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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 256 of 519

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Page 256

प्रथमः निष्यन्दः १५५
'मल' ही संसार का मूल है । सृष्टि का प्रथम स्पंदन कैसे होता है?—'आणवमल' से
ज्यों ही ज्ञान में स्वातन्त्र्य की एवं स्वातन्त्र्य में ज्ञान की हानि होती है त्यों ही सृष्टि का
प्रथम स्पन्दन प्रारंभ होता है । 'परमशिव' सर्वथा निस्पंदं है । प्रशान्त है ।¹
इसे ही 'परमभैरव' भी कहा गया है । उसकी 'शक्ति' ही सृष्टि, स्पन्दन, सृष्टि-
विस्तार, स्थिति एवं संहार आदि कार्यों का निष्पादन करती है । आणव, 'मायीय' एवं
'कार्म' मल शिवस्वरूप को ढक कर असत् में सत्, अनात्म में आत्मा, अनित्य में नित्य,
अस्वभाव में स्वभाव एवं क्षर में मिथ्या अक्षरत्व का अभिमान उत्पन्न कर देता है ।²
जो मलों से निर्मुक्त है, इन कोशों से मुक्त है वही मुक्त है ।
आणव मल—अपने स्वरूप की हानि ही जिसका स्वरूप है ऐसी अख्याति ही
चैतन्य का 'आणव मल' है । स्वर्ण में निहित अशुद्धि रूपी दोष ही आत्मा का
आणवमल है । यह अन्तरंग आवरण या आन्तर आच्छादन है । यह तदात्मा बनकर
रहता है ।
मायीय मल—'माया' से लेकर 'विद्या' तक के ६ कञ्चुक आत्मा के सूक्ष्म
आवरण हैं यथा चावल का छिलका (कम्बुक) जो चावल के पीठ पर रहता है । इसके
द्वारा ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व में भेदमय बोध होता है । यही है—'मायीय मल' ।
कार्म मल—इसकी अपेक्षा जो बाह्यावरण है वह भूसी की भाँति, प्रकृति-निर्मित
शरीर का अस्तित्वस्वरूप आवरण है जो कि स्थूल है तथा त्वचा, मांस आदि के स्वरूप
वाला होने के कारण यह तृतीय मल 'कार्ममल' कहलाता है ।
१. 'पर मल' = आणवमल । अणु (जीवात्मा) का मल ।
२. 'सूक्ष्म मल' = मायीय मल ।
३. 'स्थूल मल' = कार्ममल ।
पशु—कोशत्रय—ये तीन मल ही कोशत्रय हैं । इन तीनों मलों से आच्छादित
आत्मा प्रकाशनोपरान्त भी घर में प्रतिबिम्बित आकाश की भाँति संकुचित हो जाती है
और इसलिए 'अणु' एवं 'पशु' कही जाती है—'स्पन्दकारिका' (४५) में इसका स्वरूप
इस प्रकार कहा गया है ।
शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥ (विभूतिस्पंद)
इन मलों में 'आणव' प्रधान मल है । = मल के ये तीन रूप हैं—परमावरणं मल
इह सूक्ष्मं मायादि कञ्चुकं स्थूलम् ।
बाह्यं विग्रहरूपं कोशत्रय वेष्टितो ह्यात्मा ॥ (परमार्थसार २४)
कोशत्रय—त्रिकदर्शन में कोशत्रय की मान्यता है किन्तु वेदान्त में कोशपञ्चक की
मान्यता है । जो निम्नांकित हैं—
१-२. अभिनवगुप्त—परमार्थसार ।