स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
Page 285 of 519
Read in context१८४ स्पन्दकारिका
ऐसा क्यों कहा जाय? जिस प्रकार लौकिकी सुषुप्तावस्था अत्यधिक मोहात्मक
होने के कारण सत् होते हुए भी उसमें वेद्य एवं वेदक की भिन्नता नहीं रहती। वेद्य एवं
वेदक की भिन्नता को तत्काल ग्रहण न कर, परन्तु उसके अभावरूपात्मक होने के कारण
जागने पर उसे खोजने पर यही प्रतीत होता है कि उसकी अनुभूति केवल भूतकाल में हुई
थी किन्तु अब वर्तमान में उसकी सत्ता नहीं है—अतः वह अनित्य है—इसी प्रकार अभाव
समाधि की अवस्था भी व्युत्थान के समय अनित्य ही है। कारण यह है कि स्वप्न एवं
अभाव समाधि दोनों में ही अनुभव की सत्ता वर्तमान में नहीं रहती केवल उनकी स्मृतियाँ
मात्र शेष रहती है अतः दोनों के लक्षणों में समानता है। अतः ये सभी इस प्रकार की
समाधियों के प्रकार सुषुप्तावस्था में ही अन्तर्भूत हैं उनसे पृथक् नहीं हैं।—इसी तथ्य को
ग्रन्थकार ने—'अतस्तत्कृतं ..... सदा' कारिका में प्रतिपादित किया है।
न तु—न तो। (पुनः)
तत् तत्त्वम् = वह तत्त्व। इस प्रकरण में उपादेयतम रूप में पूर्वोपदिष्ट
स्वस्वभावलक्षण सद्वस्तु ॥
एवम्—इस प्रकार। उपर्युक्त प्रकार से।
'स्मर्यमाणत्वं प्रतिपद्यते' = अतीत के स्मरण मात्र का विषय बन कर नहीं रह
जाती। संस्मरण का विषय नहीं बनती प्रत्युत् वह वर्तमान में भी सद्वस्तु के रूप में
विद्यमान रहती है क्योंकि समाधि और उसके अनुभव तथा परतत्त्व नित्योदित तथा सदा
वर्तमान रहा करते हैं। कहा भी गया है—
'अतोऽभावभावनया समाधिलब्धभूमिकस्यापि' १
अभाव की धारणा कल्पित करने पर अभाव रहता ही नहीं। जड़ता (मूढ़ता) भी
विद्यमान नहीं है प्रत्युत इसके विपरीत चेतना विद्यमान है। इस तर्क के द्वारा समस्त भाव
(Existence) केवल विचार या धारणा की परिपक्वता की स्थिति में कल्पना की सृष्टि
के रूप में प्रस्तुत होता है।
जीवन का परम लक्ष्य शून्य की धारणा या विश्व के अभाव (शून्य) की कल्पना से
तो कभी अधिगत नहीं किया जा सकता।
पूर्व पक्ष का तर्क—प्रतिवादी तर्क करता है कि विश्व का ध्वंस या शून्य नागार्जुन
के द्वारा कल्पित शून्य (Vacuum) से अभिन्न है जिन्होंने कहा था कि शून्यता (Vacu-
ity) वह तत्त्व है जिसमें गुणों का अभाव है, समस्त श्रेणियों का अभाव है, सभी सुखों
एवं दुःखों का अभाव है—समस्त इच्छाओं का अभाव है किन्तु जो वस्तुतः अभाव या
शून्य नहीं है—
'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः।
सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥'
उत्तर पक्ष का तर्क—ग्रन्थकार का कथन है कि—हाँ यह तो ऐसा ही है किन्तु
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।