Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 275 of 519

Read in context
Page 275

१७४ स्पन्दकारिका
संदेश देना चाहते हैं सर्वानुस्यूतता, सर्वव्यापकता आदि पारमात्मिक वैभव मात्र परमात्मा
में ही नहीं प्रत्युत् प्रत्येक आत्मा में है और वह वैभव (शक्ति या धर्म) उसका आगन्तुक,
क्षणिक या कृत्रिम धर्म नहीं है प्रत्युत् वह उसका 'स्वभाव' (आत्मधर्म) है।
कुसृतिः—'कुत्सिता जन्ममरणादि प्रबन्धरूपा सृतिः प्रवृत्तिः।'
स्मयमान = विस्मयाविष्ट। ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में, वैचित्य एवं अनन्त,
वैभिन्यों में एक ही अभेदात्मक सत्ता को देखकर एवं भेदात्मक विश्व में मात्र अद्वैत, अभेद
को ही पारमार्थिक सत्य के रूप में साक्षात्कृत करके ऐसा योगी आश्चर्य से भर जाता है।
'तमधिष्ठातृभावेन' = 'सर्वव्यापकत्वेन'—भट्टकल्लट ॥
जो साधक ध्यान एवं ध्यानाभाव में, अपनी स्पंद शक्ति के द्वारा, ऐकात्म्य या
सामञ्जस्य स्थापित कर लेता है उसके लिए यह जीवन एवं मृत्यु का संसार अस्तित्व में
नहीं रहता। व्युत्थान के समय भी योगी, स्पंदतत्व से एकीभूत एवं अभिन्न अपने
स्वभाव को दृढ़ता से देखता है। योगी अपने स्पन्दतत्त्वात्मक स्वभाव को व्युत्थान दशा
में भी अधिष्ठातृभाव पूर्वक देखता है।१
'न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरुद्रूपा विकसिते।
निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपधृक्॥' (वि०भै० २६)
कक्ष्यास्तोत्र में कहा गया है—
'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः,
स्वे स्वे यौगपद्येन विष्वक्।
क्षिप्त्वा मध्ये हाटकास्तंभभूत-,
स्तिष्ठन्विश्वाकार एकोऽवभासि॥'
'विज्ञानभैरव' एवं 'कक्ष्यास्तोत्र' द्वारा कथित इन श्लोकों से निर्दिष्ट इस संप्रदाय-
संमत निमीलन-उन्मीलन समाधि द्वारा एक साथ व्यापक मध्य भूमि के अवष्टंभ से अध्य-
सित, दोनों विसर्ग-अरणि से विगलित विकल्प उपक्रम से इन्द्रिय समूह स्फारित हैं।२
अन्तर्लक्ष्य बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जितः।
इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता॥
इस साधना का आश्रय लेकर (इसी भैरवी मुद्रा को साधकर), दर्पण में उन्म-
ज्जित, निमज्जित, प्रादुर्भूत एवं तिरोहित होने वाले नाना प्रतिबिम्ब-कदम्बकों की भाँति
चिदाकाश में भी प्रादुर्भूत एवं तिरोहित होने वाले जगत, जगत् के विभिन्न रूप एवं सुख-
दुःख, नील-पीत की अयथार्थता का पारमार्थिक साक्षात्कार करते हुए योगी सहस्रों जन्मों
को एक साथ देखकर एवं अपने स्वस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा करके विस्मयाविष्ट हो उठता
है।३ ऐसी स्थिति में जन्ममरणकारिणी कुत्सिता प्रवृत्ति भला कैसे प्रादुर्भूत हो सकती है?
उस पर तो विष का भी प्रभाव नहीं पड़ता—
१-३. स्पन्दनिर्णय।