सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
About this granth
The Siddha Siddhanta Paddhati (सिद्धसिद्धान्तपद्धति) is a principal Sanskrit text of the Nath tradition, ascribed to Guru Gorakhnath (Goraksha). It sets out the philosophy of the Nath yogis in systematic form, centred on the idea that the body (pinda) and the cosmos are two forms of one reality, so that the yogi can realise the highest state within his own body.
It has six teachings (upadeshas): the origin of the body, tracing the unfolding of Shakti from the supreme state; reflection on the body; awareness of the holy places and deities within it; its supports, namely nine chakras, sixteen adharas, three lakshyas and five voids; the harmony of body and the supreme; and the marks of the avadhuta yogi.
This edition with Hindi translation is published by the Gorakhnath Temple, Gorakhpur. It opens with a picture of the perpetual flame in the temple's sanctum, believed to have been lit by Gorakhnath, followed by a verse in praise of Ganapati from the sixth teaching with its Hindi meaning. The translator is not named in the opening pages. It runs to 222 pages.
प्रारंभिक पृष्ठ एवं नाथ सम्प्रदाय सिद्धान्त भूमिका
सिद्धसिद्धान्तपद्धति
गोरखनाथ-मन्दिर
गोरखपुर
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अखण्ड ( परमात्म ) ज्योति
[ श्रीगोरखनाथ-मन्दिर, गोरखपुर के गर्भगृह में गोरखनाथजी द्वारा त्रेता युग से प्रज्वलित ]
गणपति-स्तवन
विद्धात्वर्थनिचयं भक्तानुग्रहमूर्तिमत् ।
स्मरानन्दभरं चेतो गाणपत्यभिधं महः ॥
भक्तों के प्रति मूर्तिमान् अनुग्रह, स्मरण मात्र से ही आनन्दित चित्तवाला
गणपतिनामक ( परमात्म ) तेज हमें अर्थसिद्धि प्रदान करे, धर्म, अर्थ तथा काम
और मोक्ष से सम्पन्न करे ।
[ शिवगोरक्ष : सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ११५ ]
ॐ
अलख निरञ्जन
सिद्धसिद्धान्तपद्धति
प्रणेता
शिवगोरक्ष महायोगी गोरखनाथ
टीकाकार
तथा
सम्पादक
रामलाल श्रीवास्तव
गोरखनाथ-मन्दिर
गोरखपुर
प्रकाशक :
श्रीगोरखनाथ-मन्दिर
गोरखपुर
पहला संस्करण
केवल २००० प्रतियाँ
सम्वत् २०३८ वि०
मूल्य ८ रुपये
प्राप्ति-स्थान :
गोरखनाथ-मन्दिर
गोरखपुर
मुद्रक :
दी इउरेका प्रिंटिंग वर्क्स ( प्रा० ) लिमिटेड
गीताप्रेस रोड, गोरखपुर ।
फोन : ५३१०
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शिवगोरक्ष महायोगी गोरखनाथ
श्रीगोरक्षनाथो विजयतेतराम्
अनुक्रम
विषय पृष्ठ संख्या
पहला उपदेश १-३२
अव्यक्त-अनाम परब्रह्म ... ... २
परब्रह्म की निजा आदि पाँच शक्ति और उनके गुण ... ... ३
परपिण्डोत्पत्ति ... ... ७
अनादि पिण्ड के पाँच तत्व और पचीस गुण ... ... ८
महासाकार आद्य पिण्डपुरुष की उत्पत्ति, उसके पाँच तत्व और
पचीस गुण ... ... १०
महासाकार पिण्ड की आठ मूर्ति ... ... १४
नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की उत्पत्ति और पंचभूतों के पचीस गुण १४
अन्तःकरणपंचक ... ... १६
कुलपंचक ... ... १६
व्यक्तिपंचक और उसके पचीस गुण ... ... २२
प्रत्यक्षकरणपंचक ... ... २४
दस प्रधान नाड़ी और उनके स्थान ... ... २७
दस वायु ( प्राण ) और उनके स्थान ... ... २८
जीवात्मा के स्थूल शरीर का उत्पत्ति-क्रम ... ३०
दूसरा उपदेश ३३-९१
[ पिण्डविचार ]
नौ चक्र-वर्णन ... ... ३३
सोलह आधार ... ... ५०
तीन लक्ष्य ... ... ६३
व्योमपंचक ... ... ६७
अष्टांगयोग ... ... ६८
विषय पृष्ठ संख्या
तीसरा उपदेश ९२-१०२
[ पिण्डसंवित्ति ]
सप्त पाताल तथा अनेक लोकादि ... ... ६३
चार वर्ण आदि ... ... ६७
सप्तद्वीप तथा सप्त समुद्र ... ... ६६
नव खण्ड ... ... ६६
अष्टकुल पर्वत ... ... १००
नौ नदी तथा अन्य उपनदियाँ ... ... १००
नक्षत्रादि ... ... १०१
स्वर्ग-नरक-मुक्ति ... ... १०२
चौथा उपदेश १०३-११७
[ पिण्डाधार ]
कुलाकुलसामरस्य ... ... १०४
कुलशक्ति ... ... १०४
आज्ञावती पराशक्ति ... ... १०६
अनन्त शक्तिमान् ... ... १०७
आकाशादि की कुण्डलिनी से उत्पत्ति ... ... ११०
मध्याशक्तिप्रबोधन ... ... १११
स्थूल-सूक्ष्म कुण्डलिनी ... ... ११४
पाँचवां उपदेश ११८-१४२
[ पिण्डपदसामरस्य ]
परम पद ... ... ११८
गुरु द्वारा सन्मार्गदर्शन ... ... १२०
गुरु और सामरस्य ... ... १२१
निरुत्थान-प्राप्ति का उपाय ... ... १२२
पिण्डसिद्धि का वेष ... ... १२४
परमपद की प्राप्ति ... ... १२६
योगमार्ग ... ... १२६
सहजसंयमसोपायाद्वैतज्ञान ... ... १२८
विषय पृष्ठ संख्या
सद्गुरु का सेवन ... ... १३०
गुरुकुलसन्तान ... ... १३२
गुरु की प्रसन्नता और परमपद ... ... १३७
छठा उपदेश १४३-१७४
[ अवधूत योगी ]
अवधूत के वेष और चिह्न ... ... १४५
अवधूत की अवस्था (स्थिति) ... ... १४७
अवधूत की सर्वस्वरूपता ... ... १४६
सर्वसिद्धान्तदर्शनसमन्वयी ... ... १५६
सिद्धमत का आश्रय ... ... १६०
निरुत्थानरूप परमपद ... ... १६२
आदेश का स्वरूप ... ... १६६
सिद्धसिद्धान्तरूप योगशास्त्र ... ... १७१
चित्रानुक्रम :
अखण्ड परमात्म-ज्योति
शिवगोरक्ष महायोगी गोरखनाथ
गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ
卐
आशीर्वचन
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति की गरिमा )
परमक Philippe करुणामय भगवान् शिवगोरक्ष महायोगी गोरखनाथजी ने देववाणी में
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना कर अलखनिरंजन के साक्षात्कार का राजपथ
प्रशस्त किया है। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नाथयोग पर प्रचुर प्रकाश डाला गया
है। इस मौलिक योगवाङ्मय में शैवयोग के प्रतिपादन के साथ-ही-साथ निगमागम-
पुराणस्मृतिसम्मत योगाचार, वैराग्य और मोक्ष के सैद्धान्तिक और प्रक्रियात्मक-
साधनात्मक पक्षों का समीचीन समन्वय भी बोधगम्य शैली में निरूपित है, जिसका
रसास्वादन वे ही कर सकते हैं, जो योगविज्ञान—हठयोगविद्या के द्वारा परम-
साक्षात्कार की सिद्धि में अनुभवी और निष्णात हैं। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' को
हमारे सिद्धामृतमार्ग अथवा नाथ-सम्प्रदाय में अपूर्व मान्यता प्राप्त है और योगि-
सम्प्रदाय में ही नहीं, दार्शनिकों और विद्वानों में भी इस योगग्रंथ के प्रति यथेष्ट
आदरभाव और श्रद्धा का दर्शन होता है। लगभग दो सौ साल पहले काशी के
महान् योगदार्शनिक महामति बलभद्र ने 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' के रूप में 'सिद्ध-
सिद्धान्तपद्धति' के सारांश का स्वरचित संस्कृत-श्लोकों में संग्रह किया था।
महायोगी गोरखनाथजी की प्रशस्ति में बलभद्र ने कहा था—
यत्कारुण्यवलोकनादपि भवेच्चित्तर्दाविश्रमः पारदः ।
तस्मिन् श्रीकरुणासुधारसनिधौ चेतोऽस्तुमग्नं गुरौ ॥
( सिद्धसिद्धान्तसंग्रह ५ । ३६ )
जिनके कृपामय दृष्टिपात से चित्त शान्त और विषयों में अनासक्त हो जाता
है, उन करुणासुधारसनिधि गुरु ( गोरखनाथ ) में मेरा मन निमग्न हो जाय।
बलभद्र ने अपने ग्रंथ में 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' का ज्ञानामृत भर दिया है।
गोरखनाथजी महान् योगाचार्य थे, इसलिये 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में उनके
वचन उपदेश के रूप में उपलब्ध होते हैं। उन्होंने इस तरह इस योगग्रंथ के छः
उपदेशों में महायोगज्ञानामृत का वर्णन किया था। गोरखनाथजी ने निरूपण किया
[ १
है कि किस तरह एक गत्यात्मक आध्यात्मिक परमसत्य से वैविध्यपूर्ण तथा अनेक
भौतिक पदार्थों से युक्त विश्वप्रपंच उद्भूत है तथा इस सिद्धान्त का स्पष्टीकरण है
कि किस प्रकार दिक्कालनिरपेक्ष भेदातीत, शाश्वत, परमात्मा अलखनिरंजन परम-
शिव अपनी स्वरूपभूत शक्ति के द्वारा दिक्कालपरिसीमित वैविध्यपूर्ण ब्रह्माण्ड एवं
असंख्य व्यष्टिपिण्डों के रूप में अभिव्यक्त होता है। इसके आरम्भ में अजातवाद
और तत्पश्चात् सत्कार्यवाद की रीति से आदिनाथ की सत्ता से पृथक् जगत्, अण्ड
और पिण्ड की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। अण्ड-पिण्ड की उत्पत्ति प्रमाण
सिद्ध नहीं है, क्योंकि आदिनाथ अलखनिरंजन की सत्ता से भिन्न जगत् की सत्ता
नहीं है। नाथयोग में अजातवाद का ही सिद्धान्त यद्यपि मान्य है तथापि इस
मान्यता की पुष्टि के लिये शरीर में ही सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड और जीवन्मुक्त
अमरकाय योगियों ने परमात्मा की अखण्डता, अभिन्नता और निरंजनता
(निर्मलता) का बोध प्राप्त किया। सत्कार्यवाद अथवा परिणामवाद पर यही
अजातवाद की विजय है। जब तक योगी अथवा अध्यात्मविज्ञानी की परमात्म-
स्वरूप में स्थिति और सम्पूर्ण निष्ठा नहीं हो जाती है, तब तक जन्म-मरण का
दुःख नहीं छूट सकता और साधक की दृष्टि में विश्वप्रपंच की अहंकार के स्तर पर
रागद्वेषादि द्वन्द्वात्मक मल या अविद्या के धरातल पर सत्ता बनी रहेगी। अण्डपिण्ड
के रूप का ज्ञान हो जाने पर उसकी आधारशिला पारमार्थिक सत्ता का जीवात्मा-
साधक को बोध हो जाना सरल हो जाता है। यह निर्विवाद है कि इस विश्व-
प्रपंच की गत्यात्मकता के मूलकारण के रूप में कोई स्वयंसत्य, स्वयंप्रकाशितसत्ता
है, जो हमारी इन्द्रिय, मन, बुद्धि से परे अतीन्द्रिय, अतिमानसिक और अतिबौद्धिक
स्तर पर अभिव्यक्त है। गोरखनाथजी ने इस शाश्वत चेतना को परासंवित् कहा
है, यही परमसत्ता है। उन्होंने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के छः उपदेशों में पिण्डोत्पत्ति,
पिण्डविचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार, पिण्डपदसमरसभाव और नित्यावधूतलक्षण
आदि का निरूपण कर नित्यनिर्विकार परमसत्ता को ही जीवात्मा-योगसाधक के
लिये प्रतिपाद्य स्वीकार कर उसके स्वरूपबोध अथवा अन्तर्लय की पद्धति सुनिश्चित
की है।
समष्टिब्रह्म, व्यष्टिब्रह्म, विशिष्टब्रह्म, सभी का मूल निरंजनता है,
निरंशता, निस्पन्दता और अभिन्नता तथा निश्चयता है। शिवगोरक्ष की दृष्टि
में अद्वैत आत्मा (परमात्मा) अपनी निजाशक्ति से युक्त होकर स्वरूपतः अभिन्न
है। निजस्वरूप में निहित शक्ति की जागृति के स्तर पर परमात्मा शाश्वत, अनन्त
परपिण्ड है।
२ ]
शक्तिचक्रक्रमेणोत्थोजातः पिण्डपरः शिवः ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६ )
यह परब्रह्मशिव गोरखनाथजी के योगसिद्धान्त के अनुसार अपरंपर,
परमपद, शून्य, निरंजन परमात्मा है ।
अपरम्परं परमपदं शून्यं निरञ्जनं परमात्मेति
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । १७ )
परब्रह्मशून्य-स्वसत्तामात्र है, निर्विकार ही निरंजन है । अपरम्पर, परमपद,
शून्यनिरंजन परमात्मा अजन्मा और परमानन्दस्वरूप है । निरंजन ब्रह्म सत्य है,
सहज है, सर्वगत है। यह परमानन्द परमात्मा सदा अपने स्वरूप में सुख का
अनुभव करता है, ऐसा भाव, तत्वदर्शन अथवा योगरसामृत सिद्धसिद्धान्तपद्धति में
परिलक्षित है । पांचभौतिक शरीर जन्म लेने और मृत्युग्रस्त होने का धरातल
है । जीवात्मा को शरीर धारण कर जन्म लेना पड़ता है और शरीर के जीर्ण
होने पर अथवा दैवयोग से उसमें से यह प्राण के रूप में बाहर निकल कर अपनी
स्वरूपसत्ता में अन्तर्लीन हो जाता है। प्राण या जीवन एक उन्नत स्तर से
शरीर में उतरता है, जड़ जगत् में प्राण की ही शक्ति सृजन और विनाश की
भौतिक प्रक्रियाओं का सजीव आकारों में रूपान्तर करती है ।
गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में हठयोग की साधन-प्रक्रिया का मर्म
स्पष्ट किया है । हठयोग की साधना वास्तव में प्राणसाधना है और प्राणायाम की
सिद्धि से ही यह फलवती होती है ।
पवन हीं जोग पवन हीं भोग, पवन हीं हरै छतीसौँ रोग ।
या पवन कोई जांणै भेव । सो आपै करता आपै देव ।।
( गोरखबानी सबदी १४७ )
पवन-प्राण के संयम से ही नाड़ियों का मल-शोधन होता है, शरीर की
शक्ति बनी रहती है, मन संयमित और स्थिर रहता है । प्राण के चेतना
में स्थिर हो जाने पर योगी सारी सिद्धियों को वश में कर लेता है ।
हमारे शरीर में असंख्य नाड़ियों का जाल फैला हुआ है । नाड़ियों का
उत्पत्ति-स्थान है मूलकन्द, मूलकन्द से उत्पन्न बहत्तर हजार नाड़ियों में दस प्रमुख हैं,
[ ३
इनमें इड़ा-पिंगला, चन्द्र-सूर्य, नाड़ी कहलाती हैं, ये वाय और दायें नासारन्ध्ररूपी
द्वारों से बहती हैं । इनके मध्य में सुषुम्ना ब्रह्माण्ड-मार्ग से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त बहती
है । मूलकन्द से ही निकल कर सरस्वती, पूषा, अलम्बुषा, गान्धारी, हस्तिजिह्वा,
कुहू और शंखिनी नाड़ी बहती हैं । हमारे शरीर में दस वायु की स्थिति कही
गयी है, हृदय में प्राणवायु उच्छ्वास और नि:श्वास रूप में हकार तथा सकार
ध्वनि करती आती-जाती है । यही हठयोग की विद्या की आधारशिला है । हकार
सूर्य है, ठकार चन्द्रमा है । सूर्य-चन्द्रमा का योग ही गोरखनाथजी की दृष्टि में
हठयोग है ।
हकारः कीर्तितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते ।
सूर्याचन्द्रमसोर्योगाद्धठयोगो निगद्यते ॥
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६६ )
गोरखनाथजी ने जीव की शरीर में उत्पत्ति के सम्बन्ध में यथार्थ वर्णन करते
हुए कहा है कि स्त्री-पुरुष के संगम के परिणामस्वरूप रज और वीर्य के स्त्री की
योनि में ऐक्य से जीव के स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है । नौवें मास में यह
जीवात्मा सत्यज्ञानयुक्त होता है और दसवें मास में योनिद्वार के स्पर्श से अज्ञानी
शिशु के रूप में आत्मोद्धार के लिये तड़पता हुआ जन्म लेता है । उसे संसार में
आते ही सत्यज्ञान, स्वरूपबोध की विस्मृति हो जाती है ।
परमशिव के कुल और अकुल रूप की उपासना पर प्रकाश डालते हुए
गोरखनाथजीने कहा है कि विशिष्ट चेतन, शक्तियुक्त शिव की उपासना ही
कुलाचार है, इस कुलाचार में निष्काम कर्म में निष्ठा रहती है । अकुल अवस्था
में परिपक्व योग ही शीर्षस्थानीय कहा गया है । अकुल में, स्वरूपानुभवस्वरूप
परमात्मबोध में ही चित्त की लयावस्था रहती है । आदिनाथ अकुल और कुल,
दोनों अवस्थाओं से परे हैं । महाप्रलय में कुल ( व्यक्तावस्था ) और अकुल
( अव्यक्तावस्था ) दोनों का अभाव रहता है । स्वयंज्योति, सच्चिदानन्दमूर्ति,
एक मात्र सत्स्वरूप शाश्वत कैवल्य ही अभिव्यक्त रहता है । यही चरम सत्ता है ।
यही समस्त सत्ताओं की सत्ता है, समस्त अस्तित्वों का सत्य है, समस्त व्यावहारिक
अनुभवों का प्रकाशक और ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का निर्माता है । यह भावाभाव-
विनिर्मुक्त है, नाशोत्पत्तिविवर्जित और सर्वसंकल्पनातीत है । यही आदिनाथ का
परब्रह्मस्वरूप है । नाथयोग के सिद्धान्त के अनुरूप अपने स्वरूप में सन्निहित
करनेवाली शिव से शाश्वत संयोगमयी शक्ति ही परमसत्ता है । शक्ति शिव में और
४ ]