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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 271 of 519

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Page 271

१७० स्पन्दकारिका
२) ऐसा परमात्मा उसका विश्रान्ति-स्थान कैसे बन सकेगा—
'शान्तब्रह्मवदौदसीन्यमवलम्बमाना कथं विश्वमाभासयेत्?
कथं च तद्विश्रान्तिस्थानं भवितुमहर्हा?१
२. दार्शनिक स्पिनोजा (Spinoza: 1632-1677) का कथन है कि विश्व
परमात्मा से पृथक् नहीं है प्रत्युत्—'विश्वम् ईश्वरः । ईश्वरश्च तद् विश्वम्' = सब ईश्वर है
और ईश्वर ही सब है यही है स्पिनोजा का 'सर्वेश्वरवाद' । शङ्कराचार्य भी 'सर्वब्रह्मवाद' के
समर्थक हैं किन्तु उनकी मान्यता में—१) 'ब्रह्मसत्यम्'—तो ठीक है और 'जीव ब्रह्मैव
नापरः' भी ठीक है किन्तु उनका 'जगन्मिथ्या' कथन ठीक नहीं है। यह Spinoza को
भी मान्य नहीं है, सांख्यदर्शन को भी मान्य नहीं है—रामानुजीय वेदान्त दर्शन को भी
मान्य नहीं है तथा 'प्रत्यभिज्ञा' 'स्पन्द' 'क्रम' आदि अद्वैतवादी शैव दर्शनों को भी मान्य
नहीं है। स्पिनोजा भी परमात्मा को स्थितिशील नहीं गतिशील मानता है। स्पिनोजा का
मूल सत्व निर्गुण है जबकि स्पन्द या प्रत्यभिज्ञा का मूल तत्त्व सगुण, निर्गुण, विश्वमय
एवं विश्वातीत दोनों हैं।
वेदान्ती शान्त ब्रह्मवादी भी हैं। इस ब्रह्म का स्वरूप शान्त एवं निस्पन्द है।
उसमें विमर्श का पूर्णतः अभाव है। वह 'निस्तरंग महोदधि कल्प' है—तरंग शून्य
महासमुद्र है। इसके कारण उसमें—ज्ञान, एवं क्रिया की शक्ति एवं संवेदना भी नहीं है।
ये ब्रह्मवादी ब्रह्म को चेतन तो मानते हैं किन्तु 'निस्तरंग जलनिधि' कहने से वे उसे
उदासीन एवं शक्तिहीन भी मानते हैं। स्पन्द सूत्र ऐसे शक्तिहीन—ज्ञान-क्रिया-हीन, एवं
निष्क्रिय ब्रह्म में विश्वास नहीं रखता। शैव दार्शनिक कहते हैं कि जो निरपेक्षतः पूर्ण
स्वतन्त्र है (जिसकी स्वभावगत शक्ति 'स्वातन्त्र्य शक्ति' हों) ऐसा ब्रह्म एक साथ निस्तरंग
एवं तरंगित दोनों रह सकता है।
'शिवदृष्टि' में सोमान्दपाद कहते हैं कि—शैवदर्शन में निस्तरंगता शिव की
शक्तिहीनता का प्रतीक नहीं है प्रत्युत् इच्छा-ज्ञान-क्रिया शक्तियों का सूक्ष्म सामरस्य या
अभेदात्मकता संकेतित है।
शैवदार्शनिकों के मत में चैतन्य एवं प्रसरणशीलता—स्वरूप प्रथन एक ही सिक्के
के दो पहलू हैं। शिव विश्वरूप में अवभासमान है। चूँकि विश्व शिवमय, शिवस्वरूप है
अतः गर्हित एवं मिथ्या भी नहीं है। निन्दनीय (गर्हित) तो यह है कि विश्व को
शिवस्वरूप माना ही न जाय। आत्म चैतन्य से विश्व की पृथकता ही गर्हित है। ज्ञातृत्व
एवं कर्तृत्व शिव का स्वभाव है और स्वभाव का त्याग संभव नहीं है अतः शिव से इन
शक्तियों की पृथकता भी संभव नहीं है। 'शिवदृष्टि' में सूक्ष्मता का अर्थ शिव का
शक्तिराहित्य नहीं है प्रत्युत् अभेदता है—
सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते।
चिद्रूपाह्लाद परमो निर्विभागः परस्तदा ॥२
उसका रूपप्रसार गर्हित नहीं है—'रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तितमत (शिव-
१. 'परमार्थचर्चाविवरण' (हरभट्ट) । २. शिवदृष्टि (१.४) ।