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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

धारणा और समाधि इन तीन अवस्थाओं का अभिप्राय है।

अवस्था भेदों में स्वरूप की अभेद अवस्था ८९
१ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥१८॥
ज्ञानज्ञेयभेदेन द्विरूपे २जाग्रत्स्वप्नात्मके पदद्वये संवेदनम्, सुषुप्ततुर्यात्मके
पदद्वये पुनश्चिद्रूपत्वेन केवलम् अनुभवः, न तु द्वितीयमन्यत्वेन उपलभ्यते ॥१॥
अनुवाद
सूत्र—शक्तिघन एवं सर्वव्यापक आत्मतत्त्व जाग्रत्-अवस्था में केवल ज्ञेयपदार्थों का
रूप धारण करने वाली और स्वप्न-अवस्था में केवल ज्ञान (मानसिक संकल्प-विकल्पात्मक ज्ञप्ति)
का रूप धारण करने वाली, महान् विमर्शशक्ति के द्वारा प्रकाशमान रहता है। उन दो अव-
स्थाओं से इतर अवस्थाओं में (सुषुप्ति और तुर्या में) केवल चिन्मात्र रूप में प्रकाशमान
रहता है ॥१८॥
वृत्ति—जाग्रत् और स्वप्न इन दो अवस्थाओं की अवस्थागत द्विरूपता का आधार
यह है कि पहली में संवेदन का रूप ज्ञेय और दूसरी में ज्ञान होता है। इसके प्रतिकूल सुषुप्ति
और तुर्या नामवाली दो अवस्थाओं में, स्वभाव की अनुभूति, विशुद्ध चिन्मात्र रूप में ही
होती है। इन दो अवस्थाओं में स्वभाव की उपलब्धि (चित्-रूपता के अतिरिक्त) और किसी
रूप में नहीं होती है ॥१८॥
विवरण
जाग्रत् आदि अवस्थाओं के सर्वसाधारण लौकिक रूप पर ३पहले प्रकाश डाला गया
है। यह भी कहा गया है कि वास्तव में ये अवस्थाभेद औपचारिक हैं क्योंकि इन सबों का
अनुभविता (वेदक) एक ही होता है। अब यहाँ पर केवल इतना विचारणीय है कि आध्या-
त्मिक दृष्टिकोण से इन अवस्थाओं की स्वरूपगत विशेषतायें कौन सी हैं और इनमें शक्ति की
स्पन्दना किन-किन रूपों में विलासमान होती है।
४मुख्य जाग्रत्-अवस्था—अनुभवी सिद्ध पुरुषों का कथन है कि मुख्य जाग्रत्-अवस्था
पूर्णरूप में ५प्रमेय-भूमिका है। इसमें संवित्-भट्टारिका (विमर्श शक्ति) प्रमेय-भूमिका पर
१. इस सूत्र में पाठक्रम को छोड़कर आर्थक्रम से ज्ञानरूपता का सम्बन्ध स्वप्न के साथ और
ज्ञेयरूपता का सम्बन्ध जाग्रत्-अवस्था के साथ जोड़ना चाहिये क्योंकि पाठक्रम की अपेक्षा
आर्थक्रम बलवान् होता है। (श्री स्वामी ईश्वरस्वरूप जी)
२. प्रस्तुत संदर्भ में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं से योगियों की ध्यान
धारणा और समाधि इन तीन अवस्थाओं का अभिप्राय है।
३. द्रष्टव्य, सूत्र ३ का विवरण।
४. 'मुख्य-अवस्था' कहने से किसी भी अवस्था का वह विशुद्धरूपं अभिप्रेत है जिसमें अभी
उससे इतर अवस्थाओं का संकर न हुआ हो। जैसे मुख्य जाग्रत्-अवस्था विशुद्ध जाग्रत्
को ही कहा जायेगा जाग्रत्-जाग्रत्, जाग्रत् स्वप्न इत्यादि को नहीं।
५. मेयभूमिरियं मुख्यं पञ्चमदशायाम् (तं० १०.२४०)

९० स्पन्दकारिका
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
उतर कर, सांसारिक प्रमेय, प्रमाण, १प्रमाता और प्रमा की विचित्रताओं से भरे हुए, प्रमेय
विश्व के रूप में ही स्पन्दायमान रहती है। शास्त्रीय शब्दों में इस अवस्था को अधिष्ठेय-
अवस्था कहते हैं क्योंकि इसमें, २मन में अन्तःसकल्पात्मक संवेदन के रूप में भासमान घट-पट
आदि वेद्य पदार्थों के द्वारा ही, बाहर के स्थूल घट-पट आदि वेद्यपदार्थों का अवभासन हो
जाता है । यही कारण है कि इसमें मानसिक संकल्परूप घट-पट आदि वेद्यभाव अधिष्ठाता
पदवी पर और उनके द्वारा अवभासित होने वाले बाह्य स्थूल घट-पट आदि वेद्यभाव अधिष्ठेय
पदवी पर अवस्थित रहते हैं । जाग्रत्-अवस्था में, अन्तःसंवेदन के रूप में वर्तमान वेद्य पदार्थों
का बाह्य स्थूल वेद्य पदार्थों के रूप में अवभासित होना आवश्यक है क्योंकि तभी तो इस
अवस्था की सार्थकता मानी जाती है । इस कारण से यह अवस्था प्रति समय अधिष्ठेय-अवस्था
ही कही जाती है । यह ३कभी भी अधिष्ठातृ-अवस्था नहीं बन सकती है । इस अवस्था में
शक्ति (स्पन्दमयी विमर्शशक्ति) ज्ञेयरूप में ही विलासमान रहती है अतः सावधान पुरुषों को
ज्ञेयता में ही स्वरूप की अनुभूति होती रहती है ।
मुख्य स्वप्न-अवस्था--मुख्य स्वप्नावस्था में संवित्-भट्टारिका वैकल्पिक ज्ञानरूप में
ही स्पन्दित होती हुई, ४जाग्रत्-अवस्था के ही घट पट आदि ज्ञेय पदार्थों को मानसिक
संकल्परूप में इस प्रकार सुस्पष्ट रूप में अवभासित कर लेती है कि मानो प्रमाता, जाग्रत्-
अवस्था के समान ही, बाह्य इन्द्रियों के द्वारा उनका ग्रहण कर रहा हो । शास्त्रों के अनुसार
जहां जाग्रत्-अवस्था को ज्ञेयप्रधानता के कारण प्रमेय पद कहते हैं, वहाँ स्वप्नावस्था को
वैकल्पिक ज्ञानप्रधानता के कारण ५प्रमाण पद कहते हैं । प्रमाण पद होने का अभिप्राय यह
है कि इस अवस्था में अनुभवित्ता के मानसिक संकल्प, स्थूल घट पट आदि वेद्य पदार्थों की
वास्तविक स्थिति के अभाव में भी, संकल्परूप में उनकी छाया६ को अवभासित करते हैं ।
१. इस प्रमाता शब्द से संसार भूमिका पर अवस्थित पशुवर्ग का अभिप्राय है । संसार का
पशुवर्ग चेतन होने पर भी विश्वात्मक संवित् की अपेक्षा से प्रमेय वर्ग में ही अन्तर्भूत हो
जाता है ।
२. तथा हि भासते यत्तन्नीलमन्तःप्रवेदने ।
संकल्परूपे बाह्यस्य तदधिष्ठातृबोधकम् ।।
यत्तु बाह्यतया नीलं चकास्त्यस्य न विद्यते ।
कथञ्चिदप्यधिष्ठातृभावस्तज्जाग्रदुच्यते ॥ (तं०, १०.२३४-३५)
३. यदधिष्ठेयमेवेह नाधिष्ठातृ कदाचन ।
संवेदनगतं वेद्यं तज्जाग्रत्समुदाहृतम् ।। (तत्रैव १०.२३१)
४. यत्त्वधिष्ठानकरणभावमध्यास्य वर्तते ।
वेद्यं सत्पूर्वकथितं भूततत्त्वाभिधामयम् ।
तत्स्वप्नो मुख्यतो ज्ञेयं तच्च वैकल्पिके पथि ॥ (तं०, १०.२४७-४८)
५. मानभूमिरियं मुख्या स्वप्नो ह्यत्र प्रमाणकः । (तत्रैव, १०.२४८)
६. मेयच्छायावभासिनी मानप्रधाना स्वप्नावस्थेयमित्यर्थः । (तं० वि०, १०.२४८)

अवस्था भेदो में स्वरूप की अभेद अवस्था ९१
फलतः यह बात स्पष्ट है कि स्वप्नावस्था में, जाग्रत्-अवस्था के ही अनुभूयमान वेद्य पदार्थ,
बाह्य स्थूल रूप में वर्तमान न होते हुए भी, मानसिक संकल्परूप में (ज्ञानरूप में) वर्तमान
रहते हैं। इसी कारण से इस अवस्था का दूसरा शास्त्रीय नाम अधिष्ठान-अवस्था भी है।
सावधान पुरुषों को इस अवस्था में, वैकल्पिक ज्ञानरूप में ही स्पन्दायमान स्वरूप की अनुभूति
प्राप्त होती है।
मुख्य सुषुप्ति-अवस्था—यद्यपि सुषुप्ति शब्द का अर्थ पूर्णस्वाप है तथापि आध्यात्मिक
स्तर पर इसका अभिप्राय प्रगाढ़ निद्रा नहीं है। योग की प्रक्रिया के अनुसार यह समाधि की
अवस्था है। इसको सुषुप्ति की संज्ञा इसलिए दी गई है कि इस अवधि में, वह जाग्रत् एवं
स्वप्न का अनुभव करने वाला अनुभवित्ता ही, चिन्मात्र रूप में अवस्थित रह कर, जाग्रत् के
ज्ञेयरूप और स्वप्न के वैकल्पिक ज्ञानरूप वेद्य पदार्थों को ग्रहण करने के प्रति पूर्णतया¹ सुप्त
अर्थात् विमुख हो जाता है। फलतः इस काल में, वही पूर्वोक्त ²अधिष्ठातृरूप में (अन्तः-
संवेदन के रूप में) वर्तमान प्रमेयभाव, जो कि बाह्य प्रमेयविश्व के बीज जैसे होते हैं, संस्कार
रूप बन कर, मानो गहरी नींद में जैसे पड़े रहते हैं। इसका अभिप्राय यह कि सुषुप्ति काल
में वेद्यता पूर्णतया गलकर चिन्मात्ररूपता में लय नहीं हो जाती है, प्रत्युत तावत्कालपर्यन्त
संस्काररूप में वर्तमान रहती है। यही कारण है कि सुषुप्ति काल के बीत जाते ही अन्तः-
संवेदन में फिर भी वेद्यता का उदय हो जाता है। शास्त्रकारों ने इस अवस्था को 'मुख्य
मातृदशा'³ की संज्ञा दी है क्योंकि इसमें, तावत्काल पर्यन्त, ज्ञेयरूपता और वैकल्पिक ज्ञान-
रूपता का सारा क्षोभ शान्त होने के कारण, प्रमाता मुख्य चिन्मात्ररूप में अवस्थित
रहता है।
तुर्या अवस्था—सुषुप्ति कालीन प्रमातृभाव अमित नहीं, अपितु मित ही है क्योंकि इस
काल के बीतते ही, संस्काररूप में, विद्यमान वेद्यता फिर भी उदय में आ जाती है और
चिन्मात्ररूपता पर भेदव्याप्ति का आवरण पड़ जाता है। अतः सावधान योगी, अपने अथक
अनुसंधान के द्वारा इस अवस्था को लांघ कर, इसके उपरितन स्तर पर विद्यमान एक ऐसी
अवर्णनीय अवस्था में प्रविष्ट हो जाते हैं जहां उनके मन में विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी
अवशिष्ट नहीं रहते हैं। इसको तुर्यावस्था कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार यह विशुद्ध ⁴प्रमारूप
अर्थात् विरज, विमल, अखण्ड एवं सर्वतोमुखी चिन्मात्ररूपता की अवस्था है। यही अन्तिम
१. अनुभूतो विकल्पे च योऽसौ द्रष्टा स एव हि ।
न भावग्रहणं तेन सुष्ठु सुप्तत्वमुच्यते ।। (तं०, १०.२५८-५९)
२. यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम् ।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णींभूतं सौषुप्तमुच्यते ।। (तं० १०.२५७-५८)
३. मुख्या मातृदशा सेयं सुषुप्ताख्या निगद्यते ।। (तं, १०.२६०)
४. यत्तु प्रमात्मकं रूपं प्रमातुरुपरि स्थितम् ।
पूर्णतागमनोन्मुख्यमौदासीन्यात्परिच्युतिः ।
तत्तूर्यमुच्यते (तं० १०.२६५)

९२ स्पन्दकारिका
शिवभाव में प्रविष्ट होने का सिंहद्वार है और यहाँ पर पहुँचे हुए साधक की सारी मायकीय
उदासीनतायें सदा सर्वदा के लिये शान्त हो जाती हैं। इसी अवस्था को, स्पन्दशास्त्र के
पारिभाषिक शब्दों में, ज्ञान-क्रिया की शाश्वतस्पन्दमयी विमर्श-भूमिका अथवा शाक्त-भूमिका
कहते हैं।
सामान्य स्पन्द-भूमिका होने के कारण इसका कोई विशिष्ट नामकरण सम्भव नहीं है
अतः शास्त्रों में इसको 'तुर्या' अर्थात् चौथी अवस्था की संज्ञा देकर ही संतोष किया गया है।
साथ ही यह समझना भी आवश्यक है कि इस अवस्था को मुख्य या अमुख्य अवस्था भी नहीं
कहा जा सकता है। इसका कारण यह है कि पूर्ण चिन्मात्ररूप होने के कारण यह अवस्था, स्वयं
ही, जाग्रत् आदि पूर्वोक्त तीन अवस्थाओं में व्याप्त रहकर, उनको ^१जीवन देती है; अतः वे
अपने मिश्रण से इसमें मुख्यता या अमुख्यता कैसे उत्पन्न कर सकती हैं ? वास्तव में जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति ये तीन अवस्थायें, अन्ततो गत्वा, इसी अवस्था में लय हो जाती हैं और
उस लयीभाव की प्रक्रिया यह है कि ^२प्रमेय प्रमाण में, प्रमाण प्रमाता में और प्रमाता प्रमा में
लय होकर कृतकृत्य हो जाते हैं। प्रमाता में अन्तः-बहिः पूर्ण शाक्तसमावेश हो जाता है अतः
यह अवस्था साक्षात् ^३शाक्तसमावेशात्मक अभेदव्याप्ति की ही अवस्था है।
इस प्रकार चारों अवस्थाओं के स्वरूप-विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्षों पर पहुँचा
जा सकता है—
१. जाग्रत्-अवस्था में शक्ति की स्फुरणा का रूप ज्ञेयता है।
२. स्वप्न-अवस्था में शक्ति की स्फुरणा का रूप संकल्प-विकल्पात्मक ज्ञप्ति है।
३. सुषुप्ति-अवस्था में शाक्त-स्फुरणा का रूप चिन्मय है परन्तु ज्ञेयता संस्कार रूप में
अवशिष्ट रहने के कारण पूर्ण चिन्मय नहीं है।
४. तुर्या-अवस्था में ज्ञेयता के संस्कार भी अवशिष्ट नहीं रहते हैं अतः इसमें शक्ति
स्फुरणा का रूप पूर्ण चिन्मय है ॥१८॥
[ज्ञानी और विशेषस्पन्द]
अगले सूत्र में यह उपदेश दिया जारहा है कि जिस भाग्यशाली योगी को, पूर्ण शाक्त-
समावेश हो जाने के फलस्वरूप, प्रत्येक अवस्था में, सामान्य-स्पन्दात्मक स्वभाव की अनुभूति
होती रहती हो, उसके मार्ग में विशेष-स्पन्दों के अनन्त प्रवाह कोई बाधा नहीं डाल सकते
हैं—
गुणादिस्पन्दनिःष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥१९॥
१. .........'इति सैवैषा देवी विश्वैकजीवितम् । (तं०, १०. २६७)
२. मेयं माने मातरि तत् सोऽपि तस्यां मितौ स्फुटम् ।
विश्राम्यति ।' (त०, ११. ३६७)
३. शक्तिसमावेशो ह्यसौ मतः । (तं०, १२. २६५)