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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 270 of 519

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Page 270

प्रथमः निष्यन्दः १६९
शिवभाव में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस अवस्था विशेष में किसी भी प्रकार की स्फुरणा
नहीं होती तथा वह तरंग-हीन समुद्र की भाँति प्रशान्त एवं निस्पन्द है । सूत्रकार का
कथन है कि क्षोभ के विलीन हो जाने पर इसका मितप्रमाता स्वभावसिद्ध ज्ञातृत्व एवं
कर्तृत्व धर्म को निरावृत रूप में प्रकट होता है जिससे कि यह प्रमाता आकांक्षित विषयों
को स्वातन्त्र्यपूर्वक जानता भी है तथा अभीष्ट कार्यों का निष्पादन भी करता है ।
वृत्तिकार भट्टकल्लट कहते हैं—
यदि क्षोभ का ग्रहण अस्त हो जाता है तो ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व, (जो कि आत्मा
का स्वाभाविक धर्म है) के ऊपर से मितज्ञातृत्व एवं मितकर्तृत्व का प्रतिबन्धक अवरोध
हट जाता है और आत्मा अपने सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व की अपनी अमित शक्ति के
साथ प्रोज्ज्वलित हो उठता है । इस अवस्था में मितप्रमाता की संकुचित सीमाओं की
प्राचीर को भंग करके वह सब कुछ जान लेता है और सब कुछ कर सकने की क्षमता
प्राप्त कर लेता है 'यतः तस्मिन् प्रलीनक्षोभात्मके काले अकृत्रिमः सहजो ज्ञत्वकर्तृत्व-
भावरूपो धर्मो यस्मात्, तस्मिन् एवं प्राप्तयोगात्मके काले यत् तद् ज्ञातुम् इच्छति तत्
तत् जानाति च करोति च, नान्यथा संसार्यावस्थायाम् ।।'१
'शान्तब्रह्मवाद' और पञ्चकृत्यकारी शिव का सर्वकर्तृत्ववाद—
१. 'माण्डूक्योपनिषद्'—में परमात्मा को 'शान्त' कहा है और उसके अनेक
लक्षणों की ओर इंगित किया है । यथा—अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण,
अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, प्रपञ्चोपशम, शान्त, शिव एवं अद्वैत-'अदृष्ट-
मव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवम-
द्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥'
आचार्य शङ्कर ने (शाङ्कर भाष्य) में 'शान्त' का अर्थ—यह स्वीकार किया है कि
परमात्मा—जाग्रदादि अवस्थाओं के धर्म से रहित है—'प्रपञ्चोपशममिति जाग्रदादिस्थान-
धर्माभाव उच्यते । अतएव शान्तमविक्रियम्'२
'शान्त'—१) जाग्रदादि अवस्थाओं के धर्मों से रहित ।
२) अविकारी-'अविक्रिय' ।
इस दृष्टि से तो शाङ्कर मत के विरोध का प्रश्न ही नहीं उठता किन्तु यदि 'शान्त'
का अर्थ—'निष्क्रिय' 'निस्पन्द' माना जाय तब अवश्य इसे 'शान्तब्रह्मवाद' से सम्बद्ध
मानकर इसका शैव दर्शन विरोध करता है ।
'परमार्थचर्चा' के 'विवरण' में हरभट्ट ने 'शान्तब्रह्मवाद' के विरुद्ध अनेक प्रश्न
उठाये हैं—
१) शान्त ब्रह्मवादी परमात्मा को उदासीन (क्रियाशून्य) मानते हैं तो वे यह बताएँ
कि फिर ऐसा उदासीन परमात्मा विश्व को आभासित कैसे करेगा?
१. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व' । २. शांकरभाष्य (माण्डूक्योपनिषद) ।