शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
About this granth
The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.
The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६५
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६५
नेत्रयोः कथितं तज्ज्ञैर्गणपस्य विशेषतः।
कर्ण और नेत्र का अन्तर सदा चार अङ्गुल का समझना चाहिये। दोनों नेत्रों के मूल, मध्य तथा अग्रभाग का अन्तर क्रम से दश, सात तथा छः अङ्गुल प्रमाण का विद्वानों ने गणेश की मूर्त्ति के संबन्ध में कहा है।
उत्सेधः पृथुता स्त्रीणां स्तने पञ्चाङ्गुला मता ॥ १८१ ॥
स्त्रीकट्यां परिधिः प्रोक्तस्त्रितालो द्व्यङ्गुलाधिकः।
स्त्रीणःमवयवान् सर्वान् सप्ततालैर्विभावयेत् ॥ १८२ ॥
स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण—स्त्री-मूर्त्तियों में स्तन की ऊंचाई तथा मुटाई पांच अङ्गुल प्रमाण की होनी चाहिये। स्त्री-मूर्त्ति में कमर की परिधि दो अङ्गुल अधिक तीन ताल प्रमाण की कही हुई है। और स्त्री-मूर्त्तियों में सम्पूर्ण अङ्गों का प्रमाण मिलाकर योग सात ताल प्रमाण होना चाहिये।
सप्ततालादिमानेऽपि मुखं स्याद् द्वादशाङ्गुलम् ।
बालादीनामपि सदा दीर्घता तु पृथक् पृथक् ॥ १८३ ॥
सबों के मुख का प्रमाण—इनका सात ताल आदि प्रमाण होने पर भी मुख का प्रमाण बारह ही अङ्गुल का होता है। और बाला आदि मूर्त्तियों के भेदों की लम्बाई सदा पृथक्-पृथक् समझनी चाहिये।
शिशोस्तु कन्धरा ह्रस्वा पृथु शीर्षं प्रकीर्त्तितम् ।
कण्ठाधो वर्धते यादृक् तादृक्शीर्षं न वर्धते ॥ १८४ ॥
बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण—शिशु-मूर्त्ति की ग्रीवा छोटी और शिर बड़ा बनाना चाहिये, क्योंकि जैसा कण्ठ के नीचे का भाग बढ़ता है वैसा सिर नहीं बढ़ता है।
कण्ठाधोमुखमानेन बालः सार्धचतुर्गुणः।
द्विगुणः शिश्नपर्यन्तो ह्यधः शेषं तु सक्थितः ॥ १८५ ॥
सपादद्विगुणौ हस्तौ द्विगुणौ वा मुखेन हि ।
स्थौल्ये तु नियमो नास्ति यथाशोभि प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥
बाल-मूर्त्ति में मुख के प्रमाण की अपेक्षा कण्ठ के नीचे का भाग ४॥ गुना बड़ा होता है। उसमें शिश्न पर्यन्त भाग लंबाई में मुख से दुगुना बड़ा होता है। और शेष जंघा से लेकर नीचे का सारा भाग २। गुना अधिक बड़ा होता है। और मुख की अपेक्षा दोनों हाथ २। गुने अथवा दुगुने लम्बे होते हैं। किन्तु मुटाई में कोई नियम नहीं है उसे जिस प्रकार से देखने में सुन्दर लगे वैसा बनाना चाहिये।
नित्यं प्रवर्धते बालः पञ्चाब्दात् परतो भृशम् ।
| २६६ | शुक्रनीतिः |
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स्यात् षोडशेऽब्दे सर्वाङ्ग-पूर्णा स्त्री विंशतौ पुमान् ॥ १८७ ॥
शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण— बालक पांच वर्ष तक नित्य धीरे-धीरे बढ़ता है किन्तु पांच वर्ष के बाद अत्यन्त तेजी से बढ़ता है। स्त्री १६ वर्ष की अवस्था में सर्वाङ्गों से परिपूर्ण होती है किन्तु पुरुष २० वर्ष की अवस्था में परिपूर्ण अङ्गवाला होता है।
ततोऽर्हति प्रमाणं तु सप्ततालादिकं सदा ।
कश्चिद् बाल्येऽपि शोभाढ्यस्तारुण्ये वार्धके क्वचित् ॥ १८८॥
इससे सदा युवावस्था होने पर ही सात ताल आदि प्रमाण की योग्यता होती है। और कोई बाल्यावस्था में भी शोभायुक्त होता है, और कोई युवावस्था में एवं क्वचित् कोई वृद्धावस्था में शोभायुक्त होता है।
मुखाधस्त्र्यङ्गुला ग्रीवा हृदयं तु नवाङ्गुलम् ।
तथोदरं च बस्तिश्च सक्थि त्वष्टादशाङ्गुलम् ॥ १८९ ॥
त्र्यङ्गुलं तु भवेज्जानु जङ्घा त्वष्टादशाङ्गुला ।
गुल्फाधस्त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं सप्ततालस्य सर्वदा ॥ १९० ॥
सप्त ताल प्रमाण की मूर्त्ति के अवयवों का प्रमाण— मुख के नीचे भाग में ग्रीवा तीन अङ्गुल प्रमाण की। हृदय (वक्षः स्थल) नव अंगुल प्रमाण का तथा उदर और बस्ति (नाभि के नीचे का भाग) भी नव अंगुल प्रमाण का, ऊरु अठारह अङ्गुल प्रमाण का, जानु तीन अंगुल प्रमाण का, जङ्घा अठारह अंगुल प्रमाण की, गुल्फ के नीचे का भाग तीन अंगुल प्रमाण का, सात ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति में सदा होता है।
वेदाङ्गुलं भवेद् ग्रीवा हृदयं तु दशाङ्गुलम् ।
दशाङ्गुलं चोदरं स्याद् बस्तिश्चैव दशाङ्गुलः ॥ १९१ ॥
एकविंशाङ्गुलं सक्थि जानु स्याच्चतुरङ्गुलम् ।
एकविंशाङ्गुला जङ्घा गुल्फाधश्चतुरङ्गुलम् ॥ १९२ ॥
अष्टतालप्रमाणस्य मानमुक्तमिदं सदा ।
चार अंगुल की ग्रीवा, दस अंगुल का हृदय, दस अंगुल का उदर तथा दस अंगुल की बस्ति, इक्कीस अंगुल की ऊरु, बारह अंगुल का जानु, इक्कीस अंगुल की जंघा, चार अंगुल का गुल्फ के नीचे का भाग इस भांति से आठ ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति के अङ्गों के प्रमाण होते हैं।
त्रयोदशाङ्गुलं ज्ञेयं मुखं च हृदयं तथा ॥ १९३ ॥
उदरं च तथा बस्तिर्दशतालेषु सर्वदा ।
दस ताल प्रमाणवाली मूर्त्तियों में सदा मुख, हृदय, उदर तथा बस्ति प्रत्येक तेरह अंगुल प्रमाण का होना चाहिये।
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७
गुल्फाधश्च तथा ग्रीवा जानु पञ्चाङ्गुलं स्मृतम् ॥ १९४ ॥
षड्विंशत्यङ्गुलं सक्थि तथा जङ्घा प्रकीर्त्तिता ।
और गुल्फ के नीचे का भाग, ग्रीवा, जानु प्रत्येक पांच अंगुल प्रमाण का, तथा ऊरु और जंघा प्रत्येक छब्बीस अंगुल प्रमाण का होना चाहिये ।
एकाङ्गलो मूर्ध्नि मणिर्दशताले प्रकल्पेत् ॥ १९५ ॥
पञ्चाशदङ्गुलौ बाहू दशताले स्मृतौ सदा ।
और इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में सिर की मणि एक अंगुल प्रमाण की, तथा दोनों बाहु पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के सदा होने चाहिये ।
द्व्यङ्गुलौ द्व्यङ्गुलौ चोनौ ततो हीनप्रमाणके ॥ १९६ ॥
पाटवं तु यथाशोभि सर्वमानेषु कल्पयेत् ।
इससे (दश ताल से ) हीन प्रमाणवाली मूर्त्ति में प्रत्येक बाहु का प्रमाण दो-दो अंगुल कम होना चाहिये । और सभी प्रकार के प्रमाणों में अङ्गों की सजावट शोभानुसार करनी चाहिये ।
नवतालप्रमाणे न ह्यूनाधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ १९७ ॥
और नव ताल प्रमाण की मूर्त्ति में अङ्गों के प्रमाण में कमी-बेशी नहीं करनी चाहिये ।
दशताले तु विज्ञेयौ पादौ पञ्चदशाङ्गुलौ ।
एकैकाङ्गुलहीनौ ः स्तस्ततो न्यूनप्रमाणके ॥ १९८ ॥
इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के बनाने चाहिये । इससे हीन प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर एक-एक अंगुल कम प्रमाण के होने चाहिये ।
दशतालोर्ध्वमानं तु ताले तालेऽधिकाङ्गुलम् ।
कल्पयेन्मुखतो धीमान् शिल्पवित्सु यथा तथा ॥ १९९ ॥
दश ताल से अधिक प्रमाण की मूर्त्ति में प्रत्येक ताल पर एक २ अंगुल अधिक प्रमाण अंगों का करना चाहिये । और बुद्धिमान मूर्तिकार को मुख से आरम्भ कर पैर पर्यन्त अङ्ग जिस भांति से सुन्दर हो सके वैसा बनाना चाहिये ।
दीर्घोरुजङ्घा विकटा क्रूरा स्याद् भीषणाऽऽसुरी ।
पैशाची प्रतिमा ज्ञेया राक्षसी सुकृशाऽपि वा ॥ २०० ॥
आसुरी आदि मूर्तियों के लक्षण— जिस मूर्त्ति की ऊरु तथा जंघा दीर्घ (लम्बी), हो एवं वह देखने में विकट, क्रूर तथा भीषण आकारवाली हो तो उसे 'आसुरी' और उक्त लक्षणों से युक्त होती हुई जो मूर्त्ति अत्यन्त कृश हो उसे 'पैशाची' अथवा 'राक्षसी' समझनी चाहिये ।
| २६८ | शुक्रनीतिः |
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न पञ्चाङ्गुलतो हीना न षडङ्गुलतोऽधिकाः।
करस्य मध्यमा प्रोक्ता सर्वमानेषु तद्विदैः ॥ २०१ ॥
सभी प्रमाण की मूत्ति में हाथ की मध्यमा अंगुलि पांच अंगुल से कम तथा छः अंगुल से अधिक प्रमाण की नहीं बनानी चाहिये ऐसा मूर्ति-कला के विद्वान लोग कहते हैं।
क्वचित्तु बालसदृशं सदैव तरुणं वयः।
मूर्तीनां कल्पयेच्छिल्पी न वृद्धसदृशं क्वचित् ॥ २०२ ॥
शिल्पी को कभी मूर्त्तियों की वृद्धसदृश कल्पना न करने का निर्देश—
मूर्तिकार कहीं पर बालक के समान और कहीं युवा के समान मूर्ति बनावे किन्तु कहीं पर भी वृद्ध के समान मूर्त्ति न बनावे ।
एवंविधान् नृपो राष्ट्रे देवान् संस्थापयेत् सदा ।
प्रतिसंवत्सरे तेषामुत्सवान् सम्यगाचरेत् ॥ २०३ ॥
**राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश—**राजा अपने राज्य के अन्दर इसी भांति से बनी देव-मूर्तियों को सदा स्थापना करे । और प्रतिवर्ष उनके उत्सव भलीभांति करे ।
देवालये मानहीनां मूर्तिं भग्नां न धारयेत् ।
प्रासादांश्च तथा देवान् जीर्णानुद्धृत्य यत्नतः ॥ २०४ ॥
देवतां तु पुरस्कृत्य नृत्यादीन् वीक्ष्य सर्वदा ।
न मनः स्त्रोपभोगार्थं विदध्यादु यत्नतो नृपः ॥ २०५ ॥
**मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध—**और देवमन्दिर में उक्त प्रकार के प्रमाणों से हीन प्रमाण की अथवा खण्डित मूर्ति को न रहने दे । तथा देवता और उनके मन्दिरों के जीर्ण हो जाने पर उनका यत्नपूर्वक पुनः संस्कार करते हुये और सदा देवताओं के आगे नृत्यादि देखते हुये, राजा यत्नपूर्वक अपने राजोचित भोग भोगने में मनको न प्रवृत्त करे ।
प्रजाभिर्विहिता ये ये ह्युत्सवास्तांश्च पालयेत् ।
प्रजानन्देन संतुष्येत् तद्दुःखैर्दुःखितो भवेत् ॥ २०६ ॥
इति शुक्रनीतौ राष्ट्रमध्यं चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्मनिरूपणं नाम चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥
**प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालने करने का निर्देश—**और प्रजाओं द्वारा जो २ उत्सव किये जाते हों उनकी रक्षा करे एवं प्रजाओं के आनन्द से आनन्दित तथा दुःख से स्वयं दुःखित हो ।
इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में राष्ट्र का मध्य चतुर्थाध्याय का लोकधर्मनिरूपण-नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त हुआ ।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६९
चतुर्थाध्यायस्य पञ्चमं प्रकरणं राजधर्मनिरूपणम्
दुष्टनिग्रहणं कुर्याद् व्यवहारानुदर्शनैः ।
स्वाज्ञया वर्तितुं शक्त्या स्वाधीना च सदा प्रजा ॥ १ ॥
राजा को प्रजा-सुख से सुखी और प्रजा-दुःख से दुखी होने का निर्देश—
विचार के विषय उपस्थित होने पर उसका भलीभांति विचार कर जो दुष्ट हों उनका निग्रह करना चाहिये । ऐसा करने से प्रजा सदा राजा के अधीन रहती है और उसकी आज्ञा के अनुसार कार्य करने में समर्थ होती है । अर्थात् प्रजा जिस प्रकार से स्वेच्छापूर्वक व्यवहार न करे, वैसा करना चाहिये ।
स्वेष्टहानिकरः शत्रुर्दृष्टः पापप्रचारवान् ।
इष्टसंपादनं न्याय्यं प्रजानां पालनं हि तत् ॥ २ ॥
शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण— अपने अभीष्ट की हानि करनेवाला 'शत्रु' और आचरण द्वारा पाप का प्रचार करनेवाला 'दुष्ट' कहलाता है । और न्यायपूर्वक प्रजा का अभीष्ट सिद्ध करना ही प्रजा का 'पालन' कहलाता है ।
शत्रोरनिष्टकरणान्निवृत्तिः शत्रुनाशनम् ।
पापाचारनिवृत्तिर्यैर्दुष्टनिग्रहणं हि तत् ॥ ३ ॥
शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षण— शत्रु को अनिष्ट करने से निवृत्त कर देना ही 'शत्रु का नाश' और पापाचरण से निवृत्त करना 'दुष्ट का निग्रह' कहलाता है ।
स्वप्रजाधर्मसंस्थानं सदसत्प्रविचारतः ।
जायते चार्थसंसिद्धिर्व्यवहारस्तु येन सः ॥ ४ ॥
व्यवहार-लक्षण— जिसके द्वारा सत् और असत् विषय का अच्छी तरह से विचार करने से अपनी प्रजा की धर्म में स्थिति तथा कार्यों की भलीभांति सिद्धि होती है, उसे 'व्यवहार-मुकदमा' कहते हैं ।
धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः ।
सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥ ५ ॥
समाहितमतिः पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् ।
राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देश— राजा क्रोध और लोभ से रहित एवं प्राड्विवाक ( पूछनेवाला और उस पर विचार करनेवाला ), अमात्य, ब्राह्मण और पुरोहित के साथ सावधान होकर न्यायार्थ उपस्थित व्यवहारों को क्रमानुसार देखे ।
नैकः पश्येच्च कार्याणि वादिनोः शृणुयाद्वचः ॥ ६ ॥
रहसि च नृपः प्राज्ञः सभ्याश्चैव कदाचन ।
| २७० | शुक्रनीतिः |
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बुद्धिमान राजा अथवा न्याय-सभा के सदस्यगण अकेले एकान्त में वादी-प्रतिवादी के कार्यों (मुकदमों) को कभी न देखे और न उनकी बातों को सुने ।
पक्षपाताधिरोपस्य कारणानि च पञ्च वै ॥ ७ ॥
रागलोभभयद्वेषा वादिनोश्च रहःश्रुतिः ।
पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश— पक्षपात रूप दोष के निश्चित रूप से ये ५ कारण हैं—१. राग, २. लोभ, ३. भय, ४. द्वेष, ५. वादी-प्रतिवादी की एकान्त में बातें सुनना ।
पौरकार्याणि यो राजा न करोति सुखे स्थितः ॥ ८ ॥
व्यक्तं स नरके घोरे पच्यते नात्र संशयः ।
राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश— जो राजा सुखभोग में आसक्त रहकर पुरवासी-प्रजाजनों का हित-कार्य मुकदमा आदि देखना, नहीं करता है । वह भविष्य में निश्चित घोर नरक का दुःख भोगेगा । इसमें सन्देह नहीं है ।
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात् कुर्यान्नराधिपः ॥ ९ ॥
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ।
जो राजा मूढतावश अधर्म कार्यों को करता है उस दुरात्मा को शत्रु लोग शीघ्र अपने वश (अधीन) कर लेते हैं ।
अस्वर्ग्या लोकनाशाय परानीकभयावहा ॥ १० ॥
आयुर्बौजहरी राज्ञामस्ति वाक्ये स्वयंकृतिः ।
वादी-प्रतिवादी जनों की बातों को सुनकर राजा यदि सभासदों की राय लिये बिना स्वयं कोई निर्णय करता है तो उससे उसे नरक की प्राप्ति, प्रजाओं का नाश, शत्रुसेनाओं से भय (शत्रुओं की वृद्धि) आयु का क्षय इत्यादि होते हैं ।
तस्माच्छास्त्रानुसारेण राजा कार्याणि साधयेत् ॥ ११ ॥
इससे राजा को शास्त्रानुसार कार्यों (मुकद्दमों) को भलीभांति देखना चाहिये ।
यदा न कुर्यान्नृपतिः स्वयं कार्यविनिर्णयम् ।
तदा तत्र नियुञ्जीत ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥ १२ ॥
दान्तं कुलीनं मध्यस्थमनुद्वेगकरं स्थिरम् ।
परत्र भीरुं धर्मिष्ठमुयुक्तं क्रोधवर्जितम् ॥ १३ ॥
स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश— जब राजा स्वयं कार्यों (मुकद्दमों) का निर्णय न करे तब
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७१
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७१
उसके लिये वेद का अच्छा ज्ञाता, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, कुलीन, पक्षपात न करनेवाला, शान्त प्रकृतिवाला, चञ्चलता से रहित, परलोक से डरनेवाला, धार्मिक, उद्योगी और क्रोध से रहित ऐसे ब्राह्मण को नियुक्त करे ।
यदा विप्रो न विद्वान् स्यात् क्षत्रियं तत्र योजयेत् ।
वैश्यं वा धर्मशास्त्रज्ञं शूद्रं यत्नेन वर्जयेत् ॥ १४ ॥
ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश— जब वैसा विद्वान ब्राह्मण न मिले तब उसके लिये (निर्णय के लिये) पूर्वोक्त गुणों से युक्त धर्मशास्त्र का जाननेवाला क्षत्रिय अथवा वैश्य को नियुक्त करे किन्तु शूद्र को यत्नपूर्वक निर्णय के लिये त्याग कर दे अर्थात् उसको नियुक्त न करे ।
यद्वर्णजो भवेद्राजा योष्यस्तद्वर्णजः सदा ।
तद्वर्णे एव गुणिनः प्रायशः सम्भवन्ति हि ॥ १५ ॥
जिस जाति का राजा स्वयं हो निर्णय करने के लिये अपना प्रतिनिधि उसी जाति के व्यक्ति को सदा चुने । क्योंकि प्रायः करके राजा की जाति में ही गुणवान् लोग उत्पन्न होते हैं ।
व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६ ॥
निरालसा जितक्रोध-कामलोभाः प्रियंवदाः ।
राज्ञा नियोजितव्यास्ते सभ्याः सर्वासु जातिषु ॥ १७ ॥
सभासद् के लक्षण— व्यवहार (मुकदमा देखने की रीति) के जाननेवाले, बुद्धिमान, चरित्र, शील तथा गुण से युक्त, शत्रु तथा मित्र के साथ समान व्यवहार करनेवाले (राग-द्वेष से रहित), धर्म के जाननेवाले, सत्यवादी, आलस्य से रहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले, प्रिय वचन बोलनेवाले ऐसे सभी जातियों के व्यक्तियों को राजा द्वारा विचार-सभा का सदस्य (जूरी) नियुक्त करना चाहिये ।
कीनाशाः कारुकाः शिल्पिकुसीदिश्रेणिनर्तकाः ।
लिङ्गिनस्तस्कराः कुर्युः स्वेन धर्मेण निर्णयम् ॥ १८ ॥
अशक्यो निर्णयो ह्यन्यैस्तत्तज्ज्ञैरेव तु कारयेत् ।
राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षण— कीनाश (कृषक), कारु (बढ़ई), शिल्पी (कारीगर), सूद खानेवाले, श्रेणि (निकृष्ट जातियों के संघ), नाचनेवाले, लिङ्गी (भाण-योगी आदि) तथा तस्कर (जाति विशेष) ये सब लोग अपने २ धर्म के अनुसार अपनी २ जातियों के विवाद का निर्णय स्वयं पंचायत द्वारा करें, क्योंकि उनकी जाति के धर्म को न जाननेवाले
२७२ | शुक्रनीतिः
अन्य लोगों से निर्णय होना असंभव है, अतः जिस जाति के लोगों का विवाद हो, उसका निर्णय उसी जाति के लोगों से कराना चाहिये ।
आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः ॥ १९ ॥
न विब्रूयान्नृपो धर्मे चिकीर्षुर्हितमात्मनः ।
राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश— अपना हित चाहनेवाला राजा ब्रह्मचर्यादि आश्रमों में स्थित होकर परस्पर किसी कार्य को लेकर विवाद करनेवाले द्विजातियों के धर्म के विरुद्ध कुछ न कहे।
तपस्विनां तु कार्याणि त्रैविद्यैरेव कारयेत् ॥ २० ॥
मायायोगविदां चैव न स्वयं कोपकारणात् ।
तपस्वियों एवं माया तथा योग विद्या के जाननेवाले लोगों के विवाद का निर्णय वेद के जाननेवाले ब्राह्मणों द्वारा ही कराना चाहिये, अन्य के द्वारा नहीं, क्योंकि विरुद्ध निर्णय होने पर उन लोगों को कोप होगा अतः उससे बचने के लिये स्वयं निर्णय न करे ।
सम्यग्विज्ञानसम्पन्नो नोपदेशं प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
उत्कृष्टजातिशीलानां गुर्वाचार्यतपस्विनाम् ।
स्वयं विशिष्ट ज्ञान से युक्त होने पर भी राजा उत्कृष्ट जाति एवं शील से युक्त, गुरु, आचार्य, एवं तपस्वी लोगों को उपदेश न दे ।
आरण्यास्तु स्वकैः कुर्युः सार्थिकाः सार्थिकैः सह ॥ २२ ॥
सैनिकाः सैनिकैरेव ग्रामेऽप्युभयवासिभिः ।
जंगली लोग जंगलियों के द्वारा, संघ बनाकर रहनेवाले अपने संघ के लोगों के द्वारा एवं सैनिक लोग सैनिकों के द्वारा और ग्राम में भी रहनेवाले लोग ग्राम तथा जंगल दोनों में निवास करनेवालों के द्वारा अपने विवाद का निर्णय करावें ।
अभियुक्ताश्च ये यत्र यन्निबन्धियोजनाः ॥ २३ ॥
तत्रत्यगुणदोषाणां त एव हि विचारकाः ।
राजा ने जहां पर जिन्हें नियुक्त कर दिया है, तथा जिस कार्य के लिये जो नियुक्त हुये हैं वेही वहां के गुण तथा दोषों के विचार करनेवाले वस्तुतः होते हैं।
राजा तु धार्मिकान् सभ्यान् नियुञ्ज्यात् सुपरीक्षितान् ॥ २४ ॥
व्यवहारधुरं वोढुं ये शक्ताः पुङ्गवा इव ।
जो अच्छे बैलों के समान विवाद-निर्णय के भार को धारण करने में भलीभांति समर्थ हों तथा पूर्ण रूप से परीक्षित एवं धार्मिक हों उन्हीं लोगों को राजा निर्णायक सभ्य ( जूरी ) बनाये ।
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७३
लोकवेदज्ञधर्मज्ञाः सप्त पञ्च त्रयोऽपि वा ॥ २५ ॥
यत्रोपविष्टा विप्राः स्युः सा यज्ञसदृशी सभा ।
**यज्ञ-सदृश सभा के लक्षण—**जिस सभा में संख्या में ७, ५ अथवा ३ भी लौकिक तथा वैदिक कृत्यों के जाननेवाले धर्मज्ञ ब्राह्मण बैठे हुये हों, वह यज्ञ के समान समझी जाती है ।
श्रोतारो वणिजस्तत्र कर्तव्याः सुविचक्षणाः ॥ २६ ॥
**सभा में सुननेवालों में वैश्यों के रहने का निर्देश—**और उस सभा में श्रोता के रूप में अत्यन्त विचक्षण ( पण्डित ) वैश्यों को भी रखना चाहिये ।
अनियुक्तो नियुक्तो वा धर्मज्ञो वक्तुमर्हति ।
दैवीं वाचं स वदति यः शास्त्रमुपजीवति ॥ २७ ॥
जो धर्मशास्त्र का जाननेवाला हो उसकी चाहे नियुक्ति हो या न हो, किन्तु फिर भी उसे सभा में बोलना उचित ही होता है, क्योंकि जो शास्त्रानुसार आचरण करनेवाला होता है उसकी वाणी देवता के समान मानी जाती है ।
सभा वा न प्रवेष्टव्या वक्तव्यं वा समञ्जसम् ।
अब्रुवन् विब्रुवंश्चापि नरो भवति किल्बिषी ॥ २८ ॥
**सभा में जाने का नियम—**पहले तो विचार-सभा में जाना ही नहीं चाहिये, और यदि जाय तो जो सत्य बात हो उसे अवश्य ही कहना चाहिये । क्योंकि सभा में जाकर भी उचित बात न कहनेवाला अथवा अनुचित कहने-वाला, दोनों ही व्यक्ति पापभागी होते हैं ।
राज्ञा ये विदिताः सम्यक् कुलश्रेणिगणादयः ।
साहसस्तेयवर्ज्यानि कुर्युः कार्याणि ते नृणाम् ॥ २९ ॥
**सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम-निर्देश—**राजा जिन्हें भलीभांति से न्यायपरायण समझता हो ऐसे कुल, श्रेणि ( पञ्चायत ) और गण ( बोर्ड ) के लोगों को साहस ( बांका ) और स्तेय ( चोरी ) को छोड़ कर अन्य लोगों के मुकदमों का निर्णय करने का कार्य-भार देवे ।
विचार्या श्रेणिभिः कार्यं कुलैर्यन्न विचारितम् ।
गणैश्च श्रेण्यविज्ञातं गणाज्ञातं नियुक्तकैः ॥ ३० ॥
**निर्णायकों का तारतम्य—**उपयुक्त कुलों के द्वारा जिनका उचित निर्णय न हो सका है, उनका निर्णय श्रेणियों के द्वारा करना चाहिये । और श्रेणियों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर गणों के द्वारा, एवं गणों के द्वारा उचित निर्णय न होने पर राजा से नियुक्त किये हुये जजों के द्वारा निर्णय कराना चाहिये ।
१८ शु०
२७४ | शुक्रनीतिः
कुलादिभ्योऽधिकाः सभ्यास्तेभ्योऽध्यक्षोऽधिकः कृतः ।
सर्वेषामधिको राजा धर्माधर्मनियोजकः ॥ ३१ ॥
पूर्वोक्त कुलादिकों से अधिक सभ्यों ( जूरियों ) का निर्णय माननीय होता है, उनसे अधिक अध्यक्ष ( जज ) का निर्णय माननीय होता है। और इन सबों से अधिक धर्मा-धर्म का निर्णय करने में राजा की मान्यता होती है।
उत्तमाऽधममध्यानां विवादानां विचारणात् ।
उपर्युपरिबुद्धीनां चरन्तीश्वरबुद्धयः ॥ ३२ ॥
क्योंकि राजा उत्तम, मध्यम तथा अधम श्रेणी के सभी विवादों (मुकदमों) का निर्णायक प्रधान रूप से होता है। और उसकी बुद्धि साधारण निर्णायकों की बुद्धि से अधिक ऊँची होती है।
एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्यनिर्णयम् ।
तस्माद् बहुागमः कार्यो विवादेषूत्तमो नृपैः ॥ ३३ ॥
**निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण—**केवल एक ही शास्त्र का जानने-वाला व्यक्ति विवाद का निर्णय करना नहीं जान सकता है, अतः बहुत से शास्त्रों के ज्ञाता किसी उत्तम व्यक्ति को ही राजा निर्णायक नियुक्त करे।
स ब्रूते यं स धर्मः स्यादेको वाऽध्यात्मचिन्तकः ।
**धर्म का लक्षण—**और जो आत्म-तत्त्व का जाननेवाला व्यक्ति होता है, वह अकेला ही जो कहता है वह धर्म माना जाता है अर्थात् उसका निर्णय सर्वमान्य होता है।
एकद्वित्रिचतुर्वारं व्यवहारानुचिन्तनम् ॥ ३४ ॥
कार्यं पृथक् पृथक् सभ्यै राज्ञा श्रेष्ठोत्तरैः सह ।
**अनुचिन्तन-प्रकार का निर्देश—**राजा सबसे श्रेष्ठ सभ्यों (जूरियों) के साथ मिल कर पृथक् २ मुकदमे की गुरुता-लघुता जैसी हो उसके अनुसार एक बार अथवा २, ३, या ४ बार विचार कर निर्णय करे।
अर्थिप्रत्यर्थिनौ सभ्यांल्लेखकप्रेक्षकांश्च यः ॥ ३५ ॥
धर्मवाक्यै रञ्जयति स सभास्तारतामियात् ।
जो विचारपति या सभ्य ( जूरी ) वादी-प्रतिवादी, सभ्यों (जूरियों), लेखकों या दर्शकों को धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न करता है, वह सभ्यों में श्रेष्ठता को प्राप्त करता है। अर्थात् सर्वोत्तम समझा जाता है।
नृपोऽधिकृतसभ्याश्च स्मृतिर्गणकलेखकौ ॥ ३६ ॥
हेमाग्न्यम्बुस्वपुरुषाः साधनाङ्गानि वै दश ।
**दश साधनों का निर्देश—**१. राजा, २. अधिकारी सभ्य (विद्वान
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७५
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७५
किये हुये जूरी ), ३. स्मृति ( धर्मशास्त्र ), ४. गणक ( गणना करनेवाला ), ५. लेखक ( लिखनेवाला ), ६. सुवर्ण, ७. अग्नि, ८. जल, ९. धन, १०. पुरुष ( कर्मचारी ), ये १० व्यवहार ( मुकद्दमा ) निर्णय करने में साधन के अङ्ग हैं।
एतद्दशाङ्गकरणं यस्यामध्यास्य पार्थिवः ॥ ३७ ॥
न्यायान् पश्येत् कृतमतिः सा सभाऽध्वरसन्निभा ।
**यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण का निर्देश—**इस प्रकार से परिमार्जित बुद्धिवाला राजा जिस सभा में उपर्युक्त १० साधनों का आश्रय लेकर न्याय ( मुकद्दमों ) को देखता है ( निर्णय करता है ) उसे यज्ञ-सभा के समान समझना चाहिये।
दशानामपि चैतेषां कर्म प्रोक्तं पृथक् पृथक् ॥ ३८ ॥
वक्ताऽध्यक्षो नृपः शास्ता सभ्याः कार्य्यपरीक्षकाः ।
स्मृतिर्विनिर्णयं ब्रूते जयं दानं दमं तथा ॥ ३९ ॥
**दशाङ्गों के कर्मों का पृथक् २ निर्देश—**पूर्वोक्त इन १० साधनों के कर्म भी पृथक् २ कहे हुये हैं। जैसे—१. अध्यक्ष ( अधिकारी पुरुष ) विवाद-निर्णय का प्रकाशक होता है एवं २. राजा—शासन करनेवाला, ३. सभ्यगण ( जूरीगण )—निर्णय के औचित्य की परीक्षा करनेवाले होते हैं और ४. स्मृति ( मन्वादिस्मृति )—इसके द्वारा विवाद का निर्णय, मन्त्र जप, दान तथा इन्द्रियादि-निग्रह का ज्ञान होता है।
शपथार्थे हिरण्याग्नी अम्बु तृषितक्षुब्धयोः ।
गणको गणयेदर्थं लिखेन्न्याय्यं च लेखकः ॥ ४० ॥
५-६. शपथ ग्रहण करने के लिये सोना तथा अग्नि, ७. जल—इसका प्रयोग प्यासे तथा क्रोधी के लिये होता है ८. गणक—यह विवाद की शुभा-शुभ की गणना करनेवाला होता है। ९. लेखक—न्याय-संगत विषयों का लिखनेवाला होता है।
शब्दाभिधानतत्त्वज्ञौ गणनाकुशलौ शुची ।
नानालिपिज्ञौ कर्त्तव्यौ राज्ञा गणकलेखकौ ॥ ४१ ॥
**गणक तथा लेखक के लक्षण—**शब्द तथा अर्थ के तत्त्वज्ञ, गणना करने में कुशल, निर्दोष, नाना प्रकार की लिपियों के ज्ञाता ऐसे लक्षणों से युक्त गणक तथा लेखक की नियुक्ति राजा करे।
धर्मशास्त्रानुसारेण ह्यर्थशास्त्रविवेचनम् ।
यत्राधिक्रियते स्थाने धर्माधिकरणं हि तत् ॥ ४२ ॥
**धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश—**जिस स्थान पर धर्मशास्त्र के अनुसार
२७६ | शुक्रनीतिः
अर्थशास्त्र की विवेचना अधिक रूप से की जाय उसे धर्माधिकरण (न्यायालय-कचहरी) कहते हैं।
व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः।
मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत् सभाम् ॥ ४३ ॥
**राजासभा में प्रवेश करने का प्रकार—**व्यवहारों (मुकदमों) को देखने की इच्छा रखने वाला राजा विनीत भाव से मन्त्रणा करने में कुशल ब्राह्मणों तथा मन्त्रियों के साथ न्यायसभा में प्रवेश करे।
धर्मासनमधिष्ठाय कार्यदर्शनमारभेत्।
पूर्वोत्तरसमो भूत्वा राजा पृच्छेद्दिवादिनौ ॥ ४४ ॥
**सभा में राजा के कृत्यों का निर्देश—**इस प्रकार से राजा धर्मासन (न्यायासन) पर बैठकर मुकदमा देखना शुरू करे। वादी-प्रतिवादी दोनों में समभाव रखकर राजा उन दोनों से प्रश्न करे।
प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः।
जातिजानपदान् धर्माञ्छ्रेणिधर्मांस्तथैव च ॥ ४५ ॥
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपालयेत्।
**राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश—**प्रतिदिन लोक तथा शास्त्रों में देखे गये कारणों के द्वारा जाति, देश, श्रेणि एवं कुल के धर्मों को भलीभांति देख कर राजा अपना (विचारपूर्वक मुकदमों का निर्णय करना रूप) धर्म का पालन करे।
देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्राक् प्रवर्तिताः ॥ ४६ ॥
तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा।
**देश-जाति-कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश—**देश, जाति एवं कुल के जो धर्म जिस भांति से पहले से चले आये हों उनका उसी भांति से पालन करना चाहिये। अन्यथा अपने मनसे यदि राजा कुछ उनमें परिवर्त्तन करे तो उससे प्रजा में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है।
उद्वह्यते दाक्षिणात्यैर्मातुलस्य सुता द्विजैः ॥ ४७ ॥
मध्यदेशे कर्मकराः शिल्पिनश्च गवाशिनः।
**देश-जाति-कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश—**जैसे दक्षिण देश के ब्राह्मण लोग मामा की कन्या (ममेरी बहिन) के साथ विवाह करते हैं। मध्य देश में कर्मकर तथा शिल्पी गोमांसभक्षी होते हैं।
मत्स्यादाश्च नराः सर्वे व्यभिचाररताः स्त्रियः ॥ ४८ ॥
उत्तरे मद्यपा नार्यः स्पृश्या नृणां रजस्वलाः।
और उत्तर देश में सभी लोग मछली खानेवाले होते हैं तथा स्त्रियां
चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७७
व्यभिचार कराने वाली एवं मद्य पीनेवाली होती हैं एवं वहां के लोग रजस्वला स्त्रियों का भी स्पर्श करते हैं, जो कि निषिद्ध है ।
खशजाताः प्रगृह्णन्ति भ्रातृभार्यामभर्तृकाम् ॥ ४९ ॥
अनेन कर्मणा नैते प्रायश्चित्तदण्डार्हकाः ।
और खस जाति के लोग विधवा भाई की स्त्री के साथ विवाह करते हैं । इन सब पूर्वोक्त निषिद्ध कर्मों के करने से भी ये सब राजा के द्वारा प्रायश्चित्त तथा दण्ड के अधिकारी नहीं होते हैं ।
येषां परम्पराप्राप्ताः पूर्वजैरप्यनुष्ठिताः [॥ ५० ॥
त एव तैर्न दुष्येयुराचारान्नेतरस्य तु ।
जिन जाति, देश तथा कुलों के जो प्राचीनकाल से प्रचलित एवं उनके पूर्वजों के द्वारा सदा पालन किये जाते हुये जैसे धर्म हों उनका वैसे ही पालन करना चाहिये । अतः राजा एक दूसरे के धर्मविषयक आचारों को दूषित न करने देवें, अर्थात् जिसका जैसा आचार हो उसको वैसा करने देवें ।
परस्त्रीधनसंलुब्धा मद्यासक्तरताः कलौ ॥ ५१ ॥
विज्ञानलवदुर्दग्धाः प्रायः श्रीसंयुताश्च ये ।
तन्त्रकर्मरता वेदविमुखाः स्युः सदैव हि ॥ ५२ ॥
महादण्डेन चैतेषां कुर्यात् संशोधनं नृपः ।
कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश— कलियुग में जो धनवान् हैं वे प्रायः करके दूसरे की स्त्री तथा धन के अधिक लोभी, मद्यपान करने में आसक्त, थोड़े ज्ञान से भी अपने को सबसे अधिक पण्डित माननेवाले, तन्त्र कर्म करने में रत एवं वेदविमुख सदा होते हैं, राजा इन सबों को महादण्ड से भलीभांति दण्डित करे ।
न्यायाम्पश्येत्तु मध्याह्ने पूर्वाह्ने स्मृतिदर्शनम् ॥ ५३ ॥
न्यायादिकों के समय का निर्देश— राजा मध्याह्नकाल में न्याय (मुकदमों) को देखे । पूर्वाह्न (दोपहर के पूर्व) में स्मृतियों को देखे ।
मनुष्यमारणे स्तेये साहसेऽत्ययिके सदा ।
न कालनियमस्तत्र सद्य एव विवेचनम् ॥ ५४ ॥
मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश— किन्तु मनुष्य के मारने पर एवं चोरी, डांका किंवा अन्य नाशजनक मुकदमों के देखने में समय का नियम नहीं है बल्कि उन सबों में तत्काल ही विचार करना उचित होता है ।
धर्मासनगतं दृष्ट्वा राजानं मन्त्रिभिः सह ।
गच्छेन्निवेद्यमानं यत् प्रविरुद्धमधर्मतः ॥ ५५ ॥
२७८ | शुक्रनीतिः
यथासत्यं चिन्तयित्वा लिखित्वा वा समाहितः।
नत्वा वा प्राञ्जलिः प्रह्वो ह्यर्थी कार्यं निवेदयेत्॥ ५६॥
**राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश—**न्यायासन पर मन्त्रियों के साथ बैठे हुये राजा को देखकर प्रार्थी उनके पास जावे। और जाकर अधर्म से रहित जो निवेदन करना हो उसे यथार्थ रूप से विचार कर और सावधान-चित्त से उसे लिखकर नमस्कार करते हुये हाथ जोड़ कर नम्रता के साथ कार्य का निवेदन करे (दावा दाखिल करे)।
यथार्हमेनमभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः।
सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्मं प्रतिपादयेत्॥ ५७॥
**अर्थी के लिये राजा के कार्यों का निर्देश—**ब्राह्मणों के साथ राजा उक्त प्रार्थी का यथायोग्य संमान कर और सर्वप्रथम सान्त्वनासूचक शब्दों से सान्त्वना देकर स्वधर्म-पालन (मुकदमा देखना) प्रारम्भ करे।
काले कार्यार्थिनं पृच्छेत् प्रणतं पुरतः स्थितम्।
किं कार्यं क्व च ते पीडा मा भैषीर्ब्रूहि मानव॥ ५८॥
केन कस्मिन् कदा कस्मात् पीडितोऽसि दुरात्मना।
एवं पृष्ट्वा स्वभावोक्तं तस्य संशृणुयाद्वचः॥ ५९॥
समयानुसार राजा विनम्रभाव से संमुख में स्थित उस कार्यार्थी (मुकदमा दायर करनेवाले) से "हे भला आदमी! तुम्हारा क्या कार्य है? क्या कष्ट है? मत डरो! मुझसे कहो! तुम्हें किस दुरात्मा ने कहाँ पर, किस समय, क्यों पीड़ा पहुँचाई है?" इस प्रकार से पूछ कर उसके स्वाभाविक रीति से कहे हुये वचन को सुने।
प्रसिद्धलिपिभाषाभिस्तदुक्तं लेखको लिखेत्।
**लेखक के कृत्यों का वर्णन—**और लेखक उसके कहे हुये वाक्यों को उस समय की लिपि और भाषा में लिखे।
अन्यदुक्तं लिखेदन्योऽर्थिप्रत्यर्थिनां वचः॥ ६०॥
चौरवत् त्रासयेद् राजा लेखकं द्रागतन्द्रितः।
**राजा को अन्यथा लेख लिखनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**और यदि कोई लेखक वादी-प्रतिवादी के कहे हुये वचन को जैसा वह कहता है वैसा नहीं लिखे 'अर्थात् भिन्न रीति से लिखे' तो राजा उसे अविलम्ब चोर की भांति दण्ड देने में तत्परता रक्खे।
लिखितं तादृशं सभ्या न बिब्रूयुः कदाचन॥ ६१॥
बलाद् गृह्णन्ति लिखितं दण्डयेत्तांस्तु चौरवत्।
और सभ्य (जूरी) लोग भी उक्त रीति से लिखे हुये (अन्यथा) लेख
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७९
(बयान) का कभी भी अनुमोदन न करें। यदि वे लोग अपने अधिकार के बल से उक्त लेख का अनुमोदन करें तो राजा उन लोगों को चोर की भाँति दण्ड दे।
प्राड्विवाको नृपाभावे पृच्छेदेवं समागतम् ॥ ६२ ॥
**राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश—**और राजा के उपस्थित न रहने पर प्राड्विवाक (जज) न्यायालय में उपस्थित वादी से पूर्वोक्त रीति से पूछे।
वादिनौ पृच्छति प्राङ् वा विवाको विविनक्त्यतः ।
विचारयति सभ्यैर्वा धर्माऽधर्मान् विवक्ति वा ॥ ६३ ॥
**प्राड्विवाक शब्द के अर्थका निर्देश—**विचारपति (जज) को 'प्राड्विवाक' इसलिये कहते हैं कि—वह वादी-प्रतिवादी से पूछता है अतः 'प्राङ्' कहलाता है और विचार करता है अतः 'विवाक' कहलाता है अतः दोनों मिलकर 'प्राड्विवाक' सिद्ध होता है और वही विचारपति सभ्यों के साथ मिलकर धर्माधर्म का विचार करता है अथवा विशेष रूप से अपना निर्णय कहता है।
सभायां ये हिता योग्याः सभ्यास्ते चापि साधवः।
राजसभा (न्यायालय) में जो हित चाहनेवाले, कार्य करने में चतुर एवं सज्जन हों, उन्हीं को सभ्य (जूरी) बनाना चाहिये।
स्मृत्याचारव्यपेतेन मार्गेणाधर्षितः परैः ॥ ६४ ॥
आवेदयति चेद्राज्ञे व्यवहारपदं हि तत्।
**व्यवहार पद का कथन—**धर्मशास्त्र एवं सदाचार से विरुद्ध मार्ग का आश्रय लेकर दूसरों के द्वारा पीडित किये जाने पर यदि कोई राजा के पास न्यायालय में आवेदन पत्र देता है उसे 'व्यवहार पद' (मुकदमा दायर करना) का स्थान कहते हैं।
नोत्पादयेत् स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः ॥ ६५ ॥
न रागेण न लोभेन न क्रोधेन प्रसेन्नृपः।
परैरप्रापितानर्थांश्च चापि स्वमनीषया ॥ ६६ ॥
**राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध—**राजा या उसके अधिकारी पुरुष स्वयं किसी विवाद (मुकदमा) को न्यायालय में न उपस्थित करें। और राजा अनुराग, लोभ या क्रोध के वशीभूत होकर किसी को पीड़ित न करे। और वादी-प्रतिवादी के बिना उपस्थित किये राजा अपनी बुद्धि से किसी मुकदमा को न्यायालय में न उपस्थित करे।
छलानि चापराधांश्च पदानि नृपतेस्तथा।
| २८० | शुक्रनीतिः |
|---|
स्वयमेतानि गृह्णीयान्नृपस्त्व्यावेदकैर्विना ॥ ६७ ॥
सूचकस्तोभकाभ्यां वा श्रुत्वा चैतानि तत्त्वतः ।
राजा को छलादि का बिना निवेदन किये भी ग्रहण करने का निर्देश—
किन्तु बिना किसी के द्वारा मुकदमा दायर किये ही राजा स्वयं आगे कहे जानेवाले छल, अपराध तथा राजा के पद (विवाद-स्थान) इन सबों को सूचक (जासूस) अथवा स्तोभक (मुखबिर) के द्वारा सुनने के बाद ठीक २ जानकर मुकदमा कायम करे।
शास्त्रेणानिन्दितस्त्वर्थी नापि राज्ञा प्रचोदितः ॥ ६८ ॥
आवेदयति यत्पूर्व्वं स्तोभकः स उदाहृतः ।
स्तोभक के लक्षण — जो शास्त्र से अनिन्दित हो एवं राजा के द्वारा आवेदनार्थ प्रेरित न किया गया हो किन्तु यदि वह पहले ही आकर राजा से निवेदन करता है, उस आवेदन-कर्त्ता को स्तोभक कहते हैं।
नृपेण विनियुक्तो यः परदोषानुवीक्षणे ॥ ६९ ॥
नृपं संसूचयेज्ज्ञात्वा सूचकः स उदाहृतः ।
सूचक के लक्षण— राजा के द्वारा जो दूसरे के दोषों को निरीक्षण करने के लिये नियुक्त किये जाने पर उसे जान कर राजा को सूचित करता है, वह 'सूचक' कहलाता है।
पथिभङ्गी पराच्छेपी प्राकारोपरिलङ्घकः ॥ ७० ॥
निपानस्य विनाशी च तथा चायतनस्य च ।
परिखापूरकश्चैव राजच्छिद्रप्रकाशकः ॥ ७१ ॥
अन्तःपुरं वासगृहं भाण्डागारं महानसम् ।
प्रविशत्यनियुक्तो यो भोजनं च निरीक्षते ॥ ७२ ॥
विण्मूत्रश्लेष्मवातानां क्षेप्ता कामान् नृपाग्रतः ।
पर्य्यङ्कासनबन्धी चाप्यप्रस्थानविरोधकः ॥ ७३ ॥
नृपातिरिक्तवेषश्च विधृतः प्रविशेच्च यः ।
यश्चापद्वारेण विशेद्वेलायां तथैव च ॥ ७४ ॥
शय्यासने पादुके च शयनासनारोहणे ।
राजन्यासनशयने यस्तिष्ठति समीपतः ॥ ७५ ॥
राज्ञो विद्विष्टसेवी चाप्यदत्तविहितासनः ।
अन्यवस्त्राभरणयोः स्वर्णस्य परिधायकः ॥ ७६ ॥
स्वयंग्राहेण ताम्बूलं गृहीत्वा भक्षयेत्तु यः ।
अनियुक्तप्रभाषी च नृपाक्रोशक एव च ॥ ७७ ॥
एकवासास्तथाऽभ्यक्तो मुक्तकेशोऽवगुण्ठितः ।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८१
विचित्रिताङ्गः स्रग्वी च परिधानविधूनकः ॥ ७८ ॥
शिरःप्रच्छादकश्चैव छिद्रान्वेषणतत्परः ।
आसङ्गी मुक्तकेशश्च घ्राणकर्णाक्षिदर्शकः ॥ ७९ ॥
दन्तोल्लेखनकश्चैव कर्णनासाविशोधकः ।
राज्ञः समीपे पञ्चाशच्छलान्येतानि सन्ति हि ॥ ८० ॥
पञ्चाशत् (५०) छलों का वर्णन— १. मार्ग को नष्ट करनेवाला, २. दूसरे का अपमान करनेवाला, ३. प्राकार (चहार-दीवारी) का लांघनेवाला ४. पीने के लिये बने हुये जलाशय को नष्ट या दूषित करनेवाला, ५. रहने के लिये बने हुये स्थान को नष्ट या दूषित करनेवाला, ६. परिखा (खाई) को पाटनेवाला, ७. राजा के दोषों को प्रकाशित करनेवाला, ८. बिना आज्ञा लिये अन्तःपुर (जनानखाने) में घुस जानेवाला, ९. बिना आज्ञा के वासगृह (रहने का स्थान), १०. भाण्डगृह (खजाना), ११. या महानस (रसोई गृह) में घुसनेवाला, १२. भोजन करते समय खानेवाले को एकटक देखनेवाला, १३. जानबूझ कर मल, १४. मूत्र, १५. कफ १६. अधोवायु का त्याग करनेवाला, १७. राजा के आगे वीरासन बांधकर घमण्ड से बैठनेवाला, १८. राजा के बैठने के आगे के स्थान को छेकनेवाला, १९. राजा से अधिक वेष-भूषा धारण किये हुये राजा के सामने उपस्थित होनेवाला, २१. किसी के गृह में प्रधान द्वार को छोड़कर अन्य मार्ग से प्रवेश करनेवाला, २२. असमय में किसी के घर में जानेवाला, २३. बिना अनुमति के किसी की शय्या पर शयन करनेवाला २४. आसन पर बैठनेवाला, २५. या खड़ाऊं अथवा जूता पहननेवाला, २६. राजा के सोने के समय शय्या पर पहुँच जाने पर भी उनके समीप ठहरनेवाला, २७. राजा के शत्रु की भी सेवा करनेवाला, २८. बिना अनुमति के किसी के गृह में ठहर जानेवाला, २९. बिना अनुमति के किसी के वस्त्र, ३०. आभूषण, ३१. या स्वर्ण का धारण करनेवाला, ३२. जबरदस्ती दूसरे के पान को लेकर खानेवाला, ३३. भाषण के लिये नियुक्त न किये जाने पर भी भाषण करनेवाला, ३४. राजा की निन्दा करनेवाला, ३५. राजा के समीप में केवल एक वस्त्र पहननेवाला, ३६. तेल लगाकर जानेवाला, ३७. केश खोल कर जानेवाला, ३८. मुख ढँक कर जानेवाला, ३९. विचित्र ढङ्ग से अङ्गों को बनाकर जानेवाला, ४०. माला पहनकर जानेवाला, ४१. पहिने हुये वस्त्र को हिलानेवाला, ४२. सिर को ढँकनेवाला, ४३. दूसरे के छिद्रों को ढूंढ़नेवाला, ४४. मद्यपानादि व्यसन करनेवाला, ४५. वेश-भूषादि का त्याग करनेवाला, ४६. अपनी नाक, ४७. कान, ४८. या आंख को विशेष रूप से दिखानेवाला, ४९. दांत को कुरेदनेवाला,
२८२ शुक्रनीतिः
१०. कान या नाक से मल निकालनेवाला, राजा के समीप में ये ५० दुष्ट (दोष) माने जाते हैं।
आज्ञोल्लङ्घनकारित्वं स्त्रीवधो वर्णसङ्करः।
परस्त्रीगमनं चौर्यं गर्भश्चैव पतिं विना ॥ ८१ ॥
वाक्पारुष्यमवाच्याद्यं दण्डपारुष्यमेव च।
गर्भस्य पातनं चैवेत्यपराधा दशैव तु ॥ ८२ ॥
दश अपराधों का वर्णन— १. आज्ञा का उल्लङ्घन करना, २. स्त्री की हत्या करना, ३. विवाह द्वारा वर्णसङ्करता करना, ४. पर-स्त्री गमन करना, ५. चोरी करना, ६. पति के अलावा अन्य पुरुष से गर्भ होना, ७. कठोर वचन बोलना, ८. नहीं कहने योग्य बातें कहना ९. कठोर दण्ड देना, १०. गर्भ का गिराना इस प्रकार से ये १० अपराध होते हैं।
उत्कृती सस्यघाती चाप्यग्निदश्च तथैव च।
राज्ञो द्रोहप्रकर्ता च तन्मुद्राभेदकस्तथा ॥ ८३
तन्मन्त्रस्य प्रभेत्ता च बद्धस्य च विमोचकः।
अस्वामिविक्रयं दानं भागं दण्डं विचिन्वति ॥ ८४ ॥
पटहाघोषणाच्छादी द्रव्यमस्वामिकं च यत्।
राजाबलीढद्रव्यं च यच्चैवाङ्गविनाशनम् ॥ ८५ ॥
द्वाविंशतिपदान्याहुर्नृपज्ञेयानि पण्डिताः।
राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन— १. उद्वेग करनेवाला २. धान्य (खेती) नष्ट करनेवाला, ३. गृहादि में अग्नि लगानेवाला, ४. राजद्रोह करनेवाला, ५. राजचिह्न को नष्ट करनेवाला, ६. राजा की गुप्त मन्त्रणा को प्रकाशित करनेवाला, ७. कैदियों को जेल से भगानेवाला, ८. बिना स्वामी के वस्तु को बेंच देना, ९. किसी के दान, हिस्सा, और दण्ड को लुप्त करनेवाला, ९. राजा के द्वारा जिस विषय की डुग्गी पिटा दी गई हो, उसको छिपानेवाला, १०. बिना स्वामी के (लावारिस) द्रव्य को ले लेनेवाला, ११. राजा से ले लिये द्रव्य पर अधिकार जमानेवाला, १२. किसी अङ्गों को काट देना, ये पूर्वोक्त १० अपराधों के सहित २२ पद अर्थात् विवाद के स्थान कहे हुये हैं जिसे पण्डितों को जानना चाहिये।
उद्धतः क्रूरवाग्वेषो गर्वितश्चण्ड एव हि ॥ ८६ ॥
सहासनश्चाभिमानी वादी दण्डमवाप्नुयात्।
दण्ड-योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश— जो वादी उद्धत स्वभाववाला, निष्ठुर वचन बोलनेवाला एवं निष्ठुर कार्य करने योग्य वेषवाला, गर्वी, अत्यन्त
। चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८३
क्रोधी, विचारपति (जज) के साथ १ आसन पर बैठनेवाला और अत्यन्त भागी हो तो उसे दण्ड देना चाहिये ।
अर्थिना कथितं राज्ञे तदावेदनसंज्ञकम् ॥ ८७ ॥
कथितं प्राड्विवाकादौ सा भाषाऽखिलबोधिनी ।
स पूर्वपक्षः सभ्यादिस्तं विमृश्य यथार्थतः ॥ ८८ ॥
अर्थितः पूरयेद्धीनं तत्साध्यमधिकं त्यजेत् ।
वादिनश्चिह्नितं साध्यं कृत्वा राजा विमुद्रयेत् ॥ ८९ ॥
आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश—
वादी द्वारा जो राजा के पास आवेदन पत्र दिया जाता है, उसे 'आवेदन' (अर्जी) कहते हैं। और जो प्राड्विवाक (जज) आदि के समक्ष कहा जाता है उसे 'भाषा' (बयान) कहते हैं। जो कि सारी बातों को समझानेवाली होती है। और वही 'पूर्वपक्ष' कहा जाता है। सभ्य (जूरी) आदि उसी पर प्रार्थना किये जाने पर यथार्थ रीति से विचार कर जो कमी हो उसे वादी से पूछकर पूरा कर ले एवं जो अधिक हो उसे निकाल दे। इस भांति से उसके बयान को पूर्ण करके उस पर उसके अंगूठे का निशान लगवावे और अन्त में राजा उस पर अपनी मुहर लगा दे। वादी का यह बयान भी एक प्रकार का साध्य (गवाही) होता है।
अशोधयित्वा पक्षं ये ह्युत्तरं दापयन्ति ताम् ।
रागात्क्षोभाद्भयाद्वापि स्मृत्यर्थे बाधिकारिणः ॥ ९० ॥
सभ्यादीन् दण्डयित्वा तु ह्यधिकारात्निवर्तयेत् ।
पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश—
जो अधिकारी पुरुष राग, क्षोभ या भय से इस प्रकार से बिना वादी के पक्ष का जांच-परताल किये ही प्रतिवादी से उत्तर दिलाते हैं ऐसा करनेवाले उन अधिकारी सभ्य (जूरी) आदि को भविष्य में ऐसा पुनः निन्दित कार्य न करने का स्मरण रखने के लिये राजा दण्डित करे एवं अधिकार-च्युत कर दे।
ग्राह्याग्राह्यं विवादं तु सुविमृश्य समाश्रयेत् ॥ ९१ ॥
सञ्जातपूर्वपक्षं तु वादिनं सन्निरोधयेत् ।
राजाज्ञया सत्पुरुषैः सत्यवाग्भिर्मनोहरैः ॥ ९२ ॥
निरालसैरिङ्गितज्ञैश्च दृढशस्त्रास्त्रधारिभिः ।
पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश—
राजा विवाद (मुकदमा) लेने योग्य है या नहीं इसका भलीभांति विचार कर यदि योग्य हो तो ले ले। और जब वादी का पूर्वपक्ष (बयान) पूरा हो जाय
| २८४ | शुक्रनीतिः |
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तो आगे कहने के लिये उसे अपनी आज्ञा से सत्य बोलनेवाले, मनोहर, आलस्यशून्य, इङ्गित ( इसारे ) को समझनेवाले, दृढ स्वभावों के धारण करनेवाले ऐसे सत्पुरुषों के द्वारा रोकवा दे ।
वक्तव्येऽर्थे ह्यतिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं च तद्वचः ॥ ६३ ॥
आसेधयेद्विवादार्थी यावदाह्वानदर्शनम् ।
प्रत्यर्थिनं तु शपथैराज्ञया वा नृपस्य च ॥ ६४ ॥
जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश— विवादार्थी (वादी) व्यक्ति वक्तव्य अर्थ में स्थित न होते हुये अथवा उसके वचन का अतिक्रमण करते हुये प्रतिवादी व्यक्ति को बुलाने पर आने के साथ ही सौगन्ध देकर अथवा राजाज्ञा से रोक देवे ।
स्थानासेधः कालकृतः प्रवासात् कर्मणस्तथा ।
चतुर्विधः स्यादासेधो नासिद्धस्तं विलङ्घयेत् ॥ ९५ ॥
४ प्रकार के आसेधों का वर्णन— आसेध ४ प्रकार का होता है । १. स्थानकृत, २. कालकृत, ३. प्रवासकृत तथा ४. कर्मकृत आसेध । आसिद्ध ( रोका हुआ ) आसेध ( रोक ) का उल्लङ्घन न करे ।
यस्त्विन्द्रियनिरोधेन व्याहारोच्छ्वासनादिभिः ।
आसेधयेदनासेध्यैः स दण्ड्यो न त्वतिक्रमी ॥ ९६ ॥
यदि कोई मल-मूत्रादियों के द्वारों के निरोध से, कटु वाक्यों से अथवा कठिन शासन आदि जैसे अयोग्य आसेध के प्रकारों से किसी को अर्थात् वादी या प्रतिवादी को रोके तो वह दण्डनीय होता है । किन्तु आसेध का अतिक्रमण करनेवाला नहीं दण्डनीय होता है ।
आसेधकाल आसिद्ध आसेधं योऽतिवर्तते ।
स विनेयोऽन्यथा कुर्वन्नासेद्धा दण्डभाग् भवेत् ॥ ६७ ॥
जो आसेध ( अवरोध ) के समय में अवरुद्ध होकर आसेध का उल्लङ्घन करता है वह दण्डनीय होता है और यदि आसेध करनेवाला अन्यथा रीति से आसेध करे तो वह दण्डनीय होता है ।
यस्याभियोगं कुरुते तत्त्वेनाशङ्कयाऽथवा ।
तमेवाह्वानयेद्राजा मुद्रया पुरुषेण वा ॥ ६८ ॥
जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये राजा का निर्देश— वस्तुतः या सन्देहवश जिसके ऊपर अभियोग ( मुकदमा ) चलाया जाता है, उसी को राजा अपनी मुहर लगे हुये पत्र या राजपुरुष ( सिपाही ) द्वारा न्यायालय में बुलावे ।