स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः १७९
अनिर्वचनीय चैतन्य रस के अनिर्वाच्य आनन्दातिशय के साक्षात्कार से मण्डित स्वरूप-
समावेश का अनुभव करता है और उसके द्वारा आनन्द के विस्मय सागर में डूब जाता
है। स्वरूपसमावेश की यह आश्चर्यकारी स्पन्दरूपता ही विकल्प शून्य तुर्यातीतावस्था
रूप 'विस्मय भूमिका' है। भेदशून्य विश्वात्मभाव, अपने को सर्वत्र चिन्मात्ररूप में प्रति-
ष्ठित के रूप में अनुभव या पराहंता की अनुभूति ही इस 'विस्मय' का अपर पक्ष है।
क्रममुद्रा—तुर्यावस्थाजन्य निरतिशय आनन्दानुभव को प्राप्त करने हेतु योगी की
बार-बार अन्तर्मुखोन्मुखता ही 'क्रममुद्रा' है। 'क्रममुद्रा' के अन्य पर्याय हैं—'शांभव
समावेश' 'स्वरूप समावेश' 'भैरव मुद्रा' एवं 'नित्योदित समाधि' है। 'क्रम मुद्रा' में दो
शब्द है—(१) 'क्रम', (२) 'मुद्रा'। 'क्रम'—सृष्टि, स्थिति, संहार का क्रम ।। 'मुद्रा' =
मुद्रित करना = स्वरूप में विश्रान्ति 'क्रममुद्रा' = तुरीयावस्था। प्रत्येक क्रम को कवलित
करके स्वरूप में विश्रान्ति, । 'नित्योदित समाधि' ।। बाह्यावभासो को तुरीय सत्ता में
मुद्रित करना।
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है कि—नित्योदित—बाह्याभ्यन्तरसमावेश—(१)
'मुद्' अर्थात् हर्ष के वितरण करने से परमानन्दस्वरूप होने । (२) पाशों को नष्ट करने
का । (३) विश्व को अन्तः—तुरीय सत्ता में मुद्रित करने के कारण मुद्रात्मा और सृष्ट्यादि
क्रम का आभासक होने के कारण तथा क्रमाभासस्वरूप होने से 'क्रम' कहा जाता है
'विश्वस्य अन्तः तुरीयसत्तायां मुद्रणात् च मुद्रात्मा, क्रमः अपि सृष्ट्यादिक्रमाभासकत्वात्
तत्क्रमाभासरूपत्वात् च 'क्रम' इति अभिधीयते इति ।।' १
यह अवस्था (क्रममुद्रा, शांभव समावेश) अन्तर्मुखावस्था के अतिरिक्त बहिर्मुखा-
वस्था में भी चिद्रूपात्मक रहती है—
'तत्रादौ बाह्याद् अन्तः प्रवेशः, अभ्यन्तराद् बाह्यस्वरूपे प्रवेश आवेशवशाद् जायत
इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः ।।' २
'क्रममुद्रया अन्तः स्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः ।।' ३
'क्रममुद्रा' समाधि की स्थिति है। इसमें योगी स्वरूप समावेश की शक्ति द्वारा
बहिर्मुखता से अन्तर्मुखता में और अन्तर्मुखता से बहिर्मुखता में त्वरित प्रवेश करता है।
'सबाह्याभ्यन्तरसमावेश' का नामान्तर ही 'क्रममुद्रा' है।
इस अवस्था में अवस्थित योगी सांसारिक कार्य कलापों का निष्पादन करता हुआ
भी समाधिकालगत संस्कारों के द्वारा प्रत्येक वेद्य वस्तुओं में चिन्मात्रता के दर्शन करता
हुआ स्वस्वरूप में अवस्थित रहता है—
आसादित समावेशो योगिवरो व्युत्थानेऽपि समाधिरससंस्कारेण क्षीब इव सानन्दं
घूर्णमानो । भावराशि शरदभ्रलवम् इव चिद्गगन एवं लीयमानं पश्यन् । भूयो भूयः अन्त-
र्मुखताम् एवं समवलम्बमानो, निमीलितसमाधिक्रमे रम चिदैक्यमेव विमृशन्, व्युत्थानाभि-
मतावसरे अपि समाध्येकरस एव भवति—'
१. क्षेमराज प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । २-३. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।