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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 258 of 519

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Page 258

प्रथमः निष्यन्दः १५७
ख) स्वातन्त्र्य का अबोध रूप आणव मल—‘प्रलयाकल’ में। (इनमें कार्म मल
भी रहता है एवं विकल्प से मायीय मल भी।)
ग) देवादिक समस्त संसारी प्रमाताओं में ‘त्रिविधमल’ रहते हैं। किन्तु मुख्यतः
उनमें ‘कार्ममल’ पाया जाता है।
परमार्थसार में अभिनवगुप्तपाद कहते हैं—
‘कार्यकारणरूपा प्रकृति परमेश्वरेच्छा से पुरुष के लिए भोग्य रूप में प्रवृत्त होती है।
यथा छिलका चावल के दाने को ढक लेता है उसी प्रकार प्रकृति से लेकर पृथ्वी पर्यन्त
की समस्त सृष्टि चैतन्य को देहभाव से आच्छादित कर लेती है। (परमार्थसार : २३)
तुष इव तण्डुलकणिका मावृणुते प्रकृतिपूर्वकः सर्गः ।
पृथ्वी पर्यन्तोऽयं चैतन्यं देहभावेन ॥
परम (अन्तरंग) आवरण आणव मल (या मल) कहा जाता है। मायादिक ६
सूक्ष्म कञ्चुक बाह्य-स्थूल आवरण देहरूप हैं। यह आत्मा इनसे (तीन कोशों से)
आच्छादित है—
परमावरणं मल इह सूक्ष्मं मायादिकञ्चुकस्थूलम् ।
बाह्यं विग्रहरूपं कोशत्रय वेष्टितो ह्यात्मा ॥१
शिवसूत्र और स्पन्दसूत्र—आचार्य क्षेमराज ने ‘शिवसूत्रविमर्शिनी’ के सूत्र (ज्ञानं
बन्ध १।२; एवं १।३; १।४) आदि में इसी स्पंदसूत्र ‘निज शुद्ध्यासामर्थ्यस्य ...’ का
उद्धरण देते हुए दोनों सूत्रों में सैद्धान्तिक या वैचारिक साम्य का प्रतिपादन किया है। वे
कहते हैं कि—
१) जीवात्मा निज अशुद्धियों से असमर्थ हो जाता है।
२) वह वासनात्मक कर्तव्यों की वासनाओं की अशुद्धियों से असमर्थ हो जाता है
और इस अशुद्धि से उसमें ‘क्षोभ’ का आविर्भाव होता है।
शिवसूत्रों में अशुद्धियों का स्वरूप : एक तुलनात्मक विश्लेषण—यही विचार
उक्त शिवसूत्रों में भी व्यक्त किया गया है। शिवसूत्रकार का कथन है कि अशुद्धियों में
प्रथम अशुद्धि जो जीवात्मा के बन्धन है वह है ‘ज्ञान’।
प्रथम अशुद्धि—ज्ञान—बन्धः। ‘ज्ञानं बन्धः ।।' (१।२)'
शिवसूत्रकार ने शिवसूत्रों में प्रथमसूत्र (चैतन्यमात्मा १।१) में आत्मा के स्वरूप
का विवेचन करने के बाद दूसरा सूत्र आत्मा के बन्धनों (आत्मा के आच्छादक,
स्वरूपावरक अशुद्धियों) के विषय में ही लिखा है।
शिवसूत्रकार के मतानुसार प्रथम अशुद्धि (बन्धन का कारण) अज्ञानात्मक ज्ञान
है। यह ‘अज्ञान’ क्या है? और इसका प्रभाव क्या है?
१. अभिनवगुप्त—परमार्थसार।