सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextयह जीवात्मा पूर्वजन्मकृत सत्कर्म के फल से इस जन्म में सद्गुरु की कृपा से
जब मध्यमा कुण्डलिनी को जगा लेता है, तब वह योगसिद्धि के द्वारा सहजानन्द
स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यह निराकार चैतन्यस्वरूपिणी सूक्ष्म
महाशक्ति है ।
योगिनां परमानन्दतया कुण्डलिनी या निश्चयभूता वर्तते सा
सूक्ष्मा निराकारा ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । २२ )
मध्यमा-कुण्डलिनी के प्रबोधन के उपरान्त जो शक्ति ब्रह्म के अखण्ड-
स्वरूप, सच्चिदानन्द का साक्षात्कार कराने में तत्पर होती है, वह ऊर्ध्वशक्ति
कही जाती है । शिव और शक्ति की अभेदता ही परमपद की प्राप्ति में
ऊर्ध्वशक्तिनिपात का हेतु है ।
गोरखनाथजी ने स्वसंवेद्य, अनुभवैकगम्य निरंजनतत्व का पिण्डपद
सामरस्यपरकयोगविज्ञान के स्तर पर निर्वचन किया । यह महत्तत्व स्वतःसिद्ध
स्वरूप चैतन्यप्रकाश से ही वेद्य है । इस स्वचेतनप्रकाश के माध्यम से ही
ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, चन्द्र, अग्नि, विद्युत् आदि ज्योतिःस्वरूप पदार्थ प्रत्याभासित
होते हैं । गोरखनाथजी ने कहा है :
परमपदमिति स्वसंवेद्यमत्यन्तभासाभासकमयम् ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५ । २ )
यही योगसम्मत परमधाम है, जिसका निर्वचन साधनसापेक्ष हो ही नहीं
सकता । निर्विकल्प समाधि के द्वारा ही सहज शून्य में ॐकारपदातीत परमपद
की स्वाभिव्यक्ति सहज सिद्ध है । योगसिद्ध महापुरुष गुरु की कृपाकटाक्ष-ज्योति
से श्रद्धानिष्ठ योगाभ्यासी को स्वसंवेद्य परमपद का अनुभव होता है तो हो
जाता है । गुरु के कृपाकटाक्ष के सम्बल द्वारा मन, इन्द्रियों आदि के संयमपूर्वक
अपने पिण्ड का परपिण्ड के साथ सामरस्य स्थापित कर सच्चिदानन्द परब्रह्म का
योगी रसास्वादन करता है ।
"तस्माद् गुरुकटाक्षपातात् स्वसंवेद्यतया च महासिद्धयोगिभिः
स्वकीयं पिण्डं निरुत्थानानुभवेन समरसं क्रियत इति सिद्धान्तः ।"
( सिद्धसिद्धान्त पद्धति ५ ७ )
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