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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 24 of 222

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भगवान् गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में योगसिद्धि का स्वरूप
परमात्म साक्षात्कार बताया है, अष्टांगयोग का यही फल है। नाथयोग का
सैद्धान्तिक आधार तथा भगवान् गोरखनाथ द्वारा प्रतिपादित सिद्धामृतमार्ग के,
महायोगज्ञान का आधार है व्यष्टिशरीर (पिण्ड) में अखिल ब्रह्माण्ड की
सृष्टि अथवा तात्विक व्यापकता की अपरोक्षानुभूति । कहा गया है कि जो कुछ
ब्रह्माण्ड में है, वही हमारे व्यष्टिपिण्ड में विद्यमान है, पर वह जड़ विज्ञान के
अन्तर्गत प्राकृतिक शक्ति का समन्वयात्मक विश्लेषण नहीं है, यह तो आत्मा
का अथवा चिन्मयसच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मपरमात्मा का स्वरूपगत तात्विक
समत्वबोध है, सर्वव्यापक है। गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना
में यह सिद्ध किया है कि हमारा व्यष्टि-शरीर मात्र भौतिक शरीर नहीं है, यद्यपि
यह भौतिक रूप में पंचतत्वों से आकारित है तथापि यह एक आध्यात्मिक तत्व
में अभिव्यक्त है । यह आध्यात्मिकतत्व शरीर-व्यष्टि-पिण्ड को अपनी पाँच
भौतिक सीमाओं और बन्धनों से मुक्त होने की सामर्थ्य प्रदान करने में पूर्णक्षम
और शक्तिमान् है ।
पिण्डमध्ये चराचरं यो जानाति स योगी पिण्डसंवित्तिर्भवति ।
(सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३।१)
इस व्यष्टिशरीर में ही जो योगी सकल चराचर जगत् को व्याप्त जानता
है, वह पिण्डसंवित्ति होता है । सृष्टि दो तरह की है, व्यष्टिरूप, समष्टिरूप ।
व्यष्टि-सृष्टि में अन्तःकरणाभिमानी अस्मदादि जीव हैं और समष्टि-सृष्टि-
ब्रह्माण्ड में विराट् हिरण्यगर्भादि की अभिव्यक्ति है। यह ब्रह्माण्ड अधिक
चिरस्थायी स्वीकार किया गया है, यह अस्मदादि शरीरों का कारण और नियन्ता
है, व्यष्टिशरीर क्षणभंगुर और विनश्वर है । इस व्यष्टिपिण्ड में जीवात्मा आता
है और इसका त्याग कर निकल जाता है। जीव व्यष्टि-शरीर में कर्मबन्धन में
पड़ता है और योगाभ्यास आदि के द्वारा समष्टि, व्यापकपिण्ड में, परमात्मा में
अन्तर्लीनता ही उसके परमपद में प्रतिष्ठित होने का स्वरूप है । ब्रह्माण्ड के
समस्त रहस्य का शरीरपिण्ड में भेदन करने वाला योगी अथवा युक्त जीवात्मा
परमशान्त, निष्कल, निरंजन, परब्रह्मपरमेश्वर आदिनाथ के स्वरूप में स्थित हो
जाता है, यही परमपद अथवा परमकैवल्य है । निस्सन्देह समस्त भौतिक वस्तुओं की
समस्त कार्य-कारणात्मक क्रियायें और विकास की समस्त प्रक्रियायें तथा ब्रह्माण्ड में
वस्तुओं के नवीनतम स्तरों के प्रकट होने की प्रक्रियायें एक शाश्वत-अनन्त परब्रह्म
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