स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context१४४ स्पन्दकारिका
'प्रकाशस्य मुख्य आत्मा प्रत्यवमर्शः ॥'१
'आत्मद्रव्यस्य भावात्मकमप्येतज्जडाद्भेदकतया विमर्शाख्यं मुख्यं रूपमुक्तम्'२
स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।३ 'स्फुरत्ता' क्या है? स्फुरत्ता स्फुरणकर्तृता
अभावा-प्रतियोगिनी अभावव्यापिनी ।४
सत्ता क्या है? सत्ता भवत्ता भवनकर्तृता नित्या ।५
प्रत्यवमर्शात्मा क्या है? देशकालास्पर्शात्सैव (स्फुरत्ता) प्रत्यवमर्शात्मा चिति-
क्रियाशक्ति ॥६
हृदय क्या है? (प्रत्यवमर्शात्मा चितिक्रियाशक्तिः) सा विश्वात्मनः परमेश्वरस्य
स्वात्मप्रतिष्ठारूपा हृदयमिति ।७
क्या 'मायाशक्ति' इस 'प्रत्यवमर्श' 'हृदय' 'स्वातन्त्र्य' 'सार' आदि से कोई भिन्न
सत्ता है? नहीं 'माया' है तो 'शक्ति' का ही रूप । यह भी परमशिव की ही एक शक्ति है
किन्तु भेद यह है कि यह भेदावभासिनी शक्ति है—
'प्रकाशात्मनः परमेश्वरस्य मायाशक्त्या स्वात्मरूपं विश्वं भेदेनाभास्यते ॥'८
स्वातन्त्र्य के लक्षण—'स्वातन्त्र्य' आत्मा का स्वरूप है । यह अनन्यमुखप्रेक्षित्व
है— 'स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् ॥'९
सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व परिपूर्णत्व ही स्वातन्त्र्य है—
'चैतन्यमात्मा... चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियामयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम् उच्यते ॥'१०
शैवशास्त्र में 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के अनेक लक्षणों का उल्लेख किया गया है जिनमें
प्रमुख लक्षण निम्न हैं—
१) 'स्वातन्त्र्य' एवं 'चैतन्य' पर्यायवाची हैं ।
२) अनन्यमुखापेक्षी सर्वकर्तृत्व । दुर्घटकारित्व । अर्थात्—सृष्टि-स्थिति-संहार-
पिधान-अनुग्रहः ५ कार्य पूर्णज्ञातृता, पूर्णकर्तृता, आत्मनिर्भरता । अहं विमर्शात्मिका
विश्वात्मक स्फुरणा, पूर्णाहन्ता इसके प्रधान लक्षण हैं ।
सर्वज्ञातृत्व, सर्वकर्तृत्व क्या है? 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' का क्या अर्थ है? पशु-
भूमिका पर 'ज्ञान'—किंचित ज्ञातृत्व एवं 'क्रिया' किंचित्कर्तृत्व है किन्तु पति भूमिका पर
यह सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व अद्वितीय, अप्रतिम, अनुपमेय महाशक्ति है । यह अनन्य-
मुखापेक्षी 'ज्ञातृत्व' एवं अनन्यमुखापेक्षी नित्यात्मक, सार्वभौम, सार्वदेशिक, सार्वकालिक
सर्वात्मक ज्ञान एवं क्रिया है । यह 'ज्ञान' बुद्धि का विलास नहीं है—प्रकृत्योद्भूतअनित्य
ज्ञान नहीं है—सेन्द्रिय ज्ञान नहीं है प्रत्युत् आत्मोद्भूत या चैतन्यस्वरूप ज्ञान है, परमात्मा
की 'ज्ञानशक्ति' है, और 'क्रिया' भी सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सार्वभौम, सर्वातिशायी,
१. उत्पलदेवाचार्यः प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति । २. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।
३. प्रत्यभिज्ञाकारिका । ४. प्रत्य० का० वृत्ति ।
५. प्र०का०वृ० । ६. प्र०का०वृ० ।
७. प्र०का०वृ० । ८. प्र०का०वृ० ।
९. अभिनव गुप्त । १०. शि०सू०वि० ।