Skip to content
SarvaKosh
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished222 pages

Page 22 of 222

Read in context
Page 22

ब्रह्ममार्ग में स्थित नौचक्र ( गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नवचक्र और
'गोरक्षशतक' आदि में षट्चक्र बताये हैं ) ही विश्रामस्थल स्वीकार किये गये हैं ।
सभी चक्रों का भेदन होने पर सुषुम्ना का प्रवाह सीधा हो जाता है और जीवात्मा
( योगसाधक ) ब्रह्मरन्ध्र में प्राणसिद्धि के सहारे शिवस्वरूप हो जाता है ।
वह व्यावहारिक अथवा लोकचेतना से ऊपर उठकर समाधिस्तर पर पारमार्थिक
चेतना में विहार करता है । इन चक्रों के भेदन से महाकुण्डलिनीका प्रबोधन होता
है । कुण्डलिनीशक्ति की अभिव्यक्ति का स्थान मूलाधार है । यह शक्ति साक्षात्
गौरीस्वरूपिणी है। इसके ध्यान से साधक की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं ।
स्वाधिष्ठानचक्र में गोरखनाथजी ने प्रवालांकुर-मूँगे के अग्र भाग की तरह लाल रंग
के शिवलिंग की स्थिति बतायी है । योगसाधक प्रबुद्ध कुण्डलिनी द्वारा आलिंगित
शिवलिंग का ध्यान कर योगशक्ति प्राप्त करता है । नाभिचक्र अथवा मणिपुर में
कुण्डलिनी मध्यमा शक्ति कही जाती है । इसके ध्यान से सात्विक वृत्तियाँ प्रवाहित
होती हैं । कुण्डलिनी-जागरण के ही सन्दर्भ में हृदय-चक्र अथवा अनाहत चक्र में
स्थित लिंग की आकारवाली ज्योति का नाम गोरखनाथजी ने हंसकला कहा है ।
इसके ध्यान से इन्द्रियाँ वश में होती हैं और कंठचक्र अथवा विशुद्धचक्र में
ज्योतिर्मयी सुषुम्ना को अनाहतकला नाम दिया गया है। इसकी उपासना से जल,
स्थल, पाषाण में प्रतिघात नहीं होता, संकल्प की सिद्धि होती है । योगी जागतिक
शक्तियों पर विजय प्राप्त करता है । वह ॐकार परमेश्वर के नादरूप का
साक्षात्कार कर लेता है । आज्ञाचक्र अथवा भ्रू चक्र में सुषुम्ना अंगुष्ठमात्र दीप-
शिखाकार हो जाती है, यही ज्ञाननेत्र है। इसका ध्यान करने से योगी शाश्वत
चैतन्य-ज्योति से एकाकार हो जाता है ।
सप्तमं भ्रू चक्रं मध्यममङ्गुष्ठमात्रं ज्ञाननेत्रं दीपशिखाकारं ध्यायेत्
वाचां सिद्धिर्भवति ।
(सिद्धसिद्धान्तपद्धति २।७ )
गोरखनाथजी ने आठवें चक्र को निर्वाण-चक्र कहा है और नौवें को
आकाशचक्र कहा है । दोनों के ध्यान से क्रमशः मोक्ष और अलख-निरंजन में
स्वरूप-स्थिति प्राप्त होती है । इस तरह नौ चक्रों के भेदन द्वारा सहज स्वरूप की
प्राप्ति होती है, ब्रह्ममार्ग से जीवात्मा की यात्रा पूरी होती है । यही शाश्वत
विश्राम कहा गया है। गोरखनाथजी की योगदृष्टि में जीवात्मा का यही शाश्वत
विश्राम ध्येय है ।
६ ]