स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र :—क्षोभ के विलीन हो जाने पर, इसका (मितप्रमाता का ) स्वभावसिद्ध ज्ञातृता
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नागिन है जो सौ-सौ खण्डों में काटी जाने पर भी उछल-उछल कर डस लेती है। जडमूर्त्ति
होने के कारण स्वयं अन्धी है अतः चाहे साधु हो या असाधु, धनिक हो या निर्धन, पण्डित
हो या मूर्ख, प्रत्येक को समान रूप से डसती है; किसी को छोड़ती नहीं।
माया के ऐसे स्वभाव को दृष्टिपथ में रखकर भगवान् त्रिपुरारि ने एक और १सूत्र में
माया के प्रपञ्च (अर्थात् त्रिविध मल, वासनात्मक कर्मों का जंजाल, स्वयं माया और इसका
कार्यरूप जगत्) को, सहसा तिलाञ्जलि देकर, अपने वास्तविक स्वभाव की यथार्थ अनुभूति
का आदेश दिया है ॥९॥
[ ज्ञातृता और कर्तृता का विकास ]
पूर्वसूत्र में यह कहा गया है कि प्रत्येक प्रकार का क्षोभ निलीन हो जाने पर मित-
प्रमाता शिवभाव पर प्रतिष्ठित हो जाता है। स्पष्ट ही इस कथन का अभिप्राय यह है कि
उस अवस्था में आत्मा में किसी भी प्रकार की स्फुरणा नहीं रहती है और फलतः वह तरंग-
हीन सागर की भाँति शान्त अर्थात् निःस्पन्द हो जाता है। यदि ऐसी बात है तो उसका
पूर्वोक्त स्पन्दात्मक स्वरूप हो कैसे सिद्ध हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का निवारण
किया जा रहा है—
तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञातृत्वकर्तृत्वलक्षणः ।
यतस्तदीप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥१०॥
यतः तस्मिन् प्रलीनक्षोभात्मके काले अकृत्रिमः सहजो ज्ञातृत्वकर्तृत्वभावरूपो
धर्मो यस्मात्, तस्मिन् एव प्राप्तयोगात्मके काले यत् यद् ज्ञातुम् इच्छति तत् तत्
जानाति च करोति च, नान्यदा संसार्थवस्थायाम् ॥१०॥
अनुवाद
सूत्र :—क्षोभ के विलीन हो जाने पर, इसका (मितप्रमाता का ) स्वभावसिद्ध ज्ञातृता
और कर्तृतारूप धर्म, निरावृत रूप में प्रकट हो जाता है, जिससे यह सारी इच्छित बातों को
स्वतन्त्रतापूर्वक जानता भी है और करता भी है ॥१०॥
वृत्ति :—यतः मितप्रमाता का स्वभावसिद्ध ज्ञातृतारूप और कर्तृतारूप धर्म क्षोभ के
निलीन हो जाने के उपरान्त तत्काल ही निरावृतरूप में प्रकट हो जाता है अतः वह उस
आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बाद तत्क्षण ही जो जो बातें जानना चाहता है उनको
(स्वतन्त्रता से) जानता है और करता है। इसके प्रतिकूल संसारी अवस्था में यह बात कदापि
संभव नहीं है ॥१०॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र में शान्त ब्रह्मवाद वेदान्तियों का मुखमुद्रण सूत्रात्मक रूप में किया गया
है। उनके विचारानुसार परब्रह्म का स्वरूप शान्त अर्थात् निःस्पन्द है। इसका अभिप्राय यह
कि उनका परब्रह्म प्रकाशरूप हो या न हो परन्तु उसमें विमर्श का सर्वथा अभाव है। उनके
१. मलः कर्म च माया च मायीयमखिलं जगत् ।
सर्वं हेयमिति प्रोक्तं विज्ञेयं वस्तु निश्चितम् ।। (मा० वि०, १.१६)
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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ही शब्दों में वह 'निस्तरंगमहोदधिकल्प (तरंगहीन महान् समुद्र के समान) है। इस कारण
उसमें ज्ञान क्रियारूप चेतनता की वर्तमानता सम्भव नहीं हो सकती है। वह पूर्ण शान्त है
और प्रत्येक प्रकार की झंझट से दूर है। फलतः 'विश्व है या नहीं—उसकी सृष्टि, स्थिति
और संहार का कार्यक्रम नियमित रूप से चलता है या नहीं—यदि चलता है तो उसका ज्ञाता
और कर्ता कौन है ?'—इत्यादि बातों की उसको न तो चिन्ता है और न चेतना ही। संक्षेप
में कहने का तात्पर्य यह कि यद्यपि ये लोग एक ओर परब्रह्म को चेतन मानते हैं तथापि
दूसरी ओर उसको शान्त-निस्तरंग-महोदधिकल्प बताकर उदासीन बना देते हैं।
शैवशास्त्रियों को और विशेषकर स्पन्दशास्त्रियों को सब से उत्कृष्ट और सारे विश्व
के नियामक अनुत्तर-तत्त्व की, इसप्रकार की शक्तिहीनता अथवा लूलापन मान्य नहीं है।
स्वातन्त्र्यशक्तिघन चैतन्य का, ज्ञान और क्रिया पर अनन्यमुखापेक्षी अधिकार है; यह अधिकार
तो उस सर्वकर्ता का अकाट्य स्वभाव ही है। ऐसी परिस्थिति में उस ज्ञानपारावार में कोई
तरङ्ग न उठे यह कौन सा स्वभाव हो सकता है ? हाँ, पूर्णस्वतन्त्र होने के कारण वह तत्त्व
युगपत् ही निस्तरङ्गवृत्ति और तरङ्गायमानरूप में भी प्रकाशमान है। १निस्तरङ्गवृत्तिता से
शैवदर्शन में शक्तिहीनता का अभिप्राय नहीं अपितु इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों की
सूक्ष्म सामरस्य अवस्था अर्थात् अभेद चिद्रूपता का अभिप्राय है। वास्तव में चैतन्य वही है
जो प्रसरणशील है—रूपप्रसार का रसिक है। वह स्वयं विश्वरूप में अवभासमान है। विश्व
भी मिथ्या या गर्हित नहीं क्योंकि ऊपर से नीचे तक सारा शिवरूप होने के कारण इसके
२गर्हित होने का प्रश्न ही कहाँ से उठ सकता है। हाँ, केवल विश्व को शिवरूपता अर्थात्
आत्मभूत चैतन्य से भेदरूप में देखना ही गर्हित है और वह एक प्रकार की भ्रान्ति ही है।
३नित्यस्फुरणशील परतत्त्व को अपनी स्वभावभूत शक्तियों से विछोह किसी भी अवस्था में
नहीं होता अतः ज्ञातृता और कर्तृता उसका सहज अर्थात् अकृत्रिम और यथार्थ स्वभाव है।
शान्त होने का अभिप्राय केवल यही हो सकता है कि वह परतत्त्व विश्वोत्तीर्ण और विश्व की
सारी अवस्थाओं और वैचित्र्यों को स्वेच्छापूर्वक सत्ता प्रदान करने पर, असीम सामर्थ्यशाली
होने के नाते, स्वयं कभी भी सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अथवा क्षणभङ्गुर शरीरादि के ममत्व और
अभिमानरूप क्षोभों से अभिभूत नहीं हो सकता है। फलतः शान्त ब्रह्मवादियों ने परब्रह्म को
शान्त कहकर उसकी उस शान्ति का जैसा ४संवेदनरहित रूप प्रस्तुत किया है उसको शैव-
दार्शनिक जड़ता के अतिरिक्त कुछ और नहीं मानते हैं।
इस विषय के साथ सम्बन्धित शैव दृष्टिकोण को अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए
पाठकों का ध्यान कुछ निम्नलिखित बातों की ओर आकर्षित किया जाता है। वैसे तो प्रथम
१. सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते ।
चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा ॥ (शिवदृष्टि, १.४)
२. रूपप्रसाररसतो गर्हितत्वमयुक्तिमत् ॥ (शिवदृष्टि, १.४)
३. एवं न जातुचित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥ (तत्रैव)
४. संवित्तिशून्यमात्मनश्चिद्रूपं न कदाचिदप्यस्तीत्यर्थः (शिवदृष्टि, १.४)
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सूत्र के विवरण में इन बातों की ओर थोड़ा बहुत संकेत किया गया है परन्तु यहाँ पर जरा
विस्तारपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक प्रतीत होता है ।
१शैवमतानुसार हृदय अर्थात् अहंप्रत्यवमर्शात्मक बोधपारावार में शाश्वत रूप में,
विमर्शात्मक स्पन्द की ऊर्मियाँ उठती रहती हैं क्योंकि ज्ञान चैतन्य होने के नाते कभी भी
निष्क्रिय नहीं हो सकता है । यह विमर्शरूप स्पन्द ही है जो विश्व का द्रावण अर्थात् विश्व का
बाह्य इदंरूप में अवभासन अथवा प्रसारण और प्रसारित भावमण्डल को पुनः आन्तर अहं-
रूपता में विलयन करने की संकल्पात्मक क्रियाशीलता पर निरत है । पहले भी कहा गया है
कि स्पन्द के प्रसार की दिशा युगपत् बहिर्मुखीन और अन्तर्मुखीन भी है । बहिर्मुख प्रसार अर्थात्
विश्वात्मकता को स्वीकारने की ओर उन्मुखता को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वात्मविकास' और
अन्तर्मुखप्रसार अर्थात् प्रसृत विश्वात्मकता को पुनः समेटने की ओर उन्मुखता को 'स्वात्मसंकोच'
कहते हैं । साथ ही इस द्विमुखी क्रियाशीलता को इकट्ठेरूप में, 'स्वरूप का उच्छलन' या
२'किञ्चिच्चलन' कहा जाता है । यह किञ्चिच्चलनात्मक स्फुरणा विश्व के स्थूलरूप में विक-
सित होने के 'आदि' अर्थात् निर्माण काल और 'अन्त' अर्थात् विश्व को समेटने के समय पर
सामान्यरूप में चलती रहती है अतः इस रूप में इसको३ सामान्यस्पन्द कहते हैं । इसका भाव
यह है कि इस अवस्था में प्रवाहमान स्पन्दशक्ति में किसी भी प्रकार की घट पट आदि विशेष
विकल्पात्मकता का विभाग नहीं होता है । विश्व के स्थितिकाल में निःसंशय स्पन्द
अपनी सामान्यरूपता को छोड़कर देह, प्राण, नील, सुख इत्यादि विशेष विकल्पात्मक रूपों में
प्रवहमान होकर विश्ववैचित्र्य का अवभासन कर लेता है और यह विशेषरूपता भी उच्छलन
या किञ्चिच्चलन ही है । इस प्रकार की यह स्वात्मोच्छलनात्मक स्फुरणा ही तो चैतन्य का
शाश्वत स्वभाव है अतः पतिप्रमातृभाव अथवा संविद्रूपता इसके बिना रह नहीं सकती है ।
आखिर स्वभाव तो स्वभाव ही है, वह कभी अन्यथा नहीं हो सकता है ।
फलतः शैवसिद्धान्त के अनुसार अनुत्तरतत्त्व सर्वज्ञ और सर्वकर्ता होने के नाते कभी भी
दूर अलग-थलग पड़ा हुआ तमाशाई बन कर नहीं रहता है । वह स्वयं स्वतन्त्र होकर सब कुछ
जानता भी है और करता भी है, अतः वह उदासीन या निश्चेष्ट नहीं है ।
४विश्वात्मक शाक्तप्रसर की भूमिका पर चलने वाले सारे कार्यकलाप की साधन-संपत्ति
अर्थात् निश्चित कार्यों के निश्चित कारणसमूह का संयोजन अथवा वियोजन करने में शिव को
१. हृदये स्वविमर्शाऽसौ द्राविताशेषविश्वकः ।
भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥
स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे स्वात्मन्युच्छलनात्मकः । (तं०, ९.१०२-३)
२. किञ्चिञ्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत् ।
ऊर्मिरेषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥ (तं०, ९.१८४)
३. द्रष्टव्य, सूत्र १५ का विवरण ।
४. तथा च तेषां हेतूनां संयोनवियोजने ।
नियते शिव एवैकः स्वतन्त्रः कर्तृतामियात् ! (तं०, ९.३५-६)
५
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ही एक मात्र स्वतन्त्र कर्ता के रूप में अवश्य मानना पड़ता है क्योंकि उसका रूप संविदात्मक
है और विश्वात्मक ज्ञातृता और कर्तृता की अहंविमर्शमयी स्फुरणा ही संवित् का यथार्थ
अकृत्रिम स्वभाव है। यही कारण है कि मितप्रमातृभाव की भूमिका पर भी संसार के सारे
अणु, दैनिक आदान-प्रदान के समयों पर, अपनी अपनी आवश्यकतानुसार, निश्चित कार्यों का
उत्पादन करने के लिए जिन निश्चित कारण समूहों का संयोजन अथवा वियोजन करते रहते हैं
उनके मूल में भी स्पन्दात्मक संवित् ही क्रियाशील है। संवित् तो संवित् ही है; न कहीं कम
न कहीं अधिक। अतः पतिप्रमातृभाव अथवा पशुप्रमातृभाव की भूमिकाओं पर उसकी ज्ञातृकर्तृ
रूप क्रियाशीलता में कोई अन्तर नहीं है। हाँ केवल इतनी बात है कि पशुरूप में वह आवश्य-
कता के अनुसार स्वयं ही जड़ शरीर इत्यादि के प्रति ममत्व अभिमान के क्षोभ का चोला
पहन कर निश्चित देश, काल एवं आकार की परिधियों में क्रियाशील है जबकि पतिरूप में
उसकी क्रियाशीलता पर कोई अंकुश नहीं है। वास्तव में यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो
संसार के अणुवर्ग में पाया जाने वाला १देहादि के प्रति ममत्व, अथवा संसार के कर्तव्यों के
प्रति कर्तृत्व का झूठा अभिमान् भी तो विश्वशरीरी भगवान् की ही स्फुरणा है। अतः वह जड़
या उदासीन नहीं है।
संसार के पशु, अपने वास्तविक संविदात्मक स्वरूप को भूलकर, कभी भी तृप्त न
होने वाली वासनाओं की मरीचिका के पीछे दौड़ते हुए, 'इस कर्म से मेरी इष्टापत्ति है और
उससे अनिष्टापत्ति होगी' ऐसे संकोचों में पड़कर, उपादेयता और हेयता के क्षोभ अर्थात्
अन्तर्द्वन्द्व में, भावनाओं से जनित संघर्ष का शिकार बन जाते हैं। यदि भगवदनुग्रह और
सद्गुरुओं के कृपाकटाक्ष से पशुहृदय में एक बार ही यह अनुभूति जागृत हो जाये कि—
'वास्तव में मैं देहादि का सत्ताभूत संवित् स्वरूप ही हूँ और सारा विश्व मेरा ही विभव है,
अतः मैं जानने और करने में सर्वदा स्वतन्त्र हूँ' तो उसके सारे पाश स्वयं ही खुल जाते हैं;
वह पशुप्रमातृभाव से ऊपर उठकर अकृत्रिम ज्ञातृत्व और कर्तृत्व का अधिकारी बन जाता है।
इसी को शास्त्रों में 'आत्मबल का स्पर्श' कहते हैं ॥१०॥
[ संसारभाव की शान्ति ]
सूत्रकार ने यहाँ तक के सूत्रों में दृढ़ उपपत्तियों के द्वारा स्पन्दतत्त्व का प्रतिपादन
किया। अब अगले सूत्र में यह समझाया जा रहा है कि धीरे-धीरे अभ्यास की दृढ़ता प्राप्त
होने से, योगी को, अपने में ही उस स्पन्दशक्ति की अनुभूति हो जाती है। अनन्तर उसी
भाव पर स्थिरता प्राप्त करने से उसको जघन्य एवं घृणित पशुयोनियों में भटकते रहने से
छुटकारा मिल सकता है—
तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् ।
स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ? ॥११॥
१. तस्मादेकैकनिर्माणे शिवो विश्वैकविग्रहः ।
कर्तेति पुंसः कर्तृत्वमभिमानोऽपि विभोः कृतिः ॥ (तं०, ९.१७५)