स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context१६० स्पन्दकारिका
'माया' के पुत्र— १) जीव २) ईश्वर (पंचदशी : विद्यारण्य)
(मायाख्यायाः कामधेनोर्वत्सौ जीवेश्वरौ उभौ ।।' (पंचदशी)
'ईश्वर' = मायाबिम्बो वशीकृत्य तां स्यात् सर्वज्ञ ईश्वर ।
'जीव' = चैतन्यं यदधिष्ठानं लिंगदेहश्च यः पुनः ।
चिच्छाया लिंगदेहस्था तत्संघो जीव उच्यते ।। (पंचदशी)
जीव— १) लिंगदेह का आधाराधिष्ठान चैतन्य ।
२) लिंगदेह ३) लिंगदेह में अवस्थित चिदाभास
इन तीनों का संघ = 'जीव'
१) कूटस्थ में बुद्धि कल्पित है ।
२) उस बुद्धि में जो चेतन का प्रतिबिम्ब है वह जब प्राणों को धारण कर लेता है
वही 'जीव' है ।
१) विज्ञानमयकोशोऽयं 'जीव' इत्यागमा जगुः ।। (पंचदशी)
२) अन्तःकरण संभिन्नो बोधो जीवोऽपरोक्षताम् । (पंचदशी)
'परमात्मा' की चार अवस्थायें हैं (पंचदशी)—
'चित्' 'अन्तर्यामी' 'सूत्रात्मा' 'विराट्'
(धौत) (घट्टित) (लांछित) (रंजित) पट के समान ।।
चैतन्य के चार भेद (पंचदशी)—
कूटस्थ ब्रह्म जीव ईश्वर
'कूटस्थो ब्रह्म जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा ।।'
'ईश्वर' = 'चित्सन्निधौ प्रवृत्तायाः प्रकृतेर्हि नियामकम् ।
ईश्वरं ब्रुवते योगाः स जीवेभ्यो परः श्रुतः ।।'
चिदाभास की अवस्थायें—
अज्ञान आवरण विक्षेप परोक्षज्ञान अपरोक्षज्ञान शोकराहित्य निरंकुश तृप्ति
अज्ञान की शक्ति
असत्त्वापादक अभानापादक
(वह नहीं है) (वह मुझे प्रतीत नहीं होता) असत्वा- अभानावणा की शक्ति
(विद्याख्य) वरण की शक्ति (अपरोक्षज्ञान से
(परोक्ष ज्ञान से निवृत्ति) निवृत्त)