Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished222 pages

About this granth

The Siddha Siddhanta Paddhati (सिद्धसिद्धान्तपद्धति) is a principal Sanskrit text of the Nath tradition, ascribed to Guru Gorakhnath (Goraksha). It sets out the philosophy of the Nath yogis in systematic form, centred on the idea that the body (pinda) and the cosmos are two forms of one reality, so that the yogi can realise the highest state within his own body.

It has six teachings (upadeshas): the origin of the body, tracing the unfolding of Shakti from the supreme state; reflection on the body; awareness of the holy places and deities within it; its supports, namely nine chakras, sixteen adharas, three lakshyas and five voids; the harmony of body and the supreme; and the marks of the avadhuta yogi.

This edition with Hindi translation is published by the Gorakhnath Temple, Gorakhpur. It opens with a picture of the perpetual flame in the temple's sanctum, believed to have been lit by Gorakhnath, followed by a verse in praise of Ganapati from the sixth teaching with its Hindi meaning. The translator is not named in the opening pages. It runs to 222 pages.

Page 13Permalink

श्रीगोरक्षनाथो विजयतेतराम्

Page 14Permalink

अनुक्रम
विषय पृष्ठ संख्या
पहला उपदेश १-३२
अव्यक्त-अनाम परब्रह्म ... ... २
परब्रह्म की निजा आदि पाँच शक्ति और उनके गुण ... ... ३
परपिण्डोत्पत्ति ... ... ७
अनादि पिण्ड के पाँच तत्व और पचीस गुण ... ... ८
महासाकार आद्य पिण्डपुरुष की उत्पत्ति, उसके पाँच तत्व और
पचीस गुण ... ... १०
महासाकार पिण्ड की आठ मूर्ति ... ... १४
नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की उत्पत्ति और पंचभूतों के पचीस गुण १४
अन्तःकरणपंचक ... ... १६
कुलपंचक ... ... १६
व्यक्तिपंचक और उसके पचीस गुण ... ... २२
प्रत्यक्षकरणपंचक ... ... २४
दस प्रधान नाड़ी और उनके स्थान ... ... २७
दस वायु ( प्राण ) और उनके स्थान ... ... २८
जीवात्मा के स्थूल शरीर का उत्पत्ति-क्रम ... ३०
दूसरा उपदेश ३३-९१
[ पिण्डविचार ]
नौ चक्र-वर्णन ... ... ३३
सोलह आधार ... ... ५०
तीन लक्ष्य ... ... ६३
व्योमपंचक ... ... ६७
अष्टांगयोग ... ... ६८

Page 15Permalink

विषय पृष्ठ संख्या
तीसरा उपदेश ९२-१०२
[ पिण्डसंवित्ति ]
सप्त पाताल तथा अनेक लोकादि ... ... ६३
चार वर्ण आदि ... ... ६७
सप्तद्वीप तथा सप्त समुद्र ... ... ६६
नव खण्ड ... ... ६६
अष्टकुल पर्वत ... ... १००
नौ नदी तथा अन्य उपनदियाँ ... ... १००
नक्षत्रादि ... ... १०१
स्वर्ग-नरक-मुक्ति ... ... १०२
चौथा उपदेश १०३-११७
[ पिण्डाधार ]
कुलाकुलसामरस्य ... ... १०४
कुलशक्ति ... ... १०४
आज्ञावती पराशक्ति ... ... १०६
अनन्त शक्तिमान् ... ... १०७
आकाशादि की कुण्डलिनी से उत्पत्ति ... ... ११०
मध्याशक्तिप्रबोधन ... ... १११
स्थूल-सूक्ष्म कुण्डलिनी ... ... ११४
पाँचवां उपदेश ११८-१४२
[ पिण्डपदसामरस्य ]
परम पद ... ... ११८
गुरु द्वारा सन्मार्गदर्शन ... ... १२०
गुरु और सामरस्य ... ... १२१
निरुत्थान-प्राप्ति का उपाय ... ... १२२
पिण्डसिद्धि का वेष ... ... १२४
परमपद की प्राप्ति ... ... १२६
योगमार्ग ... ... १२६
सहजसंयमसोपायाद्वैतज्ञान ... ... १२८

Page 16Permalink

विषय पृष्ठ संख्या
सद्गुरु का सेवन ... ... १३०
गुरुकुलसन्तान ... ... १३२
गुरु की प्रसन्नता और परमपद ... ... १३७
छठा उपदेश १४३-१७४
[ अवधूत योगी ]
अवधूत के वेष और चिह्न ... ... १४५
अवधूत की अवस्था (स्थिति) ... ... १४७
अवधूत की सर्वस्वरूपता ... ... १४६
सर्वसिद्धान्तदर्शनसमन्वयी ... ... १५६
सिद्धमत का आश्रय ... ... १६०
निरुत्थानरूप परमपद ... ... १६२
आदेश का स्वरूप ... ... १६६
सिद्धसिद्धान्तरूप योगशास्त्र ... ... १७१
चित्रानुक्रम :
अखण्ड परमात्म-ज्योति
शिवगोरक्ष महायोगी गोरखनाथ
गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ
卐

Page 17Permalink

आशीर्वचन
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति की गरिमा )
परमक Philippe करुणामय भगवान् शिवगोरक्ष महायोगी गोरखनाथजी ने देववाणी में
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना कर अलखनिरंजन के साक्षात्कार का राजपथ
प्रशस्त किया है। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नाथयोग पर प्रचुर प्रकाश डाला गया
है। इस मौलिक योगवाङ्मय में शैवयोग के प्रतिपादन के साथ-ही-साथ निगमागम-
पुराणस्मृतिसम्मत योगाचार, वैराग्य और मोक्ष के सैद्धान्तिक और प्रक्रियात्मक-
साधनात्मक पक्षों का समीचीन समन्वय भी बोधगम्य शैली में निरूपित है, जिसका
रसास्वादन वे ही कर सकते हैं, जो योगविज्ञान—हठयोगविद्या के द्वारा परम-
साक्षात्कार की सिद्धि में अनुभवी और निष्णात हैं। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' को
हमारे सिद्धामृतमार्ग अथवा नाथ-सम्प्रदाय में अपूर्व मान्यता प्राप्त है और योगि-
सम्प्रदाय में ही नहीं, दार्शनिकों और विद्वानों में भी इस योगग्रंथ के प्रति यथेष्ट
आदरभाव और श्रद्धा का दर्शन होता है। लगभग दो सौ साल पहले काशी के
महान् योगदार्शनिक महामति बलभद्र ने 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' के रूप में 'सिद्ध-
सिद्धान्तपद्धति' के सारांश का स्वरचित संस्कृत-श्लोकों में संग्रह किया था।
महायोगी गोरखनाथजी की प्रशस्ति में बलभद्र ने कहा था—
यत्कारुण्यवलोकनादपि भवेच्चित्तर्दाविश्रमः पारदः ।
तस्मिन् श्रीकरुणासुधारसनिधौ चेतोऽस्तुमग्नं गुरौ ॥
( सिद्धसिद्धान्तसंग्रह ५ । ३६ )
जिनके कृपामय दृष्टिपात से चित्त शान्त और विषयों में अनासक्त हो जाता
है, उन करुणासुधारसनिधि गुरु ( गोरखनाथ ) में मेरा मन निमग्न हो जाय।
बलभद्र ने अपने ग्रंथ में 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' का ज्ञानामृत भर दिया है।
गोरखनाथजी महान् योगाचार्य थे, इसलिये 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में उनके
वचन उपदेश के रूप में उपलब्ध होते हैं। उन्होंने इस तरह इस योगग्रंथ के छः
उपदेशों में महायोगज्ञानामृत का वर्णन किया था। गोरखनाथजी ने निरूपण किया
[ १

Page 18Permalink

है कि किस तरह एक गत्यात्मक आध्यात्मिक परमसत्य से वैविध्यपूर्ण तथा अनेक
भौतिक पदार्थों से युक्त विश्वप्रपंच उद्भूत है तथा इस सिद्धान्त का स्पष्टीकरण है
कि किस प्रकार दिक्कालनिरपेक्ष भेदातीत, शाश्वत, परमात्मा अलखनिरंजन परम-
शिव अपनी स्वरूपभूत शक्ति के द्वारा दिक्कालपरिसीमित वैविध्यपूर्ण ब्रह्माण्ड एवं
असंख्य व्यष्टिपिण्डों के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसके आरम्भ में अजातवाद
और तत्पश्चात् सत्कार्यवाद की रीति से आदिनाथ की सत्ता से पृथक् जगत्, अण्ड
और पिण्ड की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। अण्ड-पिण्ड की उत्पत्ति प्रमाण
सिद्ध नहीं है, क्योंकि आदिनाथ अलखनिरंजन की सत्ता से भिन्न जगत् की सत्ता
नहीं है। नाथयोग में अजातवाद का ही सिद्धान्त यद्यपि मान्य है तथापि इस
मान्यता की पुष्टि के लिये शरीर में ही सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड और जीवन्मुक्त
अमरकाय योगियों ने परमात्मा की अखण्डता, अभिन्नता और निरंजनता
(निर्मलता) का बोध प्राप्त किया। सत्कार्यवाद अथवा परिणामवाद पर यही
अजातवाद की विजय है। जब तक योगी अथवा अध्यात्मविज्ञानी की परमात्म-
स्वरूप में स्थिति और सम्पूर्ण निष्ठा नहीं हो जाती है, तब तक जन्म-मरण का
दुःख नहीं छूट सकता और साधक की दृष्टि में विश्वप्रपंच की अहंकार के स्तर पर
रागद्वेषादि द्वन्द्वात्मक मल या अविद्या के धरातल पर सत्ता बनी रहेगी। अण्डपिण्ड
के रूप का ज्ञान हो जाने पर उसकी आधारशिला पारमार्थिक सत्ता का जीवात्मा-
साधक को बोध हो जाना सरल हो जाता है। यह निर्विवाद है कि इस विश्व-
प्रपंच की गत्यात्मकता के मूलकारण के रूप में कोई स्वयंसत्य, स्वयंप्रकाशितसत्ता
है, जो हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि से परे अतीन्द्रिय, अतिमानसिक और अतिबौद्धिक
स्तर पर अभिव्यक्त है। गोरखनाथजी ने इस शाश्वत चेतना को परासंवित् कहा
है, यही परमसत्ता है। उन्होंने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के छः उपदेशों में पिण्डोत्पत्ति,
पिण्डविचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार, पिण्डपदसमरसभाव और नित्यावधूतलक्षण
आदि का निरूपण कर नित्यनिर्विकार परमसत्ता को ही जीवात्मा-योगसाधक के
लिये प्रतिपाद्य स्वीकार कर उसके स्वरूपबोध अथवा अन्तर्लय की पद्धति सुनिश्चित
की है।
समष्टिब्रह्म, व्यष्टिब्रह्म, विशिष्टब्रह्म, सभी का मूल निरंजनता है,
निरंशता, निस्पन्दता और अभिन्नता तथा निश्चयता है। शिवगोरक्ष की दृष्टि
में अद्वैत आत्मा (परमात्मा) अपनी निजाशक्ति से युक्त होकर स्वरूपतः अभिन्न
है। निजस्वरूप में निहित शक्ति की जागृति के स्तर पर परमात्मा शाश्वत, अनन्त
परपिण्ड है।
२ ]

Page 19Permalink

शक्तिचक्रक्रमेणोत्थोजातः पिण्डपरः शिवः ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६ )
यह परब्रह्मशिव गोरखनाथजी के योगसिद्धान्त के अनुसार अपरंपर,
परमपद, शून्य, निरंजन परमात्मा है ।
अपरम्परं परमपदं शून्यं निरञ्जनं परमात्मेति
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । १७ )
परब्रह्मशून्य-स्वसत्तामात्र है, निर्विकार ही निरंजन है । अपरम्पर, परमपद,
शून्यनिरंजन परमात्मा अजन्मा और परमानन्दस्वरूप है । निरंजन ब्रह्म सत्य है,
सहज है, सर्वगत है। यह परमानन्द परमात्मा सदा अपने स्वरूप में सुख का
अनुभव करता है, ऐसा भाव, तत्वदर्शन अथवा योगरसामृत सिद्धसिद्धान्तपद्धति में
परिलक्षित है । पांचभौतिक शरीर जन्म लेने और मृत्युग्रस्त होने का धरातल
है । जीवात्मा को शरीर धारण कर जन्म लेना पड़ता है और शरीर के जीर्ण
होने पर अथवा दैवयोग से उसमें से यह प्राण के रूप में बाहर निकल कर अपनी
स्वरूपसत्ता में अन्तर्लीन हो जाता है। प्राण या जीवन एक उन्नत स्तर से
शरीर में उतरता है, जड़ जगत् में प्राण की ही शक्ति सृजन और विनाश की
भौतिक प्रक्रियाओं का सजीव आकारों में रूपान्तर करती है ।
गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में हठयोग की साधन-प्रक्रिया का मर्म
स्पष्ट किया है । हठयोग की साधना वास्तव में प्राणसाधना है और प्राणायाम की
सिद्धि से ही यह फलवती होती है ।
पवन हीं जोग पवन हीं भोग, पवन हीं हरै छतीसौँ रोग ।
या पवन कोई जांणै भेव । सो आपै करता आपै देव ।।
( गोरखबानी सबदी १४७ )
पवन-प्राण के संयम से ही नाड़ियों का मल-शोधन होता है, शरीर की
शक्ति बनी रहती है, मन संयमित और स्थिर रहता है । प्राण के चेतना
में स्थिर हो जाने पर योगी सारी सिद्धियों को वश में कर लेता है ।
हमारे शरीर में असंख्य नाड़ियों का जाल फैला हुआ है । नाड़ियों का
उत्पत्ति-स्थान है मूलकन्द, मूलकन्द से उत्पन्न बहत्तर हजार नाड़ियों में दस प्रमुख हैं,
[ ३

Page 20Permalink

इनमें इड़ा-पिंगला, चन्द्र-सूर्य, नाड़ी कहलाती हैं, ये वाय और दायें नासारन्ध्ररूपी
द्वारों से बहती हैं । इनके मध्य में सुषुम्ना ब्रह्माण्ड-मार्ग से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त बहती
है । मूलकन्द से ही निकल कर सरस्वती, पूषा, अलम्बुषा, गान्धारी, हस्तिजिह्वा,
कुहू और शंखिनी नाड़ी बहती हैं । हमारे शरीर में दस वायु की स्थिति कही
गयी है, हृदय में प्राणवायु उच्छ्वास और नि:श्वास रूप में हकार तथा सकार
ध्वनि करती आती-जाती है । यही हठयोग की विद्या की आधारशिला है । हकार
सूर्य है, ठकार चन्द्रमा है । सूर्य-चन्द्रमा का योग ही गोरखनाथजी की दृष्टि में
हठयोग है ।
हकारः कीर्तितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते ।
सूर्याचन्द्रमसोर्योगाद्धठयोगो निगद्यते ॥
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६६ )
गोरखनाथजी ने जीव की शरीर में उत्पत्ति के सम्बन्ध में यथार्थ वर्णन करते
हुए कहा है कि स्त्री-पुरुष के संगम के परिणामस्वरूप रज और वीर्य के स्त्री की
योनि में ऐक्य से जीव के स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है । नौवें मास में यह
जीवात्मा सत्यज्ञानयुक्त होता है और दसवें मास में योनिद्वार के स्पर्श से अज्ञानी
शिशु के रूप में आत्मोद्धार के लिये तड़पता हुआ जन्म लेता है । उसे संसार में
आते ही सत्यज्ञान, स्वरूपबोध की विस्मृति हो जाती है ।
परमशिव के कुल और अकुल रूप की उपासना पर प्रकाश डालते हुए
गोरखनाथजीने कहा है कि विशिष्ट चेतन, शक्तियुक्त शिव की उपासना ही
कुलाचार है, इस कुलाचार में निष्काम कर्म में निष्ठा रहती है । अकुल अवस्था
में परिपक्व योग ही शीर्षस्थानीय कहा गया है । अकुल में, स्वरूपानुभवस्वरूप
परमात्मबोध में ही चित्त की लयावस्था रहती है । आदिनाथ अकुल और कुल,
दोनों अवस्थाओं से परे हैं । महाप्रलय में कुल ( व्यक्तावस्था ) और अकुल
( अव्यक्तावस्था ) दोनों का अभाव रहता है । स्वयंज्योति, सच्चिदानन्दमूर्ति,
एक मात्र सत्स्वरूप शाश्वत कैवल्य ही अभिव्यक्त रहता है । यही चरम सत्ता है ।
यही समस्त सत्ताओं की सत्ता है, समस्त अस्तित्वों का सत्य है, समस्त व्यावहारिक
अनुभवों का प्रकाशक और ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का निर्माता है । यह भावाभाव-
विनिर्मुक्त है, नाशोत्पत्तिविवर्जित और सर्वसंकल्पनातीत है । यही आदिनाथ का
परब्रह्मस्वरूप है । नाथयोग के सिद्धान्त के अनुरूप अपने स्वरूप में सन्निहित
करनेवाली शिव से शाश्वत संयोगमयी शक्ति ही परमसत्ता है । शक्ति शिव में और
४ ]

१. प्रथम उपदेश: पिण्डोत्पत्ति विचार (परमपद, शक्ति-विकास एवं षट्चक्र स्वरूप)

Page 21Permalink

शिव शक्ति में सन्निहित हैं। गोरखनाथजी ने परमात्मा के स्वरूप-दिग्दर्शन में मत
व्यक्त किया है :—
अनामेति स्वयमनादिसिद्धं एकमेवानादिनिधनं सिद्धसिद्धान्त-
प्रसिद्धं तस्येच्छामात्र धर्माधर्मिणो निजाशक्तिः प्रसिद्धा ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १।५ )
यह परमेश्वर नाम से परे है, स्वयंज्योति, अनादिसिद्ध है, यह उत्पत्ति,
विनाश, सृजन और संहार से सर्वथा अतीत, अविनाशी है। यह अपनी चैतन्य-
शक्ति-सच्चिदानन्दस्वरूपिणी परमेश्वरी शक्ति से सबकी उत्पत्ति और संहार का
कर्ता अथवा कारण है । यह चैतन्यस्वरूप परब्रह्म सिद्धसिद्धान्त में प्रतिपाद्य अथवा
ध्येय है । इसकी निजाशक्ति ही संकल्पशक्ति अथवा इच्छाशक्ति है । इसी शक्ति
से यह निग्रहानुग्रहधर्मी है । निग्रहशक्ति कर्म का फल देती है, अनुग्रहशक्ति स्वरूप
प्रदान करती है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति में गोरखनाथजी ने निजाशक्ति, पराशक्ति
अपराशक्ति, सूक्ष्मासक्ति और कुण्डलिनी महाशक्ति का सांकेतिक निरूपण करते
हुए उनके कार्य और रूप का विवेचन प्रस्तुत किया । जो पुरुष माया और अज्ञान
से विमूढ़ होकर वैषयिक भोगों में आबद्ध रहता है, उसके लिये जगज्जननी कुण्ड-
लिनी बन्धनकारिणी होती है, पर जो मुद्राबन्ध, चक्रभेदन और प्राणायाम के
द्वारा इस महाशक्ति को जगा लेता है, उसे यह मोक्ष प्रदान करती है; इस
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' ग्रंथ में हठयोग का अक्षय भाण्डार है । जिस तरह पांचभौतिक
पिण्ड का अधिष्ठाता जीवात्मा होता है, उस तरह परपिण्ड का अधिष्ठाता सगुण-
साकाररूप में अभिव्यक्त निरंजन, निराकार, चिन्मय, सच्चिदानन्दस्वरूप
शिव होता है, ईश्वर होता है, निराकार की साकार अभिव्यक्ति का यही
यौगिक रहस्य है कि पंचशक्तियों, निजा, परा, अपरा सूक्ष्मा और कुण्डलिनी
में स्वरूपतः अन्तर्लीन परब्रह्म परमेश्वर इन्हीं के गुणों में आत्मप्रकाशन करता
है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में यौगिक दृष्टि से पिण्डविचार अन्तर्दर्शन और
ध्यान पर आधारित है । हमारा शरीर शिवशक्ति की अभिव्यक्ति का पवित्र
माध्यम है और इसमें लोकलोकान्तर, समस्त ब्रह्माण्ड का रहस्य भरा पड़ा
है । हमारे शरीर में नवचक्र, सोलह आधार, त्रिलक्ष्य और पंचव्योम स्थित हैं ।
गोरखनाथजी ने अपनी रचना 'गोरक्षशतक' में कहा है कि जिस योगी को इनका
ज्ञान नहीं है, वह नाममात्र के लिये योगी है । हमारे शरीर में सुषुम्ना नाड़ी
ब्रह्ममार्ग के रूप में प्रसिद्ध है । जीवात्मारूपी साधक अथवा योगी के लिये इस
[ ५

Page 22Permalink

ब्रह्ममार्ग में स्थित नौचक्र ( गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नवचक्र और
'गोरक्षशतक' आदि में षट्चक्र बताये हैं ) ही विश्रामस्थल स्वीकार किये गये हैं ।
सभी चक्रों का भेदन होने पर सुषुम्ना का प्रवाह सीधा हो जाता है और जीवात्मा
( योगसाधक ) ब्रह्मरन्ध्र में प्राणसिद्धि के सहारे शिवस्वरूप हो जाता है ।
वह व्यावहारिक अथवा लोकचेतना से ऊपर उठकर समाधिस्तर पर पारमार्थिक
चेतना में विहार करता है । इन चक्रों के भेदन से महाकुण्डलिनीका प्रबोधन होता
है । कुण्डलिनीशक्ति की अभिव्यक्ति का स्थान मूलाधार है । यह शक्ति साक्षात्
गौरीस्वरूपिणी है। इसके ध्यान से साधक की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं ।
स्वाधिष्ठानचक्र में गोरखनाथजी ने प्रवालांकुर-मूँगे के अग्र भाग की तरह लाल रंग
के शिवलिंग की स्थिति बतायी है । योगसाधक प्रबुद्ध कुण्डलिनी द्वारा आलिंगित
शिवलिंग का ध्यान कर योगशक्ति प्राप्त करता है । नाभिचक्र अथवा मणिपुर में
कुण्डलिनी मध्यमा शक्ति कही जाती है । इसके ध्यान से सात्विक वृत्तियाँ प्रवाहित
होती हैं । कुण्डलिनी-जागरण के ही सन्दर्भ में हृदय-चक्र अथवा अनाहत चक्र में
स्थित लिंग की आकारवाली ज्योति का नाम गोरखनाथजी ने हंसकला कहा है ।
इसके ध्यान से इन्द्रियाँ वश में होती हैं और कंठचक्र अथवा विशुद्धचक्र में
ज्योतिर्मयी सुषुम्ना को अनाहतकला नाम दिया गया है। इसकी उपासना से जल,
स्थल, पाषाण में प्रतिघात नहीं होता, संकल्प की सिद्धि होती है । योगी जागतिक
शक्तियों पर विजय प्राप्त करता है । वह ॐकार परमेश्वर के नादरूप का
साक्षात्कार कर लेता है । आज्ञाचक्र अथवा भ्रू चक्र में सुषुम्ना अंगुष्ठमात्र दीप-
शिखाकार हो जाती है, यही ज्ञाननेत्र है। इसका ध्यान करने से योगी शाश्वत
चैतन्य-ज्योति से एकाकार हो जाता है ।
सप्तमं भ्रू चक्रं मध्यममङ्गुष्ठमात्रं ज्ञाननेत्रं दीपशिखाकारं ध्यायेत्
वाचां सिद्धिर्भवति ।
(सिद्धसिद्धान्तपद्धति २।७ )
गोरखनाथजी ने आठवें चक्र को निर्वाण-चक्र कहा है और नौवें को
आकाशचक्र कहा है । दोनों के ध्यान से क्रमशः मोक्ष और अलख-निरंजन में
स्वरूप-स्थिति प्राप्त होती है । इस तरह नौ चक्रों के भेदन द्वारा सहज स्वरूप की
प्राप्ति होती है, ब्रह्ममार्ग से जीवात्मा की यात्रा पूरी होती है । यही शाश्वत
विश्राम कहा गया है। गोरखनाथजी की योगदृष्टि में जीवात्मा का यही शाश्वत
विश्राम ध्येय है ।
६ ]

Page 23Permalink

'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में महायोगी गोरखनाथजी ने सूक्ष्म'तिसूक्ष्म तथा
अमित मार्मिक रूप में अष्टांगयोग का वर्णन किया है, जो बहुत लाभप्रद है। यद्यपि
'गोरक्षशतक' आदि में षडंगयोग का ही विवेचन है तथापि 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति'
में अष्टांगयोग के निरूपण में समग्रयोगदर्शन का स्वारस्य भर दिया गया है।
गोरखनाथजी ने कहा है कि सभी इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर शान्ति
प्राप्त करना ही यम है। मन की समस्त वृत्तियों का नियंत्रण नियम है। यथालाभ
सन्तोष करना चाहिये। गुरु के शरणागत होकर रहना चाहिये। चेतनमात्र आत्मा
में ( स्वरूप में ) स्थिति ही आसन है। शरीर में प्राण की स्थिरता ही प्राणायाम
है। देहरूपी रथ के स्वामी रथी आत्मा की अश्वरूपी इन्द्रियों को उनके विषयों
से प्रत्याहारित करना प्रत्याहार है। समस्त जगत् के प्राणी और पदार्थों को
आत्मरूप देखना, उनमें आत्मा की दृढ़ धारणा करना धारणा है। परब्रह्म में
अभिन्न आत्मा का वायुरहित दीप के समान निश्चल नित्यप्रकाशरूप से ध्यान करना
चाहिये। यही निरंजन ध्यान है। गोरखनाथजी ने अपने शिष्टपुराण लघु ग्रन्थ में
कहा है—'निरंजन उपरान्ति ध्यान नाहीं'। सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक परमात्मा
सच्चिदानन्दस्वरूप अलख-निरंजन ही ध्येय है। अखण्ड आत्मस्वरूप में संस्थिति
ही उन्मनी अथवा सहज समाधि है। जब तक समाधि में ध्याता, ध्येय, ध्यान की
स्थिति है, तब तक सबीज समाधि है, केवल ध्येयाकार वृत्ति का होना निर्बीज
समाधि है। गोरखनाथजी के वचन हैं :—
यम इति उपशमः सर्वेन्द्रियजय आहारनिद्राशीतवातातपजयश्चैवं
शनैः शनैः साधयेत् । नियम इति मनोवृत्तिनां नियमनमित्येकान्तवासो
निःसङ्गतौदासीन्यं यथाप्राप्तिसन्तुष्टिर्वैरस्यं गुरुचरणावरूढ़त्वमिति ।
आसनमिति स्वस्वरूपे समासन्नता । प्राणायाम इति प्राणस्य स्थिरता ।
प्रत्याहारमिति चैतन्यतुरङ्गाणां प्रत्याहरणं विकारग्रसनोत्पन्नविकार-
स्यापि निवृत्तिर्भवतीति प्रत्याहारलक्षणम् । धारणेति सा वाह्याभ्यन्तर
एकमेवनिstatus/निज? -> एकमेवनिstatus? no: एकमेवनिजतत्त्वस्वरूपमेवान्तःकरणेन साधयेद् यथा यद्यदुत्पद्यते तत्त-
न्निराकारे धारयेत् स्वात्मानं निर्वातिदीपमिव संधारयेदिति धारणा-
लक्षणम् । अथध्यानमिति कश्चन परमार्द्धैतस्य भावः स एवात्मेति
यथा यद्यत्स्फुरति तत्तत्स्वरूपमेवेति भावयेत् सर्वभूतेषु समदृष्टिश्च इति
ध्यानलक्षणम् । सर्वतत्त्वानां समावस्था निरुद्यमत्वमनायासस्थितिमत्व-
मिति समाधिलक्षणम् ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति २ । ३२-३६ )
[ ७ ]

Page 24Permalink

भगवान् गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में योगसिद्धि का स्वरूप
परमात्म साक्षात्कार बताया है, अष्टांगयोग का यही फल है। नाथयोग का
सैद्धान्तिक आधार तथा भगवान् गोरखनाथ द्वारा प्रतिपादित सिद्धामृतमार्ग के,
महायोगज्ञान का आधार है व्यष्टिशरीर (पिण्ड) में अखिल ब्रह्माण्ड की
सृष्टि अथवा तात्विक व्यापकता की अपरोक्षानुभूति । कहा गया है कि जो कुछ
ब्रह्माण्ड में है, वही हमारे व्यष्टिपिण्ड में विद्यमान है, पर वह जड़ विज्ञान के
अन्तर्गत प्राकृतिक शक्ति का समन्वयात्मक विश्लेषण नहीं है, यह तो आत्मा
का अथवा चिन्मयसच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मपरमात्मा का स्वरूपगत तात्विक
समत्वबोध है, सर्वव्यापक है। गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना
में यह सिद्ध किया है कि हमारा व्यष्टि-शरीर मात्र भौतिक शरीर नहीं है, यद्यपि
यह भौतिक रूप में पंचतत्वों से आकारित है तथापि यह एक आध्यात्मिक तत्व
में अभिव्यक्त है । यह आध्यात्मिकतत्व शरीर-व्यष्टि-पिण्ड को अपनी पाँच
भौतिक सीमाओं और बन्धनों से मुक्त होने की सामर्थ्य प्रदान करने में पूर्णक्षम
और शक्तिमान् है ।
पिण्डमध्ये चराचरं यो जानाति स योगी पिण्डसंवित्तिर्भवति ।
(सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३।१)
इस व्यष्टिशरीर में ही जो योगी सकल चराचर जगत् को व्याप्त जानता
है, वह पिण्डसंवित्ति होता है । सृष्टि दो तरह की है, व्यष्टिरूप, समष्टिरूप ।
व्यष्टि-सृष्टि में अन्तःकरणाभिमानी अस्मदादि जीव हैं और समष्टि-सृष्टि-
ब्रह्माण्ड में विराट् हिरण्यगर्भादि की अभिव्यक्ति है। यह ब्रह्माण्ड अधिक
चिरस्थायी स्वीकार किया गया है, यह अस्मदादि शरीरों का कारण और नियन्ता
है, व्यष्टिशरीर क्षणभंगुर और विनश्वर है । इस व्यष्टिपिण्ड में जीवात्मा आता
है और इसका त्याग कर निकल जाता है। जीव व्यष्टि-शरीर में कर्मबन्धन में
पड़ता है और योगाभ्यास आदि के द्वारा समष्टि, व्यापकपिण्ड में, परमात्मा में
अन्तर्लीनता ही उसके परमपद में प्रतिष्ठित होने का स्वरूप है । ब्रह्माण्ड के
समस्त रहस्य का शरीरपिण्ड में भेदन करने वाला योगी अथवा युक्त जीवात्मा
परमशान्त, निष्कल, निरंजन, परब्रह्मपरमेश्वर आदिनाथ के स्वरूप में स्थित हो
जाता है, यही परमपद अथवा परमकैवल्य है । निस्सन्देह समस्त भौतिक वस्तुओं की
समस्त कार्य-कारणात्मक क्रियायें और विकास की समस्त प्रक्रियायें तथा ब्रह्माण्ड में
वस्तुओं के नवीनतम स्तरों के प्रकट होने की प्रक्रियायें एक शाश्वत-अनन्त परब्रह्म
८ ]

Page 25Permalink

गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ

Page 26Permalink

Blank page

Page 27Permalink

परमेश्वर की स्वच्छन्द सृजनेच्छा या इच्छा से शासित होती है। यह सर्वथा निर्विवाद
है कि एकही परमात्मा अपनी असीम आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा इन समस्त
विभिन्नताओं के रूप में अभिव्यक्त होकर उनमें रमण करता है । शिवशक्ति की
ब्रह्माण्ड और पिण्ड से प्रापंचिक आत्माभिव्यक्ति की प्रक्रिया व्यक्तियों में आनन्दमय
आध्यात्मिक चेतना और अस्तित्व के समस्त स्तरों की आध्यात्मिकता और एकता के
प्रकट होनेपर पूर्ण हो जाती है, इसकी सिद्धि तत्वज्ञानी योगियों के जीवन में होती
है । सिद्धसिद्धान्त में योगसिद्धि के लिये मन, बुद्धि आदि सभी आध्यात्मिक सत्तायें
हैं। योगी का लक्ष्य एक आत्मा को समस्त प्रकार के शरीर में देखना और समस्त
प्रापंचिक सत्ताओं के मौलिक आध्यात्मिक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना है। यही
पिण्ड, प्रापंचिक सत्ता तथा ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का मौलिक ज्ञान है। ज्यों-ज्यों योग
विज्ञानी अपनी आन्तरिक शक्तियों को उत्तरोत्तर उन्नत करने वाले चक्रों, आधारों
आदि को कुण्डलिनी-जागरण, नादानुसन्धान तथा प्राणसाधना और मन के
उन्मनीकरण द्वारा सक्रिय अथवा उर्ध्वमुख करता है, त्यों-त्यों उसे ऐसा प्रतीत
होता है कि उसका व्यष्टिपिण्ड ( शरीर ) शुद्ध आध्यात्मिक चेतना के प्रवाह में
स्थूलता और भौतिकता से ऊपर उठकर अधिक तेजस्वी रूप में आध्यात्मिक स्वरूप
में प्रतिष्ठित होता जा रहा है। जब व्यावहारिक चेतना यथेष्ट शुद्ध और आलोकित
हो जाती है, तब पूर्ण का प्रत्येक अंश में पूर्ण रूप में अनुभव किया जाता है ।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था प्रत्येक पिण्ड में अनुभवगम्य हो जाती है और समस्त
व्यष्टि-पिण्डों की मौलिक एकता स्वतः अभिव्यक्त हो उठती है । योगी की दृष्टि
वस्तुओं के धरातल का ही स्पर्श कर नहीं लौटती, वह तो समस्त वस्तुओं की
आत्मा में, चिन्मय सत्ता में प्रवेश करती है। उसके लिये ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य,
चन्द्र, लोक-लोकान्तर, द्वीप, सागर, नक्षत्र आदि व्यष्टि-पिण्ड में आध्यात्मिक
धरातल पर सच्चिदानन्दस्वरूप में आभासित होते हैं। पांचभौतिक व्यष्टिशरीर में
ही व्यावहारिक रूप से अनन्त शाश्वत ब्रह्माण्ड-व्यवस्था के दर्शन किये जा सकते
हैं। योगदृष्टि की प्राप्ति होनेपर योगी स्वयं को विराट् पुरुष के रूप में अनुभव
करने लग जाता है । योगी विभिन्न स्वरूप में अभिव्यक्त परमात्मा को
और समस्त लोकों को अपने भीतर प्रत्यक्ष देखता है और ब्रह्माण्डदर्शन का
आनन्दोपभोग करता है। वह जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, वर्ण आदि से ऊपर उठकर
अपने व्यष्टिपिण्ड में सभी को एकात्मभूत समझता है ।
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में गोरखनाथजी ने स्वयं अपना अनुभव व्यक्त करते
हुए कहा है कि इस शरीर में जो सुख है, वही स्वर्ग है और जो दुःख है, वही
[ ६

Page 28Permalink

नरक है। सकाम कर्म ही बन्धन का कारण है। संकल्परहितता और निर्विकल्पता
ही मुक्ति है। यद्यपि अज्ञानी इस निर्विकल्पता को निद्रारूप मानते हैं, तथापि वह
अखण्ड आत्मबोधरूप स्थिति है, इस बोध-स्थिति में जागते रहना ही जीवन्मुक्ति
है। योगी इस जीवन्मुक्ति में निरन्तर रमण कर समष्टि-पिण्ड—ब्रह्माण्ड और
व्यष्टिपिण्ड—शरीर में तात्विक एकात्मकता का रसास्वादन करता है।
यत्सुखं तत्स्वर्गं, यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्मतद्वन्धनं, यन्निर्विकल्पं
तन्मुक्तिः, स्वरूपदशायां निद्रादौ स्वात्मजागरः शान्तिर्भवति । एवं
सर्वदेहेषु विश्वरूपपरमेश्वरः परमात्माऽखण्डस्वभावेन घटे घटे चित्स्वरूपो
तिष्ठति ।। एवं पिण्डसंवित्तिर्भवति ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३।१३ )
असीम, अखण्ड, निरंजन परमेश्वर प्रत्येक शरीर में विद्यमान है, यही परम
सद्विवेक अथवा महायोगज्ञान है। हमारे नाथयोग में जीवात्मा का शिव और
शक्ति के साथ योगज्ञानपूर्वक अभेद होना ही समरसरूप मोक्ष कहा जाता है।
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में परमात्मा की निजाशक्ति की महिमा का विलक्षण विवेचन
हमारे महायोगी गोरखनाथ ने किया है। यह परमेश्वर की स्वकीया शक्ति है।
यह तत्वतः परमकैवल्यस्वरूपिणी महामाया है, मोक्षदायिनी परमेश्वरी है।
सिद्धसिद्धान्त के अन्तर्गत शिव को शक्ति की आत्मा कहा जा सकता है और शक्ति
शिव का अभिव्यक्ति-माध्यम है। शिव के पारमार्थिक स्वरूप में निहित शक्ति
एक अनन्त और शाश्वत रूप में सक्रिय ऊर्जा है। शिव शक्ति की आत्मा है तो
शक्ति शिव का शरीर है। शरीर का तात्पर्य आकार से है। शिव शक्ति का
पारमार्थिक रूप है तो शक्ति शिव का प्रापंचिक स्तर है। शिव से भिन्न और
स्वतंत्र शक्ति का अस्तित्व ही नहीं है।
महायोगी गोरखनाथजी ने अपनी 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' रचना में कुण्डलिनी
के जागरण और महत्ता पर मौलिक प्रकाश डाला है। शरीर में कुण्डलिनी
अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध रूप में विद्यमान है। मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी जबतक
योगसाधना के द्वारा प्रबुद्ध नहीं की जाती, तबतक देहासक्त संसार के विषयभोगों
में आबद्ध लोगों के लिये यह शोक, मोह, चिन्ता व्यापार आदि के द्वारा बन्धन-
कारिणी है। जबतक यह मूलाधार में प्रसुप्त है, अधोमुखी है, तबतक प्राणियों को
जन्म, मरण के फल से प्रभावित करती रहती है। प्रबुद्ध कुण्डलिनी जब समुत्थित
होकर सहस्रार का भेदन कर परमशिव में अन्तर्लीन हो जाती है, तब वह योग-
१० ]

Page 29Permalink

सिद्ध पुरुष के जन्म-मरण दुःखरूप फलों को देनेवाले कर्म ( के प्रभाव ) और मन
के विकारों को नष्ट करने में समर्थ होती है । समस्त जागतिक बन्धनों-अविद्या-
अन्धकार के परिणामों और विपाकों का प्रबुद्ध कुण्डलिनी के ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश
करने पर अन्त हो जाता है । योगी पूर्णकाम और शिवपद में स्वस्थ हो जाता है,
वह परमपद में अलख निरंजन की ज्योति से महिमान्वित हो उठता है । गोरखनाथ
ने कहा है :-
सा विमर्शरूपिणी योगिनः स्वस्वरूपमवगच्छन्तीति सुप्रसिद्धा ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । १५ )
यह कुण्डलिनी समस्त कार्यों के ऊपर विद्यमान है, यह विमर्शरूपविद्या है,
यह प्रबुद्ध होने पर योगियों को आत्मा के स्वरूप का व्यापक ज्ञान करा देती है ।
योगी की दृष्टि में यही आत्मदर्शन है । यद्यपि कुण्डलिनी एक है पर स्थान और
स्थूल-सूक्ष्मभेद से अधः, मध्य और ऊर्ध्व कही गयी है । गोरखनाथजी ने कुण्डलिनी-
जागरण के द्वारा परमपद की प्राप्ति का संकेत किया है :-
मध्यशक्तिप्रबोधेन अधः शक्तिनिकुञ्चनात् ।
ऊर्ध्वशक्तिनिघातेन प्राप्यते परमं पदम् ॥
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । १६ )
हमारे नाथयोग में शक्ति के अभ्युत्थान से परमपद में योगसाधक का
प्रतिष्ठित होना ही उसकी महती योगसिद्धि है। जिस महामाया-मूलशक्ति अथवा
मूलमाया के बल पर परमेश्वर जगत् की रचना करता है, वह मूलाधार में स्थित
है, उस शक्ति को जगाकर उसके ध्यान से जब योगी सम्पूर्ण चैतन्यस्वरूप में
आत्माभिव्यक्त हो उठता है, तब वह सृजन और सहार में परमेश्वर की ही
तरह समर्थ हो जाता है । उसकी सम्पूर्ण सत्ता, अहंता, क्रियाशक्ति, सच्चिदा-
नन्दपरमेश्वर की महाशक्ति में अन्तर्लीन हो उठती है । मूलाधार में स्थित
कुण्डलिनी समस्त प्राणिमात्र का जीवनाधार है, यह प्रत्येक जीवात्मा के शरीर
में व्यापक और अतिसूक्ष्म है । यह अपने स्थूल रूप में स्थूल सृष्टि की
रचनात्मक शक्ति है, इसलिये इसे सृष्टि-कुण्डलिनी कहा जाता है । मध्यमा
कुण्डलिनी चिद्रूपिणी है । यही जीव का वास्तविक स्वरूप है । यह शक्ति
चंचल मन और इन्द्रियों के विषय-भोगों के रस में रमण करने वाले जीवात्मा
को अपने निर्मल, शुद्धस्वरूप में—आत्मचैतन्य-प्रकाश में स्थापित कर देती है ।
[ ११

Page 30Permalink

यह जीवात्मा पूर्वजन्मकृत सत्कर्म के फल से इस जन्म में सद्गुरु की कृपा से
जब मध्यमा कुण्डलिनी को जगा लेता है, तब वह योगसिद्धि के द्वारा सहजानन्द
स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यह निराकार चैतन्यस्वरूपिणी सूक्ष्म
महाशक्ति है ।
योगिनां परमानन्दतया कुण्डलिनी या निश्चयभूता वर्तते सा
सूक्ष्मा निराकारा ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । २२ )
मध्यमा-कुण्डलिनी के प्रबोधन के उपरान्त जो शक्ति ब्रह्म के अखण्ड-
स्वरूप, सच्चिदानन्द का साक्षात्कार कराने में तत्पर होती है, वह ऊर्ध्वशक्ति
कही जाती है । शिव और शक्ति की अभेदता ही परमपद की प्राप्ति में
ऊर्ध्वशक्तिनिपात का हेतु है ।
गोरखनाथजी ने स्वसंवेद्य, अनुभवैकगम्य निरंजनतत्व का पिण्डपद
सामरस्यपरकयोगविज्ञान के स्तर पर निर्वचन किया । यह महत्तत्व स्वतःसिद्ध
स्वरूप चैतन्यप्रकाश से ही वेद्य है । इस स्वचेतनप्रकाश के माध्यम से ही
ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, चन्द्र, अग्नि, विद्युत् आदि ज्योतिःस्वरूप पदार्थ प्रत्याभासित
होते हैं । गोरखनाथजी ने कहा है :
परमपदमिति स्वसंवेद्यमत्यन्तभासाभासकमयम् ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५ । २ )
यही योगसम्मत परमधाम है, जिसका निर्वचन साधनसापेक्ष हो ही नहीं
सकता । निर्विकल्प समाधि के द्वारा ही सहज शून्य में ॐकारपदातीत परमपद
की स्वाभिव्यक्ति सहज सिद्ध है । योगसिद्ध महापुरुष गुरु की कृपाकटाक्ष-ज्योति
से श्रद्धानिष्ठ योगाभ्यासी को स्वसंवेद्य परमपद का अनुभव होता है तो हो
जाता है । गुरु के कृपाकटाक्ष के सम्बल द्वारा मन, इन्द्रियों आदि के संयमपूर्वक
अपने पिण्ड का परपिण्ड के साथ सामरस्य स्थापित कर सच्चिदानन्द परब्रह्म का
योगी रसास्वादन करता है ।
"तस्माद् गुरुकटाक्षपातात् स्वसंवेद्यतया च महासिद्धयोगिभिः
स्वकीयं पिण्डं निरुत्थानानुभवेन समरसं क्रियत इति सिद्धान्तः ।"
( सिद्धसिद्धान्त पद्धति ५ ७ )
१२ ]

Page 31Permalink

स्वपरपिण्डादि अभेद रूप परमपद की प्राप्ति का उपाय ही सिद्धमत में
निरुत्थान कहा जाता है। योगी के लिये यह आवश्यक है कि यदि वह कैवल्यपद
का अनुभव पाना चाहता है तो अवधूत गुरु की कृपा प्राप्त करे। 'सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति' में गोरखनाथजी ने शिव के वचन को उद्धृत कर योगमार्ग की श्रेष्ठता
प्रतिपादित की है।
योगमार्गात्परो मार्गो नास्तिनास्ति श्रुतौ स्मृतौ ।
शास्त्रेष्वन्येषु सर्वेषु शिवेन कथितः पुरा ॥
( सिद्ध सि० प० ५ । २२ )
जड़-पदार्थों का योग नहीं होता है, जड़ और चेतन का संयोग होता है,
जीवात्मा द्वारा परमात्मा में अभिन्नता की अनुभूति ही योग है। यही श्रेयस्कर
योगमार्ग है। महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि परमात्मा से अभिन्न जीवात्मा
का शाश्वत चैतन्यस्वरूप योगमार्गपरक सहज, संयम, सोपाय और अद्वैतक्रम से
ही लक्षित होता है। जीवात्मा द्वारा परमात्मस्वरूप की स्वानुभूति ही सहज ज्ञान
है। इन्द्रियों और मन को अपने विषयों से प्रत्याहारित कर आत्मा में प्रवृत्त करना
ही संयम है। अपने स्वप्रकाश आत्मा को सर्वत्र व्यापक और अभेद जानकर उसी
में स्वस्थ रहना ही स्थिति है, इस स्थिति का जिस ज्ञान द्वारा अनुभव होता है,
वही सोपाय ज्ञान है। परमतत्व की अपरोक्षानुभूति ही अद्वैतक्रमलक्षित परमपद
है। गोरखनाथजी का उपदेशामृत है कि साधना की सिद्धि के लिये योगी को अपने
गुरु के उपदिष्ट योगज्ञान में पूर्णश्रद्धावान् होकर अपने व्यष्टिपिण्ड में समस्त
ब्रह्माण्डनायक अलखनिरंजन की पूर्ण अनुभूति कर परपिण्ड से समरसीकरणपूर्वक
अज्ञान-अन्धकार का उच्छेदकर परमपद में स्थित हो जाना नितान्त समीचीन
और कल्याणकारी है। परमपद-प्राप्ति की दिशा में गुरु का अनुग्रह ही प्रमुख
साधन है, इस अनुग्रह के तीन क्रम हैं—शक्तिपात, करुणावलोकन और उपदेश।
उपदेशसम्बन्धी अनुग्रह का तात्पर्य यह है कि गुरु आत्मज्ञान के प्रकाश में पांच-
भौतिक जड़ पदार्थों के मिथ्यात्व का निर्देशन कर अपने शिष्य को सत्स्वरूप में
स्वस्थ रहने का सदुपदेश प्रदान करता है। शिष्य में विशेष श्रद्धा और साधना
के प्रति सत्कार-बुद्धि देखकर गुरु अपनी योगशक्ति से उसे कृतार्थ कर सत्स्वरूप
में स्थित कर देता है। यही शक्तिपात है। करुणावलोकन भी एक प्रकार का
शक्तिपात है।
कथनाच्छक्तिपाताद्वायद्वापादावलोकनात् ।
प्रसादात्स्वगुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ॥
( सि० सि० प० ५ । ६५ )
[ १३

Page 32Permalink

हमारे सिद्धामृतमार्ग में इसी सिद्धान्त का पोषण है कि जो मन्त्रोपदेश या
करूणावलोकन मात्र से शिष्य को परम विश्राम में अधिष्ठित कर देता है, वही
सद्गुरु है । गोरखनाथजी की शिक्षा है :-
अतएव परमपदप्राप्त्यर्थं सद्गुरुः सदावन्दनोयः ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५।७० )
यह निर्विवाद है कि गुरु के कृपापात्र शिष्य की सम्पूर्ण मानसिक वृत्तियों
का आत्मस्वरूप में लय हो जाने पर उसे स्वतः जीवात्मा-परमात्मा के ऐक्य का
रसानुभव सुलभ हो जाता है। सांसारिक बाह्य विषयों में आसक्त बुद्धि में शान्ति
और मुक्ति की अमृतमन्दाकिनी की अजस्र धारा प्रवाहित हो उठती है। पिण्डपद-
सामरस्य का आनन्द प्राप्त हो जाता है ।
गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में अवधूत योगी के लक्षण का
निरूपण कर संन्यास की वास्तविक गरिमा प्रकाशित की है। उनकी योगदृष्टि में
अवधूत योगी वह है, जो सामरस्य के आदर्श को पूर्णतया सिद्ध कर लेता है और
स्वसंवेद्य परमतत्त्व का रसास्वादन करता रहता है। अवधूत योगी अहंकार, अज्ञान,
संकीर्ण दृष्टिकोण तथा समस्त इच्छाओं, वासनाओं, चिन्ताओं, दुःखों और द्वन्द्वों
तथा बन्धनों से मुक्त होकर आत्मस्वरूप में निरन्तर प्रवृत्त रहता है। वह उन्मनी
समाधि की अवस्था में परमपद का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लेता है, निरपेक्ष अनुभूति
के प्रकाश से अपनी चेतना के बौद्धिक, मानसिक और प्राणीय स्तरों को भी
प्रकाशित कर देता है। सांसारिक जीवन और लोकव्यवहार के सामान्य कार्यों को
करते हुए भी उसकी समाधि-अवस्था निर्विकार और सहज बनी रहती है। ऐसा
अवधूत योगी वास्तव में नाथ कहा जाता है। वह स्वामी होता है, सद्गुरु होता
है। गोरखनाथजी साक्षात् शिव अवधूत थे, उनका योगदर्शन वास्तव में पूर्ण
आत्मज्ञान के आलोक से सम्पन्न मनःस्थिति में स्वयं उनके तथा अन्य सिद्ध महा-
योगियों के द्वारा अनुभूत सत्य के प्रकाश में निम्नस्तरीय सामान्य मानवीय
अनुभूतियों तथा चेतना के सामान्य ऐन्द्रिक स्तर एवं पूर्ण ज्ञानालोकित स्तर के
मध्यवर्ती असामान्य स्तर की रहस्यमयी अनुभूतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है।
गोरखनाथजी की दृष्टि में अवधूत योगी वह है, जो अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष,
अभिनिवेश, पंच क्लेशों के पाश-बन्धन से तथा बाल्य, यौवन और जरा, जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति के प्रपंच से मुक्त होकर मन को उन्मन कर अलख निरंजन में
रम जाता है। गोरखनाथजी के वचन हैं :-
१४ ]