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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

About this granth

This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.

Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.

Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.

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प्रथमः निष्यन्दः १४३
(३) परावाक्— परावक्ति विश्वम् अलपति प्रत्यवमर्शेन इति वाक् ।१
(४) स्वरसोदिता—अतएव सा स्वरसेन चिद्रूपतया स्वात्मविश्रान्तिवपुषा उदिता
सततम् अनस्तमिता नित्या अहमित्येव, एतदेव परमात्मनो मुख्यं स्वातन्त्र्यम्, ऐश्वर्यं,
ईशितृत्वम् अनन्यापेक्षित्त्वम् उच्यते ॥२
(५) 'आनन्द' ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं चैतन्यं—अनन्यनिरपेक्षतैव परमार्थत आनन्दः,
ऐश्वर्यं, स्वातन्त्र्यं चैतन्यं च ॥३
(६) स्फुरत्ता—इह घटः कस्मात् अस्ति' खपुष्पं च कस्मात् नास्ति?—इति उक्ते
वक्तारो भवन्ति, घटो हि स्फुरति मम, न तु इतरत इति, तत् एतत् घटत्वमेव यदि
स्फुरत्वं स्फुरणसंबन्धः ॥'४
(७) स्पन्द—स्पन्दनं च किंचित् चलनम्, एषैव च किञ्चिद्रूपता यत् अचलमपि
चलम् आभासते इति, प्रकाशस्वरूपं हि मनागपि नातिरिच्यते, अतिरिच्यते इव इति
अचलमेव आभासभेदयुक्तमेव च भाति ॥ उक्तम्—
आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्वपुः ।
अनिरुद्धेच्छाप्रसरः प्रसरत्क्रियः शिवः ॥
तथा— अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ (स्प० २२)
लोकेऽपि विविधवैचित्र्य योगेऽपि स्वरूपात् अचलन् जनो गंभीरः स्पन्दवान् इति
उच्यते ॥५
(८) 'सत्ता' (महासत्ता) = सत्ता च भवनकर्तृता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम्ः 'महासत्ता
महादेवी विश्वजीवनमुच्यते ॥'
(९) सार—विमर्शशक्तिः ग्राह्यग्राहकाणां यत् प्रकाशात्मकं रूपं तस्यापि अप्रकाश-
वैलक्षण्या क्षेपिका इयमेव इति श्रीसारशास्त्रेऽपि निरूपितम्—'यत्सारमस्य जगतः सा
शक्तिर्मालिनीपरा ।'६
(१०) हृदय—'हृदय' च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां
चेतनं, तस्यापि प्रकाशात्मत्वं, तस्यापि विमर्शशक्तिः इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो
विश्रान्तस्य इदमेव हृदयं विमर्शरूपं परम मन्त्रात्मकं तत्र तत्र अभिधीयते । सर्वस्य मन्त्र
एव हृदयम् । मन्त्रश्च विमर्शनात्मा, विमर्शन च परावाक्छक्तिमयम् ।
अन्ततः पुनः कहना चाहूँगा कि स्वातन्त्र्य निरपेक्ष कर्तृत्व शक्ति है—अनन्य-
मुखप्रेक्षित्व है और यही आत्मा का लक्षण भी 'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वलक्षणम्
आत्मनः स्वरूपम्—
(१) प्रकाश की मुख्य आत्मा क्या है?—'प्रत्यवमर्श'
१-६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी ।

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१४४ स्पन्दकारिका
'प्रकाशस्य मुख्य आत्मा प्रत्यवमर्शः ॥'१
'आत्मद्रव्यस्य भावात्मकमप्येतज्जडाद्भेदकतया विमर्शाख्यं मुख्यं रूपमुक्तम्'२
स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।३ 'स्फुरत्ता' क्या है? स्फुरत्ता स्फुरणकर्तृता
अभावा-प्रतियोगिनी अभावव्यापिनी ।४
सत्ता क्या है? सत्ता भवत्ता भवनकर्तृता नित्या ।५
प्रत्यवमर्शात्मा क्या है? देशकालास्पर्शात्सैव (स्फुरत्ता) प्रत्यवमर्शात्मा चिति-
क्रियाशक्ति ॥६
हृदय क्या है? (प्रत्यवमर्शात्मा चितिक्रियाशक्तिः) सा विश्वात्मनः परमेश्वरस्य
स्वात्मप्रतिष्ठारूपा हृदयमिति ।७
क्या 'मायाशक्ति' इस 'प्रत्यवमर्श' 'हृदय' 'स्वातन्त्र्य' 'सार' आदि से कोई भिन्न
सत्ता है? नहीं 'माया' है तो 'शक्ति' का ही रूप । यह भी परमशिव की ही एक शक्ति है
किन्तु भेद यह है कि यह भेदावभासिनी शक्ति है—
'प्रकाशात्मनः परमेश्वरस्य मायाशक्त्या स्वात्मरूपं विश्वं भेदेनाभास्यते ॥'८
स्वातन्त्र्य के लक्षण—'स्वातन्त्र्य' आत्मा का स्वरूप है । यह अनन्यमुखप्रेक्षित्व
है— 'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् ॥'९
सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व परिपूर्णत्व ही स्वातन्त्र्य है—
'चैतन्यमात्मा... चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियामयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम् उच्यते ॥'१०
शैवशास्त्र में 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के अनेक लक्षणों का उल्लेख किया गया है जिनमें
प्रमुख लक्षण निम्न हैं—
१) 'स्वातन्त्र्य' एवं 'चैतन्य' पर्यायवाची हैं ।
२) अनन्यमुखापेक्षी सर्वकर्तृत्व । दुर्घटकारित्व । अर्थात्—सृष्टि-स्थिति-संहार-
पिधान-अनुग्रहः ५ कार्य पूर्णज्ञातृता, पूर्णकर्तृता, आत्मनिर्भरता । अहं विमर्शात्मिका
विश्वात्मक स्फुरणा, पूर्णाहन्ता इसके प्रधान लक्षण हैं ।
सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व क्या है? 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' का क्या अर्थ है? पशु-
भूमिका पर 'ज्ञान'—किंचित ज्ञातृत्व एवं 'क्रिया' किंचित्कर्तृत्व है किन्तु पति भूमिका पर
यह सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व अद्वितीय, अप्रतिम, अनुपमेय महाशक्ति है । यह अनन्य-
मुखापेक्षी 'ज्ञातृत्व' एवं अनन्यमुखापेक्षी नित्यात्मक, सार्वभौम, सार्वदेशिक, सार्वकालिक
सर्वात्मक ज्ञान एवं क्रिया है । यह 'ज्ञान' बुद्धि का विलास नहीं है—प्रकृत्योद्भूतअनित्य
ज्ञान नहीं है—सेन्द्रिय ज्ञान नहीं है प्रत्युत् आत्मोद्भूत या चैतन्यस्वरूप ज्ञान है, परमात्मा
की 'ज्ञानशक्ति' है, और 'क्रिया' भी सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सार्वभौम, सर्वातिशायी,
१. उत्पलदेवाचार्यः प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति । २. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।
३. प्रत्यभिज्ञाकारिका । ४. प्रत्य० का० वृत्ति ।
५. प्र०का०वृ० । ६. प्र०का०वृ० ।
७. प्र०का०वृ० । ८. प्र०का०वृ० ।
९. अभिनव गुप्त । १०. शि०सू०वि० ।

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प्रथमः निष्यन्दः १४५
निर्बंध, निर्बाध, देशकालातीत, नित्य एवं चितिस्वरूप है न कि मात्र ऐन्द्रिय, अनित्य,
संकुचित, अपूर्ण, सापेक्ष, प्रतिबंधित, देशकालावच्छिन्न एवं पशुभूमिक ॥
यह स्वातन्त्र्यमयी विश्वात्मक स्फुरणा, आत्मस्वातन्त्र्य, आत्मनिर्भरता, अपरा-
श्रयता, तथा इसका आत्मभूत पूर्ण ज्ञातृत्व एवं पूर्णकर्तृत्व जो कि अहंविमर्शात्मक
स्फुरणा है। शब्दान्तर में 'चैतन्य' एवं 'स्वातन्त्र्य' पद वाच्य है।
शैव दर्शन में ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का स्वरूप—सामान्य ज्ञातृत्व (ज्ञान) एवं
कर्तृत्व (क्रिया) से भिन्न है। सामान्यस्तरीय ज्ञान एवं क्रिया यहाँ ज्ञान-क्रिया नहीं है।
ज्ञान एवं क्रिया का अर्थ है—विश्वात्मक स्तर पर प्रत्येक पदार्थ (प्रत्येक सत्ता) का
देशकालनिरपेक्ष संपूर्ण ज्ञान एवं निरपेक्ष तथा देशकाल से अप्रभावित, निर्बंध, सब कुछ
कर सकने एवं करने की पूर्ण कर्तृत्व शक्ति ही 'क्रिया' है। अन्यनिरपेक्ष स्वतन्त्र ज्ञातृत्व
एवं स्वतन्त्र-कर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व—'कर्तुं, अकर्तुं, अन्यथा कर्तुं, की पूर्ण
शक्ति ही 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' है।


पशुप्रमाता का ज्ञान एवं क्रिया—प्रति प्रमाता का ज्ञान एवं क्रिया—
१. अन्य सापेक्ष, देशकालसापेक्ष, परि-१. निरपेक्ष, देशकालसीमातीत, त्रिकाला-
स्थितिमूलक, खण्डित, अनित्य, सेन्द्रिय,बाधित, परिस्थितियों से अप्रभावित,
अपारमार्थिक, किंचित् क्षमतामूलकअखण्ड, निम्न, इन्द्रियातीत, पारमार्थिक,
(सर्वात्मक ज्ञान एवं सर्वात्मक क्रिया केसर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्वमूलक, सर्वात्मक,
विपरीत) विशेष ज्ञान एवं विशेष क्रिया-सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सामान्य, सर्व-
मूलक, मित 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' ।जननीन, व्यापक, असीम एवं अक्षर
ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व ॥
२. इन्द्रियसंभूत ।२. इन्द्रिय निरपेक्ष एवं आत्मस्वरूप,
शक्ति स्वरूप ।
३. पञ्चकञ्चुकाविष्ट । ससीम३. पञ्चकञ्चुकों की सीमा-रेखा से अप्रति-
बंधित । असीम ॥
४. पशु-सम्बद्ध । सादि४. पति (शिव) से सम्बद्ध, अनादि ।
५. कृत्रिम एवं सायास ।५. सहज एवं स्वाभाविक ।
६. देहात्मबोधात्मक । सान्त६. आत्मस्वभावात्मक । अनन्त
७. ससीम, सादि, सान्त७. अनन्तप्रवाही, अनाद्यन्त
८. अन्तःकरणस्वरूपात्मक (देहात्मक,८. स्वरूपात्मक, विराट्, असंकुचित,
प्राणात्मक, मनसात्मक, इन्द्रियात्मक, बु-पूर्णाहन्तात्मक; आत्मविमर्शात्मक, पति
द्ध्यात्मक, मित अहङ्कारात्मक), संकुचित,भूमिक आत्ममूलक, विश्वात्मक समष्टि
पशु भूमिक, अनात्मविमर्शात्मक देहादि-मूलक, शक्तिचक्रात्मक
मूलक, व्यष्ट्यात्मक,
९. जड़ात्मक, जड़-चेतनात्मक, भेदा-९. चैतन्यात्मक, सर्वचिन्मयवादमूलक,
त्मक । पुर्यष्टकात्मक, एवं शक्ति चक्रा-अभेदात्मक, पुर्यष्टकातीत, आत्मविभवा-
त्मक (भेद प्रथात्मक) ॥त्मक ।

स्पं० १०

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१४६ स्पन्दकारिका
'स्वातन्त्र्य' का अपर पर्याय 'चिति' भी है 'चिति' का अर्थ है चैतन्य। चेतने की
सर्वसामान्य क्रिया ही 'चिति' है—'चितिक्रिया सर्वसामान्य रूपा ।।' (शि०सू०वा०)
'चैतन्य' सर्वज्ञानक्रिया सम्बन्धमय स्वातन्त्र्य है—'चैतन्यं सर्वज्ञानक्रिया, सम्बन्धमयं
परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम्।' (शि०सू०वि०) 'तन्त्रालोक' में 'स्वातन्त्र्य' को इस प्रकार परि-
भाषित किया गया है—चैतन्यमिति भावान्तः शब्दः स्वातन्त्र्यमात्रकम् । अनाक्षिप्तविशेषं
सदाहसूत्रे पुरातने (तन्त्रालोक १.२८) प्रत्यवमर्शात्मकता ही चिति है—'चितिः
प्रत्यवमर्शात्मा' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)।
चेतने की क्रिया (चिति) संसार के प्रत्येक प्रमाता (ग्राहक) में विद्यमान है। यहाँ
तक कि जड़ पदार्थों में भी इसकी सत्ता है। जो स्वातन्त्र्यपूर्वक किसी भी पदार्थ या व्यक्ति
को जान सके या कार्य कर सके वह चेतन है।
पशु एवं पति के चेतने में क्या भेद है? पशु वर्ग का चेतना मित, सापेक्ष,
अनित्य, देशकालसापेक्ष है किन्तु पति का नहीं। पति में सर्वत्र 'स्वातन्त्र्य' है।
'स्वातन्त्र्य' का अर्थ है—इच्छा, ज्ञान, क्रिया, और आनन्द में पूर्णता। ज्ञान, क्रिया,
विभुता, तृप्ति, नित्यत्व में पूर्णता (निरपेक्ष, निर्बन्ध एवं नित्य पूर्णत्व) ।।
'पंचविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनो भगवतः'
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'
शिव की अनन्त शक्तियों में प्रमुख शक्तियाँ
[चिति शक्ति] [आनन्द शक्ति] [इच्छा शक्ति] [ज्ञान शक्ति] [क्रिया शक्ति]
स्वातन्त्र्य—(क्षेमराज : शि०सू०वि०—)
'चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा इति चेतयते इति चेततः सर्वज्ञानक्रियास्वतन्त्रः तस्य
भावः स्वातन्त्र्यम् उच्यते ।।'
स्वातन्त्र्यशक्ति—तत्र भालनेत्रं 'स्वातन्त्रशक्तिः', दक्षिणनेत्रं 'प्रमाणशक्तिः',
वामनेत्रं 'प्रमेयशक्तिः' । (प०त्रिं०)
'प्रकाश' = 'प्रकाशश्च अनन्योन्मुख- [स्वातन्त्र्य शक्ति]
विमर्शः अहमिति'

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प्रथमः निष्यन्दः १४७
परमात्मा की शक्तियाँ
प्रकाशरूपता स्वातन्त्र्यम् तच्चमत्कार आमर्शात्मकता सर्वाकारयोगित्वं
चिच्छक्तिः आनन्दशक्तिः इच्छाशक्तिः ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः
(ईषत्तया वेद्योन्मुखता
आमर्शः ।)
चिच्छक्ति आनन्द शक्ति इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति क्रिया शक्ति
(स्वातन्त्र्यपूर्ण इच्छा- सर्वज्ञातृत्व सर्वकर्तृत्व
शक्ति का सङ्कोच) | |
आणवमल विद्या कला
(अपूर्णमन्यतात्मक) | |
(वेद्योन्मुखता) मायीय मल कार्ममल
(अल्पज्ञातृत्व) किञ्चित्कर्तृत्व
भेद ज्ञान
पुरुष के ६ कञ्चुक—१. माया, २. कला, ३. राग, ४. विद्या, ५. काल, ६.
नियति ।
शक्ति सङ्कोच की पद्धति एवं अशुद्धियाँ—
सर्वकर्तृत्व सर्वज्ञत्व पूर्णत्व नित्यत्व व्यापकत्व = शक्तियाँ
कला विद्या राग काल नियति शक्ति-सङ्कोच
(अल्प (अल्प अपूर्णत्व (अनि- (अव्यापकत्व (पञ्चकञ्चुक)
कर्तृत्व) ज्ञातृत्व) त्यत्व) मितव्याप्ति)
सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व-नित्यत्व-व्यापकत्व शक्तयः । सङ्कोच गृहाना यथाक्रमं
'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल' 'नियति' रूपतया भ्रान्ति ।
(क्षेमराज : 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम् : सूत्र ९) ॥
शक्ति-सङ्कोच एवं पशुगत अशुद्धियाँ—'संपूर्ण कर्तृज्ञाद्याः वह्वयः सन्त्यस्य
शक्तयस्तस्य । सङ्कोचात्संकुचिताः कलादिरूपेण । रूठ्यन्त्येनम् । १) तत्सर्वकर्तृत्ता सा
संकुचिता कतिपयार्थमात्रपरा । किंचित्कर्तारममूं कलयन्ती कीर्त्यते कला नाम । २) सर्व-

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१४८ स्पन्दकारिका
ज्ञाताऽस्य शक्तिः परिमिततनुरल्पवेद्यमात्रपरा । ज्ञानमुत्पादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः ।
३) नित्यपरिपूर्णतृप्तिः शक्तिस्त ज्ञानमुत्पादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः । ४) नित्य-
परिपूर्ण तृप्तिः शक्तिस्तस्य परिमिता तु सती । भोगेषु रञ्जयन्ती सततममुं राग तत्त्वतां
याता ॥' आचार्य क्षेमराज—'षट्त्रिंशत् तत्त्वसन्दोह' ।
भेदावभासात्मिका, भेदात्मक उल्लासशीला इच्छाशक्ति ही है। 'महामाया' शिव में
अभिन्नतया रहने वाली, निखिल जगत् का उल्लासन करने वाली, शिव के अभेद को
भेदावभासन में परिणत करने वाली शक्ति है 'परानिशा' (महामाया) ॥
महामाया (परानिशा)—'माया—कला—विद्या, राग, नियति, काल ।
'मल' = संकुचित ज्ञान । प्रच्छन्नज्ञानात्मकता = 'मल' । पूर्णत्व की अख्याति =
'मल' । अज्ञान = 'मल' ॥ संसारांकुरकारण = 'मल' ॥ मल, अज्ञान, अभिलाषा,
अविद्या—अविद्या, ग्लानि, विमूढ़ता, पशुत्व आदि सभी 'अशुद्धि' के पर्याय हैं—
मलोऽभिलाषश्चाज्ञानमविद्यालोलिकाप्रथा ।
भवयोषोऽनुप्लवश्च ग्लानिः शोषो विमूढ़ता ॥
अहंममात्मताद्वैधो मायाशक्तिरथावृतिः ।
दोषवीजं पशुत्वं च संसारांकुरकारणम् ॥
तत्त्व—काश्मीरीय शैवदर्शन में ३६ तत्त्वों की मान्यता है जो निम्न है—
१. शिव तत्त्व = १) शिवतत्त्व २) शक्ति तत्त्व = २
२. विद्या तत्त्व = १) सदाशिवतत्त्व, २) ईश्वर तत्त्व, ३) शुद्ध विद्या = ३
३. आत्म तत्त्व = (३१ तत्त्व) । (६) 'माया' (७) कला (८) माया (९) राग
(१०) काल (११) नियति (१२) पुरुष (१३) प्रकृति (१४) बुद्धि (१५) अहङ्कार
(१६) मन (१७-२१) श्रोत्र-त्वक्-चक्षु-जिह्वा-घ्राण (२२-२६) -वाक्-पाणि-पाद-पायु-
उपस्थ (२६-३१) शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध । (३२-३६) आकाश-वायु-वह्नि-सलिल-
भूमि ।
'शिवतत्त्व' (अहंविमर्श) 'सदाशिवतत्त्व' (अहमिदं विमर्श) 'ईश्वरतत्त्व' (इमिदं
विमर्श)—इनमें प्रथमपद की प्रधानता है। 'सद्विद्या'—(अहं एवं इदं दोनों का समभावेन
प्राधान्य) 'माया शक्ति'—अहं एवं इदं में पृथक्त्वः (क) अहमंश = पुरुष (ख) इदमंश
= प्रकृति ॥ 'शिव' का 'पुरुष' रूप में रूपान्तरण—(माया द्वारा पाँच उपाधियों की सृष्टि
जिससे कि 'शिव' पशु बन सके ।—पञ्च कञ्चुक—'कला' 'विद्या' 'राग' 'काल'
'नियति' ।
'आत्मतत्त्वों' (३१ तत्त्वों) में प्रथम तत्त्व 'माया' है और उसी से उत्पन्न होते हैं
'पञ्चकञ्चुक' ॥ 'मायाशक्ति'—पञ्चकञ्चुक ॥ 'प्रकृति' तेरहवाँ तत्त्व है । माया—'पञ्च-
कञ्चुक' ।
परमेश्वर की ५ शक्तियाँ—(१) 'चित्' (२) 'आनन्द' (३) 'इच्छा' (४) 'ज्ञान'

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प्रथमः निष्यन्दः १४९
(५) 'क्रिया' अपने को स्वतन्त्र बोध करना तथा अविघात इच्छासम्पन्न समझना =
'इच्छाशक्ति' ॥ स्वातन्त्र्य = 'आनन्द शक्ति' ॥ 'चित् शक्ति' = प्रकाश ॥ 'ज्ञान
शक्ति' = आमर्श ॥ (आमर्श = वेद्य पदार्थ का सामान्य ज्ञान) ॥
क्रियाशक्ति = सर्वाकार धारण करने की योग्यता इन्हीं पञ्चशक्तियों द्वारा परमशिव
द्वारा स्वभित्ति (शक्ति) पर जगत् का अवभासन ।
सांख्यदर्शन—पुरुष, प्रकृति नित्य हैं ।
शैव दर्शन—पुरुष, प्रकृति अनित्य हैं ।
१) चित् शक्ति (प्रकाशात्मक—इसी के द्वारा शिव अपने को स्वप्रकाश समझते
हैं।
२) आनन्दशक्ति = इसके द्वारा शिव अपने में आनन्द का साक्षात्कार करते हैं ।
३) इच्छाशक्ति = इसके द्वारा शिव जगत् की सृष्टि, संहार एवं अन्य कार्य
निष्पादित करते हैं ।
४) ज्ञानशक्ति = इसके द्वारा शिव स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं ।
५) क्रियाशक्ति = इसके कारण शिव सभी स्वरूपों को धारण कर सकते हैं ।
जगत् = शिव की शक्तियों का विस्तृत रूप । 'विश्व' शक्ति-प्रचय है (शिवसूत्र) ।
इसी शक्ति के द्वारा शिव को 'अहं' का बोध हो पाता है । 'शक्ति' में उन्मेष—सृष्टि,
'शक्ति' में निमेष—प्रलय । 'उन्मेष'—सदाशिव तत्त्व । शैवदर्शन—'सृष्टि' = शक्ति का
उन्मेष ।
स्वातन्त्र्य = ज्ञान एवं क्रिया का स्वतन्त्र (अनन्यमुखापेक्षी) कर्तृत्व । सृष्टि-स्थिति-
संहार-पिधान और अनुग्रह के दुर्घट कार्यकारित्व, दुर्घट कार्यज्ञातृत्व । स्वातन्त्र्य =
अनन्यमुखापेक्षी सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व । आत्मस्वभाव पूर्णज्ञातृत्व एवं पूर्णकर्तृत्व की
अहंविमर्शात्मिका विश्वात्मक स्फुरणा = 'स्वातन्त्र्य' 'आत्मा' 'चैतन्य' आदि ।
'पशुभूमिका' एक साथ, सर्वत्र, निरापद, निर्बंध एवं निरपेक्ष समस्त कार्य करना
एवं जानना असंभव है क्योंकि पशु अस्वतन्त्र, सीमाबद्ध एवं परमुखापेक्षी है । यही
स्वातन्त्र्य है—
'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् । (ई०प्र०वि०)
पशु में चितिक्रिया (चेतने की क्रिया । स्वातन्त्र्यात्मक नहीं है । विश्वात्मक स्तर पर
ज्ञानक्रिया समन्वित चेतने की क्रिया का अशेष एवं अनन्यमुखापेक्षी कर्तृत्व ही परमेश्वर
का 'ऐश्वर्य' एवं 'पूर्ण स्वातन्त्र्य' है । यह स्वातन्त्र्य देशकालातीत है । परमात्मा प्रत्येक
क्षण, सब कुछ, कहीं भी, एक साथ (बिना किसी की सहायता के तथा बिना किसी भी
बाधा के) सब कुछ कर सकता है एवं सब कुछ जान सकता है किन्तु पशुभूमिक जीव
नहीं है ।
अविराम स्पन्दात्मक 'पतिप्रमाता' का यथार्थ स्वस्वरूप क्या है? समस्त विश्व के

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१५० स्पन्दकारिका
समस्त पदार्थों का आधारभूत एवं सबकी अन्तिम विश्रान्तस्थली है 'स्वतन्त्रता' एवं
अखण्डस्पन्दात्मिका संवित् शक्ति । चितिक्रिया की प्रक्रिया क्या है? यह स्थूल क्रियावत्
नहीं है । प्रत्युत् यह आभ्यन्तरिक साङ्कल्पिक गतिमयता है—यह है अहंप्रत्यवमर्शात्मक
सामान्यस्पन्द । विमर्शात्मकता ही इसका अभिन्न स्वभाव है और यही है, जड़ एवं चेतना
की व्यावर्तक रेखा । ज्ञान एवं क्रिया शक्ति (प्रकाश-विमर्श) पृथक्-पृथक् पदार्थ नहीं है
प्रत्युत् ये स्पन्दात्मिका चितिशक्ति का ही रूपान्तर है । 'क्रिया' ज्ञान का ही उत्पाद
(विकास) है । 'ज्ञान' क्रिया का पूर्ववर्ती स्वरूप है । 'प्रकाश' (शिव) बहिर्मुखदशा में
'विमर्श' (शक्ति) है और ही अन्तर्मुख दशा में 'प्रकाश' (शिव) है । 'इदं' अह का फल
है—अहं की फसल है । 'इदं' अहं का स्थूलतर विकास है । 'अहं' एक बीज है और
'इदं' है उसका अंकुर ।
स्पन्दात्मक शिव अपने भीतर अभेद रूप में जगत् को अवस्थित रखता है ।
'जगत्' शिव का विराट् प्रसार है ।
'स्वातन्र्य' मुख्यतः कर्तृतास्वरूप है । विश्वात्मा स्वयं द्वारा आविर्भूत मल
(अशुद्धि) के द्वारा आत्मस्वरूप को आंशिक रूप में आच्छादित करके तथा जड़ वर्ग को
सम्पूर्णतः आच्छादित करके स्थित है । यह 'स्वातन्त्र्य' किसी को पूर्णतः अस्वतन्र कर
देता है तो किसी को अंशतः ।
अशुद्धि—'निज शुद्ध्यासामर्थ्यस्य'—जो अपनी अशुद्धियों के कारण ही असमर्थ
हो चुका हो ऐसे व्यक्ति का । 'अशुद्धि' = आणव मल । 'कर्तव्य' = कार्म मल ।
'क्षोभ' = मायीयमल । 'अशुद्धि' ही है अख्याति; मल, बन्ध या अविद्या । स्वतन्त्र
स्वभाव का अज्ञान, पशुत्व, आत्मविस्मृति, शिवत्व के स्थान पर पशुत्व से तादात्म्य ही
'अशुद्धि' है । 'ज्ञानं बन्धः' (शिवसूत्र) में 'ज्ञान' अज्ञानमात्र का सूचक नहीं प्रत्युत्
यथार्थ आत्मस्वभाव का अज्ञान है । 'अज्ञान' वह आत्मगोपनात्मिका स्थिति है जिसमें
अपने स्वस्वरूप का आच्छादन करके मितात्मा शिव पति से च्युत होकर पशु बन जाता
है । इसमें आत्मा स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा अपने ही स्वतन्त्र स्वरूप को छिपाकर-स्वात्म
विस्मृतिरूपात्मक आच्छादन ओढ़ लेता है ।
'स्वातन्त्र्यशक्ति' प्रतिक्षण पाँच रूपों में स्पन्दायमान है और उसके पाँच रूप
निम्नांकित हैं—१. 'चित' २. 'आनन्द' ३. 'इच्छा' ४. 'ज्ञान' एवं ५. 'क्रिया' । इसे
ही सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व एवं व्यापकत्व भी कह सकते हैं । शक्ति पञ्चक
द्वारा सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान एव अनुग्रहरूपात्मक पञ्च कृत्यों का अनवरत निष्पादन
किया जाता रहता है । अपने आनन्दस्वभाव के कारण चैतन्य की प्रकृति ही है विश्वरूप में
अनवरतावभासन । चैतन्य का स्वभाव है—संसारभाव का अवभासन । आत्मा संसार की
भूमिका पर अभेद व्याप्ति का विस्मरण करके भेद-व्याप्ति ग्रहण कर लेता है ।
स्वातन्त्र्य-रत्नाकर में निःशेष विश्व अभेदात्मक 'अहं' के रूप में अवस्थित है ।
'अहं' को 'इदं' के रूप में अवभासित करने की अभिलाषा ही प्रथम मल है । चूँकि समस्त
वैश्विक-विस्तार (जागतिक कल्पना) स्वस्वरूप में शाश्वतिक रूप में अवस्थित है और वह

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प्रथमः निष्यन्दः १५१
भी अभेदात्मक रूप में, — अतः उसकी भेदात्मक रूप में अभिलाषा करना—पूर्ण को
अपूर्ण रूप में देखने की आकांक्षा करना एक ‘अशुद्धि’ या ‘मल’ ही तो है । यह अपूर्णता
ही—‘आणव मल’ ‘मायीय मल’ एवं ‘कार्ममल’ के रूप में विद्यमान है ।
पतिप्रमाता अपने स्वातन्त्र्य शक्ति से पशुभूमिका स्वीकार करके ‘शक्तिदरिद्री’ बन
जाता है । मलत्रय में जो ‘आणव मल’ नामक अशुद्धि है उसके दो भेद हैं—
१) स्वातन्त्र्य की हानि (पूर्णज्ञातृत्व का संकोच)—‘स्वातन्त्र्य हानिवार्धस्य’
२) स्वातन्त्र्य का अबोध (पूर्णज्ञातृत्व का मिथ्याभिमान)
‘स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता’ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा) ‘स्वातन्त्र्यहानिर्ज्ञातृत्वसंकोचः’
(ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)
‘निज अशुद्धि’ (का० ९) आत्मा को आच्छादित करने वाले एवं अन्तःकरण को
मलिन बनाने वाले ‘मल’ है । इसे ही आचार्य शङ्कर ने ‘अविद्या’ कहा है । बौद्धों ने भी
बन्धन की द्वादश श्रृंखलाओं में इसे प्रथम स्थान दिया है—
‘अविज्जा पच्चया संखाण, संखार पच्चया विञ्जाणं ......
अज्ञान ज्ञानाभाव नहीं है प्रत्युत् अपूर्ण ज्ञान हैः—त्रिक-सिद्धान्त शैव-शाक्त
तांत्रिकों ने इस ‘अज्ञान’ को मलात्मक माना है । ‘मल’ तीन प्रकार के हैं—१) आणव
मल २) मायीय मल ३) कार्म मल ॥
अशुद्धि का कारण क्या है?—अशुद्धि का कारण असत् तत्त्वों में सत्त्व,
अचित् में चित्, अनात्म में आत्मा, अशुचि में शुचि अनित्य में नित्य एवं दुःख में सुख
आदि की प्रतीति है । यह अध्यासात्मक एवं अध्यारोपजन्य है । यह मिथ्याप्रतीति का
परिणाम है ।
अशुद्धि का कारण आणवादिक मल भी हैं ।
मालिनीविजयोत्तरतन्त्र का मत—संसारांकुर अज्ञान ही ‘मल’ हैं—
‘मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम्’ (मा० वि० प्र० अधिकार) ‘महार्थमञ्जरी’
का मत— ‘मल’ ही प्रधान अशुद्धि है— ।
मालिनीविजय : अज्ञान कैसा होता है?
१. अज्ञान ही मल है । २. यही संसार के अंकुर का कारण है । ३. अज्ञान
अंधकार है । पारमेश्वर स्वातन्त्र्य की अनुभूति ‘स्व’ रूप का यह गोपन करता है । ४.
आत्मा एवं अनात्मा सम्बन्धी व्यर्थ की डाझनों में डालने वाला होता है । ५. अपूर्ण ज्ञान
ही ‘अज्ञान’ है । इसे ‘आणवमल’ भी कहते हैं—‘अज्ञानं तिमिरं पारमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्र-
मुल्लासितस्वरूपगोपनासत्तत्त्वमात्मानात्मनोरन्यथाभिमानस्वभावम् अपूर्ण ज्ञानं तदेव चाणवं
मलम् ॥’ (तन्त्रालोकः विवेक प्र०आ०श्लोक २३)
अभिनवगुप्तपादाचार्य का मत—
मलमज्ञानभिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।

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१५२ स्पन्दकारिका
इति प्रोक्तं तथा च श्रीमालिनीविजयोत्तरे ॥ (१।२३)
'अज्ञानं' संसृतेर्हेतुर्ज्ञानं मोक्षैककारणम् ॥ (तन्त्रलोक १।२२)
'मिथ्याज्ञान' संसार का कारण है । इसके विपरीत 'तत्त्वज्ञान' है । इससे अज्ञान
दूर होता है और मोक्ष प्राप्त होता है—
'मोक्ष एव उपादेयः तत्प्रतिपक्षभूतः संसारश्च हेयः । तस्य च मिथ्याज्ञानं निमित्तं,
तत्प्रतिकूलं च तत्वज्ञानम् । (विवेक)
निजाशुद्धासमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ।
यदा क्षोभः प्रलीयेत ततः स्यात् परमं पदम् ॥
'परमपद' 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' के अष्टादशोऽधिकार में कहा गया है—
निरोधं मध्यमे स्थाने कुर्वीत् क्षणमात्रकम् ।
पश्यते तत्र चिच्छक्तिं तुटिमात्रामखण्डिताम् ॥ (१८।३७)
तदेव परमं तत्त्वं तस्माज्जातमिदं जगत् ॥
प्राप्नोति परमं स्थानं भुक्त्वा सिद्धिं यथेप्सिताम् ॥ ४३)
'अशुद्धि' क्या है? 'तन्त्रालोक' (४।१९८) में कहते हैं कि —
१) यह समस्त दृश्यादृश्य अस्तित्व ब्रह्म ही तो है । देह आदि समस्त वस्तु तत्त्व
परब्रह्मात्मक ही तो है फिर कैसी शुद्धि कैसी अशुद्धि? इसका उत्तर देते हुए अभिनव-
गुप्त कहते हैं—
सबके शिवात्मक होने पर भी यह भेदप्रदा बुद्धि ही अशुद्धि बन जाती है । बुद्धि
का परिष्कार ही शुद्धि है—
शिवात्मकेष्वप्येतेषु शुद्धिर्या व्यतिरेकिणी ।
सैवा शुद्धिः पराख्याता शुद्धिस्तद्धीविमर्दनम् ॥ (४।१९८)
शुद्धि एवं अशुद्धि में भेद क्या है ? परतत्त्व से शून्य वस्तु ही अशुद्ध है
अन्यथा कुछ भी अशुद्ध नहीं है—
अशुद्धं नास्ति तत्किंचित्सर्वं तत्र व्यवस्थितः ।
यतेन रहितं किंचिदशुद्धं तेन जायते ॥ (विवेक २.८९)
'अभिलाषा' क्या है । 'अभिलाषा' एक मल है ।
'अभिलाषो मलोऽत्र तु' (स्वच्छन्द० ४-१०४) ।
शून्यप्रमाता 'अभिलाषा' रूपी मल के प्रभाव से आणवमल ग्रस्त हो जाता है ।
मेय को स्वीकार करके भेदवाद की भूमि पर गिर पड़ता है । विमर्श के कारण में उच्छलन
प्रारंभ होता है ।
स एव स्वात्मा मेयेऽस्मिन्भेदिते स्वीक्रियोन्मुखः ।
पतन्समुच्छलत्वेन प्राणस्पन्दोर्मिसंज्ञितः ॥ (६।११)

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प्रथमः निष्यन्दः १५३
क्षोभ—सांख्यदर्शन तो सतोगुण रजोगुण एवं तमोगुण के साम्य में भंग को ही
‘क्षोभ’ कहता है। काम क्रोध आदि से उत्पन्न समस्त आवेग क्षोभ हैं। विकल्प दशा में
ही क्षोभ उत्पन्न होता है। क्षोभ के शान्त होने पर निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप का साक्षात्कार
होता है।
प्रशास्तिभूतिपाद—विकल्प-व्यापार का शोधन आवश्यक है। संसार के समस्त
आकर्षक पदार्थ मन को आह्लादित करते हैं। उन सभी में अपना स्वात्मस्वरूप ही
प्रकाशित हो रहा है—वह सन मैं ही तो हूँ। सभी पदार्थों में इस प्रकार से स्वात्मस्वरूप
की भावना से मन का ‘क्षोभ’ शान्त होता है। ‘विज्ञानभैरव’ की ७५, ८६-८७, ९०-
९१, एवं १०३ संख्या की धारणाओं में बाह्य क्षोभ की शान्ति के उपायों का विवेचन
किया गया है—
विकल्प—जिन विकल्पों के संस्कार से सहज विद्या का उदय होता है और शुद्धि
प्राप्त होती है वे क्या हैं? बाह्य नील-पीत, घट-पट आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी
पदार्थ ‘विकल्प’ हैं।
‘महार्थमञ्जरी’ : महेश्वरानन्द—१
अशुद्धि और शुद्धि—यदि कोई अर्चक अर्चना, उपासना या साधना करता है तो
उसे सबसे पूर्व अपनी साधना-यात्रा के मार्ग के प्रतिबन्धकों को दूर करना पड़ेगा। यह
प्रतिबन्धक है—‘अशुद्धि’। इसका निवारण होता है—‘शुद्धि’ द्वारा।
‘शोषो मलस्य नाशो दाह एतस्य वासनोच्छेदः।
आप्लावनं तनूनां ज्ञानसुधासेकनिर्मिता शुद्धिः ॥’
‘सोसो मलस्स णासो दाहो एअस्स वासणुच्छेओ।
अब्बालणं तूणूणं णाण सुहासेऽअणिम्मिआ सुद्धी ॥’२
अशुद्धि को दूर करने के उपाय—
१) मल के नाश का उपाय = ‘शोष’
२) वासनोच्छेद का उपाय = ‘दाह’
३) शुद्धि का उपाय = ‘आप्लावन’ ३
शुद्धि के उपाय—आप्लावन = ‘शरीरों की ज्ञान सुधासेवानिर्मिता शुद्धि’
अर्चकों में एक अलौकिकता का आविर्भाव होता है। यह मलोपलेपों के क्षय से
संपादित होता है। उसमें ‘शोष’ की भूमिका क्या है?४
‘शरीराणां शोषो नाम तदायतस्य मलस्य संसारांकुरकारणभूतस्याज्ञानस्य कर्शन-
मेवः ॥’ (संसारांकुर-कारण मल रूप अज्ञान का कर्शन ही ‘शोष’ है। ‘दाह’ की
**भूमिका क्या है?**५
‘दाहश्च नाम तेषां प्रस्तुतस्यैव मलस्य या वासना संस्कारसारतयावस्थानम् तद्व-
युदासस्वभावो भवति ॥’६
१-४. महार्थमञ्जरी। ५-६. परिमल।

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१५४ स्पन्दकारिका
'दाह' = मल की वासना एवं संस्कार का औदासीन्य ॥ 'आप्लावन' की भूमिका
क्या है?१
एवमाप्लावनमप्यज्ञानव्यपोहाविनाभावोद्भूतस्वरूपलाभलक्षणाह्लाददायित्वादमृतायमानं
यद् ज्ञानं स्वात्मावबोधस्तत्प्रसरधारावाहिकोपकल्पिता शुद्धिः पवित्रीकरणमिति ॥२
'आप्लावन' = अज्ञान का व्यपोह, स्वरूप लाभ, आह्लादिशय-प्राप्ति, अमृताय-
मान ज्ञान की प्राप्ति, स्वात्मस्वभाव का प्रसार और उससे पवित्रीकरण ॥३
क्रमवासना का मत—(महार्थमञ्जरी की दृष्टि से साम्य)
संवित् सतत्त्वनैर्मल्यसिद्धये शोषणादिकम् ।
विकल्पसार्वभौमस्य शरीरस्याश्रयाम्यहम् ॥
परिमल—१) प्राणपरिस्पन्द के कारण प्राणीभूतवायुतत्त्व के साथ तादात्म्यानु-
संधान के अनन्तर करिष्यमाण 'दाह' आप्लावन' की योग्यता प्राथमिक पूजा-नियम है ।
इसके बाद—
२) परम प्रमातृतापरामर्श के द्वारा उनकी अवच्छिन्नप्रमातृत्ता का विगलनरूप 'दाह'
संपाद्य है ।
विज्ञानभट्टारक में भी कहा गया है—
कालाग्निना कालपदादुत्थितेन स्वकं पुरम् ।
प्लुष्टंविचिन्तयेदन्ते शान्ताभासः प्रजायते ॥
इसी के दृढ़ीकरणार्थ अलौकिक अहन्तानन्दचन्द्रिकामय महाप्रमेयामृतप्रवाहाभिषेका-
नुभूति का आप्लावन आवश्यक है । कहा भी गया है—
सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् ।
प्लुष्टस्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥ (विज्ञानभट्टारक)
आणव मल४—'स्वातन्त्र्यहानि स्वातन्त्र्य बेधिस्य' स्याथबोधता'
कार्ममल५ = 'कार्ममलस्याप्यावरकत्वं' 'धर्माधर्मात्मकं कर्म सुखदुखादिलक्षणम्'
—मालिनीविजय
मायीय मल६—'भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम् कर्तर्यबोधे कार्मं च ...।'
—श्रीप्रत्यभिज्ञा ॥
'कंचुक' भी मल स्वरूप है । कंचुक द्विविध है: अन्तरंग = 'माया'—बहिरंग =
प्रकृति से माया पर्यन्त ॥
'कार्ममल' = मायीय एवं प्राकृतिक (कार्म) चकंचुक, कोश या मल के अतिरिक्त
परमसूक्ष्म कोश 'आणवमल' है । ये तीनों मल भी तत्वान्तर्गत ही हैं ।७
सृष्टि का प्रथम स्पंदन कब?— वस्तुतः शिव ज्ञान है और 'मल' अज्ञान है
१-३. परिमल । ४. प्रत्यभिज्ञा । ५. मालिनीविजय ।
६. परमार्थसार (अभिनव) । ७. अभिनवः परमार्थसार ।

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प्रथमः निष्यन्दः १५५
'मल' ही संसार का मूल है । सृष्टि का प्रथम स्पंदन कैसे होता है?—'आणवमल' से
ज्यों ही ज्ञान में स्वातन्त्र्य की एवं स्वातन्त्र्य में ज्ञान की हानि होती है त्यों ही सृष्टि का
प्रथम स्पन्दन प्रारंभ होता है । 'परमशिव' सर्वथा निस्पंदं है । प्रशान्त है ।¹
इसे ही 'परमभैरव' भी कहा गया है । उसकी 'शक्ति' ही सृष्टि, स्पन्दन, सृष्टि-
विस्तार, स्थिति एवं संहार आदि कार्यों का निष्पादन करती है । आणव, 'मायीय' एवं
'कार्म' मल शिवस्वरूप को ढक कर असत् में सत्, अनात्म में आत्मा, अनित्य में नित्य,
अस्वभाव में स्वभाव एवं क्षर में मिथ्या अक्षरत्व का अभिमान उत्पन्न कर देता है ।²
जो मलों से निर्मुक्त है, इन कोशों से मुक्त है वही मुक्त है ।
आणव मल—अपने स्वरूप की हानि ही जिसका स्वरूप है ऐसी अख्याति ही
चैतन्य का 'आणव मल' है । स्वर्ण में निहित अशुद्धि रूपी दोष ही आत्मा का
आणवमल है । यह अन्तरंग आवरण या आन्तर आच्छादन है । यह तदात्मा बनकर
रहता है ।
मायीय मल—'माया' से लेकर 'विद्या' तक के ६ कञ्चुक आत्मा के सूक्ष्म
आवरण हैं यथा चावल का छिलका (कम्बुक) जो चावल के पीठ पर रहता है । इसके
द्वारा ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व में भेदमय बोध होता है । यही है—'मायीय मल' ।
कार्म मल—इसकी अपेक्षा जो बाह्यावरण है वह भूसी की भाँति, प्रकृति-निर्मित
शरीर का अस्तित्वस्वरूप आवरण है जो कि स्थूल है तथा त्वचा, मांस आदि के स्वरूप
वाला होने के कारण यह तृतीय मल 'कार्ममल' कहलाता है ।
१. 'पर मल' = आणवमल । अणु (जीवात्मा) का मल ।
२. 'सूक्ष्म मल' = मायीय मल ।
३. 'स्थूल मल' = कार्ममल ।
पशु—कोशत्रय—ये तीन मल ही कोशत्रय हैं । इन तीनों मलों से आच्छादित
आत्मा प्रकाशनोपरान्त भी घर में प्रतिबिम्बित आकाश की भाँति संकुचित हो जाती है
और इसलिए 'अणु' एवं 'पशु' कही जाती है—'स्पन्दकारिका' (४५) में इसका स्वरूप
इस प्रकार कहा गया है ।
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (विभूतिस्पंद)
इन मलों में 'आणव' प्रधान मल है । = मल के ये तीन रूप हैं—परमावरणं मल
इह सूक्ष्मं मायादि कञ्चुकं स्थूलम् ।
बाह्यं विग्रहरूपं कोशत्रय वेष्टितो ह्यात्मा ॥ (परमार्थसार २४)
कोशत्रय—त्रिकदर्शन में कोशत्रय की मान्यता है किन्तु वेदान्त में कोशपञ्चक की
मान्यता है । जो निम्नांकित हैं—
१-२. अभिनवगुप्त—परमार्थसार ।

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१५६ स्पन्दकारिका
१) अन्नमय कोश २) प्राणमय कोश ३) मनोमय कोश
४) विज्ञानमय कोश ५) आनन्दमय कोश ।
मलों के तीन प्रकार आत्मा के स्वातन्त्र्य के आच्छादक है। 'मल' क्या है?
मल—(१) अज्ञानं किल बन्धहेतुरुदितः शास्त्रे मलं स्मृतम् ।¹
(२) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुर कारणम् ।²
(३) योग्यतामात्रमेवैतत् भावव्यच्छेद संग्रहे ।
मलस्तेनास्य न पृथक् तत्त्वभावोऽस्ति रागवत् ॥³
(४) स्वात्मप्रच्छादनक्रीडामात्रमेव मलं विदुः ॥⁴
(क) आणवमल =
१) 'संकोच एवं पुंसामाणवमलमित्युक्तप्रायम् ।'⁵
२) स्वातन्त्रहानिर्बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता ।
द्विधाणवमलमिदं स्वस्वरूपापहानितः ॥⁶
संविद्रूपे न भेदाऽस्ति वास्तवो यद्यपि ध्रुवे ।
तथाप्यावृति निर्ह्रास तारतम्यात् स लक्ष्यते ॥
(ख) मायीय मल— १) भिन्नवेद्य प्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम् ॥⁷
२) शरीरभुवनाकारो मायीयः परिकीर्तितः ॥⁸
(ग) कार्ममल— देवादीनां च सर्वेषां भाविनां त्रिविधं मलम् ।'⁹
तथापि कार्ममेवैकं मुख्यं संसारकारणम् ॥
१) अप्रतिहतस्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्तिः संकुचिता सती अपूर्णाम्मन्यतारूपम्
'आणवमलम्' ।१०
२) ज्ञानशक्तिकमेण संकोचात् भेदे सर्वज्ञत्वस्य किंचिज्ज्ञत्व प्राप्तेः वेद्यप्रथारूपं
'मायीयं मलम्'११
३) क्रियाशक्तिकमेण भेदे सर्वकर्तृत्वस्य किंचित्कर्तृत्वाप्तेः कर्मेन्द्रियरूप संकोच-
ग्रहणपूर्वकम् अत्यन्तं परिमिततां प्राप्ता शुभाशुभानुष्ठानमयं कार्म मलम् ।१२
क) स्वातन्त्र्य हानिरूप आणव मल—'विज्ञान केवल' में ।
१. तन्त्रसार (आ०-१ पृ०-५) । २. तन्त्रालोक (६। पृ०५७) ।
३. तन्त्रालोक (६। पृ० ५७) ।
४. मालिनीविजय वार्तिक काण्ड २।१८६) । ५. स्वच्छन्दतन्त्र टीका पृ० ५१९ ।
६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका (भास्करी: २ पृ० २४८) ।
७. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका भास्करी । ८. तन्त्रालोक (१।५६) ।
९. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका ३-२-१० (भास्करी २ पृ० २५३)
१०. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् । ११. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।
१२. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।

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प्रथमः निष्यन्दः १५७
ख) स्वातन्त्र्य का अबोध रूप आणव मल—‘प्रलयाकल’ में। (इनमें कार्म मल
भी रहता है एवं विकल्प से मायीय मल भी।)
ग) देवादिक समस्त संसारी प्रमाताओं में ‘त्रिविधमल’ रहते हैं। किन्तु मुख्यतः
उनमें ‘कार्ममल’ पाया जाता है।
परमार्थसार में अभिनवगुप्तपाद कहते हैं—
‘कार्यकारणरूपा प्रकृति परमेश्वरेच्छा से पुरुष के लिए भोग्य रूप में प्रवृत्त होती है।
यथा छिलका चावल के दाने को ढक लेता है उसी प्रकार प्रकृति से लेकर पृथ्वी पर्यन्त
की समस्त सृष्टि चैतन्य को देहभाव से आच्छादित कर लेती है। (परमार्थसार : २३)
तुष इव तण्डुलकणिका मावृणुते प्रकृतिपूर्वकः सर्गः ।
पृथ्वी पर्यन्तोऽयं चैतन्यं देहभावेन ॥
परम (अन्तरंग) आवरण आणव मल (या मल) कहा जाता है। मायादिक ६
सूक्ष्म कञ्चुक बाह्य-स्थूल आवरण देहरूप हैं। यह आत्मा इनसे (तीन कोशों से)
आच्छादित है—
परमावरणं मल इह सूक्ष्मं मायादिकञ्चुकस्थूलम् ।
बाह्यं विग्रहरूपं कोशत्रय वेष्टितो ह्यात्मा ॥१
शिवसूत्र और स्पन्दसूत्र—आचार्य क्षेमराज ने ‘शिवसूत्रविमर्शिनी’ के सूत्र (ज्ञानं
बन्ध १।२; एवं १।३; १।४) आदि में इसी स्पंदसूत्र ‘निज शुद्ध्यासामर्थ्यस्य ...’ का
उद्धरण देते हुए दोनों सूत्रों में सैद्धान्तिक या वैचारिक साम्य का प्रतिपादन किया है। वे
कहते हैं कि—
१) जीवात्मा निज अशुद्धियों से असमर्थ हो जाता है।
२) वह वासनात्मक कर्तव्यों की वासनाओं की अशुद्धियों से असमर्थ हो जाता है
और इस अशुद्धि से उसमें ‘क्षोभ’ का आविर्भाव होता है।
शिवसूत्रों में अशुद्धियों का स्वरूप : एक तुलनात्मक विश्लेषण—यही विचार
उक्त शिवसूत्रों में भी व्यक्त किया गया है। शिवसूत्रकार का कथन है कि अशुद्धियों में
प्रथम अशुद्धि जो जीवात्मा के बन्धन है वह है ‘ज्ञान’।
प्रथम अशुद्धि—ज्ञान—बन्धः। ‘ज्ञानं बन्धः ।।' (१।२)'
शिवसूत्रकार ने शिवसूत्रों में प्रथमसूत्र (चैतन्यमात्मा १।१) में आत्मा के स्वरूप
का विवेचन करने के बाद दूसरा सूत्र आत्मा के बन्धनों (आत्मा के आच्छादक,
स्वरूपावरक अशुद्धियों) के विषय में ही लिखा है।
शिवसूत्रकार के मतानुसार प्रथम अशुद्धि (बन्धन का कारण) अज्ञानात्मक ज्ञान
है। यह ‘अज्ञान’ क्या है? और इसका प्रभाव क्या है?
१. अभिनवगुप्त—परमार्थसार।

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१५८ स्पन्दकारिका
१) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।
२) अज्ञानाद्बध्यते लोकस्ततः सृष्टिश्च संहृतिः ॥
(अज्ञान—बन्धन—सृष्टि + संहार) (मालिनीविजय) अशुद्धि स्वरूप इस
ज्ञानात्मक अज्ञान का स्वरूप क्या है ?
क) आत्मा में अनात्मताभिमानरूप जो अख्याति (अज्ञान) या अज्ञानात्मक ज्ञान है
वही बन्धन है—'एवमात्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्याति लक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं
बन्धो ॥'
ख) इसी प्रकार—शरीरादिक अनात्मा में आत्माभिमानतारूप जो अज्ञान है उससे
उत्पन्न ज्ञान भी बन्धन है—
'यावद् अनात्मनि शरीरादौ' आत्मताभिमातारूप जो अज्ञान है उससे उत्पन्न ज्ञान
भी बन्धन है—
'यावद् अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव'
(परामृतरसापाय ....) कारिका में इसी भात को गुंफित किया गया है ।
ग) परमेश्वर के द्वारा स्वस्वातन्त्र्य शक्ति से आभासित स्वस्वरूप गोपनात्मिका
महामाया शक्ति के द्वारा अपनी आत्मा में .... मायाप्रमात्रान्त जो सङ्कोच अवभासित किया
गया है वही शिवाभेदरूप अख्यात्यात्मक अर्थात् अपूर्णम्मन्यतात्मक आणवमलसतत्त्व-
संकुचित अज्ञानात्मक ज्ञान ही बन्धन है । यही प्रथम अज्ञान या प्रथमा शुद्धि 'आणव
मल' है । इसके अनन्तर शिवसूत्रकार ने 'योनिवर्गः कलाशरीरम्' (१।३) 'ज्ञानाधि-
ष्ठानं मातृका' (१।४) द्वारा भी अशुद्धियों पर प्रकाश डाला है । आचार्य क्षेमराज ने
'शिवसूत्रविमर्शिनी' में इनकी व्याख्या निम्न स्पन्दसूत्रों—
१) शब्दराशिसमुत्थस्य ....' (स्पन्दसूत्र) तथा
२) स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः (स्पन्द सूत्र) में स्वीकार किया है ।
स्वच्छन्दशास्त्र में इसी अशुद्धिमूलक 'मल' के स्वरूप का निम्न शब्दों में विवेचन
किया गया है—
मलप्रध्वस्तचैतन्यं कलाविद्यासमाश्रितम् ।
रागेण रंजितात्मानं कालेन कलितं तथा ॥¹
'आणव' के अतिरिक्त 'मायीय' एवं 'कार्म' मल की घोर अशुद्धियाँ हैं ।
शुद्धि और अशुद्धि—वास्तविक शुद्धि तो स्वाहन्ता में निमज्जन है—
'शुद्धिर्बहिष्कृतार्थानां स्वाहन्तायां निमज्जनम्' (परिमल) । वह निखिल विश्व


१. नियत्या यमितं भूयः पुंभावेनोपबृंहितम् ।
प्रधानाशयसंपन्नं गुणत्रयसमन्वितम् ॥
बुद्धितत्त्वसमासीनमहंकारसमावृतम् ।
मनसा बुद्धिमाक्षैस्तन्मात्रैः स्थूलभूतकैः ॥ (स्वच्छन्दतन्त्र)

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प्रथमः निष्यन्दः १५९
चिदात्मक एवं चिद्रूप है किन्तु बुद्धि इस अद्वैत एवं अभेद में भी द्वैत की कल्पना कर
लेती है और यह व्यतिरेकिणी बुद्धि ही अशुद्धि है और बुद्धि के इस भेदात्मक स्वरूप का
विमर्दन ही 'पराशुद्धि' है—
चिदात्मकेष्वप्येतेषु या बुद्धिर्व्यतिरेकिणी ।
सैवाशुद्धिः परा प्रोक्ता शुद्धिस्तद्धी विमर्दनम् ।। (परिमल)
शुद्धविद्या क्या है? अशुद्धविद्या कलङ्क प्रक्षालनाविनाभूता स्वस्वभावप्रत्यभिज्ञाप-
नात्मिका संवित्स्वातन्त्र्यशक्तिः शुद्धविद्या' । (परिमल)
'विज्ञानभैरव' में 'शुद्धि' एवं 'अशुद्धि' का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है—
किञ्चिज्ज्ञैर्या स्मृताऽशुद्धिः सा शुद्धिः शम्भुदर्शने ।
न शुचिर्ह्यशुचिस्तस्मान्निर्विकल्पो भवेन्नरः ।। (परिमल)
वेदान्त का मत—
१) 'मल' = अन्तःकरण के मलिन संस्कार ।
२) 'विक्षेप' = चित्त - चाञ्चल्य । —विल्का
३) 'आवरण' = स्वरूप - विस्मृति ।
शुद्धि-प्रक्रिया— १) 'मल' मल की शुद्धि—(मल-निवृत्ति) = निष्कामोपासना से
२) विक्षेप-निवृत्ति—शुद्ध एवं एकनिष्ठ = उपासनायोग से ।
३) आवरण-निवृत्ति— शुद्ध - ज्ञान से ।
'आवरण' का कार्य = स्वरूप-विस्मृति । 'विक्षेप' का कार्य = अध्यारोपा
अध्यास ।।
'अविद्या' का स्वरूप = त्वं परमात्मानं सन्तं संसारिणं संसार्यहमस्मीति विप-रीतं
प्रतिपद्यसे । अकर्तारं सन्तं कर्तेति, अभोक्तारं सन्तं भोक्तेति, विद्यमानं च अविद्यमान-मिति
इयमविद्या ।। (शङ्कराचार्य)
अविद्या नाम अन्यस्मिन् अन्य धर्माध्यारोपणा ।। (पञ्चदशी)
'माया' और 'अविद्या' में भेद— १. दोनों प्रकृतियाँ सत्व की शुद्धि—'माया'
२. सत्व की मलिनता— 'अविद्या' । (विद्यारण्य = 'पञ्चदशी') ।
'प्रकृति' के दो रूप—'माया' 'अविद्या' सत्व शुद्धयविशुद्धिभ्यां मायाविद्ये च ते
मते ।।
१) अचिन्त्य रचना शक्ति बीजं 'मायेति' निश्चिनु ।। (पञ्चदशी)
२) मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।।
अस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् । ('पञ्चदशी')
३) चिदानन्दमयब्रह्म प्रतिबिम्बसमन्विता ।
तमोरजः सत्वगुणा प्रकृतिर्द्विधा च सा ।। (पञ्चदशी)

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१६० स्पन्दकारिका
'माया' के पुत्र— १) जीव २) ईश्वर (पंचदशी : विद्यारण्य)
(मायाख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरौ उभौ ।।' (पंचदशी)
'ईश्वर' = मायाबिम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वर ।
'जीव' = चैतन्यं यदधिष्ठानं लिंगदेहश्च यः पुनः ।
चिच्छाया लिंगदेहस्था तत्संघो जीव उच्यते ।। (पंचदशी)
जीव— १) लिंगदेह का आधाराधिष्ठान चैतन्य ।
२) लिंगदेह ३) लिंगदेह में अवस्थित चिदाभास
इन तीनों का संघ = 'जीव'
१) कूटस्थ में बुद्धि कल्पित है ।
२) उस बुद्धि में जो चेतन का प्रतिबिम्ब है वह जब प्राणों को धारण कर लेता है
वही 'जीव' है ।
१) विज्ञानमयकोशोऽयं 'जीव' इत्यागमा जगुः ।। (पंचदशी)
२) अन्तःकरण संभिन्नो बोधो जीवोऽपरोक्षताम् । (पंचदशी)
'परमात्मा' की चार अवस्थायें हैं (पंचदशी)—
'चित्' 'अन्तर्यामी' 'सूत्रात्मा' 'विराट्'
(धौत) (घट्टित) (लांछित) (रंजित) पट के समान ।।
चैतन्य के चार भेद (पंचदशी)—
कूटस्थ ब्रह्म जीव ईश्वर
'कूटस्थो ब्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।।'
'ईश्वर' = 'चित्सन्निधौ प्रवृत्तायाः प्रकृतेर्हि नियामकम् ।
ईश्वरं ब्रुवते योगाः स जीवेभ्यो परः श्रुतः ।।'
चिदाभास की अवस्थायें—
अज्ञान आवरण विक्षेप परोक्षज्ञान अपरोक्षज्ञान शोकराहित्य निरंकुश तृप्ति
अज्ञान की शक्ति
असत्त्वापादक अभानापादक
(वह नहीं है) (वह मुझे प्रतीत नहीं होता) असत्वा- अभानावणा की शक्ति
(विद्याख्य) वरण की शक्ति (अपरोक्षज्ञान से
(परोक्ष ज्ञान से निवृत्ति) निवृत्त)

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प्रथमः निष्यन्दः १६१
उपादान जीव (चैतन्य) (चैतन्य के स्थान)
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विवर्त परिणाम आरंभ नेत्र में कण्ठ में हृदय में ब्रह्म में
(जाग्रति) (स्वप्न) (सुषुप्ति) (तुरीय)
'जीव' = अन्तःकरण का साहित्य ॥
'ईश्वर' = अन्तःकरण का साहित्य ॥
परमपद
परम पद का स्वरूप क्या है?—'स्यात् परमं पदम्'—
१) यजुर्वेद—तत्त्वद्रष्टा ऋषिमूनि विष्णु के परम पद का सर्वदा साक्षात्कार करते
हैं—ओ३म् तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥'
२) परमाकाश परम व्योम का ही अभिधानान्तर 'परमपद' है ।
३) मन्त्रलयोपरान्त सुषुम्ना में नादात्मक प्रणवानुभूति या अनवरत नादश्रवण से
उत्पन्न होने वाला विराट् या परमाकाश ही 'परमपद' है ।
४) निरालम्बोपनिषद् में कहा गया है कि—'प्राण' इन्द्रिय आदि एवं अन्तः-
करण के गुणादिक के परे सच्चिदानन्दन्य नित्य, मुक्त परब्रह्म ध्यान ही 'परमपद' है—
'परमंपदमिति च प्राणेन्द्रियाद्यन्तः करणगुणादेः परतरे सच्चिदानन्दमयं नित्यमुक्तब्रह्मस्थानं
परमं पदम् ॥
५) ध्यानबिन्दूपनिषद् के मतानुसार—'शब्द के साथ अक्षर नाद के क्षोभ होने पर
उत्पन्न शब्द शून्यावस्था की स्थिति ही 'परमपद' है—
'बीजाक्षरं परं बिन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम् ।
सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम् ॥'
६) मैत्रायणी उपनिषद् के अनुसार 'लय विक्षेप-शून्य मन को सम्यक् रूप से
स्थिर करके जो अमनी भाव का उदय होता है वही 'परमपद' है—लय विक्षेपरहितं मनः
कृत्वा सुनिश्चितम् ।
यदा यात्यमनीभावं तदा तत्परमं पदम् ॥ (मैत्रायणी उप० ६-३४)
७) तेजोबिन्दूपनिषद् में कहा गया है कि परम गोपनीय अस्तन्द्र निराश्रय सोमरूप
सूक्ष्मा कला ही विष्णु का 'परमपद' है—
परमं गुह्यतमं विद्धि ह्यस्तन्द्रो निराश्रयः ।
सोमरूपकला सूक्ष्मा विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ (१.५)
८) श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है कि—
क) निश्चल चित्त से एक-एक अवयव का ध्यान करना चाहिए ।
ख) मन को विषय-शून्य बनाकर विषय-शून्य मन का उससे योग करना चाहिए ।
स्पं० ११

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१६२ स्पन्दकारिका
ग) तदुपरान्त चित्त में किसी भी विषय का चिन्तन या अनुस्मरण नहीं करना
चाहिए।
घ) वही आन्तर स्थिति विष्णु का परमपद है जहाँ पहुँचकर मन अत्यन्त आह्लादित
हो उठता है—
तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा।
मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत् ॥
पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ (भागवत २-१-१९)
९) ध्यानबिन्दूपनिषद् में कहा गया है कि 'जो मन प्रपञ्च की सृष्टि' स्थिति एवं
लय का विधान करता है उस मन का जहाँ विलय होता है वही विष्णु का परम पद है।
'यन्मनस्त्रिजगत् सृष्टिस्थितिव्यसनकर्मकृत् ।
तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ (ध्यान० २५)
१०) 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि गंगा एवं यमुना इड़ा पिंगला के
मध्य में स्थित बालखण्डा तपस्विनी का बलात्कारपूर्वक ग्रहण भी विष्णु का 'परमपद'
है— गंगा यमुनोर्मध्ये बालखण्डां तपस्विनीम् ।
बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
११) 'घेरण्डसंहिता' में कहा गया है कि—'अनाहत शब्द की जो विशिष्ट ध्वनि
होती है उस ध्वनि के अन्तर्गत ज्योति है। उस ज्योति के अंतर्गत जो मन है वह मन
जहाँ विजय प्राप्त करता है वह आस्पद ही विष्णु का 'परमपद' है—
अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः ।
ध्वनेरन्तर्गतं ज्योति ज्योतिरन्तर्गतं मनः ।
तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥
आचार्य जयरथ तन्त्रालोक की टीका 'विवेक' में कहते हैं—
'अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिः परमं पदमश्नुते ॥'
अन्तर्लक्ष्य एवं बहिर्दृष्टि रखने वाले योगी 'परमपद' प्राप्त करते हैं। वे व्यवहार-
परायण रहकर भी स्वात्ममात्र में विश्रान्ति सुख की अनुभूति प्राप्त करते हैं अतः स्पष्ट है
कि योगी भेदावस्था में भी अभेद भावना-स्वरूपात्मक स्थिति-प्राप्त करता है—
बहिस्तत्तद्व्यवहारपरत्वेऽपि स्वात्ममात्रविश्रान्त्या परं परं चमत्कारातिशयमनु-
भवन्ति ॥१
परम पद—'अन्तः अहंपरामर्शात्मनि संवित्त्वे सावधानो बाह्यविषयासंगेऽपि
स्वरूपपरामर्शपरत्वात् भैरवमुद्रानुपविष्टो योगी 'परं पदमश्नुते' विमर्शदशामधिशेते ॥'२
भैरवमुद्रानुपविष्ट योगी परमपद या विमर्श दशा प्राप्त करता है।
१. जयरथ-'विवेक' (तन्त्रालोक की टीका) (आ०५)।
२. तन्त्रालोक (आ०५)—'विवेक' श्लोक ८० ।