Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 286 of 519

Read in context
Page 286

प्रथमः निष्यन्दः १८५
यदि शुद्ध बुद्धि एवं आनन्द के स्वतन्त्र एवं परम स्वभाव को मूलाधार (Subtratum)
मान लिया जाय तो । 'विज्ञानभैरव' भी इस सत्य को स्वीकार करता है कि परमात्मा देश
और काल की सीमा से ऊपर है और वह शून्यवत् है जिसमें कि चेतना की दशा
परमाधार रूप में स्थित है। यदि इस दृष्टि से शून्य पर विचार किया जाय तो यह मान्य
है अन्यथा 'न शून्यं परमार्थतः' का कोई अर्थ ही नहीं है।
'आलोकमाला' नामक ग्रन्थ में इन सब पर प्रकाश डाला जा चुका है जिसमें
कहा गया है कि 'वह परिभाषा से परे (अनिर्वचनीय) दशा ही शून्यता है जो कि
विद्वज्जनों के लिए भी अगम्य एवं अज्ञेय है। इसका वह सामान्य अर्थ जो कि नास्तिक
प्रस्तुत करते हैं—वस्तुतः वह सत्य नहीं है।'
प्रतिवादी का यह कथन सत्य है कि परम सत्य अवर्णनीय है—अज्ञेय है—अतः
अभिव्यक्ति से परे है—किन्तु उसे 'शून्य' या 'अभाव' (Naught, vacuum, non-
existence) कैसे कहा जा सकता है? यहाँ तक कि शून्य या अभाव को भी कल्पना
के द्वारा समझा जा सकता है—वह भी ज्ञेय है। यदि प्रतिवादी पक्ष इस परम सत्ता को
नहीं समझ पाते तो उसे चाहिए कि वह इसके साक्षात्कार कर्ता या अनुभावक परमर्षियों
से शिक्षा ग्रहण करें। किन्तु यह उचित नहीं है कि वे स्वयं अपने को एवं अपने
अनुयायियों को निरालम्ब पाताल या खोह में फेंक दें। उन्हें यह कैसे ज्ञात हुआ कि
जड़ता है?—
इसी के उत्तर में कहा गया है कि—'यतोऽभियोगसंस्पर्शात् तदासीदिति निश्चयः ॥'
यह 'अभियोग' या घोषणा (Declaration) कि 'मैं था'—यह भी सूचित करता
है कि—'वह है'—'मैं पूर्णतः जड़ था।' जड़ता की यह अवस्था कृत्रिम है क्योंकि वह
स्मर्यमाण है। वह अवस्था अनुभव में आने पर सत्ता (भाव) को सूचित करती है न कि
शून्य या अभाव को। वह वर्तमान में विद्यमान उस विचारक के अस्तित्व को प्रमाणित
करती है न कि उसके अभाव को। चेतना का स्वरूप प्रलय के समय भी पूर्ण रहता है
अतः सत्य तो यह है कि अभाव की सत्ता है ही नहीं।
पूर्वपक्ष—नील, पीत आदि का स्मरण तो तब रहता है जब कि ये पहले कभी
देखे जा चुके हों और पूर्वकाल में सुनिर्णीत हों। लेकिन जो शून्य में लय हो चुका हो
और जिसकी निर्णयात्मिका शक्ति भी लय के कारण समाप्त हो चुकी हो उसके लिए तो
निर्णय करना ही असंभव है। फिर यह कैसे कहा गया कि परवर्ती निर्णय के समक्ष
जड़ता का अस्तित्व है अर्थात्—'वह था'।
उत्तर पक्ष—यह ज्ञेय का धर्म या गुण है कि उसे विचारक के द्वारा तब तक याद
नहीं किया जा सकता जब तक कि आत्मा में उसका संस्कार नहीं पड़ जाता। ज्ञेय 'यह'
के रूप में कभी सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। अपने शून्य की काल्पनिक दशा में
सीमित ज्ञाता परम ज्ञातृत्व बन कर ही रहता है। वह अपने से पृथक् नहीं रह सकता
अतः निर्णय तो उसी का है—यह सिद्ध हुआ।