स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
Page 247 of 519
Read in context१४६ स्पन्दकारिका
'स्वातन्त्र्य' का अपर पर्याय 'चिति' भी है 'चिति' का अर्थ है चैतन्य। चेतने की
सर्वसामान्य क्रिया ही 'चिति' है—'चितिक्रिया सर्वसामान्य रूपा ।।' (शि०सू०वा०)
'चैतन्य' सर्वज्ञानक्रिया सम्बन्धमय स्वातन्त्र्य है—'चैतन्यं सर्वज्ञानक्रिया, सम्बन्धमयं
परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम्।' (शि०सू०वि०) 'तन्त्रालोक' में 'स्वातन्त्र्य' को इस प्रकार परि-
भाषित किया गया है—चैतन्यमिति भावान्तः शब्दः स्वातन्त्र्यमात्रकम् । अनाक्षिप्तविशेषं
सदाहसूत्रे पुरातने (तन्त्रालोक १.२८) प्रत्यवमर्शात्मकता ही चिति है—'चितिः
प्रत्यवमर्शात्मा' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)।
चेतने की क्रिया (चिति) संसार के प्रत्येक प्रमाता (ग्राहक) में विद्यमान है। यहाँ
तक कि जड़ पदार्थों में भी इसकी सत्ता है। जो स्वातन्त्र्यपूर्वक किसी भी पदार्थ या व्यक्ति
को जान सके या कार्य कर सके वह चेतन है।
पशु एवं पति के चेतने में क्या भेद है? पशु वर्ग का चेतना मित, सापेक्ष,
अनित्य, देशकालसापेक्ष है किन्तु पति का नहीं। पति में सर्वत्र 'स्वातन्त्र्य' है।
'स्वातन्त्र्य' का अर्थ है—इच्छा, ज्ञान, क्रिया, और आनन्द में पूर्णता। ज्ञान, क्रिया,
विभुता, तृप्ति, नित्यत्व में पूर्णता (निरपेक्ष, निर्बन्ध एवं नित्य पूर्णत्व) ।।
'पंचविधकृत्यकारित्वं चिदात्मनो भगवतः'
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् । अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।।'
शिव की अनन्त शक्तियों में प्रमुख शक्तियाँ
[चिति शक्ति] [आनन्द शक्ति] [इच्छा शक्ति] [ज्ञान शक्ति] [क्रिया शक्ति]
स्वातन्त्र्य—(क्षेमराज : शि०सू०वि०—)
'चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा इति चेतयते इति चेततः सर्वज्ञानक्रियास्वतन्त्रः तस्य
भावः स्वातन्त्र्यम् उच्यते ।।'
स्वातन्त्र्यशक्ति—तत्र भालनेत्रं 'स्वातन्त्रशक्तिः', दक्षिणनेत्रं 'प्रमाणशक्तिः',
वामनेत्रं 'प्रमेयशक्तिः' । (प०त्रिं०)
'प्रकाश' = 'प्रकाशश्च अनन्योन्मुख- [स्वातन्त्र्य शक्ति]
विमर्शः अहमिति'