सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextइनमें इड़ा-पिंगला, चन्द्र-सूर्य, नाड़ी कहलाती हैं, ये वाय और दायें नासारन्ध्ररूपी
द्वारों से बहती हैं । इनके मध्य में सुषुम्ना ब्रह्माण्ड-मार्ग से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त बहती
है । मूलकन्द से ही निकल कर सरस्वती, पूषा, अलम्बुषा, गान्धारी, हस्तिजिह्वा,
कुहू और शंखिनी नाड़ी बहती हैं । हमारे शरीर में दस वायु की स्थिति कही
गयी है, हृदय में प्राणवायु उच्छ्वास और नि:श्वास रूप में हकार तथा सकार
ध्वनि करती आती-जाती है । यही हठयोग की विद्या की आधारशिला है । हकार
सूर्य है, ठकार चन्द्रमा है । सूर्य-चन्द्रमा का योग ही गोरखनाथजी की दृष्टि में
हठयोग है ।
हकारः कीर्तितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते ।
सूर्याचन्द्रमसोर्योगाद्धठयोगो निगद्यते ॥
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६६ )
गोरखनाथजी ने जीव की शरीर में उत्पत्ति के सम्बन्ध में यथार्थ वर्णन करते
हुए कहा है कि स्त्री-पुरुष के संगम के परिणामस्वरूप रज और वीर्य के स्त्री की
योनि में ऐक्य से जीव के स्थूल शरीर की उत्पत्ति होती है । नौवें मास में यह
जीवात्मा सत्यज्ञानयुक्त होता है और दसवें मास में योनिद्वार के स्पर्श से अज्ञानी
शिशु के रूप में आत्मोद्धार के लिये तड़पता हुआ जन्म लेता है । उसे संसार में
आते ही सत्यज्ञान, स्वरूपबोध की विस्मृति हो जाती है ।
परमशिव के कुल और अकुल रूप की उपासना पर प्रकाश डालते हुए
गोरखनाथजीने कहा है कि विशिष्ट चेतन, शक्तियुक्त शिव की उपासना ही
कुलाचार है, इस कुलाचार में निष्काम कर्म में निष्ठा रहती है । अकुल अवस्था
में परिपक्व योग ही शीर्षस्थानीय कहा गया है । अकुल में, स्वरूपानुभवस्वरूप
परमात्मबोध में ही चित्त की लयावस्था रहती है । आदिनाथ अकुल और कुल,
दोनों अवस्थाओं से परे हैं । महाप्रलय में कुल ( व्यक्तावस्था ) और अकुल
( अव्यक्तावस्था ) दोनों का अभाव रहता है । स्वयंज्योति, सच्चिदानन्दमूर्ति,
एक मात्र सत्स्वरूप शाश्वत कैवल्य ही अभिव्यक्त रहता है । यही चरम सत्ता है ।
यही समस्त सत्ताओं की सत्ता है, समस्त अस्तित्वों का सत्य है, समस्त व्यावहारिक
अनुभवों का प्रकाशक और ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का निर्माता है । यह भावाभाव-
विनिर्मुक्त है, नाशोत्पत्तिविवर्जित और सर्वसंकल्पनातीत है । यही आदिनाथ का
परब्रह्मस्वरूप है । नाथयोग के सिद्धान्त के अनुरूप अपने स्वरूप में सन्निहित
करनेवाली शिव से शाश्वत संयोगमयी शक्ति ही परमसत्ता है । शक्ति शिव में और
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