स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context१७२ स्पन्दकारिका
स्वात्मोच्छलनात्मक स्फुरणा ही चैतन्य का शाश्वत स्वस्वभाव है। चाहे पति
प्रमाता हो चाहे पशुप्रमाता दोनों का प्रमातृत्व इसका ऋणी है।
सर्वज्ञ, सर्वकर्ता अनुत्तर तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' की सामर्थ्य से सब कुछ
जानता भी है और सब कुछ करता भी है उदासीन, निरपेक्ष साक्षी मात्र बनकर नहीं रहता।
संवित् का यथार्थ स्वरूप अहंविमर्शात्मक स्फुरणा है। स्वतन्त्र कर्ता संविदात्मक
है। विश्वात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व की अहंविमर्शमयी स्फुरणा ही संवित् का अकृत्रिम
स्वभाव है।
प्रमाताओं की मुख्यतः दो श्रेणियाँ हैं—(१) पतिप्रमाता, (२) पशुप्रमाता ।
कार्यों के कारणसमूह का संयोजन—वियोजन करने में स्वतंत्र कर्ता तो मात्र शिव
ही है क्योंकि विश्वात्मक ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व की अहं विमर्शमयी स्फुरणा का वह स्वामी
है किन्तु मितप्रमाता (पशु) भी अपनी पशु भूमिका में संयोजन-वियोजन की क्षमता रखता
है क्योंकि संवित् सक्रिय है और वह संवित् पशुओं में भी है अतः ज्ञाता-कर्ता के व्यापार
की क्रिया में दोनों में कोई भेद नहीं है हाँ अन्तर है तो उसकी मात्रा में यथा—
१) पतिभूमिका—सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व' पूर्ण तृप्ति आदि ॥
२) पशुभूमिका—सर्वकर्तृत्व, किंचिद् ज्ञातृत्व, किंचिद् तृप्ति आदि ॥
पशु अपने संविदात्मक स्वरूप को विस्मृत कर देने के कारण 'पति' से 'पशु' बन
जाता है किन्तु देहादिक में अहंभाव का त्याग करने एवं 'संवित्स्वरूपोऽहं, विश्वविभ-
वोऽहं, सर्वज्ञातृत्व-कर्तृत्व शक्ति संपन्नोऽहं, शिवोऽहं' की प्रत्यभिज्ञा होते ही उसके
समस्त पाशों का उच्छेद हो जाता है और वह 'पशु' से 'पशुपति' बन जाता है। इस
मितप्रमातृत्व के स्थान पर अमितप्रमातृत्व की प्राप्ति ही 'आत्मबल का स्पर्श' कहलाता
है। पशु एवं पति मूलतः अभिन्न हैं—
१) तथा च तेषां हेतूनां संयोजनवियोजने ।
नियते शिव एवैकः स्वतन्त्रः कर्तृतामियात् ॥ (तं०९।३५)
२) तस्मादेकैकनिर्माणे शिवो विश्वैकविग्रह ।
कर्तेति पुंसः कर्तृत्वाभिमानोऽपि विभो कृतिः ॥ (तं० ९।३६)
पशु की मित पदार्थों में ममता, अहंकार, उनके साथ एकात्मता आदि भी विश्व-
शरीरी की ही स्फुरणा है। सर्वज्ञ शिव ही विराजमान है—
'ना सावस्था न यः शिवः ॥'
'विज्ञानभैरव' (धारण ८४) में कहा गया है—
सर्वज्ञः सर्वकर्ता च व्यापकः परमेश्वरः ।
स एवाहं शैवधर्मा इति दाढर्याच्छिवो भवेत् ॥ १०७ ॥
प्रथम प्रत्यभिज्ञा—'मै शुद्धबुद्ध स्वरूप हूँ'
द्वितीय प्रत्यभिज्ञा—'निखिल जगत् मेरा ही अपना विस्तार है'