Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 246 of 519

Read in context
Page 246

प्रथमः निष्यन्दः १४५
निर्बंध, निर्बाध, देशकालातीत, नित्य एवं चितिस्वरूप है न कि मात्र ऐन्द्रिय, अनित्य,
संकुचित, अपूर्ण, सापेक्ष, प्रतिबंधित, देशकालावच्छिन्न एवं पशुभूमिक ॥
यह स्वातन्त्र्यमयी विश्वात्मक स्फुरणा, आत्मस्वातन्त्र्य, आत्मनिर्भरता, अपरा-
श्रयता, तथा इसका आत्मभूत पूर्ण ज्ञातृत्व एवं पूर्णकर्तृत्व जो कि अहंविमर्शात्मक
स्फुरणा है। शब्दान्तर में 'चैतन्य' एवं 'स्वातन्त्र्य' पद वाच्य है।
शैव दर्शन में ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का स्वरूप—सामान्य ज्ञातृत्व (ज्ञान) एवं
कर्तृत्व (क्रिया) से भिन्न है। सामान्यस्तरीय ज्ञान एवं क्रिया यहाँ ज्ञान-क्रिया नहीं है।
ज्ञान एवं क्रिया का अर्थ है—विश्वात्मक स्तर पर प्रत्येक पदार्थ (प्रत्येक सत्ता) का
देशकालनिरपेक्ष संपूर्ण ज्ञान एवं निरपेक्ष तथा देशकाल से अप्रभावित, निर्बंध, सब कुछ
कर सकने एवं करने की पूर्ण कर्तृत्व शक्ति ही 'क्रिया' है। अन्यनिरपेक्ष स्वतन्त्र ज्ञातृत्व
एवं स्वतन्त्र-कर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्व एवं सर्वकर्तृत्व—'कर्तुं, अकर्तुं, अन्यथा कर्तुं, की पूर्ण
शक्ति ही 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' है।


पशुप्रमाता का ज्ञान एवं क्रिया—प्रति प्रमाता का ज्ञान एवं क्रिया—
१. अन्य सापेक्ष, देशकालसापेक्ष, परि-१. निरपेक्ष, देशकालसीमातीत, त्रिकाला-
स्थितिमूलक, खण्डित, अनित्य, सेन्द्रिय,बाधित, परिस्थितियों से अप्रभावित,
अपारमार्थिक, किंचित् क्षमतामूलकअखण्ड, निम्न, इन्द्रियातीत, पारमार्थिक,
(सर्वात्मक ज्ञान एवं सर्वात्मक क्रिया केसर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञातृत्वमूलक, सर्वात्मक,
विपरीत) विशेष ज्ञान एवं विशेष क्रिया-सार्वदेशिक, सार्वकालिक, सामान्य, सर्व-
मूलक, मित 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' ।जननीन, व्यापक, असीम एवं अक्षर
ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व ॥
२. इन्द्रियसंभूत ।२. इन्द्रिय निरपेक्ष एवं आत्मस्वरूप,
शक्ति स्वरूप ।
३. पञ्चकञ्चुकाविष्ट । ससीम३. पञ्चकञ्चुकों की सीमा-रेखा से अप्रति-
बंधित । असीम ॥
४. पशु-सम्बद्ध । सादि४. पति (शिव) से सम्बद्ध, अनादि ।
५. कृत्रिम एवं सायास ।५. सहज एवं स्वाभाविक ।
६. देहात्मबोधात्मक । सान्त६. आत्मस्वभावात्मक । अनन्त
७. ससीम, सादि, सान्त७. अनन्तप्रवाही, अनाद्यन्त
८. अन्तःकरणस्वरूपात्मक (देहात्मक,८. स्वरूपात्मक, विराट्, असंकुचित,
प्राणात्मक, मनसात्मक, इन्द्रियात्मक, बु-पूर्णाहन्तात्मक; आत्मविमर्शात्मक, पति
द्ध्यात्मक, मित अहङ्कारात्मक), संकुचित,भूमिक आत्ममूलक, विश्वात्मक समष्टि
पशु भूमिक, अनात्मविमर्शात्मक देहादि-मूलक, शक्तिचक्रात्मक
मूलक, व्यष्ट्यात्मक,
९. जड़ात्मक, जड़-चेतनात्मक, भेदा-९. चैतन्यात्मक, सर्वचिन्मयवादमूलक,
त्मक । पुर्यष्टकात्मक, एवं शक्ति चक्रा-अभेदात्मक, पुर्यष्टकातीत, आत्मविभवा-
त्मक (भेद प्रथात्मक) ॥त्मक ।

स्पं० १०