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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 287 of 519

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Page 287

१८६ स्पन्दकारिका
अभाववाद, सर्वशून्यवाद का खण्डन—माध्यमिक सम्प्रदाय के शून्यवादी बौद्ध
एवं अभावब्रह्मवादी दार्शनिक कहते हैं कि सर्वोच्च सत्य 'शून्य' एवं 'अभाव' है। स्पन्द
तत्त्व पूर्ण ज्ञान मय एवं पूर्णकर्तृत्वशाली है। अभाववादी कहते हैं कि शरीर, मन, बुद्धि
चित्त, अहङ्कार, इन्द्रियाँ एवं उनके विषय आदि सभी अनात्म पदार्थों का निषेध करते
करते केवल सर्वत्र अभाव ही अभाव दृष्टिगोचर होता है और आत्मा इसी अभाव में लय
हो जाती है।
वृत्तिकार भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—(१) यह कथन संगत नहीं है
कि—'तब तक अभाव की कल्पना एवं उसका अभ्यास करना चाहिए जब तक कि
आत्मा अभाव में लीन न हो जाय ।।'—तर्क यह है कि 'अभाव' भावना का विषय बन
ही नहीं सकता। अभाव एक अस्तित्त्व-शून्यता या जड़ता की अवस्था है अतः उसको
भावना का विषय नहीं बनाया जा सकता।
(२) अभाव-भावना मूढ़ता की अवस्था है क्योंकि समाधि काल के पश्चात् जब
ऐसे योगी को अभियोग (भाषण के साथ संबन्ध) हो जाता है तब वह उस समाधि की
अवस्था को—'वह मेरी शून्यावस्था थी'—इस प्रकार स्मृति के रूप में अनुभव करता है।
(३) आत्मा का स्वभाव इसके विपरीत है। सतत उदित होने के कारण आत्मा
की चित् स्वरूपता का इस प्रकार अनुभव नहीं किया जाता जिस प्रकार मूढ़ता का।
(४) चित्त्व तो शाश्वत रूप में उदित रहने वाली सत्ता है। उसका अनुभव
सार्वकालिक एवं अनुभवित्ता के रूप में—स्वतन्त्र चैतन्य प्रमाता के रूप में—होता है।
(५) अभाववादी प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा है। छान्दोग्योपनिषद
(३.१९.१) में कहा गया है—'असदेवेदमग्र आसीत्' अर्थात् सृष्टि के आरंभ में कुछ
भी नहीं था मात्र था तो केवल 'असत्'। यह असत् ही सृष्टि का प्रथम तत्त्व था।
यह सिद्धान्त मानता है कि—'असतः सज्जायत्'।
अभाव ब्रह्मवाद—अर्थात् असत् रूप कारण से भाव रूप (सद्रूप) कार्य की
उत्पत्ति हुई। इस भावरूप में दृष्टिगत जगत् की सृष्टि के पूर्व किसी भी पदार्थ की सत्ता
भाव रूप में नहीं थी। अतः चतुर्दिक अभाव का ही साम्राज्य था। इस अभाव से ही
भावरूप जगत् की संरचना हुई।
श्रुति (छा. ३.१९.१) भी कहती है—सृष्टि से पूर्व असत् मात्र था अर्थात् सृष्टि में
मात्र अभाव ही अभाव था। प्रलय की दशा में भी सभी विश्व अभाव—असत् में लीन हो
जाएगा। अतः ब्रह्म का यथार्थ स्वरूप भी अभाव ही है। अभाव का निरन्तराभ्यास एवं
संतत ध्यान करने से समस्त सांसारिक द्वैत का मूलोच्छेद हो जाता है। वेदक एवं दोनों
सत्ताएँ भी अन्ततः प्रलय काल में अभाव में लय हो जाएगी। इस दृष्टि के अनुसार
अभाव में लय हो जाना ही जीवात्मा की मुक्ति है। 'अभाव समाधि' ही सिद्धि प्राप्त होने
पर अभावरूप परब्रह्म में आत्मा का लय ही उसका मोक्ष है।
शून्यवाद—माध्यमिक सम्प्रदाय के शून्यवादी आचार्यों की मान्यता यह है कि