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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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शक्तिचक्रक्रमेणोत्थोजातः पिण्डपरः शिवः ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६ )
यह परब्रह्मशिव गोरखनाथजी के योगसिद्धान्त के अनुसार अपरंपर,
परमपद, शून्य, निरंजन परमात्मा है ।
अपरम्परं परमपदं शून्यं निरञ्जनं परमात्मेति
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । १७ )
परब्रह्मशून्य-स्वसत्तामात्र है, निर्विकार ही निरंजन है । अपरम्पर, परमपद,
शून्यनिरंजन परमात्मा अजन्मा और परमानन्दस्वरूप है । निरंजन ब्रह्म सत्य है,
सहज है, सर्वगत है। यह परमानन्द परमात्मा सदा अपने स्वरूप में सुख का
अनुभव करता है, ऐसा भाव, तत्वदर्शन अथवा योगरसामृत सिद्धसिद्धान्तपद्धति में
परिलक्षित है । पांचभौतिक शरीर जन्म लेने और मृत्युग्रस्त होने का धरातल
है । जीवात्मा को शरीर धारण कर जन्म लेना पड़ता है और शरीर के जीर्ण
होने पर अथवा दैवयोग से उसमें से यह प्राण के रूप में बाहर निकल कर अपनी
स्वरूपसत्ता में अन्तर्लीन हो जाता है। प्राण या जीवन एक उन्नत स्तर से
शरीर में उतरता है, जड़ जगत् में प्राण की ही शक्ति सृजन और विनाश की
भौतिक प्रक्रियाओं का सजीव आकारों में रूपान्तर करती है ।
गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में हठयोग की साधन-प्रक्रिया का मर्म
स्पष्ट किया है । हठयोग की साधना वास्तव में प्राणसाधना है और प्राणायाम की
सिद्धि से ही यह फलवती होती है ।
पवन हीं जोग पवन हीं भोग, पवन हीं हरै छतीसौँ रोग ।
या पवन कोई जांणै भेव । सो आपै करता आपै देव ।।
( गोरखबानी सबदी १४७ )
पवन-प्राण के संयम से ही नाड़ियों का मल-शोधन होता है, शरीर की
शक्ति बनी रहती है, मन संयमित और स्थिर रहता है । प्राण के चेतना
में स्थिर हो जाने पर योगी सारी सिद्धियों को वश में कर लेता है ।
हमारे शरीर में असंख्य नाड़ियों का जाल फैला हुआ है । नाड़ियों का
उत्पत्ति-स्थान है मूलकन्द, मूलकन्द से उत्पन्न बहत्तर हजार नाड़ियों में दस प्रमुख हैं,
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