स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः १७३
विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन् (वि०भै० १०२)
प्रसार्य भैरवं रूपं भावयन्तस्तन्मयो भवेत् (वि०भै० ८६)
तैमिरं भावयन् रूपं भैरवं रूपमेष्यति (वि०भै० ८५)
लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं भैरवत्वेन भावयेत् ।
तत्सर्वं भैरवाकारं तेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥ ८३ ॥
न व्रजेन्न विशेच्छक्तिर्मरूरूपा विकासिते ।
निर्विकल्पतया मध्ये तया भैरवरूपता ॥ २६ ॥
'तदास्याऽकृत्रिमो धर्मो'—इसकी व्याख्या 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' के सूत्र 'तथापि
तद्वत् पंचकृत्य करोति' (प्र० हृ० १०) के प्रकाश में ही संभव है। क्षेमराज कहते हैं कि
शिव का अकृत्रिम धर्म भी वही है क्योंकि परमात्मा में भी वही धर्म स्वात्मस्वरूप के रूप
में अवस्थित हैं जो जीवों में है—
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तविनाशनम् ॥'
'पंचविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनोभगवतः ॥
'स्वच्छन्द तन्त्र' में भी कहा गया है कि चिदात्मा भगवान् में सदैव पंचविधकारिता
स्थित है । यथा भगवान् अशुद्धाध्वा के विकास क्रम से स्वरूपविकासात्मक सृष्ट्यादि की
रचना करतें हैं उसी प्रकार चित् शक्ति के संकुचित होने पर संसारभूमिका में पंचकृत्य
करते हैं—
'यथा च भगवान् शुद्धेतराध्वस्फारक्रमेण ... तथा संकुचितचिच्छक्तित्वेन संसार-
भूमिकायां पंचकृत्यानि विधत्ते ॥
स्वस्वभाव की सर्वव्यापकता के साक्षात्कार के कारण योगी की संसरण से मुक्ति—
तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ।
स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ॥ ११ ॥
जो (साधक) 'स्वभाव' (स्पन्द स्वरूप आत्मा) को (जगत् के प्रत्येक कण में)
सर्वव्याप्त देखता हुआ विस्मयाविष्ट की भाँति अवस्थित रहता है भला उसके लिए यह
कुत्सित संसरण कहाँ हैं? ॥ ११ ॥
- सरोजिनी *
तुरीयावस्था या शाक्तभूमिका में अवस्थित योगी जब जगत् के कण-कण में सर्वत्र
एक ही चिदात्मा की व्यापकता, अवस्थान एवं उनमें उसकी सर्वव्यापक अनु-स्यूतता का
साक्षात्कार करने लगता है तब उसके कुत्सित आवागमन-चक्र का कोई भय नहीं रह
जाता ।
कारिकाकार ने 'स्पन्द' 'आत्मा' 'चिति' 'शिव' 'विमर्श' 'स्वातन्त्र्य' 'शक्ति'
आदि शब्दों का प्रयोग न करके 'स्वभाव' का प्रयोग क्यों किया? कारिकाकार यह