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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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स्वपरपिण्डादि अभेद रूप परमपद की प्राप्ति का उपाय ही सिद्धमत में
निरुत्थान कहा जाता है। योगी के लिये यह आवश्यक है कि यदि वह कैवल्यपद
का अनुभव पाना चाहता है तो अवधूत गुरु की कृपा प्राप्त करे। 'सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति' में गोरखनाथजी ने शिव के वचन को उद्धृत कर योगमार्ग की श्रेष्ठता
प्रतिपादित की है।
योगमार्गात्परो मार्गो नास्तिनास्ति श्रुतौ स्मृतौ ।
शास्त्रेष्वन्येषु सर्वेषु शिवेन कथितः पुरा ॥
( सिद्ध सि० प० ५ । २२ )
जड़-पदार्थों का योग नहीं होता है, जड़ और चेतन का संयोग होता है,
जीवात्मा द्वारा परमात्मा में अभिन्नता की अनुभूति ही योग है। यही श्रेयस्कर
योगमार्ग है। महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि परमात्मा से अभिन्न जीवात्मा
का शाश्वत चैतन्यस्वरूप योगमार्गपरक सहज, संयम, सोपाय और अद्वैतक्रम से
ही लक्षित होता है। जीवात्मा द्वारा परमात्मस्वरूप की स्वानुभूति ही सहज ज्ञान
है। इन्द्रियों और मन को अपने विषयों से प्रत्याहारित कर आत्मा में प्रवृत्त करना
ही संयम है। अपने स्वप्रकाश आत्मा को सर्वत्र व्यापक और अभेद जानकर उसी
में स्वस्थ रहना ही स्थिति है, इस स्थिति का जिस ज्ञान द्वारा अनुभव होता है,
वही सोपाय ज्ञान है। परमतत्व की अपरोक्षानुभूति ही अद्वैतक्रमलक्षित परमपद
है। गोरखनाथजी का उपदेशामृत है कि साधना की सिद्धि के लिये योगी को अपने
गुरु के उपदिष्ट योगज्ञान में पूर्णश्रद्धावान् होकर अपने व्यष्टिपिण्ड में समस्त
ब्रह्माण्डनायक अलखनिरंजन की पूर्ण अनुभूति कर परपिण्ड से समरसीकरणपूर्वक
अज्ञान-अन्धकार का उच्छेदकर परमपद में स्थित हो जाना नितान्त समीचीन
और कल्याणकारी है। परमपद-प्राप्ति की दिशा में गुरु का अनुग्रह ही प्रमुख
साधन है, इस अनुग्रह के तीन क्रम हैं—शक्तिपात, करुणावलोकन और उपदेश।
उपदेशसम्बन्धी अनुग्रह का तात्पर्य यह है कि गुरु आत्मज्ञान के प्रकाश में पांच-
भौतिक जड़ पदार्थों के मिथ्यात्व का निर्देशन कर अपने शिष्य को सत्स्वरूप में
स्वस्थ रहने का सदुपदेश प्रदान करता है। शिष्य में विशेष श्रद्धा और साधना
के प्रति सत्कार-बुद्धि देखकर गुरु अपनी योगशक्ति से उसे कृतार्थ कर सत्स्वरूप
में स्थित कर देता है। यही शक्तिपात है। करुणावलोकन भी एक प्रकार का
शक्तिपात है।
कथनाच्छक्तिपाताद्वायद्वापादावलोकनात् ।
प्रसादात्स्वगुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ॥
( सि० सि० प० ५ । ६५ )
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