स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
प्रकाश बिम्बग्राही होने पर भी जड़ ही होता है³ ।
१८ स्पन्दकारिका
तीर्णता अर्थात् विशुद्ध ज्ञान-प्रधान प्रकाशरूपता और विश्वरूपता अर्थात् क्रियाप्रधान विमर्श-
रूपता, मयूराण्ड में वर्तमान द्रवपदार्थ के ही रूप में अवस्थित आगामी शावक के विचित्र
रंगों वाले परों की कल्पना के समान, अभेद 'अहं' रूप में ही अवस्थित है— 'संविन्निष्ठा हि
विषयव्यवस्थितयः' ।
उपरिनिर्दिष्ट प्रकाशभाग और विमर्शभाग में से क्रियाप्रधान विमर्शभाग¹ ही सामान्य-
स्पन्द है । उसी के द्वारा अन्तर्मुख 'अहं' में, अभिन्न रूप में अवस्थित, विश्वकल्पना का
बहिर्मुख 'इदं' रूप में अवभासन और 'इदं' रूप में अवभासित विश्व की अन्तर्मुख अनुसंधा-
नात्मक 'अहं'-रूपता में विश्रान्ति की क्रिया सम्पन्न होती है ।
विमर्श में जिस वस्तु का सद्भाव हो उसी का बाह्य अवभासन भी संभव हो सकता
है । जिस पदार्थ का बाह्यरूप में अवभासन हुआ हो उसी का अन्तर्मुखता में विश्राम संभव
हो सकता है । फलतः विमर्शात्मक स्पन्द-शक्ति का ही ऐसा स्वातन्त्र्य एवं असीम सामर्थ्य है
कि वह अवभासित² पदार्थ को अपने रूप में लय कर सकती है; अपने आप को भावमण्डल के
रूप में अवभासित कर सकती है; दोनों को एकाकार बनाकर धारण कर सकती है और
दोनों से पृथक् रूप में भी अवस्थित रह सकती है। वास्तव में यह विमर्शात्मक स्फुरणा
(स्पन्द-शक्ति) एक महान् सत्ता है जिसके बिना प्रकाश की कल्पना व्यर्थ है क्योंकि विमर्शहीन
प्रकाश बिम्बग्राही होने पर भी जड़ ही होता है³ ।
अभी ऊपर कहा गया है कि स्पन्दशक्ति का स्वभाव किञ्चिच्चलन⁴ है । शैवशास्त्रों
में किञ्चिच्चलन शब्द का अर्थ स्वतन्तरूप में स्फुरित होना है । संवित् कभी भी स्फुरणा
के बिना नहीं रह सकती है क्योंकि वह फिर चिद्रूप ही नहीं हो सकती है । यदि ऐसा होता
तो फिर चिद्रूपता के अभाव में सारे विश्व में जड़ कंकर पत्थरों के सिवा अन्य कोई जीवित
सत्ता देखने को नहीं मिलती ।
वे जड़ वस्तुएँ भी हैं या नहीं यह भी कोई नहीं कह सकता । अतः उनकी सत्ता न होने
के समान ही होती । फलतः संवित् प्रतिसमय प्रमाता और प्रमेय दोनों रूपों में सतत-स्फुरणा-
१. हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः ।
भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ।।
स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे···· ····। (तं, ४.१८२-८३)
द्रष्टव्य—सूत्र १० का विवरण भी ।
२.. विमर्शो हि सर्वंसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं परीकरोति, उभयम् एकीकरोति,
एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवंस्वभावः ॥
(ई० प्र० वि०, १.५.१३)
३. स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ।। (ई० प्र०, १.५.११)
४. किञ्चिच्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत् ।
ऊर्मिरेषा विबोधाब्धेः शक्तिरेवेह गण्यते ।। (तं० आ०,
स्पन्द एक गतिहीन गति १९
मयी है। वास्तव में स्पन्द अथवा स्फुरणा संवित्समुद्र की तरङ्ग है। स्पष्ट है कि स्पन्द तथा
संवित् एक ही अभिन्न ज्ञानक्रियामयी सत्ता है। संवित्¹ का संवित्त्व यही है कि वह विमर्श-
मयी अथवा सततस्पन्दमयी होने के कारण प्रत्येक पदार्थ का (विश्वोत्तीर्ण रूप में अथवा विश्व-
मय रूप में वर्तमान भावों का) स्वतन्त्र 'अहं' रूप में विमर्श कर सकती है। सागर² की
सागरता तो इसी से चरितार्थ होती है कि वह कभी तरङ्गहीन तथा कभी तरङ्गायमान रूपों
को धारण कर लेता है। संवित्स्वरूप³ विश्वात्मा, अपने इसी स्पन्दमय स्वातन्त्र्य से अपने स्वरूप
को छिपाकर और विद्युद्गति से प्रकट करके, अक्रम में क्रम का और क्रम में अक्रम का
अवभासन करने को क्रीडा करता रहता है। वास्तव में यही आनन्दात्मक स्वातन्त्र्यशक्ति का
अलौकिक चमत्कार है।
स्पन्दशक्ति एक महान् सत्ता⁴ होने के कारण प्रत्येक क्रिया के करने में स्वतन्त्र⁵ है।
विश्व के प्रत्येक दृश्यमान अथवा अदृश्यमान पदार्थ को सत्ता देती है। इतना ही नहीं, अपितु
जिन वस्तुओं का प्रत्यक्षरूप में पूर्ण अभाव होता है उनको भी कल्पना के द्वारा स्थिति प्रदान
करती है। उदाहरणार्थ आकाशपुष्प⁶, वन्ध्यापुत्र अथवा शशशृंग ऐसी ही कल्पनायें हैं। इसके
अतिरिक्त देश, काल और आकार की सीमाओं को जन्म देती है परन्तु स्वयं नित्य एवं
व्यापक होने के कारण उनसे ⁷ससीम नहीं बन जाती है। यही ⁸कारण है कि संसार में
जितनी भी प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमाओं की कल्पनायें हैं, अथवा अन्तरङ्गरूप या
बहिरङ्गरूप में जो भी कुछ है, उन सारे रूपों में यह शक्ति अपने आप को अवभासित करती
है और उनसे पृथक्रूप में भी प्रकाशमान रहती है।
स्पन्द शक्ति की अनन्तता
यद्यपि वास्तव में यह शक्ति एक ही है तथापि प्रसार की भूमिका पर यह अनन्त
धाराओं में प्रवहमान है। विश्व⁹ के जितने भी पदार्थ हैं वे सारे शक्ति के ही रूप हैं।
'सामान्य१०-भूमिका अर्थात् पतिदशा में वह चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच
१. इदमेव संविदः संवित्त्वं यत्—'सर्वम् आमृशतीति' । (तं० वि०, ४,२१४ पृष्ठ)
२. निस्तरङ्गतराङ्गादिवृत्तिरेव हि सिन्धुता । (तं०, ४.१८५)
३. एष प्रकाशरूप आत्मा स्वच्छन्दो ढोकयति निजरूपम् ।
पुनः प्रकटयति झटिति अथ क्रमवशादेष परमार्थेन शिवरसम् ।। (तं० सा०, पृ० ७)
४. सा स्फुरत्ता महासत्ता....। (ई० प्र०, १.५.१४)
५. सत्ता च भवनकर्तृ ता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् । (ई० प्र० वि०, १.५.१४)
६. सा च खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति । (ई० प्र० वि०, १.५.१४)
७. देशकालाविशेषिणी । (ई० प्र०, १.५.१४)
८. अत एषा स्थिता संविदन्तर्बाह्योभयात्मना ।
स्वयं निर्भास्य तत्रान्याद्भासयन्तीव भासते ।। (तं० ४.१४७)
९. शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः । (शि० सू० वि०, ८९ पृष्ठ)
१०. द्रष्टव्य सूत्र ११९ का विवरण ।
२० स्पन्दकारिका
मुख्य एवं असंकुचित रूपों में सततविकासशील होती हुई, विशेष-भूमिका अर्थात् पशुदशा
(जीवभाव) में प्राण, अन्तःकरण, बाह्य-इन्द्रियां इत्यादि अनन्त प्रमेयों के रूपों में प्रवहमान
है। प्रतिप्रमाता¹ की अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति ही उसकी आनन्दघनता; आनन्द का चमत्कार
ही इच्छा-शक्ति; प्रकाशरूपता ही चित्-शक्ति; विमर्शमयता ही ज्ञानशक्ति और प्रत्येक प्रकार
के आकार इत्यादि को अवभासित करने का सामर्थ्य ही क्रियाशक्ति है। इससे² स्पष्ट होता
है कि यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च मौलिक स्वातन्त्र्यशक्ति का ही विकास है। ऐसे अनन्तरूपों
के होते हुए भी यह स्वातन्त्र्यशक्ति मुख्यतः इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन तीन रूपों में, शाश्वत
रूप में स्फुरित रहती है। पतिभाव में ही नहीं अपितु पशुभाव में भी शक्ति का यही इच्छा-
त्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक रूप प्रतिपल कार्यनिरत रहता है। कोई भी प्राणी जिस
वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसकी अन्तःचेतना में पहले ही अभिन्न रूप में अवस्थित होती
है। अनन्तर ज्ञान के द्वारा उसको जानकर, क्रिया के द्वारा कार्यरूप में परिणत करता है।
संक्षेप में कहा जाता है कि प्राणी जो कुछ चाहता है वही जानता भी है और करता भी है।
इसी प्रकार पतिदशा में ही इष्यमाण विश्वकल्पना, पहले इच्छाशक्ति में अभिन्न रूप में अव-
स्थित रहती है। अनन्तर ज्ञानशक्ति के द्वारा उसका विमर्श होकर क्रियाशक्ति के द्वारा बाह्य
अवभासन सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार एक ही मौलिक पारमेश्वरी स्पन्दशक्ति, अपने
स्वातन्त्र्य से इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया का व्यपदेशमात्र धारण करती है। ये सारे व्यपदेश उन्मेष
में आनेवाली मायाशक्ति³ के सामर्थ्य से ही उत्पन्न हो जाते हैं। क्योंकि केवल शिवदशा को
छोड़⁴ कर अन्य सभी दशाओं में मायाशक्ति का ही साम्राज्य छाया रहता है। स्मरण रहे कि
इदंभाव को अवभासित करने की ओर उन्मुख बनी हुई स्वातन्त्र्य-शक्ति ही 'मायाशक्ति'
कहलाती है। यह शक्ति की वह अवस्था है जिसमें आगामी भेदकल्पना भरी हुई तो होती है
परन्तु उसका विभाग नहीं हुआ होता है। यह स्थिति कुछ उसी प्रकार की होती है जिस
प्रकार सेम⁵ की फली के गर्भ में आगामी अनन्त फलियों की कल्पना अविभक्त रूप में अवस्थित
रहती है। अस्तु, इस विषय पर यथा स्थान प्रकाश डाला जायेगा। यहां पर केवल इतना ध्यान में
१. तस्य च स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः, तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः, प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः,
आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः, सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः।
(तं० सा० ६ पृ०)
२. तस्मात्संवित्त्वमेवैतत्स्वातन्त्र्यं यत्तदप्यलम् ।
विविच्यमानं बह्वीषु पर्यवस्यति शक्तिषु ।। (तं० : १.१६०)
३. माया नाम च देवस्य शक्तिरव्यतिरेकिणी ।
भेदावभासस्वातन्त्र्यं तथा हि स तया कृतः ।। (तं०, १. १४९-५०)
४. शिवदशामेकां मुक्त्वा मायाशक्तिः सर्वत्र कृतपदा । (स्प० वि०, ६ पृष्ठ)
५. अत एव बहिर्मुखतायां भाविनो विभागस्य
शिम्बिकाफलवत् अस्यां गर्भीकारोऽस्ति । (तं० वि०, ९. १५१)
स्पन्दकारिका २१
रखना आवश्यक है कि समूचा विश्व इसी पारमेश्वरी स्पन्दशक्ति का बहिर्मुखीन प्रसार अथवा
विकास है।
स्पन्दशक्ति के प्रसार के, सामान्य और विशेष दो रूप हैं। इन्हीं दो रूपों के आधार
पर शैवशास्त्रियों ने इसके सामान्य-स्पन्द और विशेष-स्पन्द दो नाम रखे हैं। इसका सामान्य
रूप अनेकाकारता में एकाकारता और विशेषरूप एकाकारता में अनेकाकारता है। भाव यह
कि इसका सामान्यरूप विश्वात्मक सूक्ष्म चेतना या प्राणना है जो कि विश्व के अनेक रूपों में
भी एक ही सामान्यरूप में व्याप्त है। दूसरी ओर इसका विशेष रूप विश्व के अनेक एवं विचित्र
नामरूपात्मक प्रमेय पदार्थों का रूप है और इस रूप में भेद की ही प्रधानता होने के कारण
यह वस्तुतः एक होते हुए भी विशेष रूपों में (अनेकाकारों में) प्रवहमान है। यहाँ पर स्पन्द-
शक्ति के इन दो रूपों का संकेतमात्र दिया गया है। आगे यथास्थान इनका विश्लेषण किया
जायेगा।
अब यहाँ पर सूत्र में उल्लिखित उन्मेष-निमेष पर थोड़ा सा प्रकाश डालना युक्तियुक्त
होगा—
इस विषय में पहले कहा गया है कि 'उन्मेष-निमेष' मात्र संकल्पात्मक गतिमयता के
अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस संकल्पात्मक गतिमयता को शैवशास्त्रों में इच्छा¹
शक्ति का नाम दिया गया है। यह इच्छाशक्ति शङ्कर का नित्यधर्म अथवा स्वभाव है।
यह उससे कभी छूटता नहीं क्योंकि जैसा पहले कहा गया है कि शक्ति और शक्तिमान् कभी
भी अलग नहीं हो सकते। सूत्र में एक ही इच्छाशक्ति अथवा संकल्पमात्र को व्यक्त करने के
लिए उन्मेष और निमेष इन दो शब्दों का प्रयोग मात्र औपचारिक है। सूक्ष्मदृष्टि से देखने
पर यह बात अच्छी प्रकार समझ में आती है कि उन्मेष अथवा निमेष दोनों संकल्पमात्र के
ही द्योतक हैं। उन्मेष उस अवस्था का द्योतक है जब कि पारमेश्वर संकल्प में, विश्वोत्तीर्ण
रूप में अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहने की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था
में सारा 'इदं-भाव' अथवा प्रमेयभाव मात्र 'अहं' रूप अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप प्रमातृभाव में
ही लीन हुआ होता है। इसी को शैव शब्दावली में पारमेश्वर अनुग्रह या शक्तिपात कहते हैं।
निमेष उस अवस्था का द्योतक है जब पारमेश्वर संकल्प में, स्वरूप को संसार के अनन्त भेद-
पूर्ण वैचित्र्यों में प्रसारित करने की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था में चिन्मात्ररूप
प्रमातृभाव में, अभिन्नरूप में वर्तमान प्रमेयता, पूर्वोक्त मायाशक्ति के प्रभाव से अलग होकर
विकास में आ जाती है। इसको शैव शब्दों में तिरोधान कहते हैं। स्पष्ट है कि दोनों रूपों में
पारमेश्वर संकल्पमात्र की ही गतिमयता अर्थात् इच्छाशक्ति ही कार्यनिरत है। पारमेश्वर
संकल्प के इन्हीं दो रूपों को क्रमशः अन्तर्मुखस्पन्द और बहिर्मुखस्पन्द कहते हैं। इस विषय में
यह समझना आवश्यक है कि स्पन्द-शक्ति की यह द्विमुखी गतिमयता एक ही समय पर चलती
१. उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बन्धि प्रतिपाद्यते,
स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः, तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात्।
(स्प० वि०, ४ पृष्ठ)