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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 259 of 519

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Page 259

१५८ स्पन्दकारिका
१) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।
२) अज्ञानाद्बध्यते लोकस्ततः सृष्टिश्च संहृतिः ॥
(अज्ञान—बन्धन—सृष्टि + संहार) (मालिनीविजय) अशुद्धि स्वरूप इस
ज्ञानात्मक अज्ञान का स्वरूप क्या है ?
क) आत्मा में अनात्मताभिमानरूप जो अख्याति (अज्ञान) या अज्ञानात्मक ज्ञान है
वही बन्धन है—'एवमात्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्याति लक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं
बन्धो ॥'
ख) इसी प्रकार—शरीरादिक अनात्मा में आत्माभिमानतारूप जो अज्ञान है उससे
उत्पन्न ज्ञान भी बन्धन है—
'यावद् अनात्मनि शरीरादौ' आत्मताभिमातारूप जो अज्ञान है उससे उत्पन्न ज्ञान
भी बन्धन है—
'यावद् अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बन्ध एव'
(परामृतरसापाय ....) कारिका में इसी भात को गुंफित किया गया है ।
ग) परमेश्वर के द्वारा स्वस्वातन्त्र्य शक्ति से आभासित स्वस्वरूप गोपनात्मिका
महामाया शक्ति के द्वारा अपनी आत्मा में .... मायाप्रमात्रान्त जो सङ्कोच अवभासित किया
गया है वही शिवाभेदरूप अख्यात्यात्मक अर्थात् अपूर्णम्मन्यतात्मक आणवमलसतत्त्व-
संकुचित अज्ञानात्मक ज्ञान ही बन्धन है । यही प्रथम अज्ञान या प्रथमा शुद्धि 'आणव
मल' है । इसके अनन्तर शिवसूत्रकार ने 'योनिवर्गः कलाशरीरम्' (१।३) 'ज्ञानाधि-
ष्ठानं मातृका' (१।४) द्वारा भी अशुद्धियों पर प्रकाश डाला है । आचार्य क्षेमराज ने
'शिवसूत्रविमर्शिनी' में इनकी व्याख्या निम्न स्पन्दसूत्रों—
१) शब्दराशिसमुत्थस्य ....' (स्पन्दसूत्र) तथा
२) स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः (स्पन्द सूत्र) में स्वीकार किया है ।
स्वच्छन्दशास्त्र में इसी अशुद्धिमूलक 'मल' के स्वरूप का निम्न शब्दों में विवेचन
किया गया है—
मलप्रध्वस्तचैतन्यं कलाविद्यासमाश्रितम् ।
रागेण रंजितात्मानं कालेन कलितं तथा ॥¹
'आणव' के अतिरिक्त 'मायीय' एवं 'कार्म' मल की घोर अशुद्धियाँ हैं ।
शुद्धि और अशुद्धि—वास्तविक शुद्धि तो स्वाहन्ता में निमज्जन है—
'शुद्धिर्बहिष्कृतार्थानां स्वाहन्तायां निमज्जनम्' (परिमल) । वह निखिल विश्व


१. नियत्या यमितं भूयः पुंभावेनोपबृंहितम् ।
प्रधानाशयसंपन्नं गुणत्रयसमन्वितम् ॥
बुद्धितत्त्वसमासीनमहंकारसमावृतम् ।
मनसा बुद्धिमाक्षैस्तन्मात्रैः स्थूलभूतकैः ॥ (स्वच्छन्दतन्त्र)