही नहीं । यदि सत्ता की धारण का इसके साथ संबन्ध स्थापित किया जाय
तो इसकी भी कुछ सत्ता दृष्टिगत होती है और तब यह अभाव स्वयं ही नष्ट हो जाएगा ।
इसके अतिरिक्त यह भी कि उस सार्वभौम विध्वंस की कल्पना ही कैसे की जा सकती है
जहाँ कि स्वयं यह धारणा रखने वाला या विचार करने वाला ही लुप्त हो जाता है? यदि
आप विचारक के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं तब तो सार्वभौम महाध्वंस ही असंभाव्य है
क्योंकि उस स्थिति में तो विचारक की सत्ता बनी रहेगी—वह विश्व में स्थित ही माना
जाएगा । अतः सार्वभौम महाध्वंस सत् का निर्माण नहीं कर सकता ॥
आक्षेपक का आक्षेप और उसके तर्क—यह विचारक कृत्रिम है और वह अभाव
से अभिन्न है । वह अपनी कल्पना के द्वारा विश्व के ध्वंस (विनाश) की धारणा व्यक्त
करता है और इस धारणा की परिपक्वता के समय वह अभाव के साथ नहीं भाव के
साथ अभिन्न हो जाता है । विश्व के रूप में नहीं प्रत्युत शून्य के रूप में अवस्थित ज्ञाता
इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि वह ऐसा आत्मानुभव से अनुभव करता है और अपने को
ज्ञाता समझता है और संकुचित (सीमित) व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है । अतः
यहाँ असंगतता नहीं है ।२
अतः शून्यता (Vacuum) की दशा कृत्रिम है और यह अस्तित्व में इस रूप में
है कि यह कभी अस्तित्व में नहीं था । परमात्मा 'शून्य' के विषय में उपदेश तो देता है
जिससे कि वह वास्तविक ज्ञान को अनधिकारियों से मुक्त रख सके । ज्ञेय गंभीर सुषुप्ति
के समान हैं ।
जड़ता के रूप में विद्यमान स्वप्नहीन सुषुप्ति को सभी समझ सकते हैं । अतः
ध्यान करके अन्य 'शून्य' को प्राप्त करने की आवश्यकता ही क्या है? क्योंकि अयथा-
र्थता (सत्यहीनता) की दृष्टि से तो दोनों समतुल्य या अभिन्न हैं ।३
बहुत से दार्शनिक यथा वेदान्ती, नैयायिक, सांख्य एवं सौगत आदि जड़ता के
समुद्र में अधःपतित हो चुके हैं । मोह, अज्ञान या जड़त्व अभिन्न है । यही शून्य भी है ।
स्पंद तत्त्व में प्रवेशार्थियों के लिये शून्य एक व्यवधान है । ग्रन्थकार ने शून्यवाद का पूर्ण
उन्मूलन करने का प्रयास किया है । वेदान्तियों एवं सौगतों का खण्डन इस लिए किया
गया है क्योंकि इन दोनों की दृष्टि समान है ।४
१-४. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।
१८२ स्पन्दकारिका
स्पंद तत्त्व के नाम की सत्यता एवं सार्थकता 'शून्य' की भाँति स्मर्यमाण नहीं है
क्योंकि उसे 'अज्ञेय' नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह ज्ञाता से अभिन्न है। इसीलिए
बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है कि 'किस साधन से ज्ञाता को जाना जाय?' यद्यपि
योगी व्युत्थानावस्था में 'समाधि' का स्मरण रखता है किन्तु यही 'स्पंद तत्त्व' नहीं है।
यह वैसा नहीं है क्योंकि वह परम ज्ञाता (Omniscient) नित्य (Ever-present)
असीम तथा पूर्ण प्रकाश एवं पूर्णानन्द है। 'न सावस्था न यः शिवः' (विचारों की दिशा
में शब्द एवं अर्थ की ऐसी कोई दशा (अवस्था) है ही नहीं जो शिव न हो) अतः 'स्पंद
तत्त्व' अनन्तानन्दस्वरूप होने के कारण स्मरण का विषय नहीं बन सकता और न तो
जड़ (Insentient) ही कहा जा सकता है। उसे 'तत्' (That) कहना भी संगत नहीं
है। क्योंकि ऐसा कहने से यह बोध होता है कि वह ज्ञान का विषय बन चुका है और
स्मर्यमाण है। शब्द सत्य स्मर्यमाण एवं ज्ञेय नहीं है।१
आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहते हैं—अभाव शशशृंग के समान होता
है। अतः अवस्तु होने के कारण वह कभी अनुभव का विषय नहीं बन सकता। अभाव
एक मूढ़ावस्था है अतः चेतन नहीं है। अभियोग (अभिलाषा) के संस्पर्श से अभाव की
भावना प्रादुर्भूत होती है। वह मेरी शून्यावस्था थी—ऐसा स्मरण होता है। कहा भी गया
है कि—जिस भाव के द्वारा अभाव बाधित होता है; वह 'है' या 'नहीं'। उसके अभाव के
बाधक भाव का सद्भाव कौन काट सकता है? अतः वह है और चिन्मय है। उसी से
सभी का अनुभव होता है, अभाव का भी'—
'अभावो येन भावेन बाध्यतेऽस्ति न नास्ति सः।
तस्य भावस्य सद्भावो वद केन निवार्यते।
सोऽस्त्यतश्चिन्मयो भावो येन सर्वं विभाव्यते ॥'
यही कारण है कि अभाव की भावना कृत्रिम और अनित्य ही होती है। वह
सुषुप्तावस्था के समान है। यदि ऐसा न होता तो बाद में मूढ़ावस्था के समान उसका
स्मरण न होता। उस अवस्था के कारण ही सदा प्रकाशमान आत्मा स्मृति का विषय बन
जाती है। आत्मा देखकर ही तो स्मरण करती है। अतः वह चिद्रूप एवं नित्योदित है।
यही कारण है—'कि गुरु से उपदेश प्राप्त करके आदरपूर्वक उसका सम्मान करना
चाहिए। अभी तक ऐसा लगता है मानों दो अवस्थायें हों—१) स्मर्ता २) स्मर्तव्य। इनमें
कौन नित्य है और कौन अनित्य?—इसका विचार अगली कारिका में किया गया है।
'अवस्थाद्वयमात्राऽस्ति स्मर्तृस्मर्तव्यभेदतः।
यत्तस्य नित्यनित्यत्वविचारायेदमुच्यते ॥'२
नाभावो = न + अभावो। अभावो = वस्तुशून्यता।
भाव्यतां = भवनीयत्वं। 'समाधावालम्बनभावं।' समाधि में स्थित आत्मालम्बन।
नैति = नहीं जाता है। (क्योंकि अभाव एवं भाव की भावना में परस्पर विरोध है)
१. स्पन्दनिर्णय। २. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका'।
प्रथमः निष्यन्दः १८३
भाव = संविद्विषयतायोग्यपदार्थ। यह ध्येय के रूप में आलम्बन का विषय बन
सकता है। एक स्थान पर कहा गया है—
'अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत्॥'
ध्यान, ध्यातृ एवं ध्येय रूप विकल्पों के उच्छेदस्वरूप जो समाधि की अवस्था है
उसे ही आत्मतत्त्व का विस्मरण करने वाले (अज्ञ) लोग 'अभाव' मानते हैं।
तत्र = वहाँ। उस अवस्था विशेष में।
अमूढ़ता = मूढ़ता का अभाव॥
'यतोऽभियोगसंस्पर्शात्' = व्युत्थानावस्था में उसी प्रकार की दशा अन्तरा-
नुसंधान का विषय के रूप में गृहीत अभियोग के द्वारा तत्समय प्रत्युदित अभिलाप से
होने वाले संस्पर्श या संपर्क से।
तदासीत्—तद् + आसीत्। 'तद्' = दशान्तर। वह दशान्तर। 'आसीत्' =
था। (अभूत्)॥
इति निश्चयः = अध्यवसाय। (अध्यवसायः स्यात्)॥
अभाव समाधिलब्धप्रतिष्ठ योगी व्युत्थानावस्था में अवस्थित होने पर यदि उस
अवस्था का अनुसंधान न कर पाये तब भला हम उसे लब्ध प्रतिष्ठ कैसे कह सकते हैं ?
और वह भी अपने को उस प्रकार का कैसे समझ सकता है ? उसके ऐसा न होने पर
समाधि और व्युत्थान इन दोनों में कोई व्यतिरेक (पृथक्ता) रह ही नहीं जाएगी। अर्थात्
उसकी व्युत्थानावस्था एवं समाधि दोनों में कोई अन्तर रह ही नहीं जाएगा। भाव यह है
कि उसे समाधि का अनुभव हो ही नहीं पायेगा। हाँ, उस अभाव की अवस्था की प्राप्ति
के कारण इतना स्मरण अवश्य बना रहेगा कि मैंने उसका अनुभव अवश्य किया था।१
बारहवीं कारिका के भाव को स्फुटीकृत करने के लिए ग्रन्थकार ने तेरहवीं कारिका
कही।
अतः = इसलिए। 'वह अनुभव मुझे कभी भूतकाल में हुआ था'—ऐसा
अभियुज्यमान होने के कारण।
तत् = वह। 'अभावसमाधि' नामक वस्तु।
कृत्रिमं ज्ञेयं—बनावटी समझना चाहिए अर्थात् भावाभावदशा के योग के कारण
उसे काल्पनिक एवं अनित्य समझना चाहिए।
सदा—सदैव। अर्थात् ऐसी कोई कालकला संभव नहीं हो पाती जिसमें कि उस
प्रकार की समाधि की अवस्था नित्य रूप में स्थित रह सकें।
इसे किस प्रकार की कृत्रिमता समझा जाय? इसे सुषुप्तावस्था के समान अर्थात्
सुखपूर्ण निद्रा ('सुखस्वापावस्था') के समान वाले पद (संविदधिकरण) के तुल्य समझना
चाहिए॥
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
१८४ स्पन्दकारिका
ऐसा क्यों कहा जाय? जिस प्रकार लौकिकी सुषुप्तावस्था अत्यधिक मोहात्मक
होने के कारण सत् होते हुए भी उसमें वेद्य एवं वेदक की भिन्नता नहीं रहती। वेद्य एवं
वेदक की भिन्नता को तत्काल ग्रहण न कर, परन्तु उसके अभावरूपात्मक होने के कारण
जागने पर उसे खोजने पर यही प्रतीत होता है कि उसकी अनुभूति केवल भूतकाल में हुई
थी किन्तु अब वर्तमान में उसकी सत्ता नहीं है—अतः वह अनित्य है—इसी प्रकार अभाव
समाधि की अवस्था भी व्युत्थान के समय अनित्य ही है। कारण यह है कि स्वप्न एवं
अभाव समाधि दोनों में ही अनुभव की सत्ता वर्तमान में नहीं रहती केवल उनकी स्मृतियाँ
मात्र शेष रहती है अतः दोनों के लक्षणों में समानता है। अतः ये सभी इस प्रकार की
समाधियों के प्रकार सुषुप्तावस्था में ही अन्तर्भूत हैं उनसे पृथक् नहीं हैं।—इसी तथ्य को
ग्रन्थकार ने—'अतस्तत्कृतं ..... सदा' कारिका में प्रतिपादित किया है।
न तु—न तो। (पुनः)
तत् तत्त्वम् = वह तत्त्व। इस प्रकरण में उपादेयतम रूप में पूर्वोपदिष्ट
स्वस्वभावलक्षण सद्वस्तु ॥
एवम्—इस प्रकार। उपर्युक्त प्रकार से।
'स्मर्यमाणत्वं प्रतिपद्यते' = अतीत के स्मरण मात्र का विषय बन कर नहीं रह
जाती। संस्मरण का विषय नहीं बनती प्रत्युत् वह वर्तमान में भी सद्वस्तु के रूप में
विद्यमान रहती है क्योंकि समाधि और उसके अनुभव तथा परतत्त्व नित्योदित तथा सदा
वर्तमान रहा करते हैं। कहा भी गया है—
'अतोऽभावभावनया समाधिलब्धभूमिकस्यापि' १
अभाव की धारणा कल्पित करने पर अभाव रहता ही नहीं। जड़ता (मूढ़ता) भी
विद्यमान नहीं है प्रत्युत इसके विपरीत चेतना विद्यमान है। इस तर्क के द्वारा समस्त भाव
(Existence) केवल विचार या धारणा की परिपक्वता की स्थिति में कल्पना की सृष्टि
के रूप में प्रस्तुत होता है।
जीवन का परम लक्ष्य शून्य की धारणा या विश्व के अभाव (शून्य) की कल्पना से
तो कभी अधिगत नहीं किया जा सकता।
पूर्व पक्ष का तर्क—प्रतिवादी तर्क करता है कि विश्व का ध्वंस या शून्य नागार्जुन
के द्वारा कल्पित शून्य (Vacuum) से अभिन्न है जिन्होंने कहा था कि शून्यता (Vacu-
ity) वह तत्त्व है जिसमें गुणों का अभाव है, समस्त श्रेणियों का अभाव है, सभी सुखों
एवं दुःखों का अभाव है—समस्त इच्छाओं का अभाव है किन्तु जो वस्तुतः अभाव या
शून्य नहीं है—
'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः।
सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥'
उत्तर पक्ष का तर्क—ग्रन्थकार का कथन है कि—हाँ यह तो ऐसा ही है किन्तु
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
प्रथमः निष्यन्दः १८५
यदि शुद्ध बुद्धि एवं आनन्द के स्वतन्त्र एवं परम स्वभाव को मूलाधार (Subtratum)
मान लिया जाय तो । 'विज्ञानभैरव' भी इस सत्य को स्वीकार करता है कि परमात्मा देश
और काल की सीमा से ऊपर है और वह शून्यवत् है जिसमें कि चेतना की दशा
परमाधार रूप में स्थित है। यदि इस दृष्टि से शून्य पर विचार किया जाय तो यह मान्य
है अन्यथा 'न शून्यं परमार्थतः' का कोई अर्थ ही नहीं है।
'आलोकमाला' नामक ग्रन्थ में इन सब पर प्रकाश डाला जा चुका है जिसमें
कहा गया है कि 'वह परिभाषा से परे (अनिर्वचनीय) दशा ही शून्यता है जो कि
विद्वज्जनों के लिए भी अगम्य एवं अज्ञेय है। इसका वह सामान्य अर्थ जो कि नास्तिक
प्रस्तुत करते हैं—वस्तुतः वह सत्य नहीं है।'
प्रतिवादी का यह कथन सत्य है कि परम सत्य अवर्णनीय है—अज्ञेय है—अतः
अभिव्यक्ति से परे है—किन्तु उसे 'शून्य' या 'अभाव' (Naught, vacuum, non-
existence) कैसे कहा जा सकता है? यहाँ तक कि शून्य या अभाव को भी कल्पना
के द्वारा समझा जा सकता है—वह भी ज्ञेय है। यदि प्रतिवादी पक्ष इस परम सत्ता को
नहीं समझ पाते तो उसे चाहिए कि वह इसके साक्षात्कार कर्ता या अनुभावक परमर्षियों
से शिक्षा ग्रहण करें। किन्तु यह उचित नहीं है कि वे स्वयं अपने को एवं अपने
अनुयायियों को निरालम्ब पाताल या खोह में फेंक दें। उन्हें यह कैसे ज्ञात हुआ कि
जड़ता है?—
इसी के उत्तर में कहा गया है कि—'यतोऽभियोगसंस्पर्शात् तदासीदिति निश्चयः ॥'
यह 'अभियोग' या घोषणा (Declaration) कि 'मैं था'—यह भी सूचित करता
है कि—'वह है'—'मैं पूर्णतः जड़ था।' जड़ता की यह अवस्था कृत्रिम है क्योंकि वह
स्मर्यमाण है। वह अवस्था अनुभव में आने पर सत्ता (भाव) को सूचित करती है न कि
शून्य या अभाव को। वह वर्तमान में विद्यमान उस विचारक के अस्तित्व को प्रमाणित
करती है न कि उसके अभाव को। चेतना का स्वरूप प्रलय के समय भी पूर्ण रहता है
अतः सत्य तो यह है कि अभाव की सत्ता है ही नहीं।
पूर्वपक्ष—नील, पीत आदि का स्मरण तो तब रहता है जब कि ये पहले कभी
देखे जा चुके हों और पूर्वकाल में सुनिर्णीत हों। लेकिन जो शून्य में लय हो चुका हो
और जिसकी निर्णयात्मिका शक्ति भी लय के कारण समाप्त हो चुकी हो उसके लिए तो
निर्णय करना ही असंभव है। फिर यह कैसे कहा गया कि परवर्ती निर्णय के समक्ष
जड़ता का अस्तित्व है अर्थात्—'वह था'।
उत्तर पक्ष—यह ज्ञेय का धर्म या गुण है कि उसे विचारक के द्वारा तब तक याद
नहीं किया जा सकता जब तक कि आत्मा में उसका संस्कार नहीं पड़ जाता। ज्ञेय 'यह'
के रूप में कभी सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। अपने शून्य की काल्पनिक दशा में
सीमित ज्ञाता परम ज्ञातृत्व बन कर ही रहता है। वह अपने से पृथक् नहीं रह सकता
अतः निर्णय तो उसी का है—यह सिद्ध हुआ।
१८६ स्पन्दकारिका
अभाववाद, सर्वशून्यवाद का खण्डन—माध्यमिक सम्प्रदाय के शून्यवादी बौद्ध
एवं अभावब्रह्मवादी दार्शनिक कहते हैं कि सर्वोच्च सत्य 'शून्य' एवं 'अभाव' है। स्पन्द
तत्त्व पूर्ण ज्ञान मय एवं पूर्णकर्तृत्वशाली है। अभाववादी कहते हैं कि शरीर, मन, बुद्धि
चित्त, अहङ्कार, इन्द्रियाँ एवं उनके विषय आदि सभी अनात्म पदार्थों का निषेध करते
करते केवल सर्वत्र अभाव ही अभाव दृष्टिगोचर होता है और आत्मा इसी अभाव में लय
हो जाती है।
वृत्तिकार भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—(१) यह कथन संगत नहीं है
कि—'तब तक अभाव की कल्पना एवं उसका अभ्यास करना चाहिए जब तक कि
आत्मा अभाव में लीन न हो जाय ।।'—तर्क यह है कि 'अभाव' भावना का विषय बन
ही नहीं सकता। अभाव एक अस्तित्त्व-शून्यता या जड़ता की अवस्था है अतः उसको
भावना का विषय नहीं बनाया जा सकता।
(२) अभाव-भावना मूढ़ता की अवस्था है क्योंकि समाधि काल के पश्चात् जब
ऐसे योगी को अभियोग (भाषण के साथ संबन्ध) हो जाता है तब वह उस समाधि की
अवस्था को—'वह मेरी शून्यावस्था थी'—इस प्रकार स्मृति के रूप में अनुभव करता है।
(३) आत्मा का स्वभाव इसके विपरीत है। सतत उदित होने के कारण आत्मा
की चित् स्वरूपता का इस प्रकार अनुभव नहीं किया जाता जिस प्रकार मूढ़ता का।
(४) चित्त्व तो शाश्वत रूप में उदित रहने वाली सत्ता है। उसका अनुभव
सार्वकालिक एवं अनुभवित्ता के रूप में—स्वतन्त्र चैतन्य प्रमाता के रूप में—होता है।
(५) अभाववादी प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा है। छान्दोग्योपनिषद
(३.१९.१) में कहा गया है—'असदेवेदमग्र आसीत्' अर्थात् सृष्टि के आरंभ में कुछ
भी नहीं था मात्र था तो केवल 'असत्'। यह असत् ही सृष्टि का प्रथम तत्त्व था।
यह सिद्धान्त मानता है कि—'असतः सज्जायत्'।
अभाव ब्रह्मवाद—अर्थात् असत् रूप कारण से भाव रूप (सद्रूप) कार्य की
उत्पत्ति हुई। इस भावरूप में दृष्टिगत जगत् की सृष्टि के पूर्व किसी भी पदार्थ की सत्ता
भाव रूप में नहीं थी। अतः चतुर्दिक अभाव का ही साम्राज्य था। इस अभाव से ही
भावरूप जगत् की संरचना हुई।
श्रुति (छा. ३.१९.१) भी कहती है—सृष्टि से पूर्व असत् मात्र था अर्थात् सृष्टि में
मात्र अभाव ही अभाव था। प्रलय की दशा में भी सभी विश्व अभाव—असत् में लीन हो
जाएगा। अतः ब्रह्म का यथार्थ स्वरूप भी अभाव ही है। अभाव का निरन्तराभ्यास एवं
संतत ध्यान करने से समस्त सांसारिक द्वैत का मूलोच्छेद हो जाता है। वेदक एवं दोनों
सत्ताएँ भी अन्ततः प्रलय काल में अभाव में लय हो जाएगी। इस दृष्टि के अनुसार
अभाव में लय हो जाना ही जीवात्मा की मुक्ति है। 'अभाव समाधि' ही सिद्धि प्राप्त होने
पर अभावरूप परब्रह्म में आत्मा का लय ही उसका मोक्ष है।
शून्यवाद—माध्यमिक सम्प्रदाय के शून्यवादी आचार्यों की मान्यता यह है कि
प्रथमः निष्यन्दः १८७
‘शून्य’ ही परमतत्त्व है । नागार्जुन प्रभृति दार्शनिकों ने ‘सर्वशून्यवाद’ की स्थापना की
ओर समस्त सत्ताओं का निषेध किया गया । अभिनवगुप्तपादाचार्य ने अपने ‘तन्त्रालोक’
नामक ग्रन्थ में इसे ‘सर्वापह्नवहेवाक धर्मा’ कहा । ये दार्शनिक सत्ता के प्रत्येक प्रमाता,
प्रमेय, प्रज्ञा आदि के अनस्तित्त्व को स्वीकार करते हैं । समस्त विश्व शून्य का विवर्त
होता है ।
१) मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत् ॥
२) न सत् नासन् न सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् ।
चतुष्कोटि विनिर्मुक्तत्वं माध्यमिको गुरुः ॥
‘शून्य’ न सत् है, न असत् है, न सदसत् है, प्रत्युत् यह चतुष्कोटिविनिर्मुक्त तत्त्व
है: ‘चतुष्कोटि विनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ।’¹
१) शून्यवाद के अनुसार विश्व शून्य का विवर्त है । शून्य ही पारमार्थिक
सत्य है ।
२) विज्ञानवाद के अनुसार विश्व विज्ञान का विवर्त है ।
३) शान्त ब्रह्मवाद के अनुसार विश्व ब्रह्म का विवर्त है ।
४) व्याकरण-दर्शन के अनुसार विश्व शब्द का विवर्त है ।
‘विवर्ततेऽर्थभावेन जगत्प्रक्रिया यथा ॥’
५) आभासवाद के अनुसार विश्व केवल आभास है ।
६) प्रतिबिम्बवाद के अनुसार विश्व केवल सत्य का प्रतिबिम्ब है ।
७) स्वातन्त्र्यवाद के अनुसार विश्व स्पन्द की सिसृक्षा—इच्छा है ।
‘इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः’ (माण्डूक्यकारिका)
‘मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्’ (शून्यवाद)
८) भास्कराचार्य ने जगत् को ‘अविकृतपरिणाम’ कहा ।
९) रामानुजाचार्य ने जगत् को ‘परिणाम’ कहा ।
१०) गौड़पादाचार्य (अजातिवाद) यदि जगत् हो तब उसके स्वरूप के विषय में
कहा जाय कि वह सत् है कि असत्, विवर्त है कि परिणाम, आभास है कि प्रतिबिम्ब ।
यथार्थ तो यह है कि जगत् है ही नहीं ।
११) शङ्कराचार्य = जगत् न सत् है न असत् न सत्य है न मिथ्या है प्रत्युत् यह
है ‘अनिर्वचनीय’ ‘अनिर्वचनीयतावाद’ ॥
बौद्धों का शून्यवाद भी यही मानता है कि जगत, सत, असत्, सदसत् एवं सद-
सत से भिन्न-इन समस्त कोटियों से परे है—
‘न सत् नासन् सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् ।
चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥’
१. माध्यमिककारिका ।