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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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शिव शक्ति में सन्निहित हैं। गोरखनाथजी ने परमात्मा के स्वरूप-दिग्दर्शन में मत
व्यक्त किया है :—
अनामेति स्वयमनादिसिद्धं एकमेवानादिनिधनं सिद्धसिद्धान्त-
प्रसिद्धं तस्येच्छामात्र धर्माधर्मिणो निजाशक्तिः प्रसिद्धा ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १।५ )
यह परमेश्वर नाम से परे है, स्वयंज्योति, अनादिसिद्ध है, यह उत्पत्ति,
विनाश, सृजन और संहार से सर्वथा अतीत, अविनाशी है। यह अपनी चैतन्य-
शक्ति-सच्चिदानन्दस्वरूपिणी परमेश्वरी शक्ति से सबकी उत्पत्ति और संहार का
कर्ता अथवा कारण है । यह चैतन्यस्वरूप परब्रह्म सिद्धसिद्धान्त में प्रतिपाद्य अथवा
ध्येय है । इसकी निजाशक्ति ही संकल्पशक्ति अथवा इच्छाशक्ति है । इसी शक्ति
से यह निग्रहानुग्रहधर्मी है । निग्रहशक्ति कर्म का फल देती है, अनुग्रहशक्ति स्वरूप
प्रदान करती है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति में गोरखनाथजी ने निजाशक्ति, पराशक्ति
अपराशक्ति, सूक्ष्मासक्ति और कुण्डलिनी महाशक्ति का सांकेतिक निरूपण करते
हुए उनके कार्य और रूप का विवेचन प्रस्तुत किया । जो पुरुष माया और अज्ञान
से विमूढ़ होकर वैषयिक भोगों में आबद्ध रहता है, उसके लिये जगज्जननी कुण्ड-
लिनी बन्धनकारिणी होती है, पर जो मुद्राबन्ध, चक्रभेदन और प्राणायाम के
द्वारा इस महाशक्ति को जगा लेता है, उसे यह मोक्ष प्रदान करती है; इस
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' ग्रंथ में हठयोग का अक्षय भाण्डार है । जिस तरह पांचभौतिक
पिण्ड का अधिष्ठाता जीवात्मा होता है, उस तरह परपिण्ड का अधिष्ठाता सगुण-
साकाररूप में अभिव्यक्त निरंजन, निराकार, चिन्मय, सच्चिदानन्दस्वरूप
शिव होता है, ईश्वर होता है, निराकार की साकार अभिव्यक्ति का यही
यौगिक रहस्य है कि पंचशक्तियों, निजा, परा, अपरा सूक्ष्मा और कुण्डलिनी
में स्वरूपतः अन्तर्लीन परब्रह्म परमेश्वर इन्हीं के गुणों में आत्मप्रकाशन करता
है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में यौगिक दृष्टि से पिण्डविचार अन्तर्दर्शन और
ध्यान पर आधारित है । हमारा शरीर शिवशक्ति की अभिव्यक्ति का पवित्र
माध्यम है और इसमें लोकलोकान्तर, समस्त ब्रह्माण्ड का रहस्य भरा पड़ा
है । हमारे शरीर में नवचक्र, सोलह आधार, त्रिलक्ष्य और पंचव्योम स्थित हैं ।
गोरखनाथजी ने अपनी रचना 'गोरक्षशतक' में कहा है कि जिस योगी को इनका
ज्ञान नहीं है, वह नाममात्र के लिये योगी है । हमारे शरीर में सुषुम्ना नाड़ी
ब्रह्ममार्ग के रूप में प्रसिद्ध है । जीवात्मारूपी साधक अथवा योगी के लिये इस
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