शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context॥ श्रीः ॥
शुक्रनीतिः
'विद्योतिनी' हिन्दीव्याख्योपेता
प्रथमोऽध्यायः
प्रणम्य जगदाधारं सर्गस्थित्यन्तकारणम् ।
संपूज्य भार्गवः पृष्टो वन्दितः पूजितः स्तुतः ॥ १ ॥
पूर्वदेवैर्यथान्यायं नीतिसारमुवाच तान् ।
शतलक्षश्लोकमितं नीतिशास्त्रमयोक्तवान् ॥ २ ॥
यदीया मती राजनीतौ विशिष्टा यमाराध्य लोके भवन्तीह शिष्टाः ।
तमानम्य नीतौ भृगो राष्ट्रभाषाऽनुवादं विदध्मस्तदीयाङ्घ्रिदासाः ॥
मङ्गलाचरण तथा ग्रन्थनाम— जगत् की उत्पत्ति, पालन तथा नाश के कारण जगत् के आधार स्वरूप परमात्मा को प्रणाम तथा पूजन कर भृगुपुत्र शुक्राचार्य ने असुरों के द्वारा पूजा, स्तुति तथा वन्दना करने के बाद पूछे जाने पर उनसे न्यायानुसार नीतियों में श्रेष्ठ उस नीतिशास्त्र का वर्णन किया जो एक करोड़ श्लोकों का था, और जिसे भगवान् ब्रह्मा ने लोकहितार्थ संग्रह कर शुक्राचार्य से कहा था ॥
स्वयंभूर्भगवान्लोकहितार्थं संग्रहेण वै ।
तत्सारं तु वसिष्ठाद्यैरस्माभिर्वृद्धिहेतवे ॥ ३ ॥
अल्पायुर्मूढदार्थाय संक्षिप्तं तर्कविस्तृतम् ।
नीतिशास्त्र का उपक्रम— उसके बाद वशिष्ठादिक हम सब ऋषियों ने मनुष्यों की बुद्धि-कामना से उसके सारांश का संग्रह किया जो संक्षिप्त होते हुये भी तर्क से परिपूर्ण है और आधुनिक अल्पजीवी राजा आदि के लिये पढ़ने योग्य है ॥
क्रियैकदेशबोधीनि शास्त्राण्यन्यानि संति हि ॥ ४ ॥
सर्वोपजीवकं लोकस्थितिकृन्नीतिशास्त्रकम् ।
धर्मार्थकाममूलं हि स्मृतं मोक्षप्रदं यतः ॥ ५ ॥