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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages
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( २६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण३२९घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल३३८
शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षण”अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश”
सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपाय”भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद”
शौर्यबल बढ़ाने के उपाय३३०शुभ भौंरी के लक्षण”
सेनाबल, आत्मिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपाय”भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता३३९
आयुर्बल के लक्षण”भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमता”
सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम”'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल”
प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण३३१'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल”
राजा के रथ का वर्णन”अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण”
अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण३३२अन्य भौंरियों से युक्त अश्वों के लक्षण”
हाथी के ४ प्रकार”यशोवर्द्धक तथा 'सव्यं' संज्ञक अश्व के लक्षण३४०
भद्रगज के लक्षण”शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण”
मन्द्रगज के लक्षण”इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल”
मृगगज के लक्षण”विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल”
मिश्रगज के लक्षण३३३पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल”
गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण”भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल”
भद्रगज के शरीर का मान”चिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल३४१
मन्द्र तथा मृग गज का मान”
उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण”
उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण”
नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना३३४
अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण”
उत्तम अश्व के अन्य लक्षण३३८
अश्व के भौंरी के दो भेद”
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( २७ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल३४१अश्वों के कुठारवादि दोष उत्पन्न होने के कारण३४५
अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण,,घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश,,
धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल,,घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण,,
कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल,,अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश३४६
घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल,,अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट,,
भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश३४२उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण,,
आवर्त्त भौरियोंके शुभप्रद स्थानों का निर्देश,,उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश३४७
सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश,,ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश,,
शुभाशुभ फलप्रद भौंरो के स्थानों का निर्देश,,वर्षर्तु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध,,
एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल३४३उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश,,
कीलोत्पाटी व मध्यम आवर्त्तों के लक्षण व फल,,थके हुए अश्व को धीरे-धीरे चलाने का एवं उनके भक्षणार्थ हितकारक पदार्थ देने का निर्देश,,
पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल,,मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश३४८
श्यामकणं अश्व के लक्षण,,मार्ग से चलकर आये हुए घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश,,
जयमङ्गल अश्व के लक्षण३४४पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश,,
निन्दित अश्व के लक्षण,,घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश,,
अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण,,घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल,,
निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण,,
स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश३४५
आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण,,
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( २८ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष३४८मनुष्य और पशुओं का ताडन द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन-दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश३५३
घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश३४९बैल आदिकों के निवास का सुरक्षित स्थल,,
घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश,,राज्य में सौ-सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश३५४
धारा गति के लक्षण,,बोझ ले चलनेवालों का तारतम्य,,
आस्कन्दित गति के लक्षण,,राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध,,
रेचित गति के लक्षण,,युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों की नियुक्ति का निर्देश,,
प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण,,संग्राम में अधिक सेना की आवश्यकता का निर्देश,,
वल्गित गति के लक्षण,,सन्नद्ध सेना का माहात्म्य३५५
बैल के मुखादि का प्रमाण३५०मौल सेना की प्रशंसा,,
पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण,,सेना में अवश्य भेद होने के कारण,,
श्रेष्ठ बैल के लक्षण,,सेना का भेद होने से अनिष्ट फल,,
श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण,,राजा को शत्रु-सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश,,
मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण,,शत्रुओं को साधने का प्रकार३५६
घोड़ा, बैल तथा ऊंट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण३५१शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का निर्देश,,
दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश,,शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश,,
दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथमादि वर्ष का ज्ञान,,मित्र की सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश,,
निन्दित घोड़ों के लक्षण३५२अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और भेद,,
दांतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा,,
अंकुश के लक्षण३५३
घोड़ों की लगाम का वर्णन,,
बैल व ऊंट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल-शोधनार्थ दंताली का वर्णन,,
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( २६ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
मान्त्रिक अस्त्र के अभाव में नालिक अस्त्र का प्रयोग करने का निर्देश३५७यान तथा आसन के लक्षण३६३
नालिक के २ प्रकारों का निर्देश,,आश्रय व द्वैधीभाव के लक्षण३६४
लघुनालिका (बन्दूक) के लक्षण,,सन्धि करने योग्य पुरुषों का निर्देश,,
बृहन्नालिक (तोप) के लक्षण३५८उपहार रूप सन्धि की सर्वश्रेष्ठता का निर्देश,,
अग्निचूर्ण (बारूद) बनाने का प्रकार,,शत्रु के बलानुसार उपहार की कल्पना के भेद,,
गोला बनाने का प्रकार,,पार्श्ववर्ती अनार्य राजा से भी सन्धि करने का निर्देश,,
नालिक की व्यवस्था का निर्देश३५९सन्धि के अवसरों का तथा उनसे लाभ का निर्देश३६५
बारूद बनाने के दूसरे अनेक प्रकारों का निर्देश,,विग्रह करने योग्य पुरुष के लक्षण,,
तोप के गोले को लक्ष्य पर फेंकने की रीति,,विग्रह होने के कारणों का तथा विग्रह और कलह के भेद का निर्देश३६६
बाण का लक्षण,,बलवान् शत्रु के साथ विग्रह करने का निषेध,,
गदा व पट्टिश के लक्षण३६०निष्पाय दशा में विग्रह करने का निर्देश,,
खड्ग-प्रासि और कुन्त (भाला) के लक्षण,,यान के पांच भेद,,
चक्र और पाश के लक्षण,,विगृह्ययान के दो प्रकार के लक्षण३६७
कवच और टोप के लक्षण,,सन्धाययान के लक्षण,,
करज के लक्षण,,संभूययान के लक्षण,,
युद्ध की इच्छा करने योग्य राजा का लक्षण३६१प्रसङ्गयान के लक्षण,,
युद्ध का सामान्य लक्षण,,उपेक्षाययान के लक्षण,,
युद्ध के भेद और लक्षण,,रास्तों में सेना को चलाने की व्यवस्था३६८
युद्ध के लिये काल-विचार,,नदी-पर्वतादि में भय की संभावना होने पर व्यूह बाँध कर चलने का निर्देश,,
युद्ध के लिये उत्तम देश का लक्षण३६२मकर, श्येन व सूचीमुख व्यूहों का नाम व योजना-स्थल का निर्देश,,
मध्यम युद्ध-देश के लक्षण,,
अधम युद्ध-देश के लक्षण,,
युद्ध के लिये सेना का विचार३६३
मन्त्र के षड्गुणों के नामों का निर्देश,,
सन्धि के लक्षण,,
विग्रह के लक्षण,,
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( ३० )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शकट, वज्र, सर्वतोभद्र, चक्रव्यूह, व्यालव्यूहों का नाम-निर्देश३६८उपाय करने से कार्य सिद्ध होने का निर्देश३७३
बाजा बजाने के ढङ्ग से संकेतों के जानने का निर्देश,,उद्योग की अवश्य-कर्तव्यता का निर्देश,,
सैनिकों को संकेतज्ञान कराने का निर्देश३६९भेद और समाश्रय की श्रेष्ठता का निर्देश,,
संकेतों के अनुसार सैनिकों को कार्य करने का निर्देश,,लाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश३७४
संकेतानुसार स्थिति रखने का निर्देश,,स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध न करने से हानि,,
संकेतानुसार बाणादि चलाने आदि का निर्देश,,किसी के ललकारने पर क्षत्रिय को अवश्य युद्ध करने का निर्देश,,
संकेतानुसार गमनादि करने का निर्देश३७०आपत्काल में ब्राह्मण का क्षत्रिय धर्म करने का निर्देश३७५
सदा व्यूहबद्ध होकर अस्त्रादि चलाने का निर्देश,,शय्या पर पड़े २ क्षत्रिय को मरने का निषेध,,
अस्त्र-प्रयोगादि के समय सैनिकों की स्थिति का निर्देश,,रण छोड़ कर घर में क्षत्रिय को मरने का निषेध,,
क्रौञ्चव्यूह के लक्षण,,युद्ध में शत्रु को न मार सकने पर बन्धुओं के साथ युद्ध में लड़ते २ मर सकने मे क्षत्रियों की परम कर्तव्यता का निर्देश,,
श्येनव्यूह के लक्षण,,
मकरव्यूह के लक्षण,,
सूचीमुख तथा चक्रव्यूह के लक्षण३७१
सर्वतोभद्र व्यूह के लक्षण,,
शकट व व्यालव्यूह के लक्षण,,
सैन्य की न्यूनता व अधिकतानुसार एवं युद्धभूमि के अनुसार १ या २ व्यूहरचना का निर्देश,,युद्ध में पीछे पैर न हटाने तथा लड़कर मर जाने की प्रशंसा,,
लाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश,,
आसन के लक्षण व उस समय के कर्तव्य,,स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध न करने से हानि,,
सन्धाय आसन के लक्षण३७२स्वामी के निमित्त करने का फल३७६
आश्रय के लक्षण,,युद्ध में वीरगति पाए हुए के लिये शोक करने का निषेध,,
द्वैधीभाव के लक्षण,,
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( ३१ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
युद्ध में शूरतापूर्वक मरने का फल३७६शरणागत को लौटा देने में घोर नरक-प्राप्ति का निर्देश३७९
युद्ध में वीरगति पाने पर मुनिदुर्लभ लोक की सुगमता से प्राप्ति का निर्देश,,दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश,,
शूरता की प्रशंसा व सर्वोत्तमता का निर्देश,,उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण,,
प्राणियों के अन्न का विचार,,सर्वोत्तम युद्ध के लक्षण३८०
सूर्यमण्डल भेदन करनेवाले दो पुरुषों का निर्देश३७७नालिकास्त्र युद्ध का लक्षण,,
आततायी ब्राह्मण व गुरु को मारने का निर्देश,,शस्त्रयुद्ध का लक्षण,,
शत्रु द्वारा संकट आ पड़ने पर आचार्य धर्मशास्त्रियों द्वारा उपाय पूछने की निरर्थकता का निर्देश,,बाहुयुद्ध का लक्षण,,
बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों का निर्देश,,
जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का निर्देश३७८बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों को मित्रों के लिये प्रयोग का निषेध३८१
आततायी ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषाभाव का निर्देश,,युद्ध के समय सेना की रचना,,
आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश,,युद्ध होने का क्रम,,
युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का निर्देश,,सेना के उपद्रुत होने पर लड़ने का निर्देश३८२
जीवन-रक्षार्थ युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश३७९सेना में फूट डालने में पाप का निर्देश,,
मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का निर्देश,,फूट जानेवाली सेना के दुःखदायिनी होने का निर्देश,,
मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश,,सामादि का ध्यान रखते हुये युद्ध करने का निर्देश,,
शत्रु पर चढ़ाई करते समय सेना को तनख्वाह बढ़ाने का निर्देश,,
युद्ध में नालास्त्र ( बन्दूक-तोप ) आदियों की योजना३८३
युद्ध में प्रहार करने के अयोग्य सैनिकों के लक्षण,,
वृद्ध-बालकादि राजा को मारने का निषेध३८४
बलवान शत्रु के नाशार्थ कूटयुद्ध की महत्ता,,
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( ३२ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश३८४प्रातः सायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश३८९
कार्य को नष्ट न करने का निर्देश,,भृत्यों के प्राप्ति-पत्र को ग्रहण कर वेतन-पत्र देने का निर्देश,,
सेनापति के नित्य-कृत्यों का निर्देश३८५शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश,,
भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश,,शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश,,
शत्रु को नष्ट करने का उपाय,,मार डालने या त्याज्य नौकरों के लक्षण,,
शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार,,अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण३९०
विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र-सेना की रक्षा करने का निर्देश,,अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण,,
राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश३८६शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार,,
शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश,,राज्य-च्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश,,
विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश,,शत्रु-संचित धन की व्यवस्था का निर्देश३९१
मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश३८७सदाचारी शत्रु का पालन और असदाचारी को कष्ट पहुँचाने का निर्देश,,
ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के टिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश,,पहरेदारों की व्यवस्था,,
१००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश,,राजा के पूज्य होने के कारणों का निर्देश३९२
सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म३८८चिरस्थायी राजा के लक्षण,,
सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म,,शीघ्र ही पदभ्रष्ट होनेवाले राजा के लक्षण३९३
आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश,,नीतिभ्रष्ट राजा को भी अन्य राजा का उद्धार करने में समर्थ होने का निर्देश,
सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश,,तेजोहीन राजा से बलवान् राजा के साधारण भृत्य का भी तेजस्वी होने का निर्देश,,
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( ३३ )

राजा से बढ़कर बहुमत की महत्ता का निर्देश३९४शत्रु का राज्य हरण करने का उपाय३९७
हीन-राज्य राजा के आचरणों का निर्देश"राजा के बिना सेनापति आदि को भी शक्तिहीन होने का निर्देश"
राजा के दरिद्र हो जाने के कारणों का निर्देश"राज्य को वृक्ष की समता का निर्देश३९८
धार्मिक नीच राजा को भी श्रेष्ठ होने का निर्देश"राजा को अवश्य पालन करने योग्य नियमों का निर्देश"
धर्म तथा अधर्म की प्रवृत्ति में राजा की ही कारणता का निर्देश"पुत्र को राज्य देने के समय का निर्देश३९९
मनु आदि के मतानुसारी शुक्र की नीति होने का तथा ग्रन्थ-संख्या का निर्देश३९५राज्य पाने पर राजपुत्र के आचरणों का निर्देश"
शुक्रनीति-सार-चिन्तन का फल"मन्त्रियों का राजपुत्र के साथ करने योग्य व्यवहार का निर्देश"
शुक्रनीति के समान दूसरी नीति न होने का निर्देश"नवीन राजा के साथ मन्त्रियों को भी अनीतिपूर्ण व्यवहार करने का निषेध"
नीति-शेष कहने का निर्देश३९६नवीन राजा को राजभक्त मन्त्री आदि के मतानुसार न रहने का दुष्परिणाम"
शत्रु के छिद्रों को ढूँढ़ते रहने का निर्देश"नवीन मन्त्री आदि की नियुक्ति की व्यवस्था४००
शत्रु राजा को हीन-बल बनाने के लिये यत्न करने का निर्देश"धूर्त्त तथा साधु जन के अन्तर ज्ञात करने का निर्देश"
मौका देख कर शत्रु को नष्ट करने का निर्देश"धूर्त्त, जार (व्यभिचारी) और चोर में धूर्त की माया करने में श्रेष्ठता का निर्देश"
युद्ध में नियुक्त करने योग्य का निर्देश"धूर्त्तों की धूर्त्तता वर्णन"
दान-मान से रहित भी भृत्य को अपने राजा को न छोड़ने का निर्देश३९७बिना धूर्त्तता के अत्यन्त धन न मिलने का निर्देश४०१
राजा के द्रव्य को मेघ-जल के समान पुष्टिप्रद होने का निर्देश"राजा लोगों को दूसरे का धन हरण करने को स्वधर्म समझने का निर्देश"

३ शु० सूची

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( ३४ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश४०१प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन४०५
बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश,,योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण,,
अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश४०२एकचित्तता के भाव का वर्णन,,
धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश,,श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन४०६
अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश,,हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश,,
शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुखदायी होने का निर्देश,,अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश,,
अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश४०३कार्यसिद्ध्यर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश,,
अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश,,छल का वर्णन४०७
स्वकार्य-सिद्धयर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश,,तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश,,
ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश,,उत्तमादि भृत्यों के लक्षण४०८
दर्प, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण४०४प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण,,
महान बैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश,,उपदेश के विना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश,,
आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश,,आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश,,
आपत्ति में बिना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का निर्देश,,बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध,,
समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश४०९
प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश,,
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( ३५ )

विषयपृष्ठविषयपृष्ठ
कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के कारणों का निर्देश४०९सैनिकों के शौर्यवर्धक उपायों को करने का निर्देश४११
निर्दोष तथा अभिमत ही कार्य करने का निर्देश"युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की नियुक्ति का निषेध"
दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश"व्यवहार में विपन्न होने पर धनिक या किसान की रक्षा करने का निर्देश"
श्रेष्ठ तथा हीन पुरुष के संमान में न्यूनाधिक्य का निषेध४१०धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार"
उत्तमादि गृह-भूमि के प्रमाणों का निर्देश"सैनिकों के धन की आत्मवत् रक्षा करने का एवं जालसाज धनिकों का धन हरण करने का निर्देश४१२
अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम-प्रवेश के निषेध का निर्देश४११मूल से चौगुना सूद ले चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश"
सैनिकों ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यवहार न करने का निर्देश"टीकाकार-परिचय"
श्लोकानुक्रमणिका४१३

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॥ श्रीः ॥

शुक्रनीतिः

'विद्योतिनी' हिन्दीव्याख्योपेता


प्रथमोऽध्यायः

प्रणम्य जगदाधारं सर्गस्थित्यन्तकारणम् ।
संपूज्य भार्गवः पृष्टो वन्दितः पूजितः स्तुतः ॥ १ ॥
पूर्वदेवैर्यथान्यायं नीतिसारमुवाच तान् ।
शतलक्षश्लोकमितं नीतिशास्त्रमयोक्तवान् ॥ २ ॥

यदीया मती राजनीतौ विशिष्टा यमाराध्य लोके भवन्तीह शिष्टाः ।
तमानम्य नीतौ भृगो राष्ट्रभाषाऽनुवादं विदध्मस्तदीयाङ्घ्रिदासाः ॥

मङ्गलाचरण तथा ग्रन्थनाम— जगत् की उत्पत्ति, पालन तथा नाश के कारण जगत् के आधार स्वरूप परमात्मा को प्रणाम तथा पूजन कर भृगुपुत्र शुक्राचार्य ने असुरों के द्वारा पूजा, स्तुति तथा वन्दना करने के बाद पूछे जाने पर उनसे न्यायानुसार नीतियों में श्रेष्ठ उस नीतिशास्त्र का वर्णन किया जो एक करोड़ श्लोकों का था, और जिसे भगवान् ब्रह्मा ने लोकहितार्थ संग्रह कर शुक्राचार्य से कहा था ॥

स्वयंभूर्भगवान्लोकहितार्थं संग्रहेण वै ।
तत्सारं तु वसिष्ठाद्यैरस्माभिर्वृद्धिहेतवे ॥ ३ ॥
अल्पायुर्मूढदार्थाय संक्षिप्तं तर्कविस्तृतम् ।

नीतिशास्त्र का उपक्रम— उसके बाद वशिष्ठादिक हम सब ऋषियों ने मनुष्यों की बुद्धि-कामना से उसके सारांश का संग्रह किया जो संक्षिप्त होते हुये भी तर्क से परिपूर्ण है और आधुनिक अल्पजीवी राजा आदि के लिये पढ़ने योग्य है ॥

क्रियैकदेशबोधीनि शास्त्राण्यन्यानि संति हि ॥ ४ ॥
सर्वोपजीवकं लोकस्थितिकृन्नीतिशास्त्रकम् ।
धर्मार्थकाममूलं हि स्मृतं मोक्षप्रदं यतः ॥ ५ ॥

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२ शुक्रनीतिः

**नीतिशास्त्र-प्रशंसा—**नीतिशास्त्र से अन्य जितने शास्त्र हैं वे सब व्यवहार के एक अंश को बताने वाले हैं किन्तु सभी लोगों का उपकारक, समाज की स्थिति को सुरक्षित रखने वाला नीतिशास्त्र ही है क्योंकि यह धर्म, अर्थ तथा काम का प्रधान कारण और मोक्ष को देनेवाला कहा हुआ है ॥

अतः सदानीतिशास्त्रमभ्यसेद्यत्नतो नृपः ।
यद्विज्ञानान्नृपाद्याश्च शत्रुघ्नाल्लोकरंजकाः ॥ ६ ॥

अतः राजा को यत्नपूर्वक नीतिशास्त्र का सदा अभ्यास करना चाहिये। जिसके ज्ञान से राजा आदि शत्रुओं को जीतनेवाले तथा प्रजा को प्रसन्न करने-वाले होते हैं ॥

सुनीतिकुशला नित्यं प्रभवंति च भूमिपाः ।

और राजा लोग इसी शास्त्र से सुन्दर रीति से नीति में निपुण होते हैं ॥

शब्दार्थानां न किं ज्ञानं विना व्याकरणाद्भवेत् ॥ ७ ॥

क्या व्याकरण के बिना शब्द और अर्थ का ज्ञान नहीं होता है ? अर्थात् इनके बिना भी होता है ॥

प्राकृतानां पदार्थानां न्यायतर्कैर्विना न किम् ।
विधिक्रियाव्यवस्थानां न किं मीमांसया विना ॥ ८ ॥

प्रकृति निर्मित द्रव्यादि सात पदार्थों का ज्ञान बिना न्याय और तर्क के एवं। विधि की क्रिया (कर्मकाण्ड) की व्यवस्थाओं का ज्ञान बिना मीमांसाशास्त्र के क्या नहीं होता है ? ॥

देहादीनां नश्वरत्वं वेदान्तैर्न विना हि किम् ।
स्वस्वाभिमतबोधीनि शास्त्राण्येतानि संति हि ॥ ९ ॥

देह पर्यन्त जगत् के सभी पदार्थों की नश्वरता (क्षणभङ्गुरता) का ज्ञान क्या बिना वेदान्तशास्त्र के नहीं होता है ? अतः उक्त ये सभी शास्त्र केवल अपने-अपने मतों को बताने के लिये बने हुये हैं ॥

तत्तन्मतानुगैः सर्वैर्विधृतानि जनैः सदा ।
बुद्धिकौशलमेतद्धि तैः किं स्याद् व्यवहारिणाम् ॥ १० ॥

और इनके केवल मतानुयायी लोग ही इन शास्त्रों का सदा अध्ययन करते हैं। उक्त इन सभी शास्त्रों में केवल बुद्धि की चतुराई मात्र है उनसे व्यवहार-क्षेत्र में कोई लाभ नहीं हो सकता है ॥

सर्वलोकव्यवहारस्थितिर्नीत्या विना नहि ।
यथाऽशनैर्विना देहस्थितिर्न स्याद्धि देहिनाम् ॥ ११ ॥

संपूर्ण लोक व्यवहार की स्थिति बिना नीति शास्त्र के उसी प्रकार नहीं हो

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प्रथमोऽध्यायः ३

सकती, जिस प्रकार भोजन के बिना प्राणियों के देह की स्थिति नहीं रह सकती ॥

सर्वाभीष्टकरं नीतिशास्त्रं स्यात्सर्वसंमतम् ।
अत्यावश्यं नृपस्यापि स सर्वेषां प्रभुर्यतः ॥ १२ ॥

राजा का नीतिशास्त्र-ज्ञान में प्रयोजन—“लोगों के संपूर्ण अभीष्ट को सिद्ध करने वाला यह नीतिशास्त्र है”—इसे सभी स्वीकार करते हैं। और यह राजाओं के लिये भी अवश्य जानने योग्य है। क्योंकि राजा सभी लोगों का स्वामी है ॥

शत्रवो नीतिहीनानां यथाऽपथ्याशिनां गदाः ।
सद्यः केचित् कालेन भवंति न भवंति च ॥ १३ ॥

जिस प्रकार कुपथ्य भोजन करने वालों को कोई रोग शीघ्र और कोई देर में उत्पन्न होते हैं, एवं पथ्य से रहनेवालों को रोग नहीं उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार नीति से रहित लोगों के कोई शत्रु, शीघ्र और कोई देर से उत्पन्न होते एवं नीति से युक्त रहनेवालों के शत्रु नहीं उत्पन्न होते हैं ॥

नृपस्य परमो धर्मः प्रजानां परिपालनम् ।
दुष्टनिग्रहणं नित्यं न नीत्याऽतो विना ह्युभे ॥ १४ ॥

'नित्य प्रजाओं का पालन और दुष्टों का दमन करना' ये दोनों राजाओं के लिये परम धर्म हैं, और ये दोनों बिना नीतिशास्त्र के नहीं हो सकते हैं ॥

अनीतिरेव सच्छिद्रं राज्ञो नित्यं भयावहम् ।
शत्रुसंवर्धनं प्रोक्तं बलह्रासकरं महत् ॥ १५ ॥

नीतिरहित होना ही राजा के लिये महान् छिद्र (दोष) है, जो सदा भय देनेवाला, शत्रु की वृद्धि करनेवाला तथा अत्यन्त बल (सैन्य अथवा शक्ति) को क्षीण करनेवाला कहा हुआ है ॥

नीतिं त्यक्त्वा वर्त्तते यः स्वतंत्रः स हि दुःखभाक् ।
स्वतंत्रप्रभुसेवा तु असिधारावलेहनम् ॥ १६ ॥

अतः जो राजा नीति का त्याग कर उच्छृङ्खल व्यवहार करता है वह दुःख भोगता है। और उच्छृङ्खल राजा की सेवा करना तलवार की धार-चाटने के समान हानिकारक है ॥

स्वाराध्यो नीतिमान् राजा दुराराध्यस्त्वनीतिमान् ।
यत्र नीतिबले चोभे तत्र श्रीस्सर्वतोमुखी ॥ १७ ॥

नीति से युक्त राजा की सुखपूर्वक और अनीति से युक्त की दुःखपूर्वक आराधना की जा सकती है। जिस राजा के पास नीति तथा बल ये दोनों हैं उसके पास चारों तरफ से लक्ष्मी आती है ॥

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४ शुक्रनीतिः

अप्रेरितहितकरं सर्व्वराष्ट्रं भवेद्यथा ।
तथा नीतिस्तु संधार्या नृपेणात्महिताय वै ॥ १८ ॥
जिस नीति से बिना राजा की प्रेरणा से ही स्वयं हितकरनेवाला संपूर्ण राष्ट्र (प्रजामण्डल) हो, उसी नीति को अपने हित के लिये राजा को अपनाना उचित है ॥

भिन्नं राष्ट्रं बलं भिन्नं भिन्नोऽमात्यादिको गणः ।
अकौशल्यं नृपस्यैतदनीतेर्यस्य सर्व्वदा ॥ १६ ॥
'जिस राजा की अनीति से सदा उसके राष्ट्र (देश), सेना और मन्त्री आदि गण में परस्पर भेद होता है', यह उसकी मूर्खता का द्योतक है ॥

तपसा तेज आदत्ते शास्ता पाता च रंजकः ।
नृपः स्वप्राक्तनाद्धत्ते तपसा च महीमिमाम् ॥ २० ॥
राजा तप से तेज धारण करता है और शास्त्र का जाननेवाला, प्रजा की रक्षा तथा मनोरञ्जन करनेवाला होता है। एवं अपने पूर्वजन्ममार्जित तप से ही वह इस पृथ्वी का पालन करता है ॥

वृष्टिशीतोष्णनक्षत्रगतिरूपस्वभावतः ।
इष्टानिष्टाधिकं न्यूनाचारैः कालस्तु भिद्यते ॥ २१ ॥
यद्यपि काल एक ही है तथापि वर्षा, शीत, उष्ण, नक्षत्रों की गति रूप स्वभाव से एवं इष्ट, अनिष्ट, अधिक, न्यून आचरण से उसके अनेक भेद होते हैं ॥

आचारप्रेरको राजा ह्येतत्कालस्य कारणम् ।
यदि कालः प्रमाणं हि कस्माद्धर्मोऽस्ति कर्तृषु ॥ २२ ॥
राजा की काल-कारणता का निर्देश—आचरण की प्रेरणा करनेवाला राजा होता है अतः वह काल का भी कारण होता है और यदि काल ही आचरण में प्रमाण माना जाय तो उसके करनेवालों में धर्म कहां से हो, अर्थात् धर्माचरण में राजा ही मुख्य कारण है न कि काल ॥

राजदंडभयाल्लोकः स्वस्वधर्मपरो भवेत् ।
यो हि स्वधर्मनिरतः स तेजस्वी भवेदिह ॥ २३ ॥
जगत् के लोग राजदण्ड के भय से अपने २ धर्म के पालन में तत्पर होते हैं। और जो अपने धर्म में निरत होता है वही इस संसार में तेजस्वी होता है ॥

विना स्वधर्मान्न सुखं स्वधर्मो हि परं तपः ।
तपः स्वधर्मरूपं यद्वर्द्धितं येन वै सदा ॥ २४ ॥
देवास्तु किंकरास्तस्य किं पुनर्मनुजा भुवि ।

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प्रथमोऽध्यायः

धर्म की प्रशंसा—स्वधर्म-पालन करने के बिना सुख नहीं होता है और अपने धर्म का पालन करना परम तप है। अतः जिसने स्वधर्म-पालन रूप तप को सदा बढ़ाया है, संसार में उसके देवता लोग भी किङ्कर हो जाते हैं फिर मनुष्यों के विषय में क्या कहना है ॥

सुदण्डैर्धर्मनिरताः प्रजाः कुर्यान्महाभयैः ॥ २५ ॥
नृपः स्वधर्मनिरतो भूत्वा तेजःक्षयोऽन्यथा ।

राजा अपने धर्म में रत होकर अत्यन्त भयदायक दण्डों के द्वारा प्रजाओं को अपने २ धर्म में रत रक्खे। यदि ऐसा नहीं करता है तो उसका तेज क्षीण हो जाता है ॥

अभिषिक्तोऽनभिषिक्तो नृपत्वं तु यदाप्नुयात् ॥ २६ ॥
बुद्ध्या बलेन शौर्येण ततो नीत्याऽनुपालयन् ।
प्रजाः सर्वाः प्रतिदिनमच्छिद्रे दंडधृक् सदा ॥ २७ ॥

जिसका अभिषेक हुआ है या नहीं हुआ है, ऐसा राजा जब राज-पदवी को धारण करे तब वह बुद्धि, बल, शूरता तथा नीति से प्रतिदिन सभी प्रजाओं का पालन करता हुआ स्वयं छिद्र (दोष) रहित होकर दण्ड को धारण करे ॥

नित्यं बुद्धिमतोऽप्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते ।
तिर्यञ्चोऽपि वशं यांति शौर्यनौतिबलैर्धनैः ॥ २८ ॥

बुद्धिमान राजा का थोड़ा भी धन नित्य वृद्धि को प्राप्त होता है। और उसकी शूरता, नीति, बल तथा धन से तिर्यग्योनि के सर्पादि भी उसके वश में हो जाते हैं ॥

सात्त्विकं राजसं चैव तामसं त्रिविधं तपः ।
यादृक्तपति योऽत्यर्थं तादृग् भवति वै नृपः ॥ २९ ॥

सात्त्विकादि गुण भेद से राजा के तीन भेद—सात्त्विक, राजस तथा तामस भेद से तप तीन प्रकार का होता है। अतः जो राजा जिस प्रकार का तप करता है उसके अनुसार वह सात्त्विक, राजस अथवा तामस गुणवाला होता है ॥

यो हि स्वधर्मनिरतः प्रजानां परिपालकः ।
यष्टा च सर्वयज्ञानां नेता शत्रुगणस्य च ॥ ३० ॥
दानशौण्डः क्षमी शूरो निःस्पृहो विषयेष्वपि ।
विरक्तः सात्त्विकः स हि नृपोऽन्ते मोक्षमन्वियात् ॥ ३१ ॥

जो राजा अपने धर्म में निरत, प्रजाओं का पालक, सम्पूर्ण यज्ञों का करने वाला, शत्रुगणों को जीतनेवाला, दानवीर, क्षमावान, शूर, इन्द्रियों के

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६

शुक्रनीतिः

विषयों की तरफ मन नहीं लगानेवाला, वैराग्य-युक्त होता है वह 'सात्विक' कहलाता है। और ऐसा ही राजा अन्त में मोक्ष को प्राप्त करता है ॥

विपरीतस्तामसः स्यात् सोऽन्ते नरकभाजनः ।
निर्घृणश्च मदोन्मत्तो हिंसकः सत्यवर्जितः ॥ ३२ ॥

और उक्त इन गुणों से विपरीत गुणवाला जो राजा होता है वह 'तामस' कहलाता है और वह अन्त में नरक को प्राप्त करता है तथा दयारहित, मद से उन्मत्त, हिंसा करनेवाला, सत्य से रहित होता है ॥

राजसो दांभिको लोभी विषयी वंचकश्शठः ।
मनसाऽन्यश्च वचसा कर्मणा कलहप्रियः ॥ ३३ ॥
नीचप्रियः स्वतंत्रश्च नीतिहीनश्छलांतरः ।
स तिर्यक्त्वं स्थावरत्वं भविताऽन्ते नृपाधमः ॥ ३४ ॥

जो दाम्भिक, लोभी, विषयी, ठग, शठ, मन से अन्य बाहर से अन्य व्यवहार करनेवाला, वाणी और कर्म से कलहप्रिय, नीचों से प्रेम रखने वाला, स्वतन्त्र, नीति से हीन, भीतर छल रखनेवाला होता है ऐसा राजा 'राजस' कहलाता है। और वह मरने पर तिर्यग्योनि ( सर्पादि योनि ) अथवा स्थावर-योनि ( वृक्षादि योनि ) को प्राप्त करता है ॥

देवांशान् सात्त्विको भुंक्ते राक्षसांशांस्तु तामसः ।
राजसो मानवांशांस्तु सत्त्वे धार्यं मनो यतः ॥ ३५ ॥

सात्त्विक राजा देवता के अंश को, तामस राक्षसों के अंश को तथा राजस मनुष्यों के अंश को भोगता है। अतः सत्त्व गुण में मन को लगाना चाहिये ॥

सत्त्वस्य तमः साम्यान्मानुषं जन्म जायते ।
यद्यदाश्रयते मर्त्यस्तत्तुल्यो दिष्टतो भवेत् ॥ ३६ ॥

सत्त्व गुण तथा तमो गुण की समता से मनुष्य का जन्म मिलता है। और भाग्यवश—जैसे गुणों का मनुष्य आश्रय लेता है उसी के अनुसार वह होता है ॥

कर्मैव कारणं चात्र सुगतिं दुर्गतिं प्रति ।
कर्मैव प्राक्तनमपि क्षणं कि कोऽस्ति चाक्रियः ॥ ३७ ॥

सुगति-दुर्गति भेद से प्राक्तन कर्म की कारणता—इस संसार में सुगति और दुर्गति के प्रति कर्म ही कारण होता है। वह भी प्राक्तन होता है। अर्थात् पूर्व कर्म ही प्रारब्ध कर्म कहलाता है। क्या कोई जीव बिना कर्म किये क्षण भर भी रह सकता है अर्थात् नहीं रह सकता है ॥

न जात्या ब्राह्मणश्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न ।
न शूद्रो न च वै म्लेच्छो भेदिता गुणकर्मभिः ॥ ३८ ॥

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प्रथमोऽध्यायः ७

इस संसार में जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या म्लेच्छ नहीं होता है, वस्तुतः गुण तथा कर्म के भेद से ही होता है ॥

ब्रह्मणस्तु समुत्पन्नाः सर्वे ते किं नु ब्राह्मणाः ।
न वर्णतो न जनकाद् ब्रह्मतेजः प्रपद्यते ॥ ३६ ॥

संपूर्ण जीव ब्रह्मा से उत्पन्न हुये हैं अतः एव वे सभी क्या ब्राह्मण कहला सकते हैं ? नहीं, क्योंकि वर्ण (जाति) से और पिता से ब्रह्मतेज नहीं प्राप्त होता है ॥

ज्ञानकर्मोपासनाभिर्देवत्ताराधने रतः ।
शांतो दांतो दयालुश्च ब्राह्मणश्च गुणैः कृतः ॥ ४० ॥

'ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड का प्रकाण्ड विद्वान होता हुआ, देवता की आराधना में लीन, शान्तचित्त, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, दयालु होना'—इन सब गुणों से ब्राह्मणों का निर्माण हुआ है ॥

लोकसंरक्षणे दक्षः शूरो दांतः पराक्रमी ।
दुष्टनिग्रहशीलो यः स वै क्षत्रिय उच्यते ॥ ४१ ॥

जनता की भली भांति रक्षा करने में चतुर, शूर, इन्द्रियों का दमन करने-वाला, पराक्रमयुक्त, स्वभावतः दुष्टों को दण्ड देनेवाला जो है वह इन गुणों से 'क्षत्रिय' कहलाता है ॥

क्रयविक्रयकुशला ये नित्यं पण्यजीविनः ।
पशुरक्षाकृषिकरास्ते वैश्याः कीर्तिता भुवि ॥ ४२ ॥

जो लोग क्रय (खरीदना)—विक्रय (बेचना) करने में कुशल, नित्य दूकानदारी से जीविका चलानेवाले, पशु-पालन तथा कृषि कर्म (खेती) करनेवाले होते हैं वे संसार में 'वैश्य' कहलाते हैं ॥

द्विजसेवाचनरताः शूराः शांता जितेन्द्रियाः ।
सीरकाष्ठतृणवहास्ते नीचाः शूद्रसंज्ञकाः ॥ ४३ ॥

जो लोग द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) जाति की सेवा में निरत, शूर, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, हल, काष्ठ तथा तृण (घास आदि) का भार-वहन करनेवाले होते हैं वे नीच एवं 'शूद्र' कहलाते हैं ॥

त्यक्तस्वधर्माचरणा निर्घृणाः परपीडकाः ।
चंडाश्च हिंसका नित्यं म्लेच्छास्ते ह्यविवेकिनः ॥ ४४ ॥

जो लोग स्वधर्माचरण का परित्याग करनेवाले, दयाशून्य, दूसरे को पीड़ा पहुँचानेवाले, अत्यन्त क्रोधी तथा हिंसा करनेवाले होते हैं वे 'म्लेच्छ' कहलाते हैं । और उनमें विवेक का लेश भी नहीं होता है ॥

प्राक्कर्मफलभोगार्हा बुद्धिः संजायते नृणाम् ।

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८
: शुक्रनीतिः

पापकर्मणि पुण्ये वा कर्तुं शक्तो न चान्यथा ॥ ४५ ॥
मनुष्यों को पूर्वार्जित कर्मों के फल भोगने के योग्य जब जैसी बुद्धि उत्पन्न होती है तब उसके अनुसार पाप अथवा पुण्य कर्म करने में मनुष्य समर्थ होता है, अन्यथा असमर्थ रहता है ॥

बुद्धिरुत्पद्यते तादृग् यादृक्कर्मफलोदयः ।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ॥ ४६ ॥
जैसे कर्मों का फल उदय होता है उसी के अनुसार वैसी बुद्धि होती है तथा जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है उसी के अनुसार वैसे सहाय (साथी) भी होते हैं ॥

प्राक्तनवशतः सर्वं भवत्येवेति निश्चितम् ।
तदोपदेशा व्यर्थाः स्युः कार्याकार्यप्रबोधकाः ॥ ४७ ॥
यदि यही निश्चित हो कि जो कुछ होता है वह सब प्राक्तन कर्म के अनुसार ही होता है तो 'यह कर्त्तव्य है और यह नहीं कर्त्तव्य है' इसके बोधक सभी उपदेश व्यर्थ हो जायेंगे ॥

धीमन्तो बन्द्यचरिता मन्यन्ते पौरुषं महत् ।
अशक्ताः पौरुषं कर्तुं क्लीबा दैवमुपासते ॥ ४८ ॥
जो बुद्धिमान एवं प्रशंसनीय चरितवाले हैं वे पुरुषार्थ को बड़ा मानते हैं अर्थात् उद्योग करते हैं। और जो पुरुषार्थ करने में असमर्थ कायर पुरुष हैं वे भाग्य की उपासना करते हैं अर्थात् भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं ॥

दैवे पुरुषकारे च खलु सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
पूर्वजन्मकृतं कर्मेहार्जितं तद् द्विधा कृतम् ॥ ४९ ॥
भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों के ऊपर ही सम्पूर्ण जगत् के कार्य स्थित हैं। इनमें पूर्वजन्म में किया हुआ कर्म 'भाग्य' और इस जन्म में किया हुआ कर्म 'पुरुषार्थ' कहलाता है, इस भांति से एक ही कर्म के दो भेद किये गये हैं ॥

बलवत्प्रतिकारि स्याद् दुर्बलस्य सदैव हि ।
सबलाबलयोर्ज्ञानं फलप्राप्त्याऽन्यथा नहि ॥ ५० ॥
भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनों में से जो दुर्बल होता है उसको हटाने-वाला सदा बलवान् होता है। सबल और दुर्बल का ज्ञान केवल फल-प्राप्ति से होता है। अन्य रीति से नहीं होता ॥

फलोपलब्धिः प्रत्यक्षहेतुना नैव दृश्यते ।
प्राक्कर्महैतुकी सा तु नान्यथैवेति निश्चयः ॥ ५१ ॥
'प्रत्यक्ष कारण (पुरुषार्थ) से फल की प्राप्ति नहीं दिखाई देती है, वह तो प्राक्तन कर्म के वश से ही होती है, अन्य से नहीं होती है' यह निश्चित है ॥

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प्रथमोऽध्यायः ९

यज्जायतेऽल्पक्रियया नृणां वापि महत्फलम् ।
तदपि प्राक्तनादेव केचित् प्रागिह कर्मजम् ॥ ५२ ॥
और कभी २ स्वल्प कर्म से ही मनुष्यों को जो अधिक फल की प्राप्ति दिखाई देती है वह प्राक्तन कर्म के वश से ही होती है, कोई २ आचार्य उसे पुरुषार्थ से हुआ ही मानते हैं ॥

वदन्तीहैव क्रियया जायते पौरुषं नृणाम् ।
सस्नेहवर्तिर्दीपस्य रक्षा वातात् प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥
'मनुष्यों का जो पुरुषार्थ फलप्राप्ति के लिये होता है उसमें इसी जन्म के अर्थात् तात्कालिक कर्म ही कारण होता है। जैसे लोक में तैल तथा बत्ती से युक्त दीपक की हवा से रक्षा प्रयत्न करने से ही होती है' ऐसा कोई २ आचार्य कहते हैं ॥

अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो न चेद्यदि ।
दुष्टानां क्षपणं श्रेयो यावद्बुद्धिबलोदयैः ॥ ५४ ॥
यदि अवश्य होनेवाले कार्यों का प्रतीकार होना संभव न होता तो अपने बुद्धि तथा बल के अनुसार दुष्टों का नाश करना कल्याणकारक न होता अर्थात् पुरुषार्थ से दुर्बल भावी (होनहार) को मिटाया जा सकता है ॥

प्रतिकूलानुकूलाभ्यां फलाभ्यां च नृपोऽप्यतः ।
ईषन्मध्याधिकाभ्यां च त्रिधा दैवं विचिन्तयेत् ॥ ५५ ॥
इससे राजा प्रतिकूल तथा अनुकूल फल देनेवाले दैव (भाग्य) के थोड़ा, मध्यम तथा अधिक इन तीनों भेदों से तीन प्रकार का समझे ॥

रावणस्य च भीष्मादेर्वनभंगे च गोग्रहे ।
प्रातिकूल्यं तु विज्ञातमकस्माद्वानरान्नरात् ॥ ५६ ॥
रावण को अशोक-वाटिका का अकेले एक हनुमान् नामक वानर द्वारा ध्वंस होने से और अकेले एक नर (अर्जुन) द्वारा भीष्म आदि (दुर्योधन) को विराट नगर में गायों को पकड़ कर रख लेने से दैव की प्रतिकूलता ज्ञात हुई ॥

कालानुकूल्यं विस्पष्टं राघवस्यार्जुनस्य च ।
अनुकूले यदा दैवे क्रियाऽल्पा सुफला भवेत् ॥ ५७ ॥
और रामचन्द्र और अर्जुन के समय की अनुकूलता तो प्रगट ही है। अतः जब दैव अनुकूल रहता है तब थोड़ा भी पुरुषार्थ सफल हो जाता है ॥

महती सत्क्रियाऽनिष्फला स्यात् प्रतिकूलके ।
बलिर्दानेन संबद्धो हरिश्चन्द्रस्तथैव च ॥ ५८ ॥
और दैव प्रतिकूल रहने पर अत्यन्त अच्छी भी क्रिया (पुण्यकार्य) अनिष्ट