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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 252

प्रथमः निष्यन्दः १५१
भी अभेदात्मक रूप में, — अतः उसकी भेदात्मक रूप में अभिलाषा करना—पूर्ण को
अपूर्ण रूप में देखने की आकांक्षा करना एक ‘अशुद्धि’ या ‘मल’ ही तो है । यह अपूर्णता
ही—‘आणव मल’ ‘मायीय मल’ एवं ‘कार्ममल’ के रूप में विद्यमान है ।
पतिप्रमाता अपने स्वातन्त्र्य शक्ति से पशुभूमिका स्वीकार करके ‘शक्तिदरिद्री’ बन
जाता है । मलत्रय में जो ‘आणव मल’ नामक अशुद्धि है उसके दो भेद हैं—
१) स्वातन्त्र्य की हानि (पूर्णज्ञातृत्व का संकोच)—‘स्वातन्त्र्य हानिवार्धस्य’
२) स्वातन्त्र्य का अबोध (पूर्णज्ञातृत्व का मिथ्याभिमान)
‘स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता’ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा) ‘स्वातन्त्र्यहानिर्ज्ञातृत्वसंकोचः’
(ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)
‘निज अशुद्धि’ (का० ९) आत्मा को आच्छादित करने वाले एवं अन्तःकरण को
मलिन बनाने वाले ‘मल’ है । इसे ही आचार्य शङ्कर ने ‘अविद्या’ कहा है । बौद्धों ने भी
बन्धन की द्वादश श्रृंखलाओं में इसे प्रथम स्थान दिया है—
‘अविज्जा पच्चया संखाण, संखार पच्चया विञ्जाणं ......
अज्ञान ज्ञानाभाव नहीं है प्रत्युत् अपूर्ण ज्ञान हैः—त्रिक-सिद्धान्त शैव-शाक्त
तांत्रिकों ने इस ‘अज्ञान’ को मलात्मक माना है । ‘मल’ तीन प्रकार के हैं—१) आणव
मल २) मायीय मल ३) कार्म मल ॥
अशुद्धि का कारण क्या है?—अशुद्धि का कारण असत् तत्त्वों में सत्त्व,
अचित् में चित्, अनात्म में आत्मा, अशुचि में शुचि अनित्य में नित्य एवं दुःख में सुख
आदि की प्रतीति है । यह अध्यासात्मक एवं अध्यारोपजन्य है । यह मिथ्याप्रतीति का
परिणाम है ।
अशुद्धि का कारण आणवादिक मल भी हैं ।
मालिनीविजयोत्तरतन्त्र का मत—संसारांकुर अज्ञान ही ‘मल’ हैं—
‘मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम्’ (मा० वि० प्र० अधिकार) ‘महार्थमञ्जरी’
का मत— ‘मल’ ही प्रधान अशुद्धि है— ।
मालिनीविजय : अज्ञान कैसा होता है?
१. अज्ञान ही मल है । २. यही संसार के अंकुर का कारण है । ३. अज्ञान
अंधकार है । पारमेश्वर स्वातन्त्र्य की अनुभूति ‘स्व’ रूप का यह गोपन करता है । ४.
आत्मा एवं अनात्मा सम्बन्धी व्यर्थ की डाझनों में डालने वाला होता है । ५. अपूर्ण ज्ञान
ही ‘अज्ञान’ है । इसे ‘आणवमल’ भी कहते हैं—‘अज्ञानं तिमिरं पारमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्र-
मुल्लासितस्वरूपगोपनासत्तत्त्वमात्मानात्मनोरन्यथाभिमानस्वभावम् अपूर्ण ज्ञानं तदेव चाणवं
मलम् ॥’ (तन्त्रालोकः विवेक प्र०आ०श्लोक २३)
अभिनवगुप्तपादाचार्य का मत—
मलमज्ञानभिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।